सुन्दरकाण्ड, सर्ग 59
एतदाख्याय तत् सर्वं हनूमान् मारुतात्मजः । भूयः समुपचक्राम वचनं वक्तुमुत्तरम् ॥ १ ॥
भावार्थ
यह सब वृत्तान्त बताकर पवनकुमार हनुमान्जीने पुनः उत्तम बातें कहनी आरम्भ कीं—॥ १ ॥
सफलो राघवोद्योगः सुग्रीवस्य च सम्भ्रमः । शीलमासाद्य सीताया मम च प्रीणितं मनः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘कपिवरो ! श्रीरामचन्द्रजीका उद्योग और सुग्रीवका उत्साह सफल हुआ । सीताजीका उत्तम शील-स्वभाव ( पातिव्रत्य ) देखकर मेरा मन अत्यन्त संतुष्ट हुआ है ॥२॥
आर्यायाः सदृशं शीलं सीतायाः प्लवगर्षभाः । तपसा धारयेल्लोकान् क्रुद्धा वा निर्दहेदपि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणियो ! जिस नारीका शील-स्वभाव आर्या सीताके समान होगा, वह अपनी तपस्यासे सम्पूर्ण लोकोंको धारण कर सकती है अथवा कुपित होनेपर तीनों लोकोंको जला सकती है ॥ ३ ॥
सर्वथातिप्रकृष्टोऽसौ रावणो राक्षसेश्वरः । यस्य तां स्पृशतो गात्रं तपसा न विनाशितम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज रावण सर्वथा महान् तपोबलसे सम्पन्न जान पड़ता है । जिसका अङ्ग सीताका स्पर्श करते समय उनकी तपस्यासे नष्ट नहीं हो गया ॥ ४ ॥
न तदग्निशिखा कुर्यात् संस्पृष्टा पाणिना सती । जनकस्य सुता कुर्याद् यत् क्रोधकलुषीकृता ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘हाथसे छू जानेपर आगकी लपट भी वह काम नहीं कर सकती, जो क्रोध दिलानेपर जनकनन्दिनी सीता कर सकती हैं ॥ ५ ॥
जाम्बवत्प्रमुखान् सर्वाननुज्ञाप्य महाकपीन् । अस्मिन्नेवंगते कार्ये भवतां च निवेदिते । न्याय्यं स्म सह वैदेह्या द्रष्टुं तौ पार्थिवात्मजौ ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘इस कार्यमें मुझे जहाँतक सफलता मिली है, वह सब इस रूपमें मैंने आपलोगोंको बता दिया । अब जाम्बवान् आदि सभी महाकपियोंकी सम्मति लेकर हम ( सीताको रावणके कारावाससे लौटाकर ) सीताके साथ ही श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणका दर्शन करें, यही न्यायसङ्गत जान पड़ता है ॥ ६ ॥
अहमेकोऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम् । तां लङ्कां तरसा हन्तुं रावणं च महाबलम् ॥ ७ ॥ किं पुनः सहितो वीरैर्बलवद्भिः कृतात्मभिः । कृतास्त्रैः प्लवगैः शक्तैर्भवद्भिर्विजयैषिभिः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘मैं अकेला भी राक्षसगणोंसहित समस्त लङ्कापुरीका वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावणको मार डालनेके लिये पर्याप्त हूँ । फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रोंको जाननेवाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरोंकी सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है ॥ ७-८ ॥
अहं तु रावणं युद्धे ससैन्यं सपुरःसरम् । सहपुत्रं वधिष्यामि सहोदरयुतं युधि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘युद्धस्थलमें सेना, अग्रगामी सैनिक, पुत्र और सगे भाइयोंसहित रावणका तो मैं ही वध कर डालूँगा ॥ ९ ॥
ब्राह्ममस्त्रं च रौद्रं च वायव्यं वारुणं तथा । यदि शक्रजितोऽस्त्राणि दुर्निरीक्ष्याणि संयुगे । तान्यहं निहनिष्यामि विधमिष्यामि राक्षसान् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘यद्यपि इन्द्रजित्के ब्राह्म अस्त्र, रौद्र, वायव्य तथा वारुण आदि अस्त्र युद्धमें दुर्लक्ष्य होते हैं—किसीकी दृष्टिमें नहीं आते हैं, तथापि मैं ब्रह्माजीके वरदानसे उनका निवारण कर दूँगा और राक्षसोंका संहार कर डालूँगा ॥ १० ॥
भवतामभ्यनुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि तम् । मयातुला विसृष्टा हि शैलवृष्टिर्निरन्तरा ॥ ११ ॥ देवानपि रणे हन्यात् किं पुनस्तान् निशाचरान् ।
भावार्थ
‘यदि आपलोगोंकी आज्ञा मिल जाय तो मेरा पराक्रम रावणको कुण्ठित कर देगा । मेरेद्वारा लगातार बरसाये जानेवाले पत्थरोंकी अनुपम वृष्टि रणभूमिमें देवताओंको भी मौतके घाट उतार देगी; फिर उन निशाचरोंकी तो बात ही क्या है ! ॥ ११½ ॥
भवतामननुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि माम् ॥ १२ ॥ सागरोऽप्यतियाद् वेलां मन्दरः प्रचलेदपि । न जाम्बवन्तं समरे कम्पयेदरिवाहिनी ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘आपलोगोंकी आज्ञा न होनेके कारण ही मेरा पुरुषार्थ मुझे रोक रहा है । समुद्र अपनी मर्यादाको लाँघ जाय और मन्दराचल अपने स्थानसे हट जाय, परंतु समराङ्गणमें शत्रुओंकी सेना जाम्बवान्को विचलित कर दे, यह कभी सम्भव नहीं है ॥ १२-१३ ॥
सर्वराक्षससङ्घानां राक्षसा ये च पूर्वजाः । अलमेकोऽपि नाशाय वीरो वालिसुतः कपिः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘सम्पूर्ण राक्षसों और उनके पूर्वजोंको भी यमलोक पहुँचानेके लिये वालीके वीर पुत्र कपिश्रेष्ठ अङ्गद अकेले ही काफी हैं ॥ १४ ॥
प्लवगस्योरुवेगेन नीलस्य च महात्मनः । मन्दरोऽप्यवशीर्येत किं पुनर्युधि राक्षसाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वानरवीर महात्मा नीलके महान् वेगसे मन्दराचल भी विदीर्ण हो सकता है; फिर युद्धमें राक्षसोंका नाश करना उनके लिये कौन बड़ी बात है ! ॥ १५ ॥
सदेवासुरयक्षेषु गन्धर्वोरगपक्षिषु । मैन्दस्य प्रतियोद्धारं शंसत द्विविदस्य वा ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तुम सब-के-सब बताओ तो सही—देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व, नाग और पक्षियोंमें भी कौन ऐसा वीर है, जो मैन्द अथवा द्विविदके साथ लोहा ले सके ? ॥ १६ ॥
अश्विपुत्रौ महावेगावेतौ प्लवगसत्तमौ । एतयोः प्रतियोद्धारं न पश्यामि रणाजिरे ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘ये दोनों वानरशिरोमणि महान् वेगशाली तथा अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं । समराङ्गणमें इन दोनोंका सामना करनेवाला मुझे कोई नहीं दिखायी देता ॥ १७ ॥
मयैव निहता लङ्का दग्धा भस्मीकृता पुरी । राजमार्गेषु सर्वेषु नाम विश्रावितं मया ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘मैंने अकेले ही लङ्कावासियोंको मार गिराया, नगरमें आग लगा दी और सारी पुरीको जलाकर भस्म कर दिया । इतना ही नहीं, वहाँकी सब सड़कोंपर मैंने अपने नामका डंका पीट दिया ॥ १८ ॥
जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः । राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ १९ ॥ अहं कोसलराजस्य दासः पवनसम्भवः । हनूमानिति सर्वत्र नाम विश्रावितं मया ॥ २० ॥
भावार्थ
‘अत्यन्त बलशाली श्रीराम और महाबली लक्ष्मणकी जय हो । श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो । मैं कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजीका दास और वायुदेवताका पुत्र हूँ । हनुमान् मेरा नाम है—इस प्रकार सर्वत्र अपने नामकी घोषणा कर दी है ॥ १९-२० ॥
अशोकवनिकामध्ये रावणस्य दुरात्मनः । अधस्ताच्छिंशपामूले साध्वी करुणमास्थिता ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘दुरात्मा रावणकी अशोकवाटिकाके मध्यभागमें एक अशोक वृक्षके नीचे साध्वी सीता बड़ी दयनीय अवस्थामें रहती हैं ॥ २१ ॥
राक्षसीभिः परिवृता शोकसंतापकर्शिता । मेघरेखापरिवृता चन्द्ररेखेव निष्प्रभा ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘राक्षसियोंसे घिरी हुई होनेके कारण वे शोक-संतापसे दुर्बल होती जा रही हैं । बादलोंकी पंक्तिसे घिरी हुई चन्द्रलेखाकी भाँति श्रीहीन हो गयी हैं ॥ २२ ॥
अचिन्तयन्ती वैदेही रावणं बलदर्पितम् । पतिव्रता च सुश्रोणी अवष्टब्धा च जानकी ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहनन्दिनी जानकी पतिव्रता हैं । वे बलके घमंडमें भरे रहनेवाले रावणको कुछ भी नहीं समझती हैं तो भी उसीकी कैदमें पड़ी हैं ॥ २३ ॥
अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा। अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘कल्याणी सीता श्रीराममें सम्पूर्ण हृदयसे अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्रमें अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीताका चित्त अनन्यभावसे श्रीरामके ही चिन्तनमें लगा हुआ है ॥ २४ ॥
तदेकवासःसंवीता रजोध्वस्ता तथैव च। सा मया राक्षसीमध्ये तर्ज्यमाना मुहुर्मुहुः ॥ २५ ॥ राक्षसीभिर्विरूपाभिर्दृष्टा हि प्रमदावने। एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘वे एक ही साड़ी पहने धूलि-धूसरित हो रही हैं। राक्षसियोंके बीचमें रहती हैं और उन्हें बारंबार उनकी डाँट-फटकार सुननी पड़ती है। इस अवस्थामें कुरूप राक्षसियोंसे घिरी हुई सीताको मैंने प्रमदावनमें देखा है। वे एक ही वेणी धारण किये दीनभावसे केवल अपने पतिदेवके चिन्तनमें लगी रहती हैं ॥ २५-२६ ॥
अधःशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमोदये। रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्यकृतनिश्चया ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘वे नीचे भूमिपर सोती हैं। हेमन्तऋतुमें कमलिनीकी भाँति उनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी है। रावणसे उनका कोई प्रयोजन नहीं है। वे मरनेका निश्चय किये बैठी हैं ॥ २७ ॥
कथंचिन्मृगशावाक्षी विश्वासमुपपादिता। ततः सम्भाषिता चैव सर्वमर्थे प्रकाशिता ॥ २८ ॥ रामसुग्रीवसख्यं च श्रुत्वा प्रीतिमुपागता। नियतः समुदाचारो भक्तिर्भर्तरि चोत्तमा ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘उन मृगनयनी सीताको मैंने बड़ी कठिनाईसे किसी तरह अपना विश्वास दिलाया। तब उनसे बातचीतका अवसर मिला और सारी बातें मैं उनके समक्ष रख सका ॥ ‘श्रीराम और सुग्रीवकी मित्रताकी बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। सीताजीमें सुदृढ़ सदाचार (पातिव्रत्य) विद्यमान है। अपने पतिके प्रति उनके हृदयमें उत्तम भक्ति है ॥ २९ ॥
यन्न हन्ति दशग्रीवं स महात्मा दशाननः। निमित्तमात्रं रामस्तु वधे तस्य भविष्यति ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘सीता स्वयं ही जो रावणको नहीं मार डालती हैं, इससे जान पड़ता है कि दशमुख रावण महात्मा है— तपोबलसे सम्पन्न होनेके कारण शाप पानेके अयोग्य है ( तथापि सीताहरणके पापसे वह नष्टप्राय ही है)। श्रीरामचन्द्रजी उसके वधमें केवल निमित्तमात्र होंगे ॥३०॥
सा प्रकृत्यैव तन्वङ्गी तद्वियोगाच्च कर्शिता। प्रतिपत्पाठशीलस्य विद्येव तनुतां गता ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘भगवती सीता एक तो स्वभावसे ही दुबली-पतली हैं, दूसरे श्रीरामचन्द्रजीके वियोगसे और भी कृश हो गयी हैं। जैसे प्रतिपदाके दिन स्वाध्याय करनेवाले विद्यार्थीकी विद्या क्षीण हो जाती है, उसी प्रकार उनका शरीर भी अत्यन्त दुर्बल हो गया है ॥ ३१ ॥
एवमास्ते महाभागा सीता शोकपरायणा। यदत्र प्रतिकर्तव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार महाभागा सीता सदा शोकमें डूबी रहती हैं। अतः इस समय जो प्रतीकार करना हो, वह सब आपलोग करें’ ॥ ३२ ॥
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