उत्तरकाण्ड, सर्ग 22
स तस्य तु महानादं श्रुत्वा वैवस्वतः प्रभुः। शत्रुं विजयिनं मेने स्वबलस्य च संक्षयम् ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) रावणके उस महानादको सुनकर सूर्यपुत्र भगवान् यमने यह समझ लिया कि ‘शत्रु विजयी हुआ और मेरी सेना मारी गयी’ ॥ १ ॥
स हि योधान् हतान् मत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः। अब्रवीत् त्वरितः सूतं रथो मे उपनीयताम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘मेरे योद्धा मारे गये’—यह जानकर यमराजके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे उतावले होकर सारथिसे बोले— ‘मेरा रथ ले आओ’ ॥ २ ॥
तस्य सूतस्तदा दिव्यमुपस्थाप्य महारथम्। स्थितः स च महातेजा अध्यारोहत तं रथम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
तब उनके सारथिने तत्काल एक दिव्य एवं विशाल रथ वहाँ उपस्थित कर दिया और वह सामने विनीतभावसे खड़ा हो गया । फिर वे महातेजस्वी यम देवता उस रथपर आरूढ़ हुए ॥ ३ ॥
प्रासमुद्गरहस्तश्च मृत्युस्तस्याग्रतः स्थितः। येन संक्षिप्यते सर्वं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उनके आगे प्रास और मुद्गर हाथमें लिये साक्षात् मृत्यु देवता खड़े थे, जो प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त त्रिभुवनका संहार करते हैं ॥ ४ ॥
कालदण्डस्तु पार्श्वस्थो मूर्तिमानस्य चाभवत्। यमप्रहरणं दिव्यं तेजसा ज्वलदग्निवत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उनके पार्श्वभागमें कालदण्ड मूर्तिमान् होकर खड़ा हुआ, जो उनका मुख्य एवं दिव्य आयुध है। वह अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था ॥ ५ ॥
तस्य पार्श्वेषु निच्छिद्राः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः । पावकस्पर्शसंकाशः स्थितो मूर्तश्च मुद्गरः ॥ ६ ॥
भावार्थ
उनके दोनों बगलमें छिद्ररहित कालपाश खड़े थे और जिसका स्पर्श अग्निके समान दुःसह है, वह मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर उपस्थित था ॥ ६ ॥
ततो लोकत्रयं क्षुब्धमकम्पन्त दिवौकसः । कालं दृष्ट्वा तथा क्रुद्धं सर्वलोकभयावहम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
समस्त लोकोंको भय देनेवाले साक्षात् कालको कुपित हुआ देख तीनों लोकोंमें हलचल मच गयी । समस्त देवता काँप उठे ॥ ७ ॥
ततस्त्वचोदयत् सूतस्तानश्वान् रुचिरप्रभान् । प्रययौ भीमसंनादो यत्र रक्षःपतिः स्थितः ॥ ८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सारथिने सुन्दर कान्तिवाले घोड़ोंको हाँका और वह रथ भयानक आवाज करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ राक्षसराज रावण खड़ा था ॥ ८ ॥
मुहूर्तेन यमं ते तु हया हरिहयोपमाः । प्रापयन् मनसस्तुल्या यत्र तत् प्रस्तुतं रणम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
इन्द्रके घोड़ोंके समान तेजस्वी और मनके समान शीघ्रगामी उन घोड़ोंने यमराजको क्षणभरमें उस स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह युद्ध चल रहा था ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा तथैव विकृतं रथं मृत्युसमन्वितम् । सचिवा राक्षसेन्द्रस्य सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ १० ॥
भावार्थ
मृत्युदेवताके साथ उस विकराल रथको आया देख राक्षसराजके सचिव सहसा वहाँसे भाग खड़े हुए ॥ १० ॥
लघुसत्त्वतया ते हि नष्टसंज्ञा भयार्दिताः । नेह योद्धुं समर्थाः स्म इत्युक्त्वा प्रययुर्दिशः ॥ ११ ॥
भावार्थ
उनकी शक्ति थोड़ी थी । इसलिये वे भयसे पीड़ित हो अपना होश-हवाश खो बैठे और ‘हम यहाँ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हैं’ ऐसा कहकर विभिन्न दिशाओंमें भाग गये ॥ ११ ॥
स तु तं तादृशं दृष्ट्वा रथं लोकभयावहम् । नाक्षुभ्यत दशग्रीवो न चापि भयमाविशत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
परंतु समस्त संसारको भयभीत करनेवाले वैसे विकराल रथको देखकर भी दशग्रीवके मनमें न तो क्षोभ हुआ और न भय ही ॥ १२ ॥
स तु रावणमासाद्य व्यसृजच्छक्तितोमरान् । यमो मर्माणि संक्रुद्धो रावणस्य न्यकृन्तत ॥ १३ ॥
भावार्थ
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए यमराजने रावणके पास पहुँचकर शक्ति और तोमरोंका प्रहार किया तथा रावणके मर्मस्थानोंको छेद डाला ॥ १३ ॥
रावणस्तु ततः स्वस्थः शरवर्षं मुमोच ह । तस्मिन् वैवस्वतरथे तोयवर्षमिवाम्बुदः ॥ १४ ॥
भावार्थ
तब रावणने भी सँभलकर यमराजके रथपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, मानो मेघ जलकी वर्षा कर रहा हो ॥ १४ ॥
ततो महाशक्तिशतैः पात्यमानैर्महोरसि । नाशक्नोत् प्रतिकर्तुं स राक्षसः शल्यपीडितः ॥ १५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर उसकी विशाल छातीपर सैकड़ों महाशक्तियोंकी मार पड़ने लगी । वह राक्षस शल्योंके प्रहारसे इतना पीड़ित हो चुका था कि यमराजसे बदला लेनेमें समर्थ न हो सका ॥ १५ ॥
एवं नानाप्रहरणैर्यमेनामित्रकर्षिणा । सप्तरात्रं कृतः संख्ये विसंज्ञो विमुखो रिपुः ॥ १६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार शत्रुसूदन यमने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए रणभूमिमें लगातार सात रातोंतक युद्ध किया। इससे उनका शत्रु रावण अपनी सुध-बुध खोकर युद्धसे विमुख हो गया ॥ १६ ॥
तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं यमराक्षसयोर्द्वयोः । जयमाकाङ्क्षतोर्वीर समरेष्वनिवर्तिनोः ॥ १७ ॥
भावार्थ
वीर रघुनन्दन ! वे दोनों योद्धा समरभूमिसे पीछे हटनेवाले नहीं थे और दोनों ही अपनी विजय चाहते थे; इसलिये उन यमराज और राक्षस दोनोंमें उस समय घोर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । प्रजापतिं पुरस्कृत्य समेतास्तद्रणाजिरे ॥ १८ ॥
भावार्थ
तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण प्रजापतिको आगे करके उस समराङ्गणमें एकत्र हुए ॥ १८ ॥
संवर्त इव लोकानां युध्यतोरभवत् तदा । राक्षसानां च मुख्यस्य प्रेतानामीश्वरस्य च ॥ १९ ॥
भावार्थ
उस समय राक्षसोंके राजा रावण तथा प्रेतराज यमके युद्धपरायण होनेपर समस्त लोकोंके प्रलयका समय उपस्थित हुआ-सा जान पड़ता था ॥ १९ ॥
राक्षसेन्द्रोऽपि विस्फार्य चापमिन्द्राशनिप्रभम् । निरन्तरमिवाकाशं कुर्वन् बाणांस्ततोऽसृजत् ॥ २० ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावण भी इन्द्रकी अशनिके सदृश अपने धनुषको खींचकर बाणोंकी वर्षा करने लगा, इससे आकाश ठसाठस भर गया---उसमें तिलभर भी खाली जगह नहीं रह गयी ॥ २० ॥
मृत्युं चतुर्भिर्विशिखैः सूतं सप्तभिरार्दयत् । यमं शतसहस्रेण शीघ्रं मर्मस्वताडयत् ॥ २१ ॥ ततः क्रुद्धस्य वदनाद् यमस्य समजायत । ज्वालामाली सनिःश्वासः सधूमः कोपपावकः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उसने चार बाण मारकर मृत्युको और सात बाणोंसे यमके सारथिको भी पीड़ित कर दिया । फिर जल्दी-जल्दी लाख बाण मारकर यमराजके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ तब यमराजके क्रोधकी सीमा न रही । उनके मुखसे वह रोष अग्नि बनकर प्रकट हुआ । वह आग ज्वाला-मालाओंसे मण्डित, श्वासवायुसे संयुक्त तथा धूमसे आच्छन्न दिखायी देती थी ॥ २२ ॥
तदाश्चर्यमथो दृष्ट्वा देवदानवसंनिधौ । प्रहर्षितौ सुसंरब्धौ मृत्युकालौ बभूवतुः ॥ २३ ॥
भावार्थ
देवताओं तथा दानवोंके समीप यह आश्चर्यजनक घटना देखकर रोषावेशसे भरे हुए मृत्यु एवं कालको बड़ा हर्ष हुआ २३
ततो मृत्युः क्रुद्धतरो वैवस्वतमभाषत । मुञ्च मां समरे यावद्धन्मीमं पापराक्षसम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् मृत्युदेवने अत्यन्त कुपित होकर वैवस्वत यमसे कहा—‘आप मुझे छोड़िये—आज्ञा दीजिये, मैं समराङ्गणमें इस पापी राक्षसको अभी मारे डालता हूँ ॥ २४ ॥
नैषा रक्षो भवेद्य मर्यादा हि निसर्गतः । हिरण्यकशिपुः श्रीमान् नमुचिः शम्बरस्तथा ॥ २५ ॥ निसन्दिर्धूमकेतुश्च बलिर्वैरोचनोऽपि च । शम्भुर्दैत्यो महाराजो वृत्रो बाणस्तथैव च ॥ २६ ॥ राजर्षयः शास्त्रविदो गन्धर्वाः समहोरगाः । ऋषयः पन्नगा दैत्या यक्षाश्च हाप्सरोगणाः ॥ २७ ॥ युगान्तपरिवर्ते च पृथिवी समहार्णवा । क्षयं नीता महाराज सपर्वतसरिद्द्रुमा ॥ २८ ॥ एते चान्ये च बहवो बलवन्तो दुरासदाः । विनिपन्ना मया दग्धाः किमुतायं निशाचरः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! यह मेरी स्वभावसिद्ध मर्यादा है कि मुझसे भिड़कर यह राक्षस जीवित नहीं रह सकता । श्रीमान् हिरण्यकशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, विरोचनकुमार बलि, शम्भुनामक दैत्य, महाराज वृत्र तथा बाणासुर, कितने ही शास्त्रवेत्ता राजर्षि, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग, ऋषि, सर्प, दैत्य, यक्ष, अप्सराओंके समुदाय, युगान्तकालमें समुद्रों, पर्वतों, सरिताओं और वृक्षोंसहित पृथ्वी—ये सब मेरे द्वारा क्षयको प्राप्त हुए हैं। ये तथा दूसरे बहुतेरे बलवान् एवं दुर्जय वीर भी मेरे द्वारा विनाशको प्राप्त हो चुके हैं, फिर यह निशाचर किस गिनतीमें है ! ॥ २५–२९ ॥
मुञ्च मां साधु धर्मज्ञ यावदेनं निहन्म्यहम् । नहि कश्चिन्मया दृष्टो बलवानपि जीवति ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ ! आप मुझे छोड़ दीजिये । मैं इसे अवश्य मार डालूँगा । जिसे मैं देख लूँ, वह कोई बलवान् होनेपर भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ३० ॥
बलं मम न खल्वेतन्मर्यादैषा निसर्गतः । स दृष्टो न मया काल मुहूर्तमपि जीवति ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘काल ! मेरी दृष्टि पड़नेपर वह रावण दो घड़ी भी जीवन धारण नहीं कर सकेगा । मेरे इस कथनका तात्पर्य केवल अपने बलको प्रकाशित करना मात्र नहीं है; अपितु यह स्वभावसिद्ध मर्यादा है’ ॥ ३१ ॥
तस्यैवं वचनं श्रुत्वा धर्मराजः प्रतापवान् । अब्रवीत् तत्र तं मृत्युं त्वं तिष्ठैनं निहन्म्यहम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
मृत्युकी यह बात सुनकर प्रतापी धर्मराजने उससे कहा— ‘तुम ठहरो, मैं ही इसे मारे डालता हूँ’ ॥ ३२ ॥
ततः संरक्तनयनः क्रुद्धो वैवस्वतः प्रभुः । कालदण्डममोघं तु तोलयामास पाणिना ॥ ३३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें करके सामर्थ्यशाली वैवस्वत यमने अपने अमोघ कालदण्डको हाथसे उठाया ॥ ३३ ॥
यस्य पार्श्वेषु निहिताः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः । पावकाशनिसंकाशो मुद्गरो मूर्तिमान् स्थितः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उस कालदण्डके पार्श्वभागोंमें कालपाश प्रतिष्ठित थे और वज्र एवं अग्नितुल्य तेजस्वी मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर स्थित था !!३४॥
दर्शनादेव यः प्राणान् प्राणिनामपि कर्षति । किं पुनः स्पृशमानस्य पात्यमानस्य वा पुनः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
वह कालदण्ड दृष्टिमें आनेमात्रसे प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण कर लेता था । फिर जिससे उसका स्पर्श हो जाय अथवा जिसके ऊपर उसकी मार पड़े, उस पुरुषके प्राणोंका संहार करना उसके लिये कौन बड़ी बात है ! ॥ ३५ ॥
स ज्वालापरिवारस्तु निर्दहन्निव राक्षसम् । तेन स्पृष्टो बलवता महाप्रहरणोऽस्फुरत् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह कालदण्ड उस राक्षसको दग्ध-सा कर देनेके लिये उद्यत था । बलवान् यमराजके हाथमें लिया हुआ वह महान् आयुध अपने तेजसे प्रकाशित हो उठा ॥ ३६ ॥
ततो विदुद्रुवुः सर्वे तस्मात् त्रस्ता रणाजिरे । सुराश्च क्षुभिताः सर्वे दृष्ट्वा दण्डोद्यतं यमम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उसके उठते ही समराङ्गणमें खड़े हुए समस्त सैनिक भयभीत होकर भाग चले। कालदण्ड उठाये यमराजको देखकर समस्त देवता भी क्षुब्ध हो उठे ॥ ३७ ॥
तस्मिन् प्रहर्तुकामे तु यमे दण्डेन रावणम् । यमं पितामहः साक्षाद् दर्शयित्वेदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
यमराज उस दण्डसे रावणपर प्रहार करना ही चाहते थे कि साक्षात् पितामह ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने दर्शन देकर इस प्रकार कहा—॥ ३८ ॥
वैवस्वत महाबाहो न खल्वमितविक्रम । न हन्तव्यस्त्वयैतेन दण्डेनैष निशाचरः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘अमित पराक्रमी महाबाहु वैवस्वत ! तुम इस कालदण्डके द्वारा निशाचर रावणका वध न करो ॥ ३९ ॥
वरः खलु मयैतस्मै दत्तस्त्रिदशपुङ्गव । स त्वया नानृतः कार्यो यन्मया व्याहृतं वचः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘देवप्रवर ! मैंने इसे देवताओंद्वारा न मारे जा सकनेका वर दिया है। मेरे मुँहसे जो बात निकल चुकी है, उसे तुम्हें असत्य नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
यो हि मामनृतं कुर्याद् देवो वा मानुषोऽपि वा । त्रैलोक्यमनृतं तेन कृतं स्यान्नात्र संशयः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘जो देवता अथवा मनुष्य मुझे असत्यवादी बना देगा, उसे समस्त त्रिलोकीको मिथ्याभाषी बनानेका दोष लगेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ४१ ॥
क्रुद्धेन विप्रमुक्तोऽयं निर्विशेषं प्रियाप्रिये । प्रजाः संहरते रौद्रो लोकत्रयभयावहः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘यह कालदण्ड तीनों लोकोंके लिये भयंकर तथा रौद्र है। तुम्हारे द्वारा क्रोधपूर्वक छोड़ा जानेपर यह प्रिय और अप्रिय जनोंमें भेदभाव न रखता हुआ सामने पड़ी हुई समस्त प्रजाका संहार कर डालेगा ॥ ४२ ॥
अमोघो ह्येष सर्वेषां प्राणिनाममितप्रभः । कालदण्डो मया सृष्टः पूर्वं मृत्युपुरस्कृतः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘इस अमित तेजस्वी कालदण्डको भी पूर्वकालमें मैंने ही बनाया था। यह किसी भी प्राणीपर व्यर्थ नहीं होता है। इसके प्रहारसे सबकी मृत्यु हो जाती है ॥ ४३ ॥
तन्न खल्वेष ते सौम्य पात्यो रावणमूर्धनि । नह्यस्मिन् पतिते कश्चिन्मुहूर्तमपि जीवति ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘अतः सौम्य ! तुम इसे रावणके मस्तकपर न गिराओ । इसकी मार पड़नेपर कोई एक मुहूर्त भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ४४ ॥
यदि ह्यस्मिन् निपतिते न म्रियेतैष राक्षसः । म्रियते वा दशग्रीवस्तदाप्युभयतोऽनृतम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘कालदण्ड पड़नेपर यदि यह राक्षस रावण न मरा तो अथवा मर गया तो—दोनों ही दशाओंमें मेरी बात असत्य होगी ॥ ४५ ॥
तन्निवर्तय लङ्केशाद् दण्डमेतं समुद्यतम् । सत्यं च मां कुरुष्वाद्य लोकांस्त्वं यद्यवेक्षसे ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘इसलिये हाथमें उठाये हुए इस कालदण्डको तुम लङ्कापति रावणकी ओरसे हटा लो । यदि समस्त लोकोंपर तुम्हारी दृष्टि है तो आज रावणकी रक्षा करके मुझे सत्यवादी बनाओ’ ॥ ४६ ॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा प्रत्युवाच यमस्तदा । एष व्यावर्तितो दण्डः प्रभविष्णुर्हि नो भवान् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा यमराजने उत्तर दिया— ‘यदि ऐसी बात है तो लीजिये मैंने इस दण्डको हटा लिया । आप हम सब लोगोंके प्रभु हैं ( अतः आपकी आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है ) ॥ ४७ ॥
किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तुं रणगतेन हि । न मया ह्ययं शक्यो हन्तुं वरपुरस्कृतः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘परंतु वरदानसे युक्त होनेके कारण यदि मेरे द्वारा इस निशाचरका वध नहीं हो सकता तो इस समय इसके साथ युद्ध करके ही मैं क्या करूँगा ? ॥ ४८ ॥
एष तस्मात् प्रणश्यामि दर्शनादस्य रक्षसः । इत्युक्त्वा सरथः साश्वस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘इसलिये अब मैं इसकी दृष्टिसे ओझल होता हूँ’ यों कहकर यमराज रथ और घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये ॥४९॥
दशग्रीवस्तु तं जित्वा नाम विश्राव्य चात्मनः । आरुह्य पुष्पकं भूयो निष्क्रान्तो यमसादनात् ॥ ५० ॥
भावार्थ
इस प्रकार यमराजको जीतकर अपने नामकी घोषणा करके दशग्रीव रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो यमलोकसे चला गया ॥ ५० ॥
स तु वैवस्वतो देवैः सह ब्रह्मपुरोगमैः । जगाम त्रिदिवं हृष्टो नारदश्च महामुनिः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज तथा महामुनि नारदजी ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गमें गये ॥ ५१ ॥
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