उत्तरकाण्ड, सर्ग 19
अथ जित्वा मरुत्तं स प्रययौ राक्षसाधिपः । नगराणि नरेन्द्राणां युद्धकाङ्क्षी दशाननः ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) पूर्वोक्त रूपसे राजा मरुत्तको जीतनेके पश्चात् राक्षसराज दशग्रीव क्रमशः अन्य नरेशोंके नगरोंमें भी युद्धकी इच्छासे गया ॥ १ ॥
समासाद्य तु राजेन्द्रान् महेन्द्रवरुणोपमान् । अब्रवीद् राक्षसेन्द्रस्तु युद्धं मे दीयतामिति ॥ २ ॥ निर्जिताः स्मेति वा ब्रूत एष मे हि सुनिश्चयः । अन्यथा कुर्वतामेवं मोक्षो नैवोपपद्यते ॥ ३ ॥
भावार्थ
महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी उन महाराजोंके पास जाकर वह राक्षसराज उनसे कहता—‘राजाओ ! तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा यह कह दो कि ‘हम हार गये ।’ यही मेरा अच्छी तरह किया हुआ निश्चय है । इसके विपरीत करनेसे तुम्हें छुटकारा नहीं मिलेगा’ ॥ २-३ ॥
ततस्त्वभीरवः प्राज्ञाः पार्थिवा धर्मनिश्चयाः । मन्त्रयित्वा ततोऽन्योन्यं राजानः सुमहाबलाः ॥ ४ ॥ निर्जिताः स्मेत्यभाषन्त ज्ञात्वा वरबलं रिपोः । दुष्यन्तः सुरथो गाधिर्गयो राजा पुरूरवाः ॥ ५ ॥ एते सर्वेऽब्रुवंस्तात निर्जिताः स्मेति पार्थिवाः ।
भावार्थ
तब निर्भय, बुद्धिमान् तथा धर्मपूर्ण विचार रखनेवाले बहुत-से महाबली राजा परस्पर सलाह करके शत्रुकी प्रबलताको समझकर बोले—‘राक्षसराज ! हम तुमसे हार मान लेते हैं’ ॥ दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय, राजा पुरूरवा–इन सभी भूपालोंने अपने-अपने राजत्वकालमें रावणके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली ॥ ५½ ॥
अथायोध्यां समासाद्य रावणो राक्षसाधिपः ॥ ६ ॥ सुगुप्तामनरण्येन शक्रेणेवामरावतीम् । स तं पुरुषशार्दूलं पुरंदरसमं बले ॥ ७ ॥ प्राह राजानमासाद्य युद्धं देहीति रावणः । निर्जितोऽसीति वा ब्रूहि त्वमेवं मम शासनम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
इसके बाद राक्षसोंका राजा रावण इन्द्रद्वारा सुरक्षित अमरावतीकी भाँति महाराज अनरण्यद्वारा पालित अयोध्या पुरीमें आया । वहाँ पुरन्दर ( इन्द्र )केसमान पराक्रमी पुरुषसिंह राजा अनरण्यसे मिलकर बोला—‘राजन् ! तुम मुझसे युद्ध करनेका वचन दो अथवा कह दो कि ‘मैं हार गया ।’ यही मेरा आदेश है’ ॥ ६–८ ॥
अयोध्याधिपतिस्तस्य श्रुत्वा पापात्मनो वचः । अनरण्यस्तु संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥ दीयते द्वन्द्वयुद्धं ते राक्षसाधिपते मया । संतिष्ठ क्षिप्रमायत्तो भव चैवं भवाम्यहम् ॥ १० ॥
भावार्थ
उस पापात्माकी वह बात सुनकर अयोध्यानरेश अनरण्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे उस राक्षसराजसे बोले—॥ ‘निशाचरपते ! मैं तुम्हें द्वन्द्वयुद्धका अवसर देता हूँ । ठहरो, शीघ्र युद्धके लिये तैयार हो जाओ । मैं भी तैयार हो रहा हूँ’ ॥ १० ॥
अथ पूर्वं श्रुतार्थेन निर्जितं सुमहद् बलम् । निष्क्रामत् तन्नरेन्द्रस्य बलं रक्षोवधोद्यतम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
राजाने रावणकी दिग्विजयकी बात पहलेसे ही सुन रक्खी थी, इसलिये उन्होंने बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर ली थी । नरेशकी वह सारी सेना उस समय राक्षसके वधके लिये उत्साहित हो नगरसे बाहर निकली ॥ ११ ॥
नागानां दशसाहस्रं वाजिनां नियुतं तथा । रथानां बहुसाहस्रं पत्तीनां च नरोत्तम ॥ १२ ॥ महीं संछाद्य निष्क्रान्तं सपदातिरथं रणे ।
भावार्थ
नरश्रेष्ठ श्रीराम ! दस हजार हाथीसवार, एक लाख घुड़सवार, कई हजार रथी और पैदल सैनिक पृथ्वीको आच्छादित करके युद्धके लिये आगे बढ़े । रथों और पैदलों-सहित सारी सेना रणक्षेत्रमें जा पहुँची ॥ १२½ ॥
ततः प्रवृत्तं सुमहद् युद्धं युद्धविशारद ॥ १३ ॥ अनरण्यस्य नृपते राक्षसेन्द्रस्य चाद्भुतम् ।
भावार्थ
युद्धविशारद रघुवीर ! फिर तो राजा अनरण्य और निशाचर रावणमें बड़ा अद्भुत संग्राम होने लगा ॥ १३½ ॥
तद् रावणबलं प्राप्य बलं तस्य महीपतेः ॥ १४ ॥ प्राणश्यत तदा सर्वं हव्यं हुतमिवानले ।
भावार्थ
उस समय राजाकी सारी सेना रावणकी सेनाके साथ टक्कर लेकर उसी तरह नष्ट होने लगी, जैसे अग्निमें दी हुई आहुति पूर्णतः भस्म हो जाती है ॥ १४½ ॥
युद्ध्वा च सुचिरं कालं कृत्वा विक्रममुत्तमम् ॥ १५ ॥ प्रज्वलन्तं तमासाद्य क्षिप्रमेवावशेषितम् । प्राविशत् संकुलं तत्र शलभा इव पावकम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
उस सेनाने बहुत देरतक युद्ध किया, बड़ा पराक्रम दिखाया; परंतु तेजस्वी रावणका सामना करके वह बहुत थोड़ी संख्यामें शेष रह गयी और अन्ततोगत्वा जैसे पतिङ्गे आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार कालके गालमें चली गयी ॥ १५-१६ ॥
सोऽपश्यत् तन्नरेन्द्रस्तु नश्यमानं महाबलम् । महार्णवं समासाद्य वनापगशतं यथा ॥ १७ ॥
भावार्थ
राजाने देखा, मेरी विशाल सेना उसी प्रकार नष्ट होती चली जा रही है, जैसे जलसे भरी हुई सैकड़ों नदियाँ महासागरके पास पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं ॥१७॥
ततः शक्रधनुःप्रख्यं धनुर्विस्फारयन् स्वयम् । आससाद नरेन्द्रस्तं रावणं क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥
भावार्थ
तब महाराज अनरण्य क्रोधसे मूर्छित हो अपने इन्द्रधनुषके समान महान् शरासनको टंकारते हुए रावणका सामना करनेके लिये आये ॥ १८ ॥
अनरण्येन तेऽमात्या मारीचशुकसारणाः । प्रहस्तसहिता भग्ना व्यद्रवन्त मृगा इव ॥ १९ ॥
भावार्थ
फिर तो जैसे सिंहको देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार मारीच, शुक, सारण तथा प्रहस्त—ये चारों राक्षस मन्त्री राजा अनरण्यसे परास्त होकर भाग खड़े हुए ॥ १९ ॥
ततो बाणशतान्यष्टौ पातयामास मूर्धनि । तस्य राक्षसराजस्य इक्ष्वाकुकुलनन्दनः ॥ २० ॥ तस्य बाणाः पतन्तस्ते चक्रिरे न क्षतं क्वचित् । वारिधारा इवाभ्रेभ्यः पतन्त्यो गिरिमूर्धनि ॥ २१ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुवंशको आनन्दित करनेवाले राजा अनरण्यने राक्षसराज रावणके मस्तकपर आठ सौ बाण मारे ॥ परंतु जैसे बादलोंसे पर्वतशिखरपर गिरती हुई जल-धाराएँ उसे क्षति नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे बरसते हुए बाण उस निशाचरके शरीरपर कहीं घाव न कर सके ॥ २१॥
ततो राक्षसराजेन क्रुद्धेन नृपतिस्तदा । तलेनाभिहतो मूर्ध्नि स रथान्निपपात ह ॥ २२ ॥
भावार्थ
इसके बाद राक्षसराजने कुपित होकर राजाके मस्तकपर एक तमाचा मारा । इससे आहत होकर राजा रथसे नीचे गिर पड़े ॥ २२ ॥
स राजा पतितो भूमौ विह्वलः प्रविवेपितः । वज्रदग्ध इवारण्ये सालो निपतितो यथा ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘जैसे वनमें वज्रपातसे दग्ध हुआ साल्का वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार राजा अनरण्य व्याकुल हो भूमिपर गिरे और थर-थर काँपने लगे ॥ २३ ॥
तं प्रहस्याब्रवीद् रक्ष इक्ष्वाकुं पृथिवीपतिम् । किमिदानीं फलं प्राप्तं त्वया मां प्रति युध्यता ॥ २४ ॥
भावार्थ
यह देख रावण जोर-जोरसे हँस पड़ा और उन इक्ष्वाकुवंशी नरेशसे बोला—‘इस समय मेरे साथ युद्ध करके तुमने क्या फल प्राप्त किया है?॥ २४ ॥
त्रैलोक्ये नास्ति यो द्वन्द्वं मम दद्यान्नराधिप । शङ्के प्रसक्तो भोगेषु न शृणोषि बलं मम ॥ २५ ॥ तस्यैवं ब्रुवतो राजा मन्दासुर्वाक्यमब्रवीत् । किं शक्यमिह कर्तुं वै कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘नरेश्वर ! तीनों लोकोंमें कोई ऐसा वीर नहीं है, जो मुझे द्वन्द्वयुद्ध दे सके । जान पड़ता है तुमने भोगोंमें अधिक आसक्त रहनेके कारण मेरे बल-पराक्रमको नहीं सुना था’ ॥ राजाकी प्राणशक्ति क्षीण हो रही थी । उन्होंने इस प्रकार बातें करनेवाले रावणका वचन सुनकर कहा—‘राक्षसराज ! अब यहाँ क्या किया जा सकता है ? क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना अत्यन्त दुष्कर है ॥ २६ ॥
नह्यहं निर्जितो रक्षस्त्वया चात्मप्रशंसिना । कालेनैव विपन्नोऽहं हेतुभूतस्तु मे भवान् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! तू अपने मुँहसे अपनी प्रशंसा कर रहा है; किंतु तूने जो आज मुझे पराजित किया है, इसमें काल ही कारण है । वास्तवमें कालने ही मुझे मारा है । तू तो मेरी मृत्युमें निमित्तमात्र बन गया है ॥ २७ ॥
किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तुं प्राणपरिक्षये । नह्यहं विमुखी रक्षो युद्ध्यमानस्त्वया हतः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘मेरे प्राण जा रहे हैं, अतः इस समय मैं क्या कर सकता हूँ? निशाचर! मुझे संतोष है कि मैंने युद्धसे मुँह नहीं मोड़ा । युद्ध करता हुआ ही मैं तेरे हाथसे मारा गया हूँ ॥ २८ ॥
इक्ष्वाकुपरिभावित्वाद् वचो वक्ष्यामि राक्षस । यदि दत्तं यदि हुतं यदि मे सुकृतं तपः । यदि गुप्ताः प्रजाः सम्यक् तदा सत्यं वचोऽस्तु मे ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘परंतु राक्षस ! तूने अपने व्यङ्ग्यपूर्ण वचनसे इक्ष्वाकुकुलका अपमान किया है, इसलिये मैं तुझे शाप दूँगा— तेरे लिये अमङ्गलजनक बात कहूँगा । यदि मैंने दान, पुण्य, होम और तप किये हों, यदि मेरे द्वारा धर्मके अनुसार प्रजाजनोंका ठीक-ठीक पालन हुआ हो तो मेरा बात सत्य होकर रहे ॥ २९ ॥
उत्पत्स्यते कुले ह्यस्मिन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् । रामो दाशरथिर्नाम स ते प्राणान् हरिष्यति ॥ ३० ॥ ततो जलधरोदग्रस्ताडितो देवदुन्दुभिः । तस्मिन्नुदाहृते शापे पुष्पवृष्टिश्च खाच्च्युता ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके इस वंशमें ही दशरथनन्दन श्रीराम प्रकट होंगे, जो तेरे प्राणोंका अपहरण करेंगे’॥ राजाके इस प्रकार शाप देते ही मेघके समान गम्भीर स्वरमें देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३१ ॥
ततः स राजा राजेन्द्र गतः स्थानं त्रिविष्टपम् । स्वर्गते च नृपे तस्मिन् राक्षसः सोऽपसर्पत ॥ ३२ ॥
भावार्थ
राजाधिराज श्रीराम ! तदनन्तर राजा अनरण्य स्वर्गलोकको सिधारे । उनके स्वर्गगामी हो जानेपर राक्षस रावण वहाँसे अन्यत्र चला गया ॥ ३२ ॥
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