उत्तरकाण्ड, सर्ग 28
सुमालिनं हतं दृष्ट्वा वसुना भस्मसात्कृतम् । स्वसैन्यं विद्रुतं चापि लक्षयित्वार्दितं सुरैः ॥ १ ॥ ततः स बलवान् क्रुद्धो रावणस्य सुतस्तदा । निवर्त्य राक्षसान् सर्वान् मेघनादो व्यवस्थितः ॥ २ ॥
भावार्थ
सुमाली मारा गया, वसुने उसके शरीरको भस्म कर दिया और देवताओंसे पीड़ित होकर मेरी सेना भागी जा रही है, यह देख रावणका बलवान् पुत्र मेघनाद कुपित हो समस्त राक्षसोंको लौटाकर देवताओंसे लोहा लेनेके लिये स्वयं खड़ा हुआ ॥ १-२ ॥
स रथेनाग्निवर्णेन कामगेन महारथः । अभिदुद्राव सेनां तां वनान्यग्निरिव ज्वलन् ॥ ३ ॥
भावार्थ
वह महारथी वीर इच्छानुसार चलनेवाले अग्नितुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वनमें फैलनेवाले प्रज्वलित दावानलके समान उस देवसेनाकी ओर दौड़ा ॥ ३ ॥
ततः प्रविशतस्तस्य विविधायुधधारिणः । विदुद्रुवुर्दिशः सर्वा दर्शनादेव देवताः ॥ ४ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके आयुध धारण करके अपनी सेनामें प्रवेश करनेवाले उस मेघनादको देखते ही सब देवता सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले ॥ ४ ॥
न बभूव तदा कश्चिद् युयुत्सोरस्य सम्मुखे । सर्वानाविद्ध्य वित्रस्तांस्ततः शक्रोऽब्रवीत् सुरान् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उस समय युद्धकी इच्छावाले मेघनादके सामने कोई भी खड़ा न हो सका । तब भयभीत हुए उन समस्त देवताओंको फटकारकर इन्द्रने उनसे कहा—॥ ५ ॥
न भेतव्यं न गन्तव्यं निवर्तध्वं रणे सुराः । एष गच्छति पुत्रो मे युद्धार्थमपराजितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘देवताओ ! भय न करो, युद्ध छोड़कर न जाओ और रणक्षेत्रमें लौट आओ । यह मेरा पुत्र जयन्त, जो कभी किसीसे परास्त नहीं हुआ है, युद्धके लिये जा रहा है’ ॥ ६ ॥
ततः शक्रसुतो देवो जयन्त इति विश्रुतः । रथेनाद्भुतकल्पेन संग्रामे सोऽभ्यवर्तत ॥ ७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर इन्द्रपुत्र जयन्तदेव अद्भुत सजावटसे युक्त रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये आया ॥ ७ ॥
ततस्ते त्रिदशाः सर्वे परिवार्य शचीसुतम् । रावणस्य सुतं युद्धे समासाद्य प्रजघ्निरे ॥ ८ ॥
भावार्थ
फिर तो सब देवता शचीपुत्र जयन्तको चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें आये और रावणके पुत्रपर प्रहार करने लगे ॥ ८ ॥
तेषां युद्धं समभवत् सदृशं देवरक्षसाम् । महेन्द्रस्य च पुत्रस्य राक्षसेन्द्रसुतस्य च ॥ ९ ॥
भावार्थ
उस समय देवताओंका राक्षसोंके साथ और महेन्द्रकुमार-का रावणपुत्रके साथ उनके बल-पराक्रमके अनुरूप युद्ध होने लगा ॥ ९ ॥
ततो मातलिपुत्रस्य गोमुखस्य स रावणिः । सारथेः पातयामास शरान् कनकभूषणान् ॥ १० ॥
भावार्थ
रावणकुमार मेघनाद जयन्तके सारथि मातलिपुत्र गोमुख-पर सुवर्णभूषित बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १० ॥
शचीसुतश्चापि तथा जयन्तस्तस्य सारथिम् । तं चापि रावणिः क्रुद्धः समन्तात् प्रत्यविध्यत ॥ ११ ॥
भावार्थ
शचीपुत्र जयन्तने भी मेघनादके सारथिको घायल कर दिया । तब कुपित हुए मेघनादने जयन्तको भी सब ओरसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ११ ॥
स हि क्रोधसमाविष्टो बली विस्फारितेक्षणः । रावणिः शक्रतनयं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस समय क्रोधसे भरा हुआ बलवान् मेघनाद इन्द्रपुत्र जयन्तको आँखें फाड़-फाड़कर देखने और बाणोंकी वर्षासे पीड़ित करने लगा ॥ १२ ॥
ततो नानाप्रहरणाञ्छितधारान् सहस्रशः । पातयामास संक्रुद्धः सुरसैन्येषु रावणिः ॥ १३ ॥ शतघ्नीमुसलप्रासगदाखड्गपरश्वधान् । महान्ति गिरिशृङ्गाणि पातयामास रावणिः ॥ १४ ॥
भावार्थ
अत्यन्त कुपित हुए रावणकुमारने देवताओंकी सेनापर भी तीखी धारवाले नाना प्रकारके सहस्रों अस्त्र-शस्त्र बरसाये ॥ उसने शतघ्नी, मूसल, प्रास, गदा, खड्ग और फरसे गिराये तथा बड़े-बड़े पर्वत-शिखर भी चलाये ॥ १४ ॥
ततः प्रव्यथिता लोकाः संजज्ञे च तमस्ततः । तस्य रावणपुत्रस्य शत्रुसैन्यानि निघ्नतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
शत्रुसेनाओंके संहारमें लगे हुए रावणकुमारकी मायासे उस समय चारों ओर अन्धकार छा गया; अतः समस्त लोक व्यथित हो उठे ॥ १५ ॥
ततस्तद् दैवतबलं समन्तात् तं शचीसुतम् । बहुप्रकारमस्वस्थमभवच्छरपीडितम् ॥ १६ ॥ नाभ्यजानन्त चान्योन्यं रक्षो वा देवताथवा । तत्र तत्र विपर्यस्तं समन्तात् परिधावत ॥ १७ ॥
भावार्थ
तब शचीकुमारके चारों ओर खड़ी हुई देवताओंकी वह सेना बाणोंद्वारा पीड़ित हो अनेक प्रकारसे अस्वस्थ हो गयी ॥ राक्षस और देवता आपसमें किसीको पहचान न सके । वे जहाँ-तहाँ बिखरे हुए चारों ओर चक्कर काटने लगे ॥१७॥
देवा देवान् निजघ्नुस्ते राक्षसान् राक्षसास्तथा । सम्मूढास्तमसाच्छन्ना व्यद्रवन्नपरे तथा ॥ १८ ॥
भावार्थ
अन्धकारसे आच्छादित होकर वे विवेकशक्ति खो बैठे थे । अतः देवता देवताओंको और राक्षस राक्षसोंको ही मारने लगे तथा बहुतेरे योद्धा युद्धसे भाग खड़े हुए ॥ १८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरः पुलोमा नाम वीर्यवान् । दैत्येन्द्रस्तेन संगृह्य शचीपुत्रोऽपवाहितः ॥ १९ ॥ संगृह्य तं तु दौहित्रं प्रविष्टः सागरं तदा । आर्यकः स हि तस्यासीत् पुलोमा येन सा शची ॥२०॥
भावार्थ
इसी बीचमें पराक्रमी वीर दैत्यराज पुलोमा युद्धमें आया और शचीपुत्र जयन्तको पकड़कर वहाँसे दूर हटा ले गया ॥ वह शचीका पिता और जयन्तका नाना था, अतः अपने दौहित्रको लेकर समुद्रमें घुस गया ॥ २० ॥
ज्ञात्वा प्रणाशं तु तदा जयन्तस्याथ देवताः । अप्रहृष्टास्ततः सर्वा व्यथिताः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ २१ ॥
भावार्थ
देवताओंको जब जयन्तके गायब होनेकी बात मालूम हुई, तब उनकी सारी खुशी छिन गयी और वे दुखी होकर चारों ओर भागने लगे ॥ २१ ॥
रावणिस्त्वथ संक्रुद्धो बलैः परिवृतः स्वकैः । अभ्यधावत देवांस्तान् मुमोच च महास्वनम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
उधर अपनी सेनाओंसे घिरे हुए रावणकुमार मेघनादने अत्यन्त कुपित हो देवताओंपर धावा किया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २२ ॥
दृष्ट्वा प्रणाशं पुत्रस्य दैवतेषु च विद्रुतम् । मातलिं चाह देवेशो रथः समुपनीयताम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
पुत्र लापता हो गया और देवताओंकी सेनामें भगदड़ मच गयी है—यह देखकर देवराज इन्द्रने मातलिसे कहा— ‘मेरा रथ ले आओ’ ॥ २३ ॥
स तु दिव्यो महाभीमः सज्ज एव महारथः । उपस्थितो मातलिना वाह्यमानो महाजवः ॥ २४ ॥
भावार्थ
मातलिने एक सजा-सजाया महाभयङ्कर, दिव्य एवं विशाल रथ लाकर उपस्थित कर दिया । उसके द्वारा हाँका जानेवाला वह रथ बड़ा ही वेगशाली था ॥ २४ ॥
ततो मेघा रथे तस्मिस्तडित्त्वन्तो महाबलाः । अग्रतो वायुचपला नेदुः परमनिःस्वनाः ॥ २५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर उस रथपर बिजलीसे युक्त महाबली मेघ उसके अग्रभागमें वायुसे चञ्चल हो बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ २५ ॥
नानावाद्यानि वाद्यन्त गन्धर्वाश्च समाहिताः । ननृतुश्चाप्सरःसङ्घा निर्याते त्रिदशेश्वरे ॥ २६ ॥
भावार्थ
देवेश्वर इन्द्रके निकलते ही नाना प्रकारके बाजे बज उठे, गन्धर्व एकाग्र हो गये और अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे ॥ २६ ॥
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां समरुद्गणैः । वृतो नानाप्रहरणैर्निर्ययौ त्रिदशाधिपः ॥ २७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्र नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र साथ लिये पुरीसे बाहर निकले ॥ २७ ॥
निर्गच्छतस्तु शक्रस्य परुषः पवनो ववौ । भास्करो निष्प्रभश्चैव महोल्काश्च प्रपेदिरे ॥ २८ ॥
भावार्थ
इन्द्रके निकलते ही प्रचण्ड वायु चलने लगी । सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आकाशसे बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं ॥ २८ ॥
पतस्मिन्नन्तरे शूरो दशग्रीवः प्रतापवान् । आरुरोह रथं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २९ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें प्रतापी वीर दशग्रीव भी विश्वकर्माके बनाये हुए दिव्य रथपर सवार हुआ ॥ २९ ॥
पन्नगैः सुमहाकायैर्वेष्टितं लोमहर्षणैः । येषां निःश्वासवातेन प्रदीप्तमिव संयुगे ॥ ३० ॥
भावार्थ
उस रथमें रोंगटे खड़े कर देनेवाले विशालकाय सर्प लिपटे हुए थे । उनकी निःश्वास-वायुसे वह रथ उस युद्धस्थलमें ज्वलित-सा जान पड़ता था ॥ ३० ॥
दैत्यैर्निशाचरैश्चैव स रथः परिवारितः । समराभिमुखो दिव्यो महेन्द्रं सोऽभ्यवर्तत ॥ ३१ ॥
भावार्थ
दैत्यों और निशाचरोंने उस रथको सब ओरसे घेर रक्खा था । समराङ्गणकी ओर बढ़ता हुआ रावणका वह दिव्य रथ महेन्द्रके सामने जा पहुँचा ॥ ३१ ॥
पुत्रं तं वारयित्वा तु स्वयमेव व्यवस्थितः । सोऽपि युद्धाद् विनिष्क्रम्य रावणिः समुपाविशत्॥ ३२ ॥
भावार्थ
रावण अपने पुत्रको रोककर स्वयं ही युद्धके लिये खड़ा हुआ । तब रावणपुत्र मेघनाद युद्धस्थलसे निकलकर चुपचाप अपने रथपर जा बैठा ॥ ३२ ॥
ततो युद्धं प्रवृत्तं तु सुराणां राक्षसैः सह । शस्त्राणि वर्षतां तेषां मेघानामिव संयुगे ॥ ३३ ॥
भावार्थ
फिर तो देवताओंका राक्षसोंके साथ घोर युद्ध होने लगा । जलकी वर्षा करनेवाले मेघोंके समान देवता युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा नानाप्रहरणोद्यतः । नाज्ञायत तदा राजन् युद्धं केनाभ्यपद्यत ॥ ३४ ॥
भावार्थ
राजन् ! दुष्टात्मा कुम्भकर्ण नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये किसके साथ युद्ध करता था, इसका पता नहीं लगता था ( अर्थात् मतवाला होनेके कारण अपने और परायेसभी सैनिकोंके साथ जूझने लगता था) ॥ ३४ ॥
दन्तैः पादैर्भुजैर्हस्तैः शक्तितोमरमुद्गरैः । येन तेनैव संक्रुद्धस्ताडयामास देवताः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
वह अत्यन्त कुपित हो दाँत, लात, भुजा, हाथ, शक्ति, तोमर और मुद्गर आदि जो ही पाता उसीसे देवताओंको पीटता था ॥ ३५ ॥
स तु रुद्रैर्महाघोरैः संगस्याथ निशाचरः । प्रयुद्धस्तैश्च संग्रामे क्षतः शस्त्रैर्निरन्तरम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वह निशाचर महाभयङ्कर रुद्रोंके साथ भिड़कर घोर युद्ध करने लगा । संग्राममें रुद्रोंने अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा उसे ऐसा क्षत-विक्षत कर दिया था कि उसके शरीरमें थोड़ी-सी भी जगह बिना घावके नहीं रह गयी थी ॥ ३६ ॥
बभौ शस्त्राचिततनुः कुम्भकर्णः क्षरन्नसृक् । विद्युत्स्तनितनिर्घोषो धारावानिव तोयदः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णका शरीर शस्त्रोंसे व्याप्त हो खूनकी धारा बहा रहा था । उस समय वह बिजली तथा गर्जनासे युक्त जलकी धारा गिरानेवाले मेघके समान जान पड़ता था ॥ ३७ ॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं प्रयुद्धं समरुद्गणैः । रणे विद्रावितं सर्वं नानाप्रहरणैस्तदा ॥ ३८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर घोर युद्धमें लगी हुई उस सारी राक्षससेनाको रणभूमिमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले रुद्रों और मरुद्गणोंने मार भगाया ॥ ३८ ॥
केचिद् विनिहताः कृत्तास्चेष्टन्ति स्म महीतले । वाहनेष्ववसक्ताश्च स्थिता एवापरे रणे ॥ ३९ ॥
भावार्थ
कितने ही निशाचर मारे गये । कितने ही कटकर धरतीपर लोटने और छटपटाने लगे और बहुत-से राक्षस प्राणहीन हो जानेपर भी उस रणभूमिमें अपने वाहनोंपर ही चिपटे रहे ॥ ३९ ॥
रथान् नागान् खरानुष्ट्रान् पन्नगांस्तुरगांस्तथा । शिशुमारान् वराहांश्च पिशाचवदनानपि ॥ ४० ॥ तान् समालिङ्ग्य बाहुभ्यां विष्टब्धाः केचिदुत्थिताः । देवैस्तु शस्त्रसंभिन्ना मम्रिरे च निशाचराः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
कुछ राक्षस रथों, हाथियों, गदहों, ऊँटों, सर्पों, घोड़ों, शिशुमारों, वराहों तथा पिशाचमुख वाहनोंको दोनों भुजाओंसे पकड़कर उनसे लिपटे हुए निश्चेष्ट हो गये थे । कितने ही जो पहलेसे मूर्छित होकर पड़े थे, मूर्छा दूर होनेपर उठे, किंतु देवताओंके शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न हो मौतके मुखमें चले गये ॥ ४०-४१ ॥
चित्रकर्म इवाभाति सर्वेषां रणसम्प्लवः । निहतानां प्रसुप्तानां राक्षसानां महीतले ॥ ४२ ॥
भावार्थ
प्राणोंसे हाथ धोकर धरतीपर पड़े हुए उन समस्त राक्षसोंका इस तरह युद्धमें मारा जाना जादू-सा आश्चर्यजनक जान पड़ता था ॥ ४२ ॥
शोणितोदकनिष्पन्दा काकगृध्रसमाकुला । प्रवृत्ता संयुगमुखे शस्त्रग्राहवती नदी ॥ ४३ ॥
भावार्थ
युद्धके मुहानेपर खूनकी नदी बह चली, जिसके भीतर अनेक प्रकारके शस्त्र ग्राहोंका भ्रम उत्पन्न करते थे । उस नदीके तटपर चारों ओर गीध और कौए छा गये थे ॥४३॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो दशग्रीवः प्रतापवान् । निरीक्ष्य तु बलं सर्वं दैवतैर्विनिपातितम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें प्रतापी दशग्रीवने जब देखा कि देवताओंने हमारे समस्त सैनिकोंको मार गिराया है, तब उसके क्रोधकी सीमा न रही ॥ ४४ ॥
स तं प्रतिविगाह्याशु प्रवृद्धं सैन्यसागरम् । त्रिदशान् समरे निघ्नञ्शक्रमेवाभ्यवर्तत ॥ ४५ ॥
भावार्थ
वह समुद्रके समान दूरतक फैली हुई देवसेनामें घुस गया और समराङ्गणमें देवताओंको मारता एवं धराशायी करता हुआ तुरंत ही इन्द्रके सामने जा पहुँचा ॥ ४५ ॥
ततः शक्रो महच्चापं विस्फार्य सुमहास्वनम् । यस्य विस्फारनिर्घोषैः स्तनन्ति स्म दिशो दश ॥ ४६ ॥
भावार्थ
तब इन्द्रने जोर-जोरसे टङ्कार करनेवाले अपने विशाल धनुषको खींचा । उसकी टङ्कार-ध्वनिसे दसों दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ४६ ॥
तद् विकृष्य महच्चापमिन्द्रो रावणमूर्धनि । पातयामास स शरान् पावकादित्यवर्चसः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
उस विशाल धनुषको खींचकर इन्द्रने रावणके मस्तकपर अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी बाण मारे ॥ ४७ ॥
तथैव च महाबाहुर्दशग्रीवो निशाचरः । शक्रं कार्मुकविभ्रष्टैः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ४८ ॥
भावार्थ
इसी प्रकार महाबाहु निशाचर दशग्रीवने भी अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी वर्षासे इन्द्रको ढक दिया ॥ ४८ ॥
प्रयुध्यतोरथ तयोर्बाणवर्षैः समन्ततः । नाज्ञायत तदा किंचित् सर्वं हि तमसा वृतम् ॥ ४९ ॥
भावार्थ
वे दोनों घोर युद्धमें तत्पर हो जब बाणोंकी वृष्टि करने लगे, उस समय सब ओर सब कुछ अन्धकारसे आच्छादित हो गया । किसीको किसी भी वस्तुकी पहचान नहीं हो पाती थी ॥ ४९ ॥
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