उत्तरकाण्ड, सर्ग 24
निवर्तमानः संहृष्टो रावणः स दुरात्मवान् । जह्रे पथि नरेन्द्रर्षिदेवदानवकन्यकाः ॥ १ ॥
भावार्थ
लौटते समय दुरात्मा रावण बड़े हर्षमें भरा था । उसने मार्गमें अनेकानेक नरेशों, ऋषियों, देवताओं और दानवोंकी कन्याओंका अपहरण किया ॥ १ ॥
दर्शनीयां हि यां रक्षः कन्यां स्त्रीं वाथ पश्यति । हत्वा बन्धुजनं तस्या विमाने तां रुरोध सः ॥ २ ॥
भावार्थ
वह राक्षस जिस कन्या अथवा स्त्रीको दर्शनीय रूप-सौन्दर्यसे युक्त देखता, उसके रक्षक बन्धुजनोंका वध करके उसे विमानपर बिठाकर रोक लेता था ॥ २ ॥
एवं पन्नगकन्याश्च राक्षसासुरमानुषीः । यक्षदानवकन्याश्च विमाने सोऽध्यरोपयत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उसने नागों, राक्षसों, असुरों, मनुष्यों, यक्षों और दानवोंकी भी बहुत-सी कन्याओंको हरकर विमानपर चढ़ा लिया ॥ ३ ॥
ता हि सर्वाः समं दुःखान्मुमुचुर्बाष्पजं जलम् । तुल्यमग्न्यर्चिषां तत्र शोकाग्निभयसम्भवम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उन सबने एक साथ ही दुःखके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाना आरम्भ किया । शोकाग्नि और भयसे प्रकट होनेवाले उनके आँसुओंकी एक-एक बूँद वहाँ आगकी चिनगारी-सी जान पड़ती थी ॥ ४ ॥
ताभिः सर्वांनवद्याभिर्नदीभिरिव सागरः । आपूरितं विमानं तद् भयशोकाशिवाश्रुभिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
जैसे नदियाँ सागरको भरती हैं, उसी प्रकार उन समस्त सुन्दरियोंने भय और शोकसे उत्पन्न हुए अमङ्गलजनक अश्रुओंसे उस विमानको भर दिया ॥ ५ ॥
नागगन्धर्वकन्याश्च महर्षितनयाश्च याः । दैत्यदानवकन्याश्च विमाने शतशोऽरुदन् ॥ ६ ॥
भावार्थ
नाग, गन्धर्वों, महर्षियों, दैत्यों और दानवोंकी सैकड़ों कन्याएँ उस विमानपर रो रही थीं ॥ ६ ॥
दीर्घकेश्यः सुचार्वङ्ग्यः पूर्णचन्द्रनिभाननाः । पीनस्तनतटा मध्ये वज्रवेदिसमप्रभाः ॥ ७ ॥ रथकूबरसंकाशैः श्रोणिदेशैर्मनोहराः । स्त्रियः सुराङ्गनाप्रख्या निष्तप्तकनकप्रभाः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उनके केश बड़े-बड़े थे । सभी अङ्ग सुन्दर एवं मनोहर थे । उनके मुखकी कान्ति पूर्ण चन्द्रमाकी छविको लज्जित करती थी । उरोजोंके तटप्रान्त उभरे हुए थे । शरीरका मध्यभाग हीरेके चबूतरेके समान प्रकाशित होता था । नितम्ब-देश रथके कूबर-जैसे जान पड़ते थे और उनके कारण उनकी मनोहरता बढ़ रही थी । वे सभी स्त्रियाँ देवाङ्गनाओंके समान कान्तिमती और तपाये हुए सुवर्णके समान सुनहरी आभासे उद्भासित होती थीं ॥ ७-८ ॥
शोकदुःखभयत्रस्ता विह्वलाश्च सुमध्यमाः । तासां निःश्वासवातेन सर्वतः सम्प्रदीपितम् ॥ ९ ॥ अग्निहोत्रमिवाभाति संनिरुद्धाग्निं पुष्पकम् ।
भावार्थ
सुन्दर मध्यभागवाली वे सभी सुन्दरियाँ शोक, दुःख और भयसे त्रस्त एवं विह्वल थीं । उन ही गरम-गरम निःश्वास-वायुसे वह पुष्पक विमान सब ओरसे प्रज्वलित-सा हो रहा था और जिसके भीतर अग्निकी स्थापना की गयी हो, उस अग्निहोत्रगृहके समान जान पड़ता था ॥ ९½ ॥
दशग्रीववशं प्राप्तास्तास्तु शोकाकुलाः स्त्रियः ॥ १० ॥ दीनवक्त्रेक्षणाः श्यामा मृग्यः सिंहवशा इव ।
भावार्थ
दशग्रीवके वशमें पड़ी हुई वे शोकाकुल अबलाएँ सिंहके पंजेमें पड़ी हुई हरिणियोंके समान दुखी हो रही थीं । उनके मुख और नेत्रोंमें दीनता छा रही थी और उन सबकी अवस्था सोलह वर्षके लगभग थी ॥ १०½ ॥
काचिच्चिन्तयती तत्र किं नु मां भक्षयिष्यति ॥ ११ ॥ काचिद् दध्यौ सुदुःखार्ता अपि मां मारयेदयम् ।
भावार्थ
कोई सोचती थी, क्या यह राक्षस मुझे खा जायगा ? कोई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इस चिन्तामें पड़ी थी कि क्या यह निशाचर मुझे मार डालेगा ? ॥ ११½ ॥
इति मातॄः पितॄन् स्मृत्वा भर्तॄन् भ्रातॄंस्तथैव च ॥ १२ ॥ दुःखशोकसमाविष्टा विलेपुः सहिताः स्त्रियः ।
भावार्थ
वे स्त्रियाँ माता, पिता, भाई तथा पतिकी याद करके दुःख-शोकमें डूब जातीं और एक साथ करुणाजनक विलाप करने लगती थीं ॥ १२½ ॥
कथं नु खलु मे पुत्रो भविष्यति मया विना ॥ १३ ॥ कथं माता कथं भ्राता निमग्नाः शोकसागरे ।
भावार्थ
‘हाय ! मेरे बिना मेरा नन्हा-सा बेटा कैसे रहेगा । मेरी माँकी क्या दशा होगी और मेरे भाई कितने चिन्तित होंगे’ ऐसा कहकर वे शोकके सागरमें डूब जाती थीं ॥ १३½ ॥
हा कथं नु करिष्यामि भर्तुस्तस्मादहं विना ॥ १४ ॥ मृत्यो प्रसादयामि त्वां नय मां दुःखभागिनीम् । किं नु तद् दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम् ॥ १५ ॥ एवं स्म दुःखिताः सर्वाः पतिताः शोकसागरे । न खल्विदानीं पश्यामो दुःखस्यास्यान्तमात्मनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘हाय ! अपने उन पतिदेवसे बिछुड़कर मैं क्या करूँगी ? ( कैसे रहूँगी ) । हे मृत्युदेव ! मेरी प्रार्थना है कि तुम प्रसन्न हो जाओ और मुझ दुखियाको इस लोकसे उठा ले चलो । हाय ! पूर्व-जन्ममें दूसरे शरीरद्वारा हमने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिससे हम सब-की-सब दुःखसे पीड़ित हो शोकके समुद्रमें गिर पड़ी हैं । निश्चय ही इस समय हमें अपने इस दुःखका अन्त होता नहीं दिखायी देता ॥ १४-१६ ॥
अहो धिङ्मानुषं लोकं नास्ति खल्वधमः परः । यद् दुर्बला बलवता भर्तारो रावणेन नः ॥ १७ ॥ सूर्येणोदयता काले नक्षत्राणीव नाशिताः ।
भावार्थ
‘अहो ! इस मनुष्यलोकको धिक्कार है ! इससे बढ़कर अधम दूसरा कोई लोक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ इस बलवान् रावणने हमारे दुर्बल पतियोंको उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे सूर्यदेव उदय लेनेके साथ ही नक्षत्रोंको अदृश्य कर देते हैं ॥ १७½ ॥
अहो सुबलवद् रक्षो वधोपायेषु रज्यते ॥ १८ ॥ अहो दुर्वृत्तमास्थाय नात्मानं वै जुगुप्सते ।
भावार्थ
‘अहो ! यह अत्यन्त बलवान् राक्षस वधके उपायोंमें ही आसक्त रहता है । अहो ! यह पापी दुराचारके पथपर चलकर भी अपने आपको धिक्कारता नहीं है ॥ १८½ ॥
सर्वथा सद्दशस्तावद् विक्रमोऽस्य दुरात्मनः ॥ १९ ॥ इदं त्वसदृशं कर्म परदाराभिमर्शनम् ।
भावार्थ
‘इस दुरात्माका पराक्रम इसकी तपस्याके सर्वथा अनुरूप है, परंतु यह परायी स्त्रियोंके साथ जो बलात्कार कर रहा है, यह दुष्कर्म इसके योग्य कदापि नहीं है ॥ १९½ ॥
यस्मादेष परक्यासु रमते राक्षसाधमः ॥ २० ॥ तस्माद् वै स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः । सतीभिर्वरनारीभिरेवं वाक्येऽभ्युदीरिते ॥ २१ ॥ नेदुर्दुन्दुभयः खस्थाः पुष्पवृष्टिः पपात च ।
भावार्थ
‘यह नीच निशाचर परायी स्त्रियोंके साथ रमण करता है, इसलिये स्त्रीके कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षसका वध होगा’ ॥ उन श्रेष्ठ सती-साध्वी नारियोंने जब ऐसी बातें कह दीं, उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ २१½ ॥
शप्ताः स्त्रीभिः स तु समं हतौजा इव निष्प्रभः ॥ २२ ॥ पतिव्रताभिः साध्वीभिर्बभूव विमना इव ।
भावार्थ
पतिव्रता साध्वी स्त्रियोंके इस तरह शाप देनेपर रावणकी शक्ति घट गयी, वह निस्तेज-सा हो गया और उसके मनमें उद्वेग-सा होने लगा ॥ २२½ ॥
एवं विलपितं तासां शृण्वन् राक्षसपुङ्गवः ॥ २३ ॥ प्रविवेश पुरीं लङ्कां पूज्यमानो निशाचरैः ।
भावार्थ
इस प्रकार उनका विलाप सुनते हुए राक्षसराज रावणने निशाचरोंद्वारा सत्कृत हो लङ्कापुरीमें प्रवेश किया ॥ २३½ ॥
पतसिन्नन्तरे घोरा राक्षसी कामरूपिणी ॥ २४ ॥ सहसा पतिता भूमौ भगिनी रावणस्य सा ।
भावार्थ
इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली भयंकर राक्षसी शूर्पणखा, जो रावणकी बहिन थी, सहसा सामने आकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २४½ ॥
तां स्वसारं समुत्थाप्य रावणः परिसान्त्वयन् ॥ २५ ॥ अब्रवीत् किमिदं भद्रे वक्तुकामासि मां द्रुतम् ।
भावार्थ
रावणने अपनी उस बहिनको उठाकर सान्त्वना दी और पूछा—‘भद्रे ! तुम अभी मुझसे शीघ्रतापूर्वक कौन-सी बात कहना चाहती थी ?’ ॥ २५½ ॥
सा बाष्पपरिरुद्धाक्षी रक्ताक्षी वाक्यमब्रवीत् ॥ २६ ॥ कृतास्मि विधवा राजंस्त्वया बलवता बलात् । एते राजंस्त्वया वीर्याद् दैत्या विनिहता रणे ॥ २७ ॥ कालकेया इति ख्याताः सहस्राणि चतुर्दश ।
भावार्थ
शूर्पणखाके नेत्रोंमें आँसू भरे थे, उसकी आँखें रोते-रोते लाल हो गयी थीं । वह बोली—‘राजन् ! तुम बलवान् हो, इसीलिये न तुमने मुझे बलपूर्वक विधवा बना दिया है ? ॥ ‘राक्षसराज ! तुमने रणभूमिमें अपने बल-पराक्रमसे चौदह हजार कालकेय नामक दैत्योंका वध कर दिया है ॥ २७½ ॥
प्राणेभ्योऽपि गरीयान् मे तत्र भर्ता महाबलः ॥ २८ ॥ सोऽपि त्वया हतस्तात रिपुणा भ्रातृगन्धिना ।
भावार्थ
‘तात ! उन्हींमें मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर आदरणीय मेरे महाबली पति भी थे । तुमने उन्हें भी मार डाला । तुम नाममात्रके भाई हो । वास्तवमें मेरे शत्रु निकले ! ॥ २८½ ॥
त्वयास्मि निहता राजन् स्वयमेव हि बन्धुना ॥ २९ ॥ राजन् वैधव्यशब्दं च भोक्ष्यामि त्वत्कृतं ह्यहम् । ननु नाम त्वया रक्ष्यो जामाता समरेष्वपि ॥ ३० ॥ स त्वया निहतो युद्धे स्वयमेव न लज्जसे ।
भावार्थ
‘राजन् ! सगे भाई होकर भी तुमने स्वयं ही अपने हाथों मेरा ( मेरे पतिदेवका ) वध कर डाला । अब तुम्हारे कारण मैं ‘वैधव्य’ शब्दका उपभोग करूँगी—विधवा कहलाऊँगी ॥ ‘भैया ! तुम मेरे पिताके तुल्य हो । मेरे पति तुम्हारे दामाद थे, क्या तुम्हें युद्धमें अपने दामाद या बहनोईकी भी रक्षा नहीं करनी चाहिये थी ? तुमने स्वयं ही युद्धमें अपने दामादका वध किया है; क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती ?’ ॥ ३०½ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवो भगिन्या क्रोशमानया ॥ ३१ ॥ अब्रवीत् सान्त्वयित्वा तां सामपूर्वमिदं वचः । अलं वत्से रुदित्वा ते न भेतव्यं च सर्वशः ॥ ३२ ॥ दानमानप्रसादैस्त्वां तोषयिष्यामि यत्नतः ।
भावार्थ
रोती और कोसती हुई बहिनके ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उसे सान्त्वना देकर समझाते हुए मधुर वाणीमें कहा—॥ ‘बेटी ! अब रोना व्यर्थ है, तुम्हें किसी तरह भयभीत नहीं होना चाहिये । मैं दान, मान और अनुग्रहद्वारा यत्नपूर्वक तुम्हें संतुष्ट करूँगा ॥ ३२½ ॥
युद्धप्रमत्तो व्याक्षिप्तो जयाकाङ्क्षी क्षिपञ्शरान् ॥ ३३ ॥ नाहमज्ञासिषं युध्यन् स्वान् परान् वापि संयुगे । जामातरं न जाने स्म प्रहरन् युद्धदुर्मदः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘मैं युद्धमें उन्मत्त हो गया था, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था, मुझे केवल विजय पानेकी धुन थी, इसलिये लगातार बाण चलाता रहा । समराङ्गणमें जूझते समय मुझे अपने-परायेका ज्ञान नहीं रह जाता था । मैं रणोन्मत्त होकर प्रहार कर रहा था, इसलिये ‘दामाद’ को पहचान न सका ॥३३-३४ ॥
तेनासौ निहतः संख्ये मया भर्ता तव स्वसः । अस्मिन् काले तु यत् प्राप्तं तत् करिष्यामि ते हितम् ॥३५॥
भावार्थ
‘बहिन ! यही कारण है जिससे युद्धमें तुम्हारे पति मेरे हाथसे मारे गये । अब इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसके अनुसार मैं सदा तुम्हारे हितका ही साधन करूँगा ॥३५॥
भ्रातुरैश्वर्ययुक्तस्य खरस्य वस पार्श्वतः । चतुर्दशानां भ्राता ते सहस्राणां भविष्यति ॥ ३६ ॥ प्रभुः प्रयाणे दाने च राक्षसानां महाबलः ।
भावार्थ
‘तुम ऐश्वर्यशाली भाई खरके पास चलकर रहो । तुम्हारा भाई महाबली खर चौदह हजार राक्षसोंका अधिपति होगा । वह उन सबको जहाँ चाहेगा, भेजेगा और उन सबको अन्न, पान एवं वस्त्र देनेमें समर्थ होगा ॥ ३६½ ॥
तत्र मातृष्वसेयस्ते भ्रातायं वै खरः प्रभुः ॥ ३७ ॥ भविष्यति तवादेशं सदा कुर्वन् निशाचरः ।
भावार्थ
‘यह तुम्हारा मौसेरा भाई निशाचर खर सब कुछ करनेमें समर्थ है और आदेशका सदा पालन करता रहेगा ॥३७½॥
शीघ्रं गच्छत्वयं वीरो दण्डकान् परिरक्षितुम् ॥ ३८ ॥ दूषणोऽस्य बलाध्यक्षो भविष्यति महाबलः ।
भावार्थ
‘यह वीर ( मेरी आज्ञासे ) शीघ्र ही दण्डकारण्यकी रक्षामें जानेवाला है; महाबली दूषण इसका सेनापति होगा ॥३८½॥
तत्र ते वचनं शूरः करिष्यति सदा खरः ॥ ३९ ॥ रक्षसां कामरूपाणां प्रभुरेष भविष्यति ।
भावार्थ
‘वहाँ शूरवीर खर सदा तुम्हारी आज्ञाका पालन करेगा और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंका स्वामी होगा’ ॥ ३९½ ॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवः सैन्यमस्यादिदेश ह ॥ ४० ॥ चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां वीर्यशालिनाम् । स तैः परिवृतः सर्वैः राक्षसैर्घोरदर्शनैः ॥ ४१ ॥ आगच्छत खरः शीघ्रं दण्डकानकुतोभयः । स तत्र कारयामास राज्यं निहतकण्टकम् । सा च शूर्पणखा तत्र न्यवसद् दण्डके वने ॥ ४२ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर दशग्रीवने चौदह हजार पराक्रमशाली राक्षसोंकी सेनाको खरके साथ जानेकी आज्ञा दी । उन भयङ्कर राक्षसोंसे घिरा हुआ खर शीघ्र ही दण्डकारण्यमें आया और निर्भय होकर वहाँका अकण्टक राज्य भोगने लगा । उसके साथ शूर्पणखा भी वहाँ दण्डकवनमें रहने लगी ॥४०-४२॥
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