उत्तरकाण्ड, सर्ग 23
ततो जित्वा दशग्रीवो यमं त्रिदशपुङ्गवम् । रावणस्तु रणश्लाघी स्वसहायान् ददर्श ह ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) देवेश्वर यमको पराजित करके युद्धका हौसला रखनेवाला दशग्रीव रावण अपने सहायकोंसे मिला ॥ १ ॥
ततो रुधिरसिक्ताङ्गं प्रहारैर्जर्जरीकृतम् । रावणं राक्षसा दृष्ट्वा विस्मयं समुपागमन् ॥ २ ॥
भावार्थ
उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे थे और प्रहारोंसे जर्जर हो गये थे । इस अवस्थामें रावणको देखकर उन राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २ ॥
जयेन वर्धयित्वा च मारीचप्रमुखास्ततः । पुष्पकं भेजिरे सर्वे सान्त्विता रावणेन तु ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महाराजकी जय हो’ ऐसा कहकर रावणकी अभ्युदय-कामना करके वे मारीच आदि सब राक्षस पुष्पकविमानपर बैठे । उस समय रावणने उन सबको सान्त्वना दी ॥ ३ ॥
ततो रसातलं रक्षः प्रविष्टः पयसां निधिम् । दैत्योरगगणाध्युष्टं वरुणेन सुरक्षितम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वह राक्षस रसातलमें जानेकी इच्छासे दैत्यों और नागोंसे सेवित तथा वरुणके द्वारा सुरक्षित जलनिधि समुद्रमें प्रविष्ट हुआ ॥ ४ ॥
स तु भोगवतीं गत्वा पुरीं वासुकिपालिताम् । कृत्वा नागान् वशे हृष्टो ययौ मणिमयीं पुरीम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
नागराज वासुकिद्वारा पालित भोगवती पुरीमें प्रवेश करके उसने नागोंको अपने वशमें कर लिया और वहाँसे हर्षपूर्वक मणिमयीपुरीको प्रस्थान किया ॥ ५ ॥
निवातकवचास्तत्र दैत्या लब्धवरा वसन् । राक्षसस्तान् समागम्य युद्धाय समुपाह्वयत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
उस पुरीमें निवातकवच नामक दैत्य रहते थे, जिन्हें ब्रह्माजीसे उत्तम वर प्राप्त थे । उस राक्षसने वहाँ जाकर उन सबको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६ ॥
ते तु सर्वे सुविक्रान्ता दैतेया बलशालिनः । नानाप्रहरणास्तत्र प्रहृष्टा युद्धदुर्मदाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
वे सब दैत्य बड़े पराक्रमी और बलशाली थे । नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करते थे तथा युद्धके लिये सदा उत्साहित एवं उन्मत्त रहते थे ॥ ७ ॥
शूलैस्त्रिशूलैः कुलिशैः पट्टिशासिपरश्वधैः । अन्योन्यं बिभिदुः क्रुद्धा राक्षसा दानवास्तथा ॥ ८ ॥
भावार्थ
उनका राक्षसोंके साथ युद्ध आरम्भ हो गया । वे राक्षस और दानव कुपित हो एक दूसरेको शूल, त्रिशूल, वज्र, पट्टिश, खड्ग और फरसोंसे घायल करने लगे ॥ ८ ॥
तेषां तु युध्यमानानां साग्रः संवत्सरो गतः । न चान्यतरतस्तत्र विजयो वा क्षयोऽपि वा ॥ ९ ॥
भावार्थ
उनके युद्ध करते हुए एक वर्षसे अधिक समय व्यतीत हो गया; किंतु उनमेंसे किसी भी पक्षकी विजय या पराजय नहीं हुई ॥ ९ ॥
ततः पितामहस्तत्र त्रैलोक्यगतिरव्ययः । आजगाम द्रुतं देवो विमानवरमास्थितः ॥ १० ॥
भावार्थ
तब त्रिभुवनके आश्रयभूत अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्मा एक उत्तम विमानपर बैठकर वहाँ शीघ्र आये ॥ १० ॥
निवातकवचानां तु निवार्य रणकर्म तत् । वृद्धः पितामहो वाक्यमुवाच विदितार्थवत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
बूढ़े पितामहने निवातकवचोंके उस युद्ध-कर्मको रोक दिया और उनसे स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही—॥ ११ ॥
नह्ययं रावणो युद्धे शक्यो जेतुं सुरासुरैः । न भवन्तः क्षयं नेतुमपि सामरदानवैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘दानवो ! समस्त देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें इस रावणको परास्त नहीं कर सकते । इसी तरह समस्त देवता और दानव एक साथ आक्रमण करें तो भी वे तुम लोगोंका संहार नहीं कर सकते ॥ १२ ॥
राक्षसस्य सखित्वं च भवद्भिः सह रोचते । अविभक्ताश्च सर्वार्थाः सुहृदां नात्र संशयः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘( तुम दोनोंमें वरदानजनित शक्ति एक-सी है ) इसलिये मुझे तो यह अच्छा लगता है कि तुमलोगोंके साथ इस राक्षसकी मैत्री हो जाय; क्योंकि सुहृदोंके सभी अर्थ ( भोग्य-पदार्थ ) एक दूसरेके लिये समान होते हैं—पृथक्-पृथक् बँटे नहीं रहते हैं । निःसंदेह ऐसी ही बात है’ ॥ १३ ॥
ततोऽग्निसाक्षिकं सख्यं कृतवांस्तत्र रावणः । निवातकवचैः सार्धं प्रीतिमानभवत् तदा ॥ १४ ॥
भावार्थ
तब वहाँ रावणने अग्निको साक्षी बनाकर निवातकवचोंके साथ मित्रता कर ली । इससे उसको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥१४॥
अर्चितस्तैर्यथान्यायं संवत्सरमथोषितः । स्वपुरात्रिर्विशेषं च प्रियं प्राप्तो दशाननः ॥ १५ ॥
भावार्थ
फिर निवातकवचोंसे उचित आदर पाकर वह एक वर्षतक वहीं टिका रहा । उस स्थानपर दशाननको अपने नगरके समान ही प्रिय भोग प्राप्त हुए ॥ १५ ॥
तत्रोपधार्य मायानां शतमेकं समाप्तवान् । सलिलेन्द्रपुरान्वेषी भ्रमति स्म रसातलम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
उसने निवातकवचोंसे सौ प्रकारकी मायाओंका ज्ञान प्राप्त किया । उसके बाद वह वरुणके नगरका पता लगाता हुआ रसातलमें सब ओर घूमने लगा ॥ १६ ॥
ततोऽश्मनगरं नाम कालकेयैरधिष्ठितम् । गत्वा तु कालकेयांश्च हत्वा तत्र बलोत्कटान् ॥ १७ ॥ शूर्पणख्याश्च भर्तारमसिना प्राच्छिनत् तदा । श्यालं च बलवन्तं च विद्युज्जिह्वं बलोत्कटम् ॥ १८ ॥ जिह्वया संलिहन्तं च राक्षसं समरे तदा ।
भावार्थ
घूमते-घूमते वह अश्मनामक नगरमें जा पहुँचा, जहाँ कालकेय नामक दानव निवास करते थे । कालकेय बड़े बलवान् थे । रावणने वहाँ उन सबका संहार करके शूर्पणखाके पति उत्कट बलशाली अपने बहनोई महाबली विद्युज्जिह्वको, जो उस राक्षसको समराङ्गणमें चाट जाना चाहता था, तलवारसे काट डाला ॥ १७-१८½ ॥
तं विजित्य मुहूर्तेन जघ्ने दैत्यांश्चतुःशतम् ॥ १९ ॥ ततः पाण्डुरमेघाभं कैलासमिव भास्वरम् । वरुणस्यालयं दिव्यमपश्यद् राक्षसाधिपः ॥ २० ॥
भावार्थ
उसे परास्त करके रावणने दो ही घड़ीमें चार सौ दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया । तत्पश्चात् उस राक्षसराजने वरुणका दिव्य भवन देखा, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल और कैलास पर्वतके समान प्रकाशमान था ॥ १९-२० ॥
क्षरन्तीं च पयस्तत्र सुरभिं गामवस्थिताम् । यस्याःपयोऽभिनिष्पन्दात् क्षीरोदो नाम सागरः ॥ २१ ॥
भावार्थ
वहीं सुरभि नामकी गौ भी खड़ी थी, जिसके थनोंसे दूध झर रहा था । कहते हैं, सुरभिके ही दूधकी धारासे क्षीरसागर भरा हुआ है ॥ २१ ॥
ददर्श रावणस्तत्र गोवृषेन्द्रवरारणिम् । यस्माच्चन्द्रः प्रभवति शीतरश्मिर्निशाकरः ॥ २२ ॥
भावार्थ
रावणने महादेवजीके वाहनभूत महावृषभकी जननी सुरभिदेवीका दर्शन किया, जिससे शीतल किरणोंवाले निशाकर चन्द्रमाका प्रादुर्भाव हुआ है ( सुरभिसे क्षीरसमुद्र और क्षीरसमुद्रसे चन्द्रमाका आविर्भाव हुआ है ) ॥ २२ ॥
यं समाश्रित्य जीवन्ति फेनपाः परमर्षयः । अमृतं यत्र चोत्पन्नं स्वधा च स्वधभोजिनाम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
उन्हीं चन्द्रदेवके उत्पत्तिस्थान क्षीरसमुद्रका आश्रय लेकर फेन पीनेवाले महर्षि जीवन धारण करते हैं । उस क्षीरसागरसे ही सुधा तथा स्वधाभोजी पितरोंकी स्वधा प्रकट हुई है ॥ २३ ॥
यां ब्रुवन्ति नरा लोके सुरभिं नाम नामतः । प्रदक्षिणं तु तां कृत्वा रावणः परमाद्भुताम् । प्रविवेश महाघोरं गुप्तं बहुविधैर्बलैः ॥ २४ ॥
भावार्थ
लोकमें जिनको सुरभि नामसे पुकारा जाता है, उन परम अद्भुत गोमाताकी परिक्रमा करके रावणने नाना प्रकारकी सेनाओंसे सुरक्षित महाभयंकर वरुणालयमें प्रवेश किया ॥२४॥
ततो धाराशताकीर्णं शारदाभ्रनिभं तदा । नित्यप्रहृष्टं दद्दशे वरुणस्य गृहोत्तमम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
वहाँ प्रवेश करके उसने वरुणके उत्तम भवनको देखा, जो सदा ही आनन्दमय उत्सवसे परिपूर्ण, अनेक जलधाराओं ( फौवारों ) से व्याप्त तथा शरत्कालके बादलोंके समान उज्ज्वल था ॥ २५ ॥
ततो हत्वा बलाध्यक्षान् समरे तैश्च ताडितः । अब्रवीच्च ततो योधान् राजा शीघ्रं निवेद्यताम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वरुणके सेनापतियोंने समरभूमिमें रावणपर प्रहार किया । फिर रावणने भी उन सबको घायल करके वहाँके योद्धाओंसे कहा—‘तुमलोग राजा वरुणसे शीघ्र जाकर मेरी यह बात कहो—॥ २६ ॥
युद्धार्थी रावणः प्राप्तस्तस्य युद्धं प्रदीयताम् । वद वा न भयं तेऽस्ति निर्जितोऽस्मीति साञ्जलिः॥२७॥
भावार्थ
‘राजन् ! राक्षसराज रावण युद्धके लिये आया है, आप चलकर उससे युद्ध कीजिये अथवा हाथ जोड़कर अपनी पराजय स्वीकार कीजिये । फिर आपको कोई भय नहीं रहेगा’ ॥ २७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धा वरुणस्य महात्मनः । पुत्राः पौत्राश्च निष्क्रामन् गौश्च पुष्कर एव च ॥ २८ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें सूचना पाकर महात्मा वरुणके पुत्र और पौत्र क्रोधसे भरे हुए निकले ।उनके साथ ‘गौ’ और ‘पुष्कर’ नामक सेनाध्यक्ष भी थे ॥ २८ ॥
ते तु तत्र गुणोपेता बलैः परिवृताः स्वकैः । युक्त्वा रथान् कामगमान् उद्यद्भास्करवर्चसः ॥ २९ ॥
भावार्थ
वे सब-के-सब सर्वगुणसम्पन्न तथा उगते हुए सूर्यके तुल्य तेजस्वी थे । इच्छानुसार चलनेवाले रथोंपर आरूढ़ हो अपनी सेनाओंसे घिरकर वे वहाँ युद्धस्थलमें आये ॥ २९ ॥
ततो युद्धं समभवद् दारुणं रोमहर्षणम् । सलिलेन्द्रस्य पुत्राणां रावणस्य च धीमतः ॥ ३० ॥ अमात्यैश्च महावीर्यैर्दशग्रीवस्य रक्षसः । वारुणं तद् बलं सर्वं क्षणेन विनिपातितम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
फिर तो वरुणके पुत्रों और बुद्धिमान् रावणमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ राक्षस दशग्रीवके महापराक्रमी मन्त्रियोंने एक ही क्षणमें वरुणकी सारी सेनाको मार गिराया ॥ ३१ ॥
समीक्ष्य स्वबलं संख्ये वरुणस्य सुतास्तदा । अर्दिताः शरजालेन निवृत्ता रणकर्मणः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
युद्धमें अपनी सेनाकी यह अवस्था देख वरुणके पुत्र उस समय बाण-समूहोंसे पीड़ित होनेके कारण कुछ देरके लिये युद्ध-कर्मसे हट गये ॥ ३२ ॥
महीतलगतास्ते तु रावणं दृश्य पुष्पके । आकाशमाशु विविशुः स्यन्दनैः शीघ्रगामिभिः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
भूतलपर स्थित होकर उन्होंने जब रावणको पुष्पक विमानपर बैठा देखा, तब वे भी शीघ्रगामी रथोंद्वारा तुरंत ही आकाशमें जा पहुँचे ॥ ३३ ॥
महदासीत् ततस्तेषां तुल्यं स्थानमवाप्य तत् । आकाशयुद्धं तुमुलं देवदानवयोरिव ॥ ३४ ॥
भावार्थ
अब बराबरका स्थान मिल जानेसे रावणके साथ उनका भारी युद्ध छिड़ गया । उनका वह आकाश-युद्ध देव-दानव-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ३४ ॥
ततस्ते रावणं युद्धे शरैः पावकसंनिभैः । विमुखीकृत्य संहृष्टा विनेदुर्विविधान् रवान् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उन वरुण-पुत्रोंने अपने अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें रावणको विमुख करके बड़े हर्षके साथ नाना प्रकारके स्वरोंमें महान् सिंहनाद किया ॥ ३५ ॥
ततो महोदरः क्रुद्धो राजानं वीक्ष्य धर्षितम् । त्यक्त्वा मृत्युभयं वीरो युद्धाकाङ्क्षी व्यलोकयत्॥३६॥
भावार्थ
राजा रावणको तिरस्कृत हुआ देख महोदरको बड़ा क्रोध हुआ । उसने मृत्युका भय छोड़कर युद्धकी इच्छासे वरुण-पुत्रोंकी ओर देखा ॥ ३६ ॥
तेन ते वारुणा युद्धे कामगाः पवनोपमाः । महोदरेण गदया हयास्ते प्रययुः क्षितिम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
वरुणके घोड़े युद्धमें हवासे बातें करनेवाले थे और स्वामीकी इच्छाके अनुसार चलते थे । महोदरने उनपर गदासे आघात किया । गदाकी चोट खाकर वे घोड़े धराशायी हो गये ॥ ३७ ॥
तेषां वरुणसूनूनां हत्वा योधान् हयांश्च तान् । मुमोचाशु महानादं विरथान् प्रेक्ष्य तान् स्थितान्॥३८॥ ते तु तेषां रथाः साश्वाः सह सारथिभिर्वरैः । महोदरेण निहताः पतिताः पृथिवीतले ॥ ३९ ॥
भावार्थ
वरुण-पुत्रोंके योद्धाओं और घोड़ोंको मारकर उन्हें रथहीन हुआ देख महोदर तुरंत ही जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ महोदरकी गदाके आघातसे वरुण-पुत्रोंके वे रथ घोड़ों और श्रेष्ठ सारथियोंसहित चूर-चूर हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥३९॥
ते तु त्यक्त्वा रथान् पुत्रा वरुणस्य महात्मनः । आकाशे विष्ठिताः शूराः स्वप्रभावाच्च विव्यथुः ॥ ४० ॥
भावार्थ
महात्मा वरुणके वे शूरवीर पुत्र उन रथोंको छोड़कर अपने ही प्रभावसे आकाशमें खड़े हो गये । उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ ४० ॥
धनूंषि कृत्वा सज्जानि विनिर्भिद्य महोदरम् । रावणं समरे क्रुद्धाः सहिताः समवारयन् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उन्होंने धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और महोदरको क्षत-विक्षत करके एक साथ कुपित हो रावणको घेर लिया ॥४१॥
सायकैश्चापविभ्रष्टैर्वज्रकल्पैः सुदारुणैः । दारयन्ति स्म संक्रुद्धा मेघा इव महागिरिम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
फिर वे अत्यन्त कुपित हो किसी महान् पर्वतपर जलकी धारा गिरानेवाले मेघोंके समान धनुषसे छूटे हुए वज्र-तुल्य भयंकर सायकोंद्वारा रावणको विदीर्ण करने लगे ॥ ४२ ॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवः कालाग्निरिव मूर्च्छितः । शरवर्षं महाघोरं तेषां मर्मस्वपातयत् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
यह देख दशग्रीव प्रलयकालकी अग्निके समान रोषसे प्रज्वलित हो उठा और उन वरुण-पुत्रोंके मर्मस्थानोंपर महाघोर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ४३ ॥
मुसलानि विचित्राणि ततो भल्लशतानि च । पट्टिशांश्चैव शक्तीश्च शतघ्नीर्महतीरपि ॥ ४४ ॥ पातयामास दुर्धर्षस्तेषामुपरि विष्ठितः ।
भावार्थ
पुष्पक विमानपर बैठे हुए उस दुर्धर्ष वीरने उन सबके ऊपर विचित्र मूसलों, सैकड़ों भल्लों, पट्टिशों, शक्तियों और बड़ी-बड़ी शतघ्नियोंका प्रहार किया ॥ ४४½ ॥
अपविद्धास्तु ते वीरा विनिष्पेतुः पदातयः ॥ ४५ ॥ ततस्तेनैव सहसा सीदन्ति स्म पदातिनः । महापङ्कमिवासाद्य कुञ्जराः षष्टिहायनाः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
उन अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल हो वे पैदल वीर पुनः युद्धके लिये आगे बढ़े; परंतु पैदल होनेके कारण रावणकी उस अस्त्र-वर्षासे ही सहसा संकटमें पड़कर बड़ी भारी कीचड़में फँसे हुए साठ वर्षके हाथीके समान कष्ट पाने लगे ॥४५-४६॥
सीदमानान् सुतान् दृष्ट्वा विह्वलान् स महाबलः । ननाद रावणो हर्षान्महानम्बुधरो यथा ॥ ४७ ॥ ततो रक्षो महानादान् मुक्त्वा हन्ति स्म वारुणान् । नानाप्रहरणोपेतैर्धारापातैरिवाम्बुदः ॥ ४८ ॥ ततस्ते विमुखाः सर्वे पतिता धरणीतले । रणात् स्वपुरुषैः शीघ्रं गृहाण्येव प्रवेशिताः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
वरुणके पुत्रोंको दुखी एवं व्याकुल देख महाबली रावण महान् मेघके समान बड़े हर्षसे गर्जना करने लगा । जोर-जोरसे सिंहनाद करके वह निशाचर पुनः नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा वरुण-पुत्रोंको मारने लगा, मानो बादल अपनी धारावाहिक वृष्टिसे वृक्षोंको पीड़ित कर रहा हो॥ फिर तो वे सभी वरुण-पुत्र युद्धसे विमुख हो पृथ्वीपर गिर पड़े । तत्पश्चात् उनके सेवकोंने उन्हें रणभूमिसे हटाकर शीघ्र ही घरोंमें पहुँचा दिया ॥ ४९ ॥
तानब्रवीद् ततो रक्षो वरुणाय निवेद्यताम् । रावणं त्वब्रवीन्मन्त्री प्रहासो नाम वारुणः ॥ ५० ॥
भावार्थ
तदनन्तर उस राक्षसने वरुणके सेवकोंसे कहा—‘अब वरुणसे जाकर कहो कि वे स्वयं युद्धके लिये आवें ।’ तब वरुणके मन्त्री प्रभासने रावणसे कहा—॥ ५० ॥
गतः खलु महाराजो ब्रह्मलोकं जलेश्वरः । गान्धर्वं वरुणः श्रोतुं यं त्वमाह्वयसे युधि ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! जिन्हें तुम युद्धके लिये बुला रहे हो, वे जलके स्वामी महाराज वरुण संगीत सुननेके लिये ब्रह्मलोकमें गये हुए हैं ॥ ५१ ॥
तत् किं तव यथा वीर परिश्रम्य गते नृपे । ये तु संनिहिता वीराः कुमारास्ते पराजिताः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘वीर ! राजा वरुणके चले जानेपर यहाँ युद्धके लिये व्यर्थ परिश्रम करनेसे तुम्हें क्या लाभ ? उनके जो वीर पुत्र यहाँ मौजूद थे, वे तो तुमसे परास्त हो ही गये’ ॥ ५२ ॥
राक्षसेन्द्रस्तु तच्छ्रुत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः । हर्षान्नादं विमुञ्चन् वै निष्क्रान्तो वरुणालयात् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
मन्त्रीकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण वहाँ अपने नामकी घोषणा करके बड़े हर्षसे सिंहनाद करता हुआ वरुणालयसे बाहर निकल गया ॥ ५३ ॥
आगतस्तु पथा येन तेनैव विनिवृत्य सः । लङ्कामभिमुखो रक्षो नभस्तलगतो ययौ ॥ ५४ ॥
भावार्थ
वह जिस मार्गसे आया था, उसीसे लौटकर आकाशमार्गसे लङ्काकी ओर चल दिया ॥ ५४ ॥*
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