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उत्तरकाण्ड, सर्ग 27

कैलासं लङ्घयित्वा तु ससैन्यबलवाहनः । आससाद महातेजा इन्द्रलोकं दशाननः ॥ १ ॥

भावार्थ

कैलास पर्वतको पार करके महातेजस्वी दशमुख रावण सेना और सवारियोंके साथ इन्द्रलोकमें जा पहुँचा ॥ १ ॥

तस्य राक्षससैन्यस्य समन्तादुपयास्यतः । देवलोके बभौ शब्दो भिद्यमानार्णवोपमः ॥ २ ॥

भावार्थ

सब ओरसे आती हुई राक्षस-सेनाका कोलाहल देवलोकमें ऐसा जान पड़ता था, मानो महासागरके मथे जानेका शब्द प्रकट हो रहा हो ॥ २ ॥

श्रुत्वा तु रावणं प्राप्तमिन्द्रश्चलित आसनात् । देवानथाब्रवीत् तत्र सर्वानेव समागतान् ॥ ३ ॥ आदित्यांश्च वसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् । सज्जा भवत युद्धार्थं रावणस्य दुरात्मनः ॥ ४ ॥

भावार्थ

रावणका आगमन सुनकर इन्द्र अपने आसनसे उठ गये और अपने पास आये हुए समस्त देवताओंसे बोले—॥ उन्होंने आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, साध्यों तथा मरुद्गणोंसे भी कहा—‘तुम सब लोग दुरात्मा रावणके साथ युद्ध करनेके लिये तैयार हो जाओ’ ॥ ४ ॥

प्रवमुक्तास्तु शक्रेण देवाः शक्रसमा युधि । संनह्य सुमहासत्त्वा युद्धश्रद्धासमन्विताः ॥ ५ ॥

भावार्थ

इन्द्रके ऐसा कहनेपर युद्धमें उन्हींके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली देवता कवच आदि धारण करके युद्धके लिये उत्सुक हो गये ॥ ५ ॥

स तु दीनः परित्रस्तो महेन्द्रो रावणं प्रति । विष्णोः समीपमागत्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ६ ॥ विष्णो कथं करिष्यामि रावणं राक्षसं प्रति । अहोऽतिबलवद् रक्षो युद्धार्थमभिवर्तते ॥ ७ ॥

भावार्थ

देवराज इन्द्रको रावणसे भय हो गया था । अतः वे दुखी हो भगवान् विष्णुके पास आये और इस प्रकार बोले—॥ ‘विष्णुदेव ! मैं राक्षस रावणके लिये क्या करूँ ! अहो ! वह अत्यन्त बलशाली निशाचर मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है ॥ ७ ॥

वरप्रदानाद् बलवान् न खल्वन्येन हेतुना । तत् तु सत्यं वचः कार्यं यदुक्तं पद्मयोनिना ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘वह केवल ब्रह्माजीके वरदानके कारण प्रबल हो गया है; दूसरे किसी हेतुसे नहीं । कमलयोनि ब्रह्माजीने जो वर दे दिया है, उसे सत्य करना हम सब लोगोंका काम है ॥ ८ ॥

तद् यथा नमुचिर्वृत्रो बलिर्नरकशम्बरौ । त्वद्बलं समवष्टभ्य मया दग्धास्तथा कुरु ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘अतः जैसे पहले आपके बलका आश्रय लेकर मैंने नमुचि, वृत्रासुर, बलि, नरक और शम्बर आदि असुरोंको दग्ध कर डाला है, उसी प्रकार इस समय भी इस असुरका अन्त हो जाय, ऐसा कोई उपाय आप ही कीजिये ॥ ९ ॥

नह्यन्यो देवदेवेश त्वदृते मधुसूदन । गतिः परायणं चापि त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ १० ॥

भावार्थ

‘मधुसूदन ! आप देवताओंके भी देवता एवं ईश्वर हैं । इस चराचर त्रिभुवनमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो हम देवताओंको सहारा दे सके । आप ही हमारे परम आश्रय हैं ॥ १० ॥

त्वं हि नारायणः श्रीमान् पद्मनाभः सनातनः । त्वयेमे स्थापिता लोकाः शक्रश्चाहं सुरेश्वरः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘आप पद्मनाभ हैं—आपहीके नाभिकमलसे जगत्की उत्पत्ति हुई है । आप ही सनातनदेव श्रीमान् नारायण हैं । आपने ही इन तीनों लोकोंको स्थापित किया है और आपने ही मुझे देवराज इन्द्र बनाया है ॥ ११ ॥

त्वया सृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । त्वामेव भगवन् सर्वे प्रविशन्ति युगक्षये ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! आपने ही स्थावर-जङ्गम प्राणियोंसहित इस समस्त त्रिलोकीकी सृष्टि की है और प्रलयकालमें सम्पूर्ण भूत आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥ १२ ॥

तदाचक्ष्व यथातत्त्वं देवदेव मम स्वयम् । असिचक्रसहायस्त्वं योत्स्यसे रावणं प्रति ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘इसलिये देवदेव ! आप ही मुझे कोई ऐसा अमोघ उपाय बताइये, जिससे मेरी विजय हो । क्या आप स्वयं चक्र और तलवार लेकर रावणसे युद्ध करेंगे ?’ ॥ १३ ॥

एवमुक्तः स शक्रेण देवो नारायणः प्रभुः । अब्रवीन्न परित्रासः कर्तव्यः श्रूयतां च मे ॥ १४ ॥ न तावदेष दुष्टात्मा शक्यो जेतुं सुरासुरैः । हन्तुं चापि समासाद्य वरदानेन दुर्जयः ॥ १५ ॥

भावार्थ

इन्द्रके ऐसा कहनेपर भगवान् नारायणदेव बोले— ‘देवराज ! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये । मेरी बात सुनो–॥ ‘पहली बात तो यह है इस दुष्टात्मा रावणको सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी न तो मार सकते हैं और न परास्त ही कर सकते हैं; क्योंकि वरदान पानेके कारण यह इस समय दुर्जय हो गया है ॥ १५ ॥

सर्वथा तु महत् कर्म करिष्यति बलोत्कटः । राक्षसः पुत्रसहितो दग्धमेतन्निसर्गतः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘अपने पुत्रके साथ आया हुआ यह उत्कट बलशाली राक्षस सब प्रकारसे महान् पराक्रम प्रकट करेगा । यह बात मुझे अपनी स्वाभाविक ज्ञानदृष्टिसे दिखायी दे रही है ॥१६॥

यत् तु मां त्वमभाषिष्ठा युध्यस्वेति सुरेश्वर । नाहं तं प्रतियोत्स्यामि रावणं राक्षसं युधि ॥ १७ ॥ नाहत्वा समरे शत्रुं विष्णुः प्रतिनिवर्तते । दुर्लभश्चैव कामोऽद्य वरगुप्ताद्धि रावणात् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘सुरेश्वर ! दूसरी बात जो मुझे कहनी है, इस प्रकार है— तुम जो मुझसे कह रहे थे कि ‘आप ही उसके साथ युद्ध कीजिये’ उसके उत्तरमें निवेदन है कि मैं इस समय युद्धस्थलमें राक्षस रावणका सामना करनेके लिये नहीं जाऊँगा ॥ ‘मुझ विष्णुका यह स्वभाव है कि मैं संग्राममें शत्रुका वध किये बिना पीछे नहीं लौटता; परंतु इस समय रावण वरदानसे सुरक्षित है, इसलिये उसकी ओरसे मेरी इस विजय-सम्बन्धिनी इच्छाकी पूर्ति होनी कठिन है ॥ १८ ॥

प्रतिजाने च देवेन्द्र त्वत्समीपे शतक्रतो । भवितास्मि यथास्याहं रक्षसो मृत्युकारणम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘परंतु देवेन्द्र ! शतक्रतो ! मैं तुम्हारे समीप इस बातकी प्रतिज्ञा करता हूँ कि समय आनेपर मैं ही इस राक्षसकी मृत्युका कारण बनूँगा ॥ १९ ॥

अहमेव निहन्तास्मि रावणं सपुरःसरम् । देवता नन्दयिष्यामि ज्ञात्वा कालमुपागतम् ॥ २० ॥ पतत् ते कथितं तत्त्वं देवराज शचीपते । युद्ध्यस्व विगतत्रासः सुरैः सार्धं महाबल ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘मैं ही रावणको उसके अग्रगामी सैनिकोंसहित मारूँगा और देवताओंको आनन्दित करूँगा; परंतु यह तभी होगा जब मैं जान लूँगा कि इसकी मृत्युका समय आ पहुँचा है ॥ ‘देवराज ! ये सब बातें मैंने तुम्हें ठीक-ठीक बता दीं । महाबलशाली शचीवल्लभ ! इस समय तो तुम्हीं देवताओंसहित जाकर उस राक्षसके साथ निर्भय हो युद्ध करो’॥ २१ ॥

ततो रुद्राः सहादित्या वसवो मरुतोऽश्विनौ । संनद्धा निर्ययुस्तूर्णं राक्षसानभितः पुरात् ॥ २२ ॥

भावार्थ

तदनन्तर रुद्र, आदित्य, वसु, मरुद्गण और अश्विनीकुमार आदि देवता युद्धके लिये तैयार होकर तुरंत अमरावतीपुरीसे बाहर निकले और राक्षसोंका सामना करनेके लिये आगे बढे ॥ २२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे नादः शुश्रुवे रजनीक्षये । तस्य रावणसैन्यस्य प्रयुद्धस्य समन्ततः ॥ २३ ॥

भावार्थ

इसी बीचमें रात बीतते-बीतते सब ओरसे युद्धके लिये उद्यत हुई रावणकी सेनाका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ २३ ॥

ते प्रबुद्धा महावीर्या अन्योन्यमभिवीक्ष्य वै । संग्राममेवाभिमुखा अभ्यवर्तन्त हृष्टवत् ॥ २४ ॥

भावार्थ

वे महापराक्रमी राक्षससैनिक सवेरे जागनेपर एक दूसरेकी ओर देखते हुए बड़े हर्ष और उत्साहके साथ युद्धके लिये ही आगे बढ़ने लगे ॥ २४ ॥

ततो दैवतसैन्यानां संक्षोभः समजायत । तदक्षयं महासैन्यं दृष्ट्वा समरमूर्धनि ॥ २५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर युद्धके मुहानेपर राक्षसोंकी उस अनन्त एवं विशाल सेनाको देखकर देवताओंकी सेनामें बड़ा क्षोभ हुआ ॥ २५ ॥

ततो युद्धं समभवद् देवदानवरक्षसाम् । घोरं तुमुलनिर्ह्रादं नानाप्रहरणोद्यतम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

फिर तो देवताओंका दानवों और राक्षसोंके साथ भयंकर युद्ध छिड़ गया । भयंकर कोलाहल होने लगा और दोनों ओरसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछार आरम्भ हो गयी ॥ २६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे शूरा राक्षसा घोरदर्शनाः । युद्धार्थं समवर्तन्त सचिवा रावणस्य ते ॥ २७ ॥

भावार्थ

इसी समय रावणके मन्त्री शूरवीर राक्षस, जो बड़े भयंकर दिखायी देते थे, युद्धके लिये आगे बढ़ आये ॥ २७ ॥

मारीचश्च प्रहस्तश्च महापार्श्वमहोदरौ । अकम्पनो निकुम्भश्च शुकः सारण एव च ॥ २८ ॥ संह्रादो धूमकेतुश्च महादंष्ट्रो घटोदरः । जम्बुमाली महाह्रादो विरूपाक्षश्च राक्षसः ॥ २९ ॥ सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च दुर्मुखो दूषणः खरः । त्रिशिराः करवीराक्षः सूर्यशत्रुश्च राक्षसः ॥ ३० ॥ महाकायोऽतिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ । एतैः सर्वैः परिवृतो महावीर्यैर्महाबलः ॥ ३१ ॥ रावणस्यार्यकः सैन्यं सुमाली प्रविवेश ह ।

भावार्थ

मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व, महोदर, अकम्पन, निकुम्भ, शुक, सारण, संह्राद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्राद, विरूपाक्ष, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, सूर्यशत्रु, महाकाय, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक—इन सभी महापराक्रमी राक्षसोंसे घिरे हुए महाबली सुमालीने, जो रावणका नाना था, देवताओंकी सेनामें प्रवेश किया ॥ २८-३१½ ॥

स दैवतगणान् सर्वान् नानाप्रहरणैः शितैः ॥ ३२ ॥ व्यध्वंसयत् समं क्रुद्धो वायुर्जलधरानिव ।

भावार्थ

उसने कुपित हो नाना प्रकारके पैने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा समस्त देवताओंको उसी तरह मार भगाया, जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है ॥ ३२½ ॥

तद् दैवतबलं राम हन्यमानं निशाचरैः ॥ ३३ ॥ प्रणुन्नं सर्वतो दिग्भ्यः सिंहनुन्ना मृगा इव ।

भावार्थ

श्रीराम ! निशाचरोंकी मार खाकर देवताओंकी वह सेना सिंहद्वारा खदेड़े गये मृगोंकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चली ॥ ३३½ ॥

एतस्मिन्नन्तरे शूरो वसूनामष्टमो वसुः ॥ ३४ ॥ सावित्र इति विख्यातः प्रविवेश रणाजिरम् ।

भावार्थ

इसी समय वसुओंमेंसे आठवें वसुने, जिनका नाम सावित्र है, समराङ्गणमें प्रवेश किया ॥ ३४½ ॥

सैन्यैः परिवृतो हृष्टैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥ ३५ ॥ त्रासयञ्शत्रुसैन्यानि प्रविवेश रणाजिरम् ।

भावार्थ

वे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एवं उत्साहित सैनिकोंसे घिरे हुए थे । उन्होंने शत्रुसेनाओंको संत्रस्त करते हुए रणभूमिमें पदार्पण किया ॥ ३५½ ॥

तथादित्यौ महावीर्यौ त्वष्टा पूषा च तौ समम् ॥ ३६ ॥ निर्भयौ सह सैन्येन तदा प्राविशतां रणे ।

भावार्थ

इनके सिवा अदितिके दो महापराक्रमी पुत्र त्वष्टा और पूषाने अपनी सेनाके साथ एक ही समय युद्धस्थलमें प्रवेश किया, वे दोनों वीर निर्भय थे ॥ ३६½ ॥

ततो युद्धं समभवत् सुराणां सह राक्षसैः ॥ ३७ ॥ क्रुद्धानां रक्षसां कीर्तिं समरेष्वनिवर्तिनाम् ।

भावार्थ

फिर तो देवताओंका राक्षसोंके साथ घोर युद्ध होने लगा । युद्धसे पीछे न हटनेवाले राक्षसोंकी बढ़ती हुई कीर्ति देख-सुनकर देवता उनके प्रति बहुत कुपित थे ॥ ३७½ ॥

ततस्ते राक्षसाः सर्वे विबुधान् समरे स्थितान् ॥ ३८ ॥ नानाप्रहरणैर्घोरैर्जघ्नुः शतसहस्रशः ।

भावार्थ

तत्पश्चात् समस्त राक्षस समरभूमिमें खड़े हुए लाखों देवताओंको नाना प्रकारके घोर अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा मारने लगे ॥ ३८½ ॥

देवाश्च राक्षसान् घोरान् महाबलपराक्रमान् ॥ ३९ ॥ समरे विमलैः शस्त्रैरुपनिन्युर्यमक्षयम् ।

भावार्थ

इसी तरह देवता भी महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न घोर राक्षसोंको समराङ्गणमें चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे मार-मारकर यमलोक भेजने लगे ॥ ३९½ ॥

एतस्मिन्नन्तरे राम सुमाली नाम राक्षसः ॥ ४० ॥ नानाप्रहरणैः क्रुद्धस्तत्सैन्यं सोऽभ्यवर्तत । स दैवतबलं सर्वं नानाप्रहरणैः शितैः ॥ ४१ ॥ व्यध्वंसयत संक्रुद्धो वायुर्जलधरं यथा ।

भावार्थ

श्रीराम ! इसी बीचमें सुमाली नामक राक्षसने कुपित होकर नाना प्रकारके आयुधोंद्वारा देवसेनापर आक्रमण किया । उसने अत्यन्त क्रोधसे भरकर बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाली वायुके समान अपने भाँति-भाँतिके तीखे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा समस्त देवसेनाको तितर-बितर कर दिया ॥ ४०-४१½ ॥

ते महाबाणवर्षैश्च शूलप्रासैः सुदारुणैः ॥ ४२ ॥ हन्यमानाः सुराः सर्वे न व्यतिष्ठन्त संहताः ।

भावार्थ

उसके महान् बाणों और भयंकर शूलों एवं प्रासोंकी वर्षासे मारे जाते हुए सभी देवता युद्धक्षेत्रमें संगठित होकर खड़े न रह सके ॥ ४२½ ॥

ततो विद्राव्यमाणेषु दैवतेषु सुमालिना ॥ ४३ ॥ वसूनामष्टमः क्रुद्धः सावित्रो वै व्यवस्थितः । संवृतः स्वैरथानीकैः प्रहरन्तं निशाचरम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

सुमालीद्वारा देवताओंके भगाये जानेपर आठवें वसु सावित्रको बड़ा क्रोध हुआ । वे अपनी रथसेनाओंके साथ आकर उस प्रहार करनेवाले निशाचरके सामने खड़े हो गये ॥ ४३-४४ ॥

विक्रमेण महातेजा वारयामास संयुगे । ततस्तयोर्महद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ॥ ४५ ॥ सुमालिनो वसोश्चैव समरेष्वनिवर्तिनोः ।

भावार्थ

महातेजस्वी सावित्रने युद्धस्थलमें अपने पराक्रमद्वारा सुमालीको आगे बढ़नेसे रोक दिया । सुमाली और वसु दोनोंमेंसे कोई भी युद्धसे पीछे हटनेवाला नहीं था; अतः उन दोनोंमें महान् एवं रोमाञ्चकारी युद्ध छिड़ गया ॥ ४५½ ॥

ततस्तस्य महाबाणैर्वसुना सुमहात्मना ॥ ४६ ॥ निहतः पन्नगरथः क्षणेन विनिपातितः ।

भावार्थ

तदनन्तर महात्मा वसुने अपने विशाल बाणोंद्वारा सुमालीके सर्प जुते हुए रथको क्षणभरमें तोड़-फोड़कर गिरा दिया ॥४६½॥

हत्वा तु संयुगे तस्य रथं बाणशतैश्चितम् ॥ ४७ ॥ गदां तस्य वधार्थाय वसुर्जग्राह पाणिना । ततः प्रगृह्य दीप्ताग्रां कालदण्डोपमां गदाम् ॥ ४८ ॥ तां मूर्ध्नि पातयामास सावित्रो वै सुमालिनः ।

भावार्थ

युद्धस्थलमें सैकड़ों बाणोंसे छिदे हुए सुमालीके रथको नष्ट करके वसुने उस निशाचरके वधके लिये कालदण्डके समान एक भयंकर गदा हाथमें ली, जिसका अग्रभाग अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था । उसे लेकर सावित्रने सुमालीके मस्तकपर दे मारा ॥ ४७-४८½ ॥

सा तस्योपरि चोल्काभा पतन्ती विबभौ गदा ॥ ४९ ॥ इन्द्रप्रमुक्ता गर्जन्ती गिराविव महाशनिः । तस्य नैवास्थि न शिरो न मांसं दृश्यते तदा ॥ ५० ॥ गदया भस्मतां नीतं निहतस्य रणाजिरे ।

भावार्थ

उसके ऊपर गिरती हुई वह गदा उल्काके समान चमक उठी, मानो इन्द्रके द्वारा छोड़ी गयी विशाल अशनि भारी गड़गड़ाहटके साथ किसी पर्वतके शिखरपर गिर रही हो।४९½। उसकी चोट लगते ही समराङ्गणमें सुमालीका काम तमाम हो गया । न उसकी हड्डीका पता लगा, न मस्तकका और न कहीं उसका मांस ही दिखायी दिया । वह सब कुछ उस गदाकी आगसे भस्म हो गया ॥ ५०½ ॥

तं दृष्ट्वा निहतं संख्ये राक्षसास्ते समन्ततः ॥ ५१ ॥ व्यद्रवन् सहिताः सर्वे क्रोशमानाः परस्परम् । विद्राव्यमाणा वसुना राक्षसा नावतस्थिरे ॥ ५२ ॥

भावार्थ

युद्धमें सुमालीको मारा गया देख वे सब राक्षस एक दूसरेको पुकारते हुए एक साथ चारों ओर भाग खड़े हुए । वसुके द्वारा खदेड़े जानेवाले वे राक्षस समरभूमिमें खड़े न रह सके ॥ ५१-५२ ॥

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