उत्तरकाण्ड, सर्ग 21
एवं संचिन्त्य विप्रेन्द्रो जगाम लघुविक्रमः । आख्यातुं तद् यथावृत्तं यमस्य सदनं प्रति ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) ऐसा विचारकर शीघ्र चलनेवाले विप्रवर नारदजी रावणके आक्रमणका समाचार बतानेके लिये यमलोकमें गये ॥ १ ॥
अपश्यत् स यमं तत्र देवमग्निपुरस्कृतम् । विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य यादृशम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वहाँ जाकर उन्होंने देखा; यमदेवता अग्निको साक्षीके रूपमें सामने रखकर बैठे हैं और जिस प्राणीका जैसा कर्म है, उसीके अनुसार फल देनेकी व्यवस्था कर रहे हैं ॥ २ ॥
स तु दृष्ट्वा यमः प्राप्तं महर्षिं तत्र नारदम् । अब्रवीत् सुखमासीनमर्घ्यमावेद्य धर्मतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
महर्षि नारदको वहाँ आया देख यमराजने आतिथ्य-धर्मके अनुसार उनके लिये अर्घ्य आदि निवेदन करके कहा—॥३॥
कच्चित् क्षेमं नु देवर्षे कच्चिद् धर्मो न नश्यति । किमागमनकृत्यं ते देवगन्धर्वसेवित ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित देवर्षे ! कुशल तो है न ? धर्मका नाश तो नहीं हो रहा है ? आज यहाँ आपके शुभागमनका क्या उद्देश्य है ?’ ॥ ४ ॥
अब्रवीत् तु तदा वाक्यं नारदो भगवानृषिः । श्रूयतामभिधास्यामि विधानं च विधीयताम् ॥ ५ ॥ एष नाम्ना दशग्रीवः पितृराज निशाचरः । उपयाति वशं नेतुं विक्रमैस्त्वां सुदुर्जयम् ॥ ६ ॥ एतेन कारणेनाहं त्वरितो ह्यागतः प्रभो । दण्डप्रहरणस्याद्य तव किं नु भविष्यति ॥ ७ ॥
भावार्थ
तब भगवान् नारद मुनि बोले—‘पितृराज ! सुनिये— मैं एक अवश्यक बात बता रहा हूँ, आप सुनकर उसके प्रतीकारका भी कोई उपाय कर लें । यद्यपि आपको जीतना अत्यन्त कठिन है, तथापि यह दशग्रीव नामक निशाचर अपने पराक्रमोंद्वारा आपको वशमें करनेके लिये यहाँ आ रहा है ॥ ‘प्रभो ! इसी कारणसे मैं तुरंत यहाँ आया हूँ कि आपको इस सङ्कटकी सूचना दे दूँ, परंतु आप तो कालदण्डरूपी आयुधको धारण करनेवाले हैं, आपकी उस राक्षसके आक्रमणसे क्या हानि होगी ?’ ॥ ७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दूरादंशुमन्तमिवोदितम् । दद्दशुर्दीप्तमायान्तं विमानं तस्य रक्षसः ॥ ८ ॥
भावार्थ
इस प्रकारकी बातें हो ही रही थीं कि उस राक्षसका उदित हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमान दूरसे आता दिखायी दिया ॥ ८ ॥
तं देशं प्रभया तस्य पुष्पकस्य महाबलः । कृत्वा वितिमिरं सर्वं समीपमभ्यवर्तत ॥ ९ ॥
भावार्थ
महाबली रावण पुष्पककी प्रभासे उस समस्त प्रदेशको अन्धकारशून्य करके अत्यन्त निकट आ गया ॥ ९ ॥
सोऽपश्यत् स महाबाहुर्दशग्रीवस्ततस्ततः । प्राणिनः सुकृतं चैव भुञ्जानांश्चैव दुष्कृतम् ॥ १० ॥
भावार्थ
महाबाहु दशग्रीवने यमलोकमें आकर देखा कि यहाँ बहुत-से प्राणी अपने-अपने पुण्य तथा पापका फल भोग रहे हैं ॥ १० ॥
अपश्यत् सैनिकांश्चास्य यमस्यानुचरैः सह । पुरुषैरुग्रघोररूपैर्भयानकैः ॥ ११ ॥ ददर्श वध्यमानांश्च क्लिश्यमानांश्च देहिनः । क्रोशतश्च महानादं तीव्रनिष्टनतत्परान् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उसने यमराजके सेवकोंके साथ उनके सैनिकोंको भी देखा । उसकी दृष्टिमें यमयातनाका दृश्य भी आया । घोर रूपधारी उग्र प्रकृतिवाले भयानक यमदूत कितने ही प्राणियोंको मारते और क्लेश पहुँचाते थे, जिससे वे बड़े जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते थे ॥ ११-१२ ॥
कृमिभिर्भक्ष्यमाणांश्च सारमेयैश्च दारुणैः । श्रोत्रायासकरा वाचो वदतश्च भयावहाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
किन्हींको कीड़े खा रहे थे और कितनोंको भयङ्कर कुत्ते नोच रहे थे । वे सब-के-सब दुखी हो-होकर कानोंको पीड़ा देनेवाला भयानक चीत्कार करते थे ॥ १३ ॥
संतार्यमाणान् वैतरणीं बहुशः शोणितोदकाम् । बालुकासु च तप्तासु तप्यमानान् मुहुर्मुहुः ॥ १४ ॥ असिपत्रवने चैव भिद्यमानानधार्मिकान् । रौरवे क्षारनद्यां च क्षुरधारासु चैव हि ॥ १५ ॥ पानीयं याचमानांश्च तृषितान् क्षुधितानपि । शवभूतान् कृशान् दीनान् विवर्णान् मुक्तमूर्धजान् ॥ १६ ॥ मलपङ्कधरान् दीनान् रुक्षांश्च परिधावतः । ददर्श रावणो मार्गे शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १७ ॥
भावार्थ
किन्हींको बारंबार रक्तसे भरी हुई वैतरणी नदी पार करनेके लिये विवश किया जाता था और कितनोंको तपायी हुई बालुकाओंपर बार-बार चलाकर संतप्त किया जाता था ॥ कुछ पापी असिपत्र-वनमें, जिसके पत्ते तलवारकी धारके समान तीखे थे, बिदीर्ण किये जा रहे थे । किन्हींको रौरव नरकमें डाला जाता था । कितनोंको खारे जलसे भरी हुई नदियोंमें डुबाया जाता था और बहुतोंको छुरोंकी धारोंपर दौड़ाया जाता था । कई प्राणी भूख और प्याससे तड़प रहे थे और थोड़े-से जलकी याचना कर रहे थे । कोई शवके समान कङ्काल, दीन, दुर्बल, उदास और खुले बालोंसे युक्त दिखायी देते थे । कितने ही प्राणी अपने अङ्गोंमें मैल और कीचड़ लगाये दयनीय तथा रूखे शरीरसे चारों ओर भाग रहे थे । इस तरहके सैकड़ों और हजारों जीवोंको रावणने मार्गमें यातना भोगते देखा ॥ १५–१७ ॥
कांश्चिच्च गृहसुख्येषु गीतवादित्रनिःस्वनैः । प्रमोदमानानद्राक्षीद् रावणः सुकृतैः स्वकैः ॥ १८ ॥
भावार्थ
दूसरी ओर रावणने देखा कुछ पुण्यात्मा जीव अपने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे अच्छे-अच्छे घरोंमें रहकर संगीत और वाद्योंकी मनोहर ध्वनिसे आनन्दित हो रहे हैं ॥ १८ ॥
गोरसं गोप्रदातारो ह्यन्नं चैवान्नदायिनः । गृहांश्च गृहदातारः स्वकर्मफलमश्नतः ॥ १९ ॥
भावार्थ
गोदान करनेवाले गोरसको, अन्न देनेवाले अन्नको और गृह प्रदान करनेवाले लोग गृहको पाकर अपने सत्कर्मोंका फल भोग रहे हैं ॥ १९ ॥
सुवर्णमणिमुक्ताभिः प्रमदाभिरलंकृतान् । धार्मिकानपरांस्तत्र दीप्यमानान् स्वतेजसा ॥ २० ॥
भावार्थ
दूसरे धर्मात्मा पुरुष वहाँ सुवर्ण, मणि और मुक्ताओंसे अलंकृत हो यौवनके मदसे मत्त रहनेवाली सुन्दरी स्त्रियोंके साथ अपनी अङ्गकान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं ॥ २० ॥
ददर्श स महाबाहू रावणो राक्षसाधिपः । ततस्तान् भिद्यमानांश्च कर्मभिर्दुष्कृतैः स्वकैः ॥ २१ ॥ रावणो मोचयामास विक्रमेण बलाद् बली । प्राणिनो मोक्षितास्तेन दशग्रीवेण रक्षसा ॥ २२ ॥
भावार्थ
महाबाहु राक्षसराज रावणने इन सबको देखा । देखकर बलवान् राक्षस दशग्रीवने अपने पाप-कर्मोंके कारण यातना भोगनेवाले प्राणियोंको पराक्रमद्वारा बलपूर्वक मुक्त कर दिया ॥ २१-२२ ॥
सुखमापुर्मुहूर्तं ते ह्यतर्कितमचिन्तितम् । प्रेतेषु मुच्यमानेषु राक्षसेन महीयसा ॥ २३ ॥ प्रेतगोपाः सुसंक्रुद्धा राक्षसेन्द्रमभिद्रवन् ।
भावार्थ
इससे थोड़ी देरतक उन पापियोंको बड़ा सुख मिला, उसके मिलनेकी न तो उन्हें सम्भावना थी और न उसके विषयमें वे कुछ सोच ही सके थे । उस महान् राक्षसके द्वारा जब सभी प्रेत यातनासे मुक्त कर दिये गये, तब उन प्रेतोंकी रक्षा करनेवाले यमदूत अत्यन्त कुपित हो राक्षसराजपर टूट पड़े ॥ २३½ ॥
ततो हलहलाशब्दः सर्वदिग्भ्यः समुत्थितः ॥ २४ ॥ धर्मराजस्य योधानां शूराणां सम्प्रधावताम् । ते प्रासैः परिघैः शूलैर्मुसलैः शक्तितोमरैः ॥ २५ ॥ पुष्पकं समधर्षन्त शूराः शतसहस्रशः । तस्यासनानि प्रासादान् वेदिकास्तोरणानि च ॥ २६ ॥ पुष्पकस्य बभञ्जुस्ते शीघ्रं मधुकरा इव ।
भावार्थ
फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे धावा करनेवाले धर्मराजके शूरवीर योद्धाओंका महान् कोलाहल प्रकट हुआ ॥ जैसे फूलपर झुंड-के-झुंड भौंरे जुट जाते हैं, उसी प्रकार पुष्पक विमानपर सैकड़ों, हजारों शूरवीर यमदूत चढ़ आये और प्रासों, परिघों, शूलों, मूसलों, शक्तियों तथा तोमरोंद्वारा उसे तहस-नहस करने लगे । उन्होंने पुष्पक विमानके आसन, प्रासाद, वेदी और फाटक शीघ्र ही तोड़ डाले ॥२५-२६½॥
देवनिष्ठानभूतं तद् विमानं पुष्पकं मृधे ॥ २७ ॥ भज्यमानं तथैवासीदक्षयं ब्रह्मतेजसा ।
भावार्थ
देवताओंका अधिष्ठानभूत वह पुष्पकविमान उस युद्धमें तोड़ा जानेपर भी ब्रह्माजीके प्रभावसे ज्यों-का-त्यों हो जाता था; क्योंकि वह नष्ट होनेवाला नहीं था ॥ २७½ ॥
असंख्या सुमहत्यासीत् तस्य सेना महात्मनः ॥ २८ ॥ शूराणामग्रयातॄणां सहस्राणि शतानि च ।
भावार्थ
महामना यमकी विशाल सेना असंख्य थी । उसमें सैकड़ों-हजारों शूरवीर आगे बढ़कर युद्ध करनेवाले थे ॥ २८½ ॥
ततो वृक्षैश्च शैलैश्च प्रासादानां शतैस्तथा ॥ २९ ॥ ततस्ते सचिवास्तस्य यथाकामं यथाबलम् । अयुध्यन्त महावीराः स च राजा दशाननः ॥ ३० ॥
भावार्थ
यमदूतोंके आक्रमण करनेपर रावणके वे महावीर मन्त्री तथा स्वयं राजा दशग्रीव भी वृक्षों, पर्वत-शिखरों तथा यमलोकके सैकड़ों प्रासादोंको उखाड़कर उनके द्वारा पूरी शक्ति लगाकर इच्छानुसार युद्ध करने लगे ॥ २९–३० ॥
ते तु शोणितदिग्धाङ्गाः सर्वशास्त्रसमाहताः । अमात्या राक्षसेन्द्रस्य चक्रुरायोधनं महत् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
राक्षसराजके मन्त्रियोंके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे थे । सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघातसे वे घायल हो चुके थे । फिर भी उन्होंने बड़ा भारी युद्ध किया ॥ ३१ ॥
अन्योन्यं ते महाभागा जघ्नुः प्रहरणैर्भृशम् । यमस्य च महाबाहो रावणस्य च मन्त्रिणः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
महाबाहु श्रीराम ! यमराज तथा रावणके वे महाभाग मन्त्री एक दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा बड़े जोरसे आघात-प्रत्याघात करने लगे ॥ ३२ ॥
अमात्यांस्तांस्तु संत्यज्य यमयोधा महाबलाः । तमेव चाभ्यधावन्त शूलवर्षैर्दशाननम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् यमराजके महाबली योद्धाओंने रावणके मन्त्रियोंको छोड़कर उस दशग्रीवके ही ऊपर शूलोंकी वर्षा करते हुए धावा किया ॥ ३३ ॥
ततः शोणितदिग्धाङ्गः प्रहारैर्जर्जरीकृतः । फुल्लाशोक इवाभाति पुष्पके राक्षसाधिपः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
रावणका सारा शरीर शस्त्रोंकी मारसे जर्जर हो गया । वह खूनसे लथपथ हो गया और पुष्पकविमानके ऊपर फूले हुए अशोक वृक्षके समान प्रतीत होने लगा ॥ ३४ ॥
स तु शूलगदाप्रासाञ्छक्तितोमरसायकान् । मुसलानि शिलावृक्षान् मुमोचास्त्रबलाद् बली ॥ ३५ ॥
भावार्थ
तब बलवान् रावणने अपने अस्त्र-बलसे यमराजके सैनिकोंपर शूल, गदा, प्रास, शक्ति, तोमर, बाण, मूसल, पत्थर और वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ ३५ ॥
तरूणां च शिलानां च शस्त्राणां चातिदारुणम् । यमसैन्येषु तद् वर्षं पपात धरणीतले ॥ ३६ ॥ तांस्तु सर्वान् विनिर्भिद्य तदस्त्रमपहत्य च । जघ्नुस्ते राक्षसं घोरमेकं शतसहस्रशः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
वृक्षों, शिलाखण्डों और शस्त्रोंकी वह अत्यन्त भयंकर वृष्टि भूतलपर खड़े हुए यमराजके सैनिकोंपर पड़ने लगी ॥ वे सैनिक भी सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें एकत्र हो उसके सारे आयुधोंको छिन्न-भिन्न करके उसके द्वारा छोड़े हुए दिव्यास्त्रका भी निवारण कर एकमात्र उस भयंकर राक्षसको ही मारने लगे ॥ ३७ ॥
परिवार्य च तं सर्वे शैलं मेघोत्करा इव। भिन्दिपालैश्च शूलैश्च निरुच्छ्वासमपोथयन् ॥ ३८ ॥ विमुक्तकवचः क्रुद्धः सिक्तः शोणितविस्रवैः। ततः स पुष्पकं त्यक्त्वा पृथिव्यामवतिष्ठत ॥ ३९ ॥
भावार्थ
जैसे बादलोंके समूह पर्वतपर सब ओरसे जलकी धाराएँ गिराते हैं, उसी प्रकार यमराजके समस्त सैनिकोंने रावणको चारों ओरसे घेरकर उसे भिन्दिपालों और शूलोंसे छेदना आरम्भ कर दिया । उसको दम लेनेकी भी फुरसत नहीं दी ॥ रावणका कवच कटकर गिर पड़ा । उसके शरीरसे रक्तकी धारा बहने लगी । वह उस रक्तसे नहा उठा और कुपित हो पुष्पकविमान छोड़कर पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ ३९ ॥
ततः स कार्मुकी बाणी समरे चाभिवर्धत। लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन क्रुद्धस्तस्थौ यथान्तकः ॥ ४० ॥
भावार्थ
वहाँ दो घड़ीके बाद उसने अपने-आपको सँभाला । फिर तो वह धनुष और बाण हाथमें ले बढ़े हुए उत्साहसे सम्पन्न हो समराङ्गणमें कुपित हुए यमराजके समान खड़ा हुआ ॥ ४० ॥
ततः पाशुपतं दिव्यमस्त्रं संधाय कार्मुके। तिष्ठ तिष्ठेति तानुक्त्वा तच्चापं व्यपकर्षत ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उसने अपने धनुषपर पाशुपत नामक दिव्य अस्त्रका संधान किया और उन सैनिकोंसे ‘ठहरो-ठहरो’ कहते हुए उस धनुषको खींचा ॥ ४१ ॥
आकर्णात् स विकृष्यार्थ चापमिन्द्रारिराहवे। मुमोच तं शरं क्रुद्धस्त्रिपुरे शंकरो यथा ॥ ४२ ॥
भावार्थ
जैसे भगवान् शङ्करने त्रिपुरासुरपर पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया था, उसी प्रकार उस इन्द्रद्रोही रावणने अपने धनुषको कानतक खींचकर वह बाण छोड़ दिया ॥ ४२ ॥
तस्य रूपं शरस्यासीत् सधूमज्वालमण्डलम् । वनं दहिष्यतो घर्मे दावाग्नेरिव मूर्च्छतः ॥ ४३ ॥ ज्वालामाली स तु शरः क्रव्यादानुगतो रणे। मुक्तो गुल्मान् द्रुमांश्चापि भस्म कृत्वा प्रधावति ॥ ४४ ॥
भावार्थ
उस समय उसके बाणका रूप धूम और ज्वालाओंके मण्डलसे युक्त हो ग्रीष्म ऋतुमें जंगलको जलानेके लिये चारों ओर फैलते हुए दावानलके समान प्रतीत होने लगा ॥ रणभूमिमें ज्वालामालाओंसे घिरा हुआ वह बाण धनुषसे छूटते ही वृक्षों और झाड़ियोंको जलाता हुआ तीव्र गतिसे आगे बढ़ा और उसके पीछे-पीछे मांसाहारी जीव-जन्तु चलने लगे ॥ ४४ ॥
ते तस्य तेजसा दग्धाः सैन्या वैवस्वतस्य तु। रणे तस्मिन् निपतिता माहेन्द्रा इव केतवः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
उस युद्धस्थलमें यमराजके वे सारे सैनिक पाशुपतास्त्रके तेजसे दग्ध हो इन्द्रध्वजके समान नीचे गिर पड़े ॥ ४५ ॥
ततस्तु सचिवैः सार्धं राक्षसो भीमविक्रमः। ननाद सुमहानादं कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर अपने मन्त्रियोंके साथ वह भयानक पराक्रमी राक्षस पृथ्वीको कम्पित करता हुआ-सा बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ ४६ ॥
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