उत्तरकाण्ड, सर्ग 20
ततो वित्रासयन् मर्त्यान् पृथिव्यां राक्षसाधिपः । आससाद घने तस्मिन् नारदं मुनिपुङ्गवम् ॥ १ ॥
भावार्थ
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) इसके बाद राक्षसराज रावण मनुष्योंको भयभीत करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा । एक दिन पुष्पक विमानसे यात्रा करते समय उसे बादलोंके बीचमें मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदजी मिले ॥ १ ॥
तस्याभिवादनं कृत्वा दशग्रीवो निशाचरः । अब्रवीत् कुशलं पृष्ट्वा हेतुमागमनस्य च ॥ २ ॥ नारदस्तु महातेजा देवर्षिरमितप्रभः । अब्रवीन्मेघपृष्ठस्थो रावणं पुष्पके स्थितम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
निशाचर दशग्रीवने उनका अभिवादन करके कुशल-समाचारकी जिज्ञासा की और उनके आगमनका कारण पूछा—॥ तब बादलोंकी पीठपर खड़े हुए अमित कान्तिमान् महातेजस्वी देवर्षि नारदने पुष्पक विमानपर बैठे हुए रावणसे कहा—॥ ३ ॥
राक्षसाधिपते सौम्य तिष्ठ विश्रवसः सुत । प्रीतोऽस्म्यभिजनोपेत विक्रमैरूर्जितैस्तव ॥ ४ ॥ विष्णुना दैत्यघातैश्च गन्धर्वोरगधर्षणैः । त्वया समं विमर्दैश्च भृशं हि परितोषितः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘उत्तम कुलमें उत्पन्न विश्रवणकुमार राक्षसराज रावण ! सौम्य ! ठहरो, मैं तुम्हारे बढ़े हुए बल-विक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ॥ ‘दैत्योंका विनाश करनेवाले अनेक संग्राम करके भगवान् विष्णुने तथा गन्धर्वों और नागोंको पददलित करनेवाले युद्धों-द्वारा तुमने मुझे समानरूपसे संतुष्ट किया है ॥ ५ ॥
किंचिद् वक्ष्यामि तावत् तु श्रोतव्यं श्रोष्यसे यदि । तन्मे निगदतस्तात समाधिं श्रवणे कुरु ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘इस समय यदि तुम सुनोगे तो मैं तुमसे कुछ सुनने-योग्य बात कहूँगा । तात ! मेरे मुँहसे निकली हुई उस बातको सुननेके लिये तुम अपने चित्तको एकाग्र करो ॥ ६ ॥
किमयं वध्यते तात त्वयावध्येन दैवतैः । हत एव ह्ययं लोको यदा मृत्युवशं गतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तात ! तुम देवताओंके लिये भी अवध्य होकर इस भूलोकके निवासियोंका वध क्यों कर रहे हो ? यहाँके प्राणी तो मृत्युके अधीन होनेके कारण स्वयं ही मरे हुए हैं; फिर तुम भी इन मरे हुओंको क्यों मार रहे हो ? ॥ ७ ॥
देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । अवध्येन त्वया लोकः क्लेष्टुं योग्यो न मानुषः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस भी जिसे नहीं मार सकते, ऐसे विख्यात वीर होकर भी तुम इस मनुष्यलोकको क्लेश पहुँचाओ, यह कदापि तुम्हारे योग्य नहीं है ॥ ८ ॥
नित्यं श्रेयसि सम्मूढं महद्भिर्व्यसनैर्वृतम् । हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ॥ ९ ॥ तैस्तैरनिष्टोपगमैरजस्रं यत्र कुत्र कः । मतिमान् मानुषे लोके युद्धेन प्रणयी भवेत् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘जो सदा अपने कल्याण-साधनमें मूढ़ हैं, बड़ी-बड़ी विपत्तियोंसे घिरे हुए हैं और बुढ़ापा तथा सैकड़ों रोगोंसे युक्त हैं, ऐसे लोगोंको कोई भी वीर पुरुष कैसे मार सकता है ? ॥ ‘जो नाना प्रकारके अनिष्टोंकी प्राप्तिसे जहाँ कहीं भी पीड़ित है, उस मनुष्यलोकमें आकर कौन बुद्धिमान् वीर पुरुष युद्धके द्वारा मनुष्योंके वधमें अनुरक्त होगा ? ॥ १० ॥
क्षीयमाणं दैवहतं क्षुत्पिपासाजरादिभिः । विषादशोकसम्मूढं लोकं त्वं क्षपयस्व मा ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘यह लोक तो यों ही भूख, प्यास और जरा आदिसे क्षीण हो रहा है तथा विषाद और शोकमें डूबकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठा है । दैवके मारे हुए इस मर्त्यलोकका तुम विनाश न करो ॥ ११ ॥
पश्य तावन्महाबाहो राक्षसेश्वर मानुषम् । मूढमेवं विचित्रार्थं यस्य न ज्ञायते गतिः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘महाबाहु राक्षसराज ! देखो तो सही, यह मनुष्यलोक ज्ञानशून्य होनेके कारण मूढ़ होनेपर भी किस तरह नाना प्रकारके क्षुद्र पुरुषार्थोंमें आसक्त है ? इसे इस बातका भी पता नहीं है कि कब दुःख और सुख आदि भोगनेका अवसर आयेगा ? ॥ १२ ॥
क्वचिद् वादित्रनृत्यादि सेव्यते मुदितैर्जनैः । रुद्यते चापरैरार्तैर्धाराश्रुनयनाननैः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यहाँ कहीं कुछ मनुष्य तो आनन्दमग्न होकर गाजे-बाजे और नाच आदिका सेवन करते हैं—उनके द्वारा मन बहलाते हैं तथा कहीं कितने ही लोग दुःखसे पीड़ित हो नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए रोते रहते हैं ॥ १३ ॥
मातापितृसुतस्नेहभार्याबन्धुमनोरमैः । मोहितोऽयं जनो ध्वस्तः क्लेशं स्वं नावबुध्यते ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘माता, पिता तथा पुत्रके स्नेहसे और पत्नी तथा भाईके सम्बन्धमें नाना प्रकारके मनसूबे बाँधनेके कारण यह मनुष्यलोक मोहग्रस्त हो परमार्थसे भ्रष्ट हो रहा है । इसे अपने बन्धनजनित क्लेशका अनुभव ही नहीं होता है ॥ १४ ॥
तत्किमेवं परिक्लिश्य लोकं मोहनिराकृतम् । जित एव त्वया सौम्य मर्त्यलोको न संशयः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार जो मोह ( अज्ञान ) के कारण परम पुरुषार्थ से वञ्चित हो गया है, ऐसे मनुष्य-लोकको क्लेश पहुँचाकर तुम्हें क्या मिलेगा ? सौम्य ! तुमने मनुष्य-लोकको तो जीत ही लिया है, इसमें कोई भी संशय नहीं है ॥ १५ ॥
अवश्यमेभिः सर्वैश्च गन्तव्यं यमसादनम् । तच्चिगृह्णीष्व पौलस्त्य यमं परपुरंजय ॥ १६ ॥ तस्मिञ्जिते जितं सर्वं भवत्येव न संशयः ।
भावार्थ
‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पुलस्त्यनन्दन ! इन सब मनुष्योंको यमलोकमें अवश्य जाना पड़ता है । अतः यदि शक्ति हो तो तुम यमराजको अपने काबूमें करो । उन्हें जीत लेनेपर तुम सबको जीत सकते हो; इसमें संशय नहीं है’ ॥१६½॥
एवमुक्तस्तु लङ्केशो दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ १७ ॥ अब्रवीन्नारदं तत्र सम्प्रहस्याभिवाद्य च ।
भावार्थ
नारदजीके ऐसा कहनेपर लङ्कापति रावण अपने तेजसे उद्दीप्त होनेवाले उन देवर्षिको प्रणाम करके हँसता हुआ बोला--॥ १७½ ॥
महर्षे देवगन्धर्वविहार समरप्रिय ॥ १८ ॥ अहं समुद्यतो गन्तुं विजयार्थं रसातलम् ।
भावार्थ
‘महर्षे ! आप देवताओं और गन्धर्वोंके लोकमें विहार करनेवाले हैं । युद्धके दृश्य देखना आपको बहुत ही प्रिय है । मैं इस समय दिग्विजयके लिये रसातलमें जानेको उद्यत हूँ ॥ १८½ ॥
ततो लोकत्रयं जित्वा स्थाप्य नागान् सुरान् वशे॥१९॥ समुद्रममृतार्थं च मथिष्यामि रसालयम् ।
भावार्थ
‘फिर तीनों लोकोंको जीतकर नागों और देवताओंको अपने वशमें करके अमृतकी प्राप्तिके लिये रसनिधि समुद्रका मन्थन करूँगा’ ॥ १९½ ॥
अथाब्रवीद् दशग्रीवं नारदो भगवानृषिः ॥ २० ॥ क खल्विदानीं मार्गेण त्वयेहान्येन गम्यते । अयं खलु सुदुर्गम्यः प्रेतराजपुरं प्रति ॥ २१ ॥ मार्गो गच्छति दुर्धर्ष यमस्यामित्रकर्शन ।
भावार्थ
यह सुनकर देवर्षि भगवान् नारदने कहा—‘शत्रुसूदन ! यदि तुम रसातलको जाना चाहते हो तो इस समय उसका मार्ग छोड़कर दूसरे रास्तेसे कहाँ जा रहे हो ? दुर्धर्ष वीर ! रसातलका यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है और यमराजकी पुरीसे होकर ही जाता है’ ॥ २०-२१½ ॥
स तु शारदमेघाभं हासं मुक्त्वा दशाननः ॥ २२ ॥ उवाच कृतमित्येव वचनं चेदमब्रवीत् ।
भावार्थ
नारदजीके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण शरद् ऋतुके बादलकी भाँति अपना उज्ज्वल हास बिखेरता हुआ बोला— ‘देवर्षे ! मैंने आपकी बात स्वीकार कर ली।’ इसके बाद उसने यों कहा—॥ २२½ ॥
तस्मादेवमहं ब्रह्मन् वैवस्वतवधोद्यतः ॥ २३ ॥ गच्छामि दक्षिणामाशां यत्र सूर्यात्मजो नृपः ।
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! अब यमराजका वध करनेके लिये उद्यत होकर मैं उस दक्षिण दिशाको जाता हूँ, जहाँ सूर्यपुत्र राजा यम निवास करते हैं ॥ २३½ ॥
मया हि भगवन् क्रोधात् प्रतिज्ञातं रणार्थिना ॥ २४ ॥ अवजेष्यामि चतुरो लोकपालानिति प्रभो ।
भावार्थ
‘प्रभो ! भगवन् ! मैंने युद्धकी इच्छासे क्रोधपूर्वक प्रतिज्ञा की है कि चारों लोकपालोंको परास्त करूँगा ॥ २४½ ॥
तदिह प्रस्थितोऽहं वै पितृराजपुरं प्रति ॥ २५ ॥ प्राणिसंक्लेशकर्तारं योजयिष्यामि मृत्युना ।
भावार्थ
‘अतः मैं यहाँसे यमपुरीको प्रस्थान कर रहा हूँ । संसारके प्राणियोंको मौतका कष्ट देनेवाले सूर्यपुत्र यमको स्वयं ही मृत्युसे संयुक्त कर दूँगा’ ॥ २५½ ॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मुनिं तमभिवाद्य च ॥ २६ ॥ प्रययौ दक्षिणामाशां प्रविष्टः सह मन्त्रिभिः ।
भावार्थ
ऐसा कहकर दशग्रीवने मुनिको प्रणाम किया और मन्त्रियोंके साथ वह दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया ॥२६½॥
नारदस्तु महातेजा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः ॥ २७ ॥ चिन्तयामास विप्रेन्द्रो विधूम इव पावकः ।
भावार्थ
उसके चले जानेपर धूमरहित अग्निके समान महातेजस्वी विप्रवर नारदजी दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो इस प्रकार विचार करने लगे—॥ २७½ ॥
येन लोकास्त्रयः सेन्द्राः क्लिश्यन्ते सचराचराः ॥ २८ ॥ क्षीणे चायुषि धर्मेण स कालो जेष्यते कथम् ।
भावार्थ
‘आयु क्षीण होनेपर जिनके द्वारा धर्मपूर्वक इन्द्रसहित तीनों लोकोंके चराचर प्राणी क्लेशमें डाले जाते—दण्डित होते हैं, वे कालस्वरूप यमराज इस रावणके द्वारा कैसे जीते जायँगे ? ॥ २८½ ॥
स्वदत्तकृतसाक्षी यो द्वितीय इव पावकः ॥ २९ ॥ लब्धसंज्ञा विचेष्टन्ते लोका यस्य महात्मनः । यस्य नित्यं त्रयो लोका विद्रवन्ति भयार्दिताः ॥ ३० ॥ तं कथं राक्षसेन्द्रोऽसौ स्वयमेव गमिष्यति ।
भावार्थ
‘जो जीवोंके दान और कर्मके साक्षी हैं, जिनका तेज द्वितीय अग्निके समान है, जिन महात्मासे चेतना पाकर सम्पूर्ण जीव नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, जिनके भयसे पीड़ित हो तीनों लोकोंके प्राणी उनसे दूर भागते हैं, उन्हींके पास यह राक्षसराज स्वयं ही कैसे जायगा ? ॥ २९-३०½ ॥
यो विधाता च धाता च सुकृतं दुष्कृतं तथा ॥ ३१ ॥ त्रैलोक्यं विजितं येन तं कथं विजयिष्यते । अपरं किं तु कृत्वैवं विधानं संविधास्यति ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जो त्रिलोकीको धारण-पोषण करनेवाले तथा पुण्य और पापके फल देनेवाले हैं और जिन्होंने तीनों लोकोंपर विजय पायी है, उन्हीं कालदेवको यह राक्षस कैसे जीतेगा ? काल ही सबका साधन है । यह राक्षस कालके अतिरिक्त दूसरे किस साधनका सम्पादन करके उस कालपर विजय प्राप्त करेगा ? ॥ ३१-३२ ॥
कौतूहलं समुत्पन्नो यास्यामि यमसादनम् । विमर्दं द्रष्टुमनयोर्यमराक्षसयोः स्वयम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘अब तो मेरे मनमें बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है, अतः इन यमराज और राक्षसराजका युद्ध देखनेके लिये मैं स्वयं भी यमलोकको जाऊँगा’ ॥ ३३ ॥
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