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उत्तरकाण्ड, सर्ग 29

ततस्तमसि संजाते सर्वे ते देवराक्षसाः । अयुद्धयन्त बलोन्मत्ताः सूदयन्तः परस्परम् ॥ १ ॥

भावार्थ

जब सब ओर अन्धकार छा गया, तब बलसे उन्मत्त हुए वे समस्त देवता और राक्षस एक दूसरेको मारते हुए परस्पर युद्ध करने लगे ॥ १ ॥

ततस्तु देवसैन्येन राक्षसानां बृहद् बलम् । दशांशं स्थापितं युद्धे शेषं नीतं यमक्षयम् ॥ २ ॥

भावार्थ

उस समय देवताओंकी सेनाने राक्षसोंके विशाल सैन्य-समूहका केवल दसवाँ हिस्सा युद्धभूमिमें खड़ा रहने दिया । शेष सब राक्षसोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ २ ॥

तस्मिंस्तु तामसे युद्धे सर्वे ते देवराक्षसाः । अन्योन्यं नाभ्यजानन्त युध्यमानाः परस्परम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

उस तामस युद्धमें समस्त देवता और राक्षस परस्पर जूझते हुए एक दूसरेको पहचान नहीं पाते थे ॥ ३ ॥

इन्द्रश्च रावणश्चैव रावणिश्च महाबलः । तस्मिंस्तमोजालवृते मोहमीयुर्न ते त्रयः ॥ ४ ॥ स तु दृष्ट्वा बलं सर्वं रावणो निहतं क्षणात् । क्रोधमभ्यगमत् तीव्रं महानादं च मुक्तवान् ॥ ५ ॥

भावार्थ

इन्द्र, रावण और रावणपुत्र महाबली मेघनाद--ये तीन ही उस अन्धकाराच्छन्न समराङ्गणमें मोहित नहीं हुए थे॥ रावणने देखा, मेरी सारी सेना क्षणभरमें मारी गयी, तब उसके मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने बड़ी भारी गर्जना की ॥ ५ ॥

क्रोधात् सूतं च दुर्धर्षः स्यन्दनस्थमुवाच ह । परसैन्यस्य मध्येन यावदन्तो नयस्व माम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

उस दुर्जय निशाचरने रथपर बैठे हुए अपने सारथिसे क्रोधपूर्वक कहा--‘सूत ! शत्रुओंकी इस सेनाका जहाँतक अन्त है, वहाँतक तुम इस सेनाके मध्य-भागसे होकर मुझे ले चलो ॥ ६ ॥

अद्यैतान् त्रिदशान् सर्वान् विक्रमैः समरे स्वयम् । नानाशस्त्रमहासारैर्नयामि यमसादनम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘आज मैं स्वयं अपने पराक्रमद्वारा नाना प्रकारके शस्त्रोंकी महान् धारावाहिक वृष्टि करके इन सब देवताओंको यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ ७ ॥

अहमिन्द्रं वधिष्यामि धनदं वरुणं यमम् । त्रिदशान् विनिहत्याशु स्वयं स्थास्याम्यथोपरि ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘मैं इन्द्र, कुबेर, वरुण और यमका भी वध करूँगा । सब देवताओंका शीघ्र ही संहार करके स्वयं सबके ऊपर स्थित होऊँगा ॥ ८ ॥

विषादो नैव कर्तव्यः शीघ्रं वाहय मे रथम् । द्विः खलु त्वां ब्रवीम्यद्य यावदन्तं नयस्व माम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये । शीघ्र मेरे रथको ले चलो । मैं तुमसे दो बार कहता हूँ, देवताओंकी सेनाका जहाँतक अन्त है, वहाँतक मुझे अभी ले चलो ॥ ९ ॥

अयं स नन्दनोद्देशो यत्र वर्तावहे वयम् । नय मामद्य तत्र त्वमुदयो यत्र पर्वतः ॥ १० ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तुरगान् स मनोजवान् । आदिदेशाथ शत्रूणां मध्येनैव च सारथिः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘यह नन्दनवनका प्रदेश है, जहाँ इस समय हम दोनों मौजूद हैं । यहींसे देवताओंकी सेनाका आरम्भ होता है । अब तुम मुझे उस स्थानतक ले चलो, जहाँ उदयाचल है ( नन्दनवनसे उदयाचलतक देवताओंकी सेना फैली हुई है )’॥ रावणकी यह बात सुनकर सारथिने मनके समान वेगशाली घोड़ोंको शत्रुसेनाके बीचसे हाँक दिया ॥ ११ ॥

तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा शक्रो देवेश्वरस्तदा । रथस्थः समरस्थस्तान् देवान् वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

रावणके इस निश्चयको जानकर समरभूमिमें रथपर बैठे हुए देवराज इन्द्रने उन देवताओंसे कहा—॥ १२ ॥

सुराः शृणुत मद्वाक्यं यत् तावन्मम रोचते । जीवन्नेव दशग्रीवः साधु रक्षो निगृह्यताम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘देवगण ! मेरी बात सुनो । मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इस निशाचर दशग्रीवको जीवित अवस्थामें ही भलीभाँति कैद कर लिया जाय ॥ १३ ॥

एष ह्यतिबलः सैन्ये रथेन पवनौजसा । गमिष्यति प्रवृद्धोर्मिः समुद्र इव पर्वणि ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘यह अत्यन्त बलशाली राक्षस वायुके समान वेगशाली रथके द्वारा इस सेनाके बीचमें होकर उसी तरह तीव्रगतिसे आगे बढ़ेगा, जैसे पूर्णिमाके दिन उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त समुद्र बढ़ता है ॥ १४ ॥

नह्येष हन्तुं शक्योऽद्य वरदानात् सुनिर्भयः । तद् ग्रहीष्यामहे रक्षो यत्ता भवत संयुगे ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘यह आज मारा नहीं जा सकता; क्योंकि ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे पूर्णतः निर्भय हो चुका है । इसलिये हमलोग इस राक्षसको पकड़कर कैद कर लेंगे । तुमलोग युद्धमें इस बातके लिये पूरा प्रयत्न करो ॥ १५ ॥

यथा बलौ निरुद्धे च त्रैलोक्यं भुज्यते मया । एवमेतस्य पापस्य निरोधो मम रोचते ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जैसे राजा बलिके बाँध लिये जानेपर ही मैं तीनों लोकोंके राज्यका उपभोग कर रहा हूँ, उसी प्रकार इस पापी निशाचरको बंदी बना लिया जाय, यही मुझे अच्छा लगता है’ ॥ १६ ॥

ततोऽन्यं देशमास्थाय शक्रः संत्यज्य रावणम् । अयुध्यत महाराज राक्षसांस्त्रासयन् रणे ॥ १७ ॥ उत्तरेण दशग्रीवः प्रविवेशानिवर्तकः । दक्षिणेन तु पार्श्वेन प्रविवेश शतक्रतुः ॥ १८ ॥

भावार्थ

महाराज श्रीराम ! ऐसा कहकर इन्द्रने रावणके साथ युद्ध करना छोड़ दिया और दूसरी ओर जाकर समराङ्गणमें राक्षसोंको भयभीत करते हुए वे उनके साथ युद्ध करने लगे॥ युद्धसे पीछे न हटनेवाले रावणने उत्तरकी ओरसे देवसेनामें प्रवेश किया और देवराज इन्द्रने दक्षिणकी ओरसे राक्षससेनामें ॥ १८ ॥

ततः स योजनशतं प्रविष्टो राक्षसाधिपः । देवतानां बलं सर्वं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

देवताओंकी सेना चार सौ कोसतक फैली हुई थी । राक्षसराज रावणने उसके भीतर घुसकर समूची देवसेनाको बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ १९ ॥

ततः शक्रो निरीक्ष्याथ प्रणष्टं तु स्वकं बलम् । न्यवर्तयदसम्भ्रान्तः समावृत्य दशाननम् ॥ २० ॥

भावार्थ

अपनी विशाल सेनाको नष्ट होती देख इन्द्रने बिना किसी घबराहटके दशमुख रावणका सामना किया और उसे चारों ओरसे घेरकर युद्धसे विमुख कर दिया ॥ २० ॥

एतस्मिन्नन्तरे नादो मुक्तो दानवराक्षसैः । हा हताः स्म इति ग्रस्तं दृष्ट्वा शक्रेण रावणम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

इसी समय रावणको इन्द्रके चंगुलमें फँसा हुआ देख दानवों तथा राक्षसोंने ‘हाय ! हम मारे गये’ ऐसा कहकर बड़े जोरसे आर्तनाद किया ॥ २१ ॥

ततो रथं समास्थाय रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । तत् सैन्यमतिसंक्रुद्धः प्रविवेश सुदारुणम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

तब रावणका पुत्र मेघनाद क्रोधसे अचेत-सा हो गया और रथपर बैठकर अत्यन्त कुपित हो उसने शत्रुकी भयंकर सेनामें प्रवेश किया ॥ २२ ॥

तां प्रविश्य महामायां प्राप्तां पशुपतेः पुरा । प्रविवेश सुसंरब्धस्तत् सैन्यं समभिद्रवत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

पूर्वकालमें पशुपति महादेवजीसे उसको जो तमोमयी महामाया प्राप्त हुई थी, उसमें प्रवेश करके उसने अपनेको छिपा लिया और अत्यन्त क्रोधपूर्वक शत्रुसेनामें घुसकर उसे खदेड़ना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

स सर्वा देवतास्त्यक्त्वा शक्रमेवाभ्यधावत । महेन्द्रश्च महातेजा नापश्यच्च सुतं रिपोः ॥ २४ ॥ विमुक्तकवचस्तत्र वध्यमानोऽपि रावणिः । त्रिदशैः सुमहावीर्यैर्न चकार च किंचन ॥ २५ ॥

भावार्थ

वह सब देवताओंको छोड़कर इन्द्रपर ही टूट पड़ा, परंतु महातेजस्वी इन्द्र अपने शत्रुके उस पुत्रको देख न सके॥ महापराक्रमी देवताओंकी मार खानेसे यद्यपि वहाँ रावण-कुमारका कवच नष्ट हो गया था, तथापि उसने अपने मनमें तनिक भी भय नहीं किया ॥ २५ ॥

स मातलिं समायान्तं ताडयित्वा शरोत्तमैः । महेन्द्रं बाणवर्षेण भूय एवाभ्यवाकिरत् ॥ २६ ॥

भावार्थ

उसने अपने सामने आते हुए मातलिको उत्तम बाणोंसे घायल करके सायकोंकी झड़ी लगाकर पुनः देवराज इन्द्रको भी ढक दिया ॥ २६ ॥

ततस्त्यक्त्वा रथं शक्रो विससर्ज च सारथिम् । ऐरावतं समारुह्य मृगयामास रावणिम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

तब इन्द्रने रथको छोड़कर सारथिको बिदा कर दिया और ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो वे रावणकुमारकी खोज करने लगे ॥ २७ ॥

स तत्र मायाबलवानदृश्योऽथान्तरिक्षगः । इन्द्रं मायापरिक्षिप्तं कृत्वा स प्राद्रवच्छरैः ॥ २८ ॥ स तं यदा परिश्रान्तमिन्द्रं जज्ञेऽथ रावणिः । तदैनं मायया बद्ध्वा स्वसैन्यमभितोऽनयत् ॥ २९ ॥

भावार्थ

मेघनाद अपनी मायाके कारण बहुत प्रबल हो रहा था । वह अदृश्य होकर आकाशमें विचरने लगा और इन्द्रको मायासे व्याकुल करके बाणोंद्वारा उनपर आक्रमण किया ॥ रावणकुमारको जब अच्छी तरह मालूम हो गया कि इन्द्र बहुत थक गये हैं, तब उन्हें मायासे बाँधकर अपनी सेनामें ले आया ॥ २९ ॥

तं तु दृष्ट्वा बलात् तेन नीयमानं महारणात् । महेन्द्रममराः सर्वे किं नु स्यादित्यचिन्तयन् ॥ ३० ॥

भावार्थ

महेन्द्रको उस महासमरसे मेघनादद्वारा बलपूर्वक ले जाये जाते देख सब देवता यह सोचने लगे कि ‘अब क्या होगा ? ॥ ३० ॥

दृश्यते न स मायावी शक्रजित् समितिंजयः । विद्यावानपि येनेन्द्रो मायया पहृतो बलात् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘यह युद्धविजयी मायावी राक्षस स्वयं तो दिखायी देता नहीं, इसीलिये इन्द्रपर विजय पानेमें सफल हुआ है । यद्यपि देवराज इन्द्र राक्षसी मायाका संहार करनेकी विद्या जानते हैं, तथापि इस राक्षसने मायाद्वारा बलपूर्वक इनका अपहरण किया है’ ॥ ३१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धाः सर्वे सुरगणास्तदा । रावणं विमुखीकृत्य शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

ऐसा सोचते हुए वे सब देवता उस समय रोषसे भर गये और रावणको युद्धसे विमुख करके उसपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे ॥ ३२ ॥

रावणस्तु समासाद्य आदित्यांश्च वसूंस्तदा । न शशाक स संग्रामे योद्धुं शत्रुभिरर्दितः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

रावण आदित्यों और वसुओंका सामना पड़ जानेपर युद्धमें उनके सम्मुख ठहर न सका; क्योंकि शत्रुओंने उसे बहुत पीड़ित कर दिया था ॥ ३३ ॥

स तं दृष्ट्वा परिम्लानं प्रहारैर्जर्जरीकृतम् । रावणिः पितरं युद्धेऽदर्शनस्थोऽब्रवीदिदम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

मेघनादने देखा पिताका शरीर बाणोंके प्रहारसे जर्जर हो गया है और वे युद्धमें उदास दिखायी देते हैं । तब वह अदृश्य रहकर ही रावणसे इस प्रकार बोला—॥ ३४ ॥

आगच्छ तात गच्छामो रणकर्म निवर्तताम् । जितं नो विदितं तेऽस्तु स्वस्थो भव गतज्वरः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘पिताजी ! चलें आइये । अब हमलोग घर चलें । युद्ध बंद कर दिया जाय । हमारी जीत हो गयी; अतः आप स्वस्थ, निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जाइये ॥ ३५ ॥

अयं हि सुरसैन्यस्य त्रैलोक्यस्य च यः प्रभुः । स गृहीतो देवबलाद् भग्नदर्पाः सुराः कृताः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘ये जो देवताओंकी सेना तथा तीनों लोकोंके स्वामी इन्द्र हैं, इन्हें मैं देवसेनाके बीचसे कैद कर लाया हूँ । ऐसा करके मैंने देवताओंका घमंड चूर कर दिया है ॥ ३६ ॥

यथेष्टं भुङ्क्ष्व लोकांस्त्रीन् निगृह्यारातिमोजसा । वृथा किं ते श्रमेणेह युद्धमद्य तु निष्फलम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘आप अपने शत्रुको बलपूर्वक कैद करके इच्छानुसार तीनों लोकोंका राज्य भोगिये । यहाँ व्यर्थ श्रम करनेसे आपको क्या लाभ है ? अब युद्धसे कोई प्रयोजन नहीं है’ ॥ ३७ ॥

ततस्ते दैवतगणा निवृत्ता रणकर्मणः । तच्छ्रुत्वा रावणेर्वाक्यं शक्रहीनाः सुरा गताः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

मेघनादकी यह बात सुनकर सब देवता युद्धसे निवृत्त हो गये और इन्द्रको साथ लिये बिना ही लौट गये ॥ ३८ ॥

अथ रणविगतः स उत्तमौजा- स्त्रिदशरिपुः प्रथितो निशाचरेन्द्रः । स्वसुतवचनमाहतः प्रियं तत् समनुनिशम्य जगाद चैव सूनुम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

अपने पुत्रके उस प्रिय वचनको आदरपूर्वक सुनकर महान् बलशाली देवद्रोही तथा सुविख्यात राक्षसराज रावण युद्धसे निवृत्त हो गया और अपने बेटेसे बोला—॥ ३९ ॥

अतिबलसदृशैः पराक्रमैस्त्वं मम कुलवंशविवर्धनः प्रभो । यदयमतुल्यबलस्त्वयाद्य वै त्रिदशपतिस्त्रिदशाश्च निर्जिताः ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘सामर्थ्यशाली पुत्र ! अपने अत्यन्त बलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करके आज तुमने जो इन अनुपम बलशाली देवराज इन्द्रको जीता और देवताओंको भी परास्त किया है, इससे यह निश्चय हो गया कि तुम मेरे कुल और वंशके यश और सम्मानकी वृद्धि करनेवाले हो ॥ ४० ॥

नय रथमधिरोप्य वासवं नगर- मितो व्रज सेनया वृतस्त्वम् । अहमपि तव पृष्ठतो द्रुतं सह सचिवैरनुयामि हृष्टवत् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘बेटा ! इन्द्रको रथपर बैठाकर तुम सेनाके साथ यहाँसे लङ्कापुरीको चलो । मैं भी अपने मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहा हूँ’ ॥ ४१ ॥

अथ स बलवृतः सवाहन- स्त्रिदशपतिं परिगृह्य रावणिः । स्वभवनमधिगम्य वीर्यवान् कृतसमरान् विससर्ज राक्षसान् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

पिताकी यह आज्ञा पाकर पराक्रमी रावणकुमार मेघनाद देवराजको साथ ले सेना और सवारियोंसहित अपने निवासस्थानको लौटा । वहाँ पहुँचकर उसने युद्धमें भाग लेनेवाले निशाचरोंको विदा कर दिया ॥ ४२ ॥

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