सुन्दरकाण्ड, सर्ग 58
ततस्तस्य गिरेः शृङ्गे महेन्द्रस्य महाबलाः । हनुमत्प्रमुखाः प्रीतिं हरयो जग्मुरुत्तमाम् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर हनुमान् आदि महाबली वानर महेन्द्रगिरिके शिखरपर परस्पर मिलकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥
प्रीतिमत्सूपविष्टेषु वानरेषु महात्मसु । तं ततः प्रतिसंहृष्टः प्रीतियुक्तं महाकपिम् ॥ २ ॥ जाम्बवान् कार्यवृत्तान्तमपृच्छदनिलात्मजम् । कथं दृष्टा त्वया देवी कथं वा तत्र वर्तते ॥ ३ ॥ तस्यां चापि कथं वृत्तः क्रूरकर्मा दशाननः । तत्त्वतः सर्वमेतन्नः प्रब्रूहि त्वं महाकपे ॥ ४ ॥
भावार्थ
जब सभी महामनस्वी वानर वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये, तब हर्षमें भरे हुए जाम्बवान्ने उन पवनकुमार महाकपि हनुमान्से प्रेमपूर्वक कार्यसिद्धिका समाचार पूछा— ‘महाकपे ! तुमने देवी सीताको कैसे देखा ? वे वहाँ किस प्रकार रहती हैं ? और क्रूरकर्मा दशानन उनके प्रति कैसा बर्ताव करता है ? ये सब बातें तुम हमें ठीक-ठीक बताओ ॥ २—४ ॥
सम्मार्गिता कथं देवी किं च सा प्रत्यभाषत । श्रुतार्थाश्चिन्तयिष्यामो भूयः कार्यविनिश्चयम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘तुमने देवी सीताको किस प्रकार ढूँढ़ निकाला और उन्होंने तुमसे क्या कहा ? इन सब बातोंको सुनकर हम लोग आगेके कार्यक्रमका निश्चितरूपसे विचार करेंगे ॥ ५ ॥
यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान् । रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वहाँ किष्किन्धामें चलनेपर हमलोगोंको कौन-सी बात कहनी चाहिये और किस बातको गुप्त रखना चाहिये ? तुम बुद्धिमान् हो, इसलिये तुम्हीं इन सब बातोंपर प्रकाश डालो’ ॥ ६ ॥
स नियुक्तस्ततस्तेन सम्प्रहृष्टतनूरुहः । नमस्यञ्शिरसा देव्यै सीतायै प्रत्यभाषत ॥ ७ ॥
भावार्थ
जाम्बवान्के इस प्रकार पूछनेपर हनुमान्जीके शरीरमें रोमाञ्च हो आया । उन्होंने सीतादेवीको मन-ही-मन मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ ७ ॥
प्रत्यक्षमेव भवतां महेन्द्राग्रात् खमाप्लुतः । उदधेर्दक्षिणं पारं काङ्क्षमाणः समाहितः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘मैं आपलोगोंके सामने ही समुद्रके दक्षिण तटपर जानेकी इच्छासे सावधान हो महेन्द्रपर्वतके शिखरसे आकाशमें उछला था ॥ ८ ॥
गच्छतश्च हि मे घोरं विघ्नरूपमिवाभवत् । काञ्चनं शिखरं दिव्यं पश्यामि सुमनोहरम् ॥ ९ ॥ स्थितं पन्थानमावृत्य मेने विघ्नं च तं नगम् ।
भावार्थ
‘आगे बढ़ते ही मैंने देखा एक परम मनोहर दिव्य सुवर्णमय शिखर प्रकट हुआ है, जो मेरी राह रोककर खड़ा है । वह मेरी यात्राके लिये भयानक विघ्न-सा प्रतीत हुआ । मैंने उसे मूर्तिमान् विघ्न ही माना ॥ ९½ ॥
उपसंगम्य तं दिव्यं काञ्चनं नगमुत्तमम् ॥ १० ॥ कृता मे मनसा बुद्धिर्भेत्तव्योऽयं मयेति च ।
भावार्थ
‘उस दिव्य उत्तम सुवर्णमय पर्वतके निकट पहुँचनेपर मैंने मन-ही-मन यह विचार किया कि मैं इसे विदीर्ण कर डालूँ ॥ १०½ ॥
प्रहतस्य मया तस्य लाङ्गूलेन महागिरेः ॥ ११ ॥ शिखरं सूर्यसंकाशं व्यशीर्यत सहस्रधा ।
भावार्थ
‘फिर तो मैंने अपनी पूँछसे उसपर प्रहार किया । उसकी टक्कर लगते ही उस महान् पर्वतके सूर्यतुल्य तेजस्वी शिखरके सहस्रों टुकड़े हो गये ॥ ११½ ॥
व्यवसायं च तं बुद्ध्वा स होवाच महागिरिः ॥ १२ ॥ पुत्रेति मधुरां वाणीं मनः प्रह्लादयन्निव । पितृव्यं चापि मां विद्धि सखायं मातरिश्वनः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मेरे उस निश्चयको समझकर महागिरि मैनाकने मनको आह्लादित-सा करते हुए मधुर वाणीमें ‘पुत्र’ कहकर मुझे पुकारा और कहा—‘मुझे अपना चाचा समझो । मैं तुम्हारे पिता वायुदेवताका मित्र हूँ ॥ १२-१३ ॥
मैनाकमिति विख्यातं निवसन्तं महोदधौ । पक्षवन्तः पुरा पुत्र बभूवुः पर्वतोत्तमाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘मेरा नाम मैनाक है और मैं यहाँ महासागरमें निवास करता हूँ । बेटा ! पूर्वकालमें सभी श्रेष्ठ पर्वत पङ्खधारी हुआ करते थे ॥ १४ ॥
छन्दतः पृथिवीं चेरुर्बाधमानाः समन्ततः । श्रुत्वा नगानां चरितं महेन्द्रः पाकशासनः ॥ १५ ॥ वज्रेण भगवान् पक्षौ चिच्छेदैषां सहस्रशः । अहं तु मोचितस्तस्मात् तव पित्रा महात्मना ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘‘वे समस्त प्रजाको पीड़ा देते हुए अपनी इच्छाके अनुसार सब ओर विचरते रहते थे । पर्वतोंका ऐसा आचरण सुनकर पाकशासन भगवान् इन्द्रने वज्रसे इन सहस्रों पर्वतों· के पङ्ख काट डाले; परंतु उस समय तुम्हारे महात्मा पिताने मुझे इन्द्रके हाथसे बचा लिया ॥ १५-१६ ॥
मारुतेन तदा वत्स प्रक्षिप्तो वरुणालये । राघवस्य मया साह्ये वर्तितव्यमरिंदम ॥ १७ ॥ रामो धर्मभृतां श्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः ।
भावार्थ
‘‘बेटा ! उस समय वायुदेवताने मुझे समुद्रमें लाकर डाल दिया था ( जिससे मेरे पङ्ख बच गये ); अतः शत्रुदमन वीर ! मुझे श्रीरघुनाथजीकी सहायताके कार्यमें अवश्य तत्पर होना चाहिये; क्योंकि भगवान् श्रीराम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी हैं’ ॥ १७½ ॥
एतच्छ्रुत्वा मया तस्य मैनाकस्य महात्मनः ॥ १८ ॥ कार्यमावेद्य च गिरेरुद्धतं वै मनो मम । तेन चाहमनुज्ञातो मैनाकेन महात्मना ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘महामना मैनाकको यह बात सुनकर मैंने अपना कार्य उन्हें बताया और उनकी आज्ञा लेकर फिर मेरा मन वहाँसे आगे जानेको उत्साहित हुआ । महाकाय मैनाकने उस समय मुझे जानेकी आज्ञा दे दी ॥ १८-१९ ॥
स चाप्यन्तर्हितः शैलो मानुषेण वपुष्मता । शरीरेण महाशैलः शैलेन च महोदधौ ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वह महान् पर्वत भी अपने मानवशरीरसे तो अन्तर्हित हो गया; परंतु पर्वतरूपसे महासागरमें ही स्थित रहा ॥ २० ॥
उत्तमं जवमास्थाय शेषमध्वानमास्थितः । ततोऽहं सुचिरं कालं जवेनाभ्यगमं पथि ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘फिर मैं उत्तम वेगका आश्रय ले शेष मार्गपर आगे बढ़ा और दीर्घकालतक बड़े वेगसे उस पथपर चलता रहा ॥ २१ ॥
ततः पश्याम्यहं देवीं सुरसां नागमातरम् । समुद्रमध्ये सा देवी वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् बीच समुद्रमें मुझे नागमाता सुरसा देवीका दर्शन हुआ । देवी सुरसा मुझसे इस प्रकार बोली—॥ २२ ॥
मम भक्ष्यः प्रदिष्टस्त्वममरैर्हरिसत्तम । ततस्त्वां भक्षयिष्यामि विहितस्त्वं हि मे सुरैः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘‘कपिश्रेष्ठ ! देवताओंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताया है, इसलिये मैं तुम्हें भक्षण करूँगी; क्योंकि सारे देवताओंने आज तुम्हें ही मेरा आहार नियत किया है’ ॥ २३ ॥
एवमुक्तः सुरसया प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः । विवर्णवदनो भूत्वा वाक्यं चेदमुदीरयम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘सुरसाके ऐसा कहनेपर मैं हाथ जोड़कर विनीतभावसे उसके सामने खड़ा हो गया और उदासमुख होकर यों बोला—॥ २४ ॥
रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम् । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च परंतपः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘‘देवि ! शत्रुओंको संताप देनेवाले दशरथनन्दन श्रीमान् राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताके साथ दण्डकारण्यमें आये थे ॥ २५ ॥
तस्य सीता हृता भार्या रावणेन दुरात्मना । तस्याः सकाशं दूतोऽहं गमिष्ये रामशासनात् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘‘वहाँ दुरात्मा रावणने उनकी पत्नी सीताको हर लिया । मैं इस समय श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे दूत होकर उन्हीं सीतादेवीके पास जा रहा हूँ ॥ २६ ॥
कर्तुमर्हसि रामस्य साहाय्यं विषये सती । अथवा मैथिलीं दृष्ट्वा रामं चाक्लिष्टकारिणम् ॥ २७ ॥ आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते ।
भावार्थ
‘‘तुम भी श्रीरामचन्द्रजीके ही राज्यमें रहती हो, इसलिये तुम्हें उनकीसहायता करनी चाहिये । अथवा मैं मिथिलेशकुमारी सीता तथा अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करके तुम्हारे मुखमें आ जाऊँगा, यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’ ॥ २७½ ॥
एवमुक्ता मया सा तु सुरसा कामरूपिणी ॥ २८ ॥ अब्रवीन्नातिवर्तेत कश्चिदेष वरो मम ।
भावार्थ
‘मेरे ऐसा कहनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली सुरसा बोली—‘मुझे यह वर मिला हुआ है कि मेरे आहारके रूपमें निकट आया हुआ कोई भी प्राणी मुझे टालकर आगे नहीं जा सकता’ ॥ २८½ ॥
एवमुक्तः सुरसया दशयोजनमायतः ॥ २९ ॥ ततोऽर्धगुणविस्तारो बभूवाहं क्षणेन तु । मत्प्रमाणाधिकं चैव व्यादितं तु मुखं तया ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘जब सुरसाने ऐसा कहा—उस समय मेरा शरीर दस योजन बड़ा था, किंतु एक ही क्षणमें मैं उससे ज्यादा बड़ा हो गया । तब सुरसाने भी अपने मुँहको मेरे शरीरकी अपेक्षा अधिक फैला लिया ॥ २९-३० ॥
तद् दृष्ट्वा व्यादितं त्वास्यं ह्रस्वं ह्यकरवं पुनः । तस्मिन् मुहूर्ते च पुनर्बभूवाङ्गुष्ठसम्मितः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘उसके फैले हुए मुँहको देखकर मैंने फिर अपने स्वरूपको छोटा कर लिया । उसी मुहूर्तमें मेरा शरीर अँगूठेके बराबर हो गया ॥ ३१ ॥
अभिपत्याशु तद्वक्त्रं निर्गतोऽहं ततः क्षणात् । अब्रवीत् सुरसा देवी स्वेन रूपेण मां पुनः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘फिर तो मैं सुरसाके मुँहमें शीघ्र ही घुस गया और तत्क्षण बाहर निकल आया । उस समय सुरसा देवीने अपने दिव्य रूपमें स्थित होकर मुझसे कहा—॥ ३२ ॥
अर्थसिद्धौ हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम् । समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘‘सौम्य ! कपिश्रेष्ठ ! अब तुम कार्यसिद्धिके लिये सुखपूर्वक यात्रा करो और विदेहनन्दिनी सीताको महात्मा रघुनाथजीसे मिलाओ ॥ ३३ ॥
सुखी भव महाबाहो प्रीतास्मि तव वानर । ततोऽहं साधुसाध्वीति सर्वभूतैः प्रशंसितः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘‘महाबाहु वानर ! तुम सुखी रहो । मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ।’ उस समय सभी प्राणियोंने ‘साधु-साधु’ कहकर मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३४ ॥
ततोऽन्तरिक्षं विपुलं प्लुतोऽहं गरुडो यथा । छाया मे निगृहीता च न च पश्यामि किंचन ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् मैं गरुड़की भाँति उस विशाल आकाशमें फिर उड़ने लगा । उस समय किसीने मेरी परछाईं पकड़ ली, किंतु मैं किसीको देख नहीं पाता था ॥ ३५ ॥
सोऽहं विगतवेगस्तु दिशो दश विलोकयन् । न किंचित् तत्र पश्यामि येन मे विहता गतिः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘छाया पकड़ी जानेसे मेरा वेग अवरुद्ध हो गया, अतः मैं दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा; परंतु जिसने मेरी गति रोक दी थी, ऐसा कोई प्राणी मुझे वहाँ नहीं दिखायी दिया ॥ ३६ ॥
अथ मे बुद्धिरुत्पन्ना किंनाम गमने मम । ईदृशो विघ्न उत्पन्नो रूपमत्र न दृश्यते ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘तब मेरे मनमें यह चिन्ता हुई कि मेरी यात्रामें ऐसा कौन-सा विघ्न पैदा हो गया, जिसका यहाँ रूप नहीं दिखायी दे रहा है ॥ ३७ ॥
अधोभागे तु मे दृष्टिः शोचतः पतिता तदा । तत्राद्राक्षमहं भीमां राक्षसीं सलिलेशयाम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘इसी सोचमें पड़े-पड़े मैंने जब नीचेकी ओर दृष्टि डाली, तब मुझे एक भयानक राक्षसी दिखायी दी, जो जलमें निवास करती थी ॥ ३८ ॥
प्रहस्य च महानादमुक्तोऽहं भीमया तया । अवस्थितमसम्भ्रान्तमिदं वाक्यमशोभनम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘उस भीषण निशाचरीने बड़े जोरसे अट्टहास करके निर्भय खड़े हुए मुझसे गरज-गरजकर यह अमङ्गलजनक बात कही—॥ ३९ ॥
कासि गन्ता महाकाय क्षुधिताया ममेप्सितः । भक्षः प्रीणय मे देहं चिरमाहारवर्जितम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘‘विशालकाय वानर ! कहाँ जाओगे ? मैं भूखी हुई हूँ । तुम मेरे लिये मनोवाञ्छित भोजन हो । आओ, चिरकालसे निराहार पड़े हुए मेरे शरीर और प्राणोंको तृप्त करो’ ॥४०॥
बाढमित्येव तां वाणीं प्रत्यगृह्णामहं ततः । आस्यप्रमाणादधिकं तस्याः कायमपूरयम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘तब मैंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसकी बात मान ली और अपने शरीरको उसके मुखके प्रमाणसे बहुत अधिक बढ़ा लिया ॥ ४१ ॥
तस्याश्चास्यं महद् भीमं वर्धते मम भक्षणे । न तु मां सा तु बुबुधे मम वा विकृतं कृतम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘परंतु उसका विशाल और भयानक मुख भी मुझे भक्षण करनेके लिये बढ़ने लगा । उसने मुझे या मेरे प्रभावको नहीं जाना तथा मैंने जो छल किया था, वह भी उसकी समझमें नहीं आया ॥ ४२ ॥
ततोऽहं विपुलं रूपं संक्षिप्य निमिषान्तरात् । तस्या हृदयमादाय प्रपतामि नभःस्थलम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘फिर तो पलक मारते-मारते मैंने अपने विशाल रूपको अत्यन्त छोटा बना लिया और उसका कलेजा निकालकर आकाशमें उड़ गया ॥ ४३ ॥
सा विसृष्टभुजा भीमा पपात लवणाम्भसि । मया पर्वतसंकाशा निकृत्तहृदया सती ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘मेरे द्वारा कलेजेके काट लिये जानेपर पर्वतके समान भयानक शरीरवाली वह दुष्टा राक्षसी अपनी दोनों बाँहें शिथिल हो जानेके कारण समुद्रके जलमें गिर पड़ी ॥ ४४ ॥
शृणोमि खगतानां च वाचः सौम्या महात्मनाम् । राक्षसी सिंहिका भीमा क्षिप्रं हनुमता हता ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘उस समय मुझे आकाशचारी सिद्ध महात्माओंकी यह सौम्य वाणी सुनायी दी—‘अहो ! इस सिंहिका नामवाली भयानक राक्षसीको हनुमान्जीने शीघ्र ही मार डाला’ ॥४५॥
तां हत्वा पुनरेवाहं कृत्यमात्ययिकं स्मरन् । गत्वा च महदध्वानं पश्यामि नगमण्डितम् ॥ ४६ ॥ दक्षिणं तीरमुदधेर्लङ्का यत्र गता पुरी ।
भावार्थ
‘उसे मारकर मैंने फिर अपने उस आवश्यक कार्यपर ध्यान दिया, जिसकी पूर्तिमें अधिक विलम्ब हो चुका था । उस विशाल मार्गको समाप्त करके मैंने पर्वतमालाओंसे मण्डित समुद्रका वह दक्षिण किनारा देखा, जहाँ लङ्कापुरी बसी हुई है ॥ ४६½ ॥
अस्तं दिनकरे याते रक्षसां निलयं पुरीम् ॥ ४७ ॥ प्रविष्टोऽहमविज्ञातो रक्षोभिर्भीमविक्रमैः ।
भावार्थ
‘सूर्यदेवके अस्ताचलको चले जानेपर मैंने राक्षसोंकी निवासस्थानभूता लङ्कापुरीमें प्रवेश किया, किंतु वे भयानक पराक्रमी राक्षस मेरे विषयमें कुछ भी जान न सके ॥ ४७½ ॥
तत्र प्रविशतश्चापि कल्पान्तघनसप्रभा ॥ ४८ ॥ अट्टहासं विमुञ्चन्ती नारी काप्युत्थिता पुरः ।
भावार्थ
‘मेरे प्रवेश करते ही प्रलयकालके मेघकी भाँति काली कान्तिवाली एक स्त्री अट्टहास करती हुई मेरे सामने खड़ी हो गयी ॥ ४८½ ॥
जिघांसन्तीं ततस्तां तु ज्वलदग्निशिरोरुहाम् ॥ ४९ ॥ सव्यमुष्टिप्रहारेण पराजित्य सुभैरवाम् । प्रदोषकाले प्रविशं भीतयाहं तयोदितः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘उसके सिरके बाल प्रज्वलित अग्निके समान दिखायी देते थे । वह मुझे मार डालना चाहती थी । यह देख मैंने बायें हाथके मुक्केसे प्रहार करके उस भयंकर निशाचरीको परास्त कर दिया और प्रदोषकालमें पुरीके भीतर प्रविष्ट हुआ । उस समय उस डरी हुई निशाचरीने मुझसे इस प्रकार कहा—॥ ४९-५० ॥
अहं लङ्कापुरी वीर निर्जिता विक्रमेण ते । यस्मात् तस्माद् विजेतासि सर्वरक्षांस्यशेषतः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘‘वीर ! मैं साक्षात् लङ्कापुरी हूँ । तुमने अपने पराक्रमसे मुझे जीत लिया है, इसलिये तुम समस्त राक्षसोंपर पूर्णतः विजय प्राप्त कर लोगे’ ॥ ५१ ॥
तत्राहं सर्वरात्रं तु विचरञ्जनकात्मजाम् । रावणान्तःपुरगतो न चापश्यं सुमध्यमाम् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘वहाँ सारी रात नगरमें घर-घर घूमने और रावणके अन्तःपुरमें पहुँचनेपर भी मैंने सुन्दर कटिप्रदेशवाली जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा ॥ ५२ ॥
ततः सीतामपश्यंस्तु रावणस्य निवेशने । शोकसागरमासाद्य न पारमुपलक्षये ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘रावणके महलमें सीताको न देखनेपर मैं शोक-सागरमें डूब गया । उस समय मुझे उस शोकका कहीं पार नहीं दिखायी देता था ॥ ५३ ॥
शोचता च मया दृष्टं प्राकारेणाभिसंवृतम् । काञ्चनेन विकृष्टेन गृहोपवनमुत्तमम् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘सोचमें पड़े-पड़े ही मैंने एक उत्तम गृहोद्यान देखा, जो सोनेके बने हुए सुन्दर परकोटेसे घिरा हुआ था ॥ ५४ ॥
सप्राकारमवप्लुत्य पश्यामि बहुपादपम् । अशोकवनिकामध्ये शिंशपापादपो महान् ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘तब उस परकोटेको लाँघकर मैंने उस गृहोद्यानको देखा, जो बहुसंख्यक वृक्षोंसे भरा हुआ था । उस अशोकवाटिकाके बीचमें मुझे एक बहुत ऊँचा अशोक वृक्ष दिखायी दिया ॥ ५५ ॥
तमारुह्य च पश्यामि काञ्चनं कदलीवनम् । अदूराच्छिंशपावृक्षात् पश्यामि वरवर्णिनीम् ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘उसपर चढ़कर मैंने सुवर्णमय कदलीवन देखा तथा उस अशोक वृक्षके पास ही मुझे सर्वाङ्गसुन्दरी सीताजीका दर्शन हुआ ॥ ५६ ॥
श्यामां कमलपत्राक्षीमुपवासकृशाननाम् । तदेकवासःसंवीतां रजोध्वस्तशिरोरुहाम् ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘वे सदा सोलह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त दिखायी देती हैं । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर हैं । सीताजी उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं और उनकी यह दुर्बलता उनका मुख देखते ही स्पष्ट हो जाती है । वे एक ही वस्त्र पहने हुए हैं और उनके केश धूलसे धूसर हो गये हैं ॥ ५७ ॥
शोकसंतापदीनाङ्गीं सीतां भर्तृहिते स्थिताम् । राक्षसीभिर्विरूपाभिः क्रूराभिरभिसंवृताम् ॥ ५८ ॥ मांसशोणितभक्ष्याभिर्व्याघ्रीभिर्हरिणीं यथा । सा मया राक्षसीमध्ये तर्ज्यमाना मुहुर्मुहुः ॥ ५९ ॥ एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा । भूमिशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘उनके सारे अङ्ग शोक-संतापसे दीन दिखायी देते हैं । वे अपने स्वामीके हित-चिन्तनमें तत्पर हैं । रक्त-मांसका भोजन करनेवाली क्रूर एवं कुरूप राक्षसियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनकी रखवाली करती हैं । ठीक उसी तरह जैसे बहुत-सी बाघिनें किसी हरिणीको घेरे हुए खड़ी हों ॥ ‘मैंने देखा, वे राक्षसियोंके बीचमें बैठी थीं और राक्षसियाँ उन्हें बारंबार धमका रही थीं । वे सिरपर एक ही वेणी धारण किये दीनभावसे अपने पतिके चिन्तनमें तल्लीन हो रही थीं । धरती ही उनकी शय्या है । जैसे हेमन्त-ऋतु आनेपर कमलिनी सूखकर श्रीहीन हो जाती है, उसी प्रकार उनके सारे अङ्ग कान्तिहीन हो गये हैं ॥ ५९-६० ॥
रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्ये कृतनिश्चया । कथंचिन्मृगशावाक्षी तूर्णमासादिता मया ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘रावणकी ओरसे उनका हार्दिक भाव सर्वथा दूर है । वे मरनेका निश्चय कर चुकी हैं । उसी अवस्थामें मैं किसी तरह शीघ्रतापूर्वक मृगनयनी सीताके पास पहुँच सका ॥६१॥
तां दृष्ट्वा तादृशीं नारीं रामपत्नीं यशस्विनीम् । तत्रैव शिंशपावृक्षे पश्यन्नहमवस्थितः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
‘वैसी अवस्थामें पड़ी हुई उन यशस्विनी नारी श्रीरामपत्नी सीताको अशोकवृक्षके नीचे बैठी देख मैं भी उस वृक्षपर स्थित हो गया और उन्हें वहींसे निहारने लगा ॥ ६२ ॥
ततो हलहलाशब्दं काञ्चीनूपुरमिश्रितम् । शृणोम्यधिकगम्भीरं रावणस्य निवेशने ॥ ६३ ॥
भावार्थ
‘इतनेहीमें रावणके महलमें करघनी और नूपुरोंकी झनकारसे मिला हुआ अधिक गम्भीर कोलाहल सुनायी पड़ा ॥ ६३ ॥
ततोऽहं परमोद्विग्नः स्वरूपं प्रत्यसंहरम् । अहं च शिंशपावृक्षे पक्षीव गहने स्थितः ॥ ६४ ॥
भावार्थ
‘फिर तो मैंने अत्यन्त उद्विग्न होकर अपने स्वरूपको समेट लिया—छोटा बना लिया और पक्षीके समान उस गहन शिंशपा ( अशोक ) वृक्षमें छिपा बैठा रहा ॥ ६४ ॥
ततो रावणदाराश्च रावणश्च महाबलः । तं देशमनुसम्प्राप्तो यत्र सीताभवत् स्थिता ॥ ६५ ॥
भावार्थ
‘इतनेहीमें रावणकी स्त्रियाँ और महाबली रावण—ये सब-के-सब उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ सीतादेवी विराजमान थीं ॥ ६५ ॥
तं दृष्ट्वाथ वरारोहा सीता रक्षोगणेश्वरम् । संकुच्योरू स्तनौ पीनौ बाहुभ्यां परिरभ्य च ॥ ६६ ॥
भावार्थ
‘राक्षसोंके स्वामी रावणको देखते ही सुन्दर कटिप्रदेशवाली सीता अपनी जाँघोंको सिकोड़कर और उभरे हुए दोनों स्तनोंको भुजाओंसे ढककर बैठ गयीं ॥ ६६ ॥
वित्रस्तां परमोद्विग्नां वीक्ष्यमाणामितस्ततः । त्राणं कंचिदपश्यन्तीं वेपमानां तपस्विनीम् ॥ ६७ ॥ तामुवाच दशग्रीवः सीतां परमदुःखिताम् । अवाक्शिराः प्रपतितो बहुमन्यस्व मामिति ॥ ६८ ॥
भावार्थ
‘वे अत्यन्त भयभीत और उद्विग्न होकर इधर-उधर देखने लगीं । उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी देता था । भयसे काँपती हुई अत्यन्त दुःखिनी तपस्विनी सीताके सामने जा दशमुख रावण नीचे सिर किये उनके चरणोंमें गिर पड़ा और इस प्रकार बोला—‘विदेहकुमारी ! मैं तुम्हारा सेवक हूँ । तुम मुझे अधिक आदर दो’ ॥६७-६८॥
यदि चेत्त्वं तु मां दर्पान्नाभिनन्दसि गर्विते । द्विमासानन्तरं सीते पास्यामि रुधिरं तव ॥ ६९ ॥
भावार्थ
‘( इतनेपर भी अपने प्रति उनकी उपेक्षा देख वह कुपित होकर बोला— ) ‘गर्वीली सीते ! यदि तू घमंडमें आकर मेरा अभिनन्दन नहीं करेगी तो आजसे दो महीनेके बाद मैं तेरा खून पी जाऊँगा’ ॥ ६९ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य रावणस्य दुरात्मनः । उवाच परमक्रुद्धा सीता वचनमुत्तमम् ॥ ७० ॥
भावार्थ
‘दुरात्मा रावणकी यह बात सुनकर सीताने अत्यन्त कुपित हो यह उत्तम वचन कहा—॥ ७० ॥
राक्षसाधम रामस्य भार्याममिततेजसः । इक्ष्वाकुवंशनाथस्य स्नुषां दशरथस्य च ॥ ७१ ॥ अवाच्यं वदतो जिह्वा कथं न पतिता तव ।
भावार्थ
‘नीच निशाचर ! अमिततेजस्वी भगवान् श्रीरामकी पत्नी और इक्ष्वाकुकुलके स्वामी महाराज दशरथकी पुत्र-वधूसे यह न कहने योग्य बात कहते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गिर गयी ? ॥ ७१½ ॥
किंस्विद्वीर्य तवानार्य यो मां भर्तुरसंनिधौ ॥ ७२ ॥ अपहृत्यागतः पाप तेनादृष्टो महात्मना ।
भावार्थ
‘दुष्ट पापी ! तुझमें क्या पराक्रम है ? मेरे पतिदेव जब निकट नहीं थे, तब तू उन महात्माकी दृष्टिसे छिपकर चोरी-चोरी मुझे हर लाया ॥ ७२½ ॥
न त्वं रामस्य सदृशो दास्येऽप्यस्य न युज्यसे ॥ ७३ ॥ अजेयः सत्यवाक् शूरो रणश्लाघी च राघवः ।
भावार्थ
‘तू भगवान् श्रीरामकी समानता नहीं कर सकता । तू तो उनका दास होने योग्य भी नहीं है । श्रीरघुनाथजी सर्वथा अजेय, सत्यभाषी, शूरवीर और युद्धके अभिलाषी एवं प्रशंसक हैं१ ॥ ७३½ ॥
जानक्या परुषं वाक्यमेवमुक्तो दशाननः ॥ ७४ ॥ जज्वाल सहसा कोपाच्चितास्थ इव पावकः । विवृत्य नयने क्रूरे मुष्टिमुद्यम्य दक्षिणम् ॥ ७५ ॥ मैथिलीं हन्तुमारब्धः स्त्रीभिर्हाहाकृतं तदा । स्त्रीणां मध्यात् समुत्पत्य तस्य भार्या दुरात्मनः ॥ ७६ ॥ वरा मन्दोदरी नाम तया स प्रतिषेधितः । उक्तश्च मधुरां वाणीं तया स मदनार्दितः ॥ ७७ ॥
भावार्थ
‘जनकनन्दिनीके ऐसी कठोर बात कहनेपर दशमुख रावण चितामें लगी हुई आगकी भाँति सहसा क्रोधसे जल उठा और अपनी क्रूर आँखें फाड़-फाड़कर देखता हुआ दाहिना मुक्का तानकर मिथिलेशकुमारीको मारनेके लिये तैयार हो गया । यह देख उस समय वहाँ खड़ी हुई स्त्रियाँ हाहाकार करने लगीं । इतनेहीमें उन स्त्रियोंके बीचसे उस दुरात्माकी सुन्दरी भार्या मन्दोदरी झपटकर आगे आयी और उसने रावणको ऐसा करनेसे रोका । साथ ही, उस कामपीड़ित निशाचरसे मधुर वाणीमें कहा—॥ ७४–७७ ॥
सीतया तव किं कार्यं महेन्द्रसमविक्रम । मया सह रमस्वाद्य मद्विशिष्टा न जानकी ॥ ७८ ॥
भावार्थ
‘महेन्द्रके समान पराक्रमी राक्षसराज ! सीतासे तुम्हें क्या काम है ? आज मेरे साथ रमण करो । जनकनन्दिनी सीता मुझसे अधिक सुन्दरी नहीं है ॥ ७८ ॥
देवगन्धर्वकन्याभिर्यक्षकन्याभिरेव च । सार्धं प्रभो रमस्वेति सीतया किं करिष्यसि ॥ ७९ ॥ ततस्ताभिः समेताभिर्नारीभिः स महाबलः । उत्थाप्य सहसा नीतो भवनं स्वं निशाचरः ॥ ८० ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! देवताओं, गन्धर्वों और यक्षोंकी कन्याएँ हैं, इनके साथ रमण करो; सीताको लेकर क्या करोगे ?’ ॥ ‘तदनन्तर वे सब स्त्रियाँ मिलकर उस महाबली निशाचर रावणको सहसा वहाँसे उठाकर अपने महलमें ले गयीं ॥ ८० ॥
याते तस्मिन् दशग्रीवे राक्षस्यो विकृताननाः । सीतां निर्भर्त्सयामासुर्वाक्यैः क्रूरैः सुदारुणैः ॥ ८१ ॥
भावार्थ
‘दशमुख रावणके चले जानेपर विकराल मुखवाली राक्षसियाँ अत्यन्त दारुण क्रूरतापूर्ण वचनोंद्वारा सीताको डराने-धमकाने लगीं ॥ ८१ ॥
तृणवद् भाषितं तासां गणयामास जानकी । गर्जितं च तथा तासां सीतां प्राप्य निरर्थकम् ॥ ८२ ॥
भावार्थ
‘परंतु जानकीने उनकी बातोंको तिनकेके समान तुच्छ समझा । उनका सारा गर्जन-तर्जन सीताके पास पहुँचकर व्यर्थ हो गया ॥ ८२ ॥
वृथा गर्जितनिश्चेष्टा राक्षस्यः पिशिताशनाः । रावणाय शशंसुस्ताः सीताव्यवसितं महत् ॥ ८३ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार गर्जना और सारी चेष्टाओंके व्यर्थ हो जानेपर उन मांसभक्षिणी राक्षसियोंने रावणके पास जाकर उसे सीताजीका महान् निश्चय कह सुनाया ॥ ८३ ॥
ततस्ताः सहिताः सर्वा विहताशा निरुद्यमाः । परिक्लिश्य समस्तास्ता निद्रावशमुपागताः ॥ ८४ ॥
भावार्थ
‘फिर वे सब-की-सब उन्हें अनेक प्रकारसे कष्ट दे हताश तथा उद्योगशून्य हो निद्राके वशीभूत होकर सो गयीं ॥ ८४ ॥
तासु चैव प्रसुप्तासु सीता भर्तृहिते रता । विलप्य करुणं दीना प्रशुशोच सुदुःखिता ॥ ८५ ॥
भावार्थ
‘उन सबके सो जानेपर पतिके हितमें तत्पर रहनेवाली सीताजी करुणापूर्वक विलापकर अत्यन्त दीन और दुखी हो शोक करने लगीं ॥ ८५ ॥
तासां मध्यात् समुत्थाय त्रिजटा वाक्यमब्रवीत् । आत्मानं खादत क्षिप्रं न सीतामसितेक्षणाम् ॥ ८६ ॥ जनकस्यात्मजां साध्वीं स्नुषां दशरथस्य च ।
भावार्थ
‘उन राक्षसियोंके बीचसे त्रिजटा नामवाली राक्षसी उठी और अन्य निशाचरियोंसे इस प्रकार बोली—‘अरी ! तुम सब अपने आपको ही जल्दी-जल्दी खा जाओ, कजरारे नेत्रोंवाली सीताको नहीं; ये राजा दशरथकी पुत्रवधू और जनककी लाड़ली सती-साध्वी सीता इस योग्य नहीं हैं ॥ ८६½ ॥
स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः ॥ ८७ ॥ रक्षसां च विनाशाय भर्तुरस्या जयाय च ।
भावार्थ
‘‘आज अभी मैंने बड़ा भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला स्वप्न देखा है; वह राक्षसोंके विनाश तथा इन सीतादेवीके पतिकी विजयका सूचक है ॥ ८७½ ॥
अलमस्मान् परित्रातुं राघवाद् राक्षसीगणम् ॥ ८८ ॥ अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते ।
भावार्थ
‘‘ये सीता ही श्रीरघुनाथजीके रोषसे हमारी और इन सब राक्षसियोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं; अतः हमलोग विदेहनन्दिनीसे अपने अपराधोंके लिये क्षमा-याचना करें—यही मुझे अच्छा लगता है ॥ ८८½ ॥
यदि ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते ॥ ८९ ॥ सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता सुखमाप्नोत्यनुत्तमम् ।
भावार्थ
‘‘यदि किसी दुःखिनीके विषयमें ऐसा स्वप्न देखा जाता है तो वह अनेक विध दुःखोंसे छूटकर परम उत्तम सुख पाती है ॥ ८९½ ॥
प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा ॥ ९० ॥ अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ।
भावार्थ
‘‘राक्षसियो ! केवल प्रणाम करनेमात्रसे मिथिलेशकुमारी जानकी प्रसन्न हो जायँगी और ये महान् भयसे मेरी रक्षा करेंगी’ ॥ ९०½ ॥
ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता ॥ ९१ ॥ अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः ।
भावार्थ
‘तब लज्जावती बाला सीता पतिकी विजयकी सम्भावनासे प्रसन्न हो बोलीं—‘यदि यह बात सच होगी तो मैं अवश्य तुमलोगोंकी रक्षा करूँगी’ ॥ ९१½ ॥
तां चाहं तादृशीं दृष्ट्वा सीताया दारुणां दशाम् ॥ ९२ ॥ चिन्तयामास विश्रान्तो न च मे निर्वृतं मनः । सम्भाषणार्थं च मया जानक्याश्चिन्तितो विधिः ॥ ९३ ॥
भावार्थ
‘कुछ विश्रामके पश्चात् मैं सीताकी वैसी दारुण दशा देखकर बड़ी चिन्तामें पड़ गया । मेरे मनको शान्ति नहीं मिलती थी । फिर मैंने जानकीजीके साथ वार्तालाप करनेके लिये एक उपाय सोचा ॥ ९२-९३ ॥
इक्ष्वाकुकुलवंशस्तु स्तुतो मम पुरस्कृतः । श्रुत्वा तु गदितां वाचं राजर्षिगणभूषिताम् ॥ ९४ ॥ प्रत्यभाषत मां देवी बाष्पैः पिहितलोचना ।
भावार्थ
‘पहले मैंने इक्ष्वाकुवंशकी प्रशंसा की । राजर्षियोंकी स्तुतिसे विभूषित मेरी वह वाणी सुनकर देवी सीताके नेत्रोंमें आँसू भर आया और वे मुझसे बोलीं—॥ ९४½ ॥
कस्त्वं केन कथं चेह प्राप्तो वानरपुङ्गव ॥ ९५ ॥ का च रामेण ते प्रीतिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ।
भावार्थ
‘‘कपिश्रेष्ठ ! तुम कौन हो ? किसने तुम्हें भेजा है ? यहाँ कैसे आये हो ? और भगवान् श्रीरामके साथ तुम्हारा कैसा प्रेम है ? यह सब मुझे बताओ’ ॥ ९५½ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा अहमप्यब्रुवं वचः ॥ ९६ ॥ देवि रामस्य भर्तुस्ते सहायो भीमविक्रमः । सुग्रीवो नाम विक्रान्तो वानरेन्द्रो महाबलः ॥ ९७ ॥
भावार्थ
‘उनका वह वचन सुनकर मैंने भी कहा—‘देवि ! तुम्हारे पतिदेव श्रीरामके सहायक एक भयंकर पराक्रमी बल-विक्रमसम्पन्न महाबली वानरराज हैं, जिनका नाम सुग्रीव है ॥ ९६-९७ ॥
तस्य मां विद्धि भृत्यं त्वं हनूमन्तमिहागतम् । भर्त्रा सम्प्रहितस्तुभ्यं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ९८ ॥
भावार्थ
‘‘उन्हींका मुझे सेवक समझो । मेरा नाम हनुमान् है । अनायास ही महान् कर्म करनेवाले तुम्हारे पति श्रीरामने भेजा है । इसलिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ ९८ ॥
इदं तु पुरुषव्याघ्रः श्रीमान् दाशरथिः स्वयम् । अङ्गुलीयमभिज्ञानमदात् तुभ्यं यशस्विनि ॥ ९९ ॥
भावार्थ
‘यशस्विनि ! पुरुषसिंह दशरथनन्दन साक्षात् श्रीमान् रामने पहचानके लिये यह अँगूठी तुम्हें दी है॥ ९९ ॥
तदिच्छामि त्वयाज्ञप्तं देवि किं करवाण्यहम् । रामलक्ष्मणयोः पार्श्वं नयामि त्वां किमुत्तरम् ॥१००॥
भावार्थ
‘देवि ! मैं चाहता हूँ कि आप मुझे आज्ञा दें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? आप कहें तो मैं अभी आपको श्रीराम और लक्ष्मणके पास पहुँचा दूँ । इस विषयमें आपका क्या उत्तर है ?’ ॥ १०० ॥
एतच्छ्रुत्वा विदित्वा च सीता जनकनन्दिनी । आह रावणमुत्पाट्य राघवो मां नयत्विति ॥१०१॥
भावार्थ
‘मेरी यह बात सुनकर और सोच-समझकर जनकनन्दिनी सीताने कहा—‘मेरी इच्छा है कि श्रीरघुनाथजी रावणका संहार करके मुझे यहाँसे ले चलें’ ॥ १०१ ॥
प्रणम्य शिरसा देवीमहमार्यामनिन्दिताम् । राघवस्य मनोह्लादमभिज्ञानमयाचिषम् ॥१०२॥
भावार्थ
‘तब मैंने उन सती-साध्वी देवी आर्या सीताको सिर झुकाकर प्रणाम किया और कोई ऐसी पहचान माँगी, जो श्रीरघुनाथजीके मनको आनन्द प्रदान करनेवाली हो ॥१०२॥
अथ मामब्रवीत् सीता गृह्यतामयमुत्तमः । मणिर्येन महाबाहू रामस्त्वां बहु मन्यते ॥१०३॥
भावार्थ
‘मेरे माँगनेपर सीताजीने कहा—‘लो, यह उत्तम चूडामणि है, जिसे पाकर महाबाहु श्रीराम तुम्हारा विशेष आदर करेंगे’ ॥ १०३ ॥
इत्युक्त्वा तु वरारोहा मणिप्रवरमुत्तमम् । प्रायच्छत् परमोद्विग्ना वाचा मां संदिदेश ह ॥१०४॥
भावार्थ
‘ऐसा कहकर सुन्दरी सीताने मुझे वह परम उत्तम चूडामणि दी और अत्यन्त उद्विग्न होकर वाणीद्वारा अपना संदेश कहा ॥ १०४ ॥
ततस्तस्यै प्रणम्याहं राजपुत्र्यै समाहितः । प्रदक्षिणं परिक्राममिहाभ्युद्गतमानसः ॥१०५॥
भावार्थ
‘तब मन-ही-मन यहाँ आनेके लिये उत्सुक हो एकाग्रचित्त होकर मैंने राजकुमारी सीताको प्रणाम किया और उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की ॥ १०५ ॥
उत्तरं पुनरेवाह निश्चित्य मनसा तदा । हनूमन् मम वृत्तान्तं वक्तुमर्हसि राघवे ॥१०६॥ यथा श्रुत्वैव नचिरात् तावुभौ रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवसहितौ वीरावुपेयातां तथा कुरु ॥१०७॥
भावार्थ
‘उस समय उन्होंने मनसे कुछ निश्चय करके पुनः मुझे उत्तर दिया—‘हनुमन् ! तुम श्रीरघुनाथजीको मेरा सारा वृत्तान्त सुनाना और ऐसा प्रयत्न करना, जिससे सुग्रीवसहित वे दोनों वीरबन्धु श्रीराम और लक्ष्मण मेरा हाल सुनते ही अविलम्ब यहाँ आ जायँ ॥ १०६-१०७ ॥
यदन्यथा भवेदेतद् द्वौ मासौ जीवितं मम । न मां द्रक्ष्यति काकुत्स्थो म्रिये साहमनाथवत् ॥१०८॥
भावार्थ
‘‘यदि इसके विपरीत हुआ तो दो महीनेतक मेरा जीवन और शेष है । उसके बाद श्रीरघुनाथजी मुझे नहीं देख सकेंगे । मैं अनाथकी भाँति मर जाऊँगी’ ॥ १०८ ॥
तच्छ्रुत्वा करुणं वाक्यं क्रोधो मामभ्यवर्तत । उत्तरं च मया दृष्टं कार्यशेषमनन्तरम् ॥१०९॥
भावार्थ
‘उनका यह करुणाजनक वचन सुनकर राक्षसोंके प्रति मेरा क्रोध बहुत बढ़ गया । फिर मैंने शेष बचे हुए भावी कार्यपर विचार किया ॥ १०९ ॥
ततोऽवर्धत मे कायस्तदा पर्वतसंनिभः । युद्धाकाङ्क्षी वनं तस्य विनाशयितुमारभे ॥११०॥
भावार्थ
‘तदनन्तर मेरा शरीर बढ़ने लगा और तत्काल पर्वतके समान हो गया । मैंने युद्धकी इच्छासे रावणके उस वनको उजाड़ना आरम्भ किया ॥ ११० ॥
तद् भग्नं वनखण्डं तु भ्रान्तत्रस्तमृगद्विजम् । प्रतिबुद्ध्य निरीक्षन्ते राक्षस्यो विकृताननाः ॥१११॥
भावार्थ
‘जहाँके पशु और पक्षी घबराये और डरे हुए थे, उस उजड़े हुए वनखण्डको वहाँ सोकर उठी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियोंने देखा ॥ १११ ॥
मां च दृष्ट्वा वने तस्मिन् समागम्य ततस्ततः । ताः समभ्यागताः क्षिप्रं रावणायाचचक्षिरे ॥११२॥
भावार्थ
‘उस वनमें मुझे देखकर वे सब इधर-उधरसे जुट गयीं और तुरंत रावणके पास जाकर उन्होंने वनविध्वंसका सारा समाचार कहा—॥ ११२ ॥
राजन् वनमिदं दुर्गं तव भग्नं दुरात्मना । वानरेण ह्यविज्ञाय तव वीर्यं महाबल ॥११३॥
भावार्थ
‘‘महाबली राक्षसराज ! एक दुरात्मा वानरने आपके बल-पराक्रमको कुछ भी न समझकर इस दुर्गम प्रमदावनको उजाड़ डाला है॥ ११३ ॥
तस्य दुर्बुद्धिता राजंस्तव विप्रियकारिणः । वधमाज्ञापय क्षिप्रं यथासौ न पुनर्व्रजेत् ॥११४॥
भावार्थ
‘‘महाराज ! यह उसकी दुर्बुद्धि ही है, जो उसने आपका अपराध किया । आप शीघ्र ही उसके वधकी आज्ञा दें, जिससे वह फिर बचकर चला न जाय’ ॥ ११४ ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रेण विसृष्टा बहुदुर्जयाः । राक्षसाः किंकरा नाम रावणस्य मनोऽनुगाः ॥११५॥
भावार्थ
‘यह सुनकर राक्षसराजने अपने मनके अनुकूल चलनेवाले किंकर नामक राक्षसोंको भेजा, जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन था ॥ ११५ ॥
तेषामशीतिसाहस्रं शूलमुद्गरपाणिनाम् । मया तस्मिन् वनोद्देशे परिघेण निषूदितम् ॥ ११६ ॥
भावार्थ
‘वे हाथोंमें शूल और मुद्गर लेकर आये थे । उनकी संख्या अस्सी हजार थी; परंतु मैंने उस वनप्रान्तमें एक परिघसे ही उन सबका संहार कर डाला ॥ ११६ ॥
तेषां तु हतशिष्टा ये ते गता लघुविक्रमाः । निहतं च मया सैन्यं रावणायाचचक्षिरे ॥ ११७ ॥
भावार्थ
‘उनमें जो मरनेसे बच गये, वे जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए भाग गये । उन्होंने रावणको मेरेद्वारा सारी सेनाके मारे जानेका समाचार बताया ॥ ११७ ॥
ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना चैत्यप्रासादमुत्तमम् । तत्रस्थान् राक्षसान् हत्वा शतं स्तम्भेन वै पुनः ॥ ११८ ॥ ललामभूतो लङ्काया मया विध्वंसितो रुषा ।
भावार्थ
‘तत्पश्चात् मेरे मनमें एक नया विचार उत्पन्न हुआ और मैंने क्रोधपूर्वक वहाँके उत्तम चैत्यप्रासादको, जो लङ्काका सबसे सुन्दर भवन था तथा जिसमें सौ खम्भे लगे हुए थे, वहाँके राक्षसोंका संहार करके तोड़-फोड़ डाला ॥ ११८½ ॥
ततः प्रहस्तस्य सुतं जम्बुमालिनमादिशत् ॥ ११९ ॥ राक्षसैर्बहुभिः सार्धं घोररूपैर्भयानकैः ।
भावार्थ
‘तब रावणने घोर रूपवाले भयानक राक्षसोंके साथ जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, प्रहस्तके बेटे जम्बुमालीको युद्धके लिये भेजा ॥ ११९½ ॥
तमहं बलसम्पन्नं राक्षसं रणकोविदम् ॥ १२० ॥ परिघेणातिघोरेण सूदयामि सहानुगम् ।
भावार्थ
‘वह राक्षस बड़ा बलवान् तथा युद्धकी कलामें कुशल था तो भी मैंने अत्यन्त घोर परिघसे मारकर सेवकोंसहित उसे कालके गालमें डाल दिया ॥ १२०½ ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्तु मन्त्रिपुत्रान् महाबलान् ॥ १२१ ॥ पदातिबलसम्पन्नान् प्रेषयामास रावणः । परिघेणैव तान् सर्वान् नयामि यमसादनम् ॥ १२२ ॥
भावार्थ
‘यह सुनकर राक्षसराज रावणने पैदल सेनाके साथ अपने मन्त्रीके पुत्रोंको भेजा, जो बड़े बलवान् थे; किंतु मैंने परिघसे ही उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ १२१-१२२ ॥
मन्त्रिपुत्रान् हताञ्श्रुत्वा समरे लघुविक्रमान् । पञ्च सेनाग्रगाञ्छूरान् प्रेषयामास रावणः ॥ १२३ ॥
भावार्थ
‘समराङ्गणमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले मन्त्रि-कुमारोंको मारा गया सुनकर रावणने पाँच शूरवीर सेनापतियोंको भेजा ॥ १२३ ॥
तानहं सहसैन्यान् वै सर्वानेवाभ्यसूदयम् । ततः पुनर्दशग्रीवः पुत्रमक्षं महाबलम् ॥ १२४ ॥ बहुभी राक्षसैः सार्धं प्रेषयामास संयुगे ।
भावार्थ
‘उन सबको भी मैंने सेनासहित मौतके घाट उतार दिया । तब दशमुख रावणने अपने पुत्र महाबली अक्षकुमारको बहुसंख्यक राक्षसोंके साथ युद्धके लिये भेजा ॥ १२४½ ॥
तं तु मन्दोदरीपुत्रं कुमारं रणपण्डितम् ॥ १२५ ॥ सहसा खं समुद्यन्तं पादयोश्च गृहीतवान् । तमासीनं शतगुणं भ्रामयित्वा व्यपेषयम् ॥ १२६ ॥
भावार्थ
‘मन्दोदरीका वह पुत्र युद्धकी कलामें बड़ा प्रवीण था । वह आकाशमें उड़ रहा था । उसी समय मैंने सहसा उसके दोनों पैर पकड़ लिये और सौ बार घुमाकर उसे पृथ्वीपर पटक दिया । इस तरह वहाँ पड़े हुए कुमार अक्षको मैंने पीस डाला ॥ १२५-१२६ ॥
तमक्षमागतं भग्नं निशम्य स दशाननः । ततश्चेन्द्रजितं नाम द्वितीयं रावणः सुतम् ॥ १२७ ॥ व्यादिदेश सुसंक्रुद्धो बलिनं युद्धदुर्मदम् ।
भावार्थ
‘अक्षकुमार युद्धभूमिमें आया और मारा गया—यह सुनकर दशमुख रावणने अत्यन्त कुपित हो अपने दूसरे पुत्र इन्द्रजित्को, जो बड़ा ही रणदुर्मद और बलवान् था, भेजा ॥ १२७½ ॥
तच्चाप्यहं बलं सर्वं तं च राक्षसपुङ्गवम् ॥ १२८ ॥ नष्टौजसं रणे कृत्वा परं हर्षमुपागतः ।
भावार्थ
‘उसके साथ आयी हुई सारी सेनाको और उस राक्षस-शिरोमणिको भी युद्धमें हतोत्साह करके मुझे बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२८½ ॥
महतापि महाबाहुः प्रत्ययेन महाबलः ॥ १२९ ॥ प्रहितो रावणेनैष सह वीरैर्मदोद्धतैः ।
भावार्थ
‘रावणने इस महाबली महाबाहु वीरको अनेक मदमत्त वीरोंके साथ बड़े विश्वाससे भेजा था ॥ १२९½ ॥
सोऽविषह्यं हि मां बुद्ध्वा स्वसैन्यं चावमर्दितम् ॥ १३० ॥ ब्रह्मणोऽस्त्रेण स तु मां प्रबद्ध्वा चातिवेगिनः । रज्जुभिश्चापि बध्नन्ति ततो मां तत्र राक्षसाः ॥ १३१ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रजित्ने देखा, मेरी सारी सेना कुचल डाली गयी, तब उसने समझ लिया कि इस वानरका सामना करना असम्भव है । अतः उसने बड़े वेगसे ब्रह्मास्त्र चलाकर मुझे बाँध लिया । फिर तो वहाँ राक्षसोंने मुझे रस्सियोंसे भी बाँधा ॥ १३०-१३१ ॥
रावणस्य समीपं च गृहीत्वा मामुपागमन् । दृष्ट्वा सम्भाषितश्चाहं रावणेन दुरात्मना ॥ १३२ ॥ पृष्ठश्च लङ्कागमनं राक्षसानां च तं वधम् । तत्सर्वं च रणे तत्र सीतार्थमुपजल्पितम् ॥ १३३॥
भावार्थ
‘इस तरह मुझे पकड़कर वे सब रावणके समीप ले आये । दुरात्मा रावणने मुझे देखकर वार्तालाप आरम्भ किया और पूछा—‘तू लङ्कामें क्यों आया ? तथा राक्षसोंका वध तूने क्यों किया ?’ मैंने वहाँ उत्तर दिया, ‘यह सब कुछ मैंने सीताजीके लिये किया है’ ॥ १३२-१३३ ॥
तस्यास्तु दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तस्त्वद्भवनं विभो । मारुतस्यौरसः पुत्रो वानरो हनुमानहम् ॥ १३४॥ रामदूतं च मां विद्धि सुग्रीवसचिवं कपिम् । सोऽहं दौत्येन रामस्य त्वत्सकाशमिहागतः ॥ १३५॥
भावार्थ
‘प्रभो ! जनकनन्दिनीके दर्शनकी इच्छासे ही मैं तुम्हारे महलमें आया हूँ । मैं वायुदेवताका औरस पुत्र हूँ, जातिका वानर हूँ और हनुमान् मेरा नाम है । मुझे श्रीरामचन्द्रजीका दूत और सुग्रीवका मन्त्री समझो । श्रीरामचन्द्रजीका दूत-कार्य करनेके लिये ही मैं यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ ॥ १३४-१३५ ॥
शृणु चापि समादेशं यदहं प्रब्रवीमि ते । राक्षसेश हरीशस्त्वां वाक्यमाह समाहितम् ॥ १३६॥
भावार्थ
‘तुम मेरे स्वामीका संदेश, जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो । राक्षसराज ! वानरराज सुग्रीवने तुमसे एकाग्रतापूर्वक जो बात कही है, उसपर ध्यान दो ॥ १३६ ॥
सुग्रीवश्च महाभागः स त्वां कौशलमब्रवीत् । धर्मार्थकामसहितं हितं पथ्यमुवाच ह ॥ १३७॥
भावार्थ
‘महाभाग सुग्रीवने तुम्हारी कुशल पूछी है और तुम्हें सुनानेके लिये यह धर्म, अर्थ एवं कामसे युक्त हितकर तथा लाभदायक बात कही है—॥ १३७ ॥
वसतो ऋष्यमूके मे पर्वते विपुलद्रुमे । राघवो रणविक्रान्तो मित्रत्वं समुपागतः ॥ १३८॥
भावार्थ
‘‘जब मैं बहुसंख्यक वृक्षोंसे हरे-भरे ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करता था, उन दिनों रणमें महान् पराक्रम प्रकट करनेवाले रघुनाथजीने मेरे साथ मित्रता स्थापित की थी ॥१३८॥
तेन मे कथितं राजन् भार्या मे रक्षसा हृता । तत्र साहाय्यहेतोर्मे समयं कर्तुमर्हसि ॥ १३९॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! उन्होंने मुझे बताया कि ‘राक्षस रावणने मेरी पत्नीको हर लिया है । उसके उद्धारके कार्यमें सहायता करनेके लिये तुम मेरे सामने प्रतिज्ञा करो’ ॥ १३९ ॥
वालिना हृतराज्येन सुग्रीवेण सह प्रभुः । चक्रेऽग्निसाक्षिकं सख्यं राघवः सहलक्ष्मणः ॥ १४०॥
भावार्थ
‘वालीने जिनका राज्य छीन लिया था, उन सुग्रीवके साथ ( अर्थात् मेरे साथ ) लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामने अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की है ॥ १४० ॥
तेन वालिनमाहत्य शरेणैकेन संयुगे । वानराणां महाराजः कृतः सम्प्लवतां प्रभुः ॥ १४१॥
भावार्थ
‘‘श्रीरघुनाथजीने युद्धस्थलमें एक ही बाणसे वालीको मारकर सुग्रीवको ( मुझको ) उछलने-कूदनेवाले वानरोंका महाराज बना दिया है ॥ १४१ ॥
तस्य साहाय्यमस्माभिः कार्यं सर्वात्मना त्विह । तेन प्रस्थापितस्तुभ्यं समीपमिह धर्मतः ॥ १४२॥
भावार्थ
‘‘अतः हमलोगोंको सम्पूर्ण हृदयसे उनकी सहायता करनी है । यही सोचकर सुग्रीवने धर्मानुसार मुझे तुम्हारे पास भेजा है ॥ १४२ ॥
क्षिप्रमानीयतां सीता दीयतां राघवस्य च । यावन्न हरयो वीरा विधमन्ति बलं तव ॥ १४३॥
भावार्थ
‘‘उनका कहना है कि तुम तुरंत सीताको ले आओ और जबतक वीर वानर तुम्हारी सेनाका संहार नहीं करते हैं तभीतक उन्हें श्रीरघुनाथजीको सौंप दो ॥ १४३ ॥
वानराणां प्रभावोऽयं न केन विदितः पुरा । देवतानां सकाशं च ये गच्छन्ति निमन्त्रिताः ॥ १४४॥
भावार्थ
‘‘कौन ऐसा वीर है जिसे वानरोंका यह प्रभाव पहलेसे ही ज्ञात नहीं है । ये वे ही वानर हैं, जो युद्धके लिये निमन्त्रित होकर देवताओंके पास भी उनकी सहायताके लिये जाते हैं’ ॥ १४४ ॥
इति वानरराजस्त्वामाहेत्यभिहितो मया । मामैक्षत ततो रुष्टश्चक्षुषा प्रदहन्निव ॥ १४५॥
भावार्थ
‘इस प्रकार वानरराज सुग्रीवने तुमसे संदेश कहा है । मेरे इतना कहते ही रावणने रुष्ट होकर मुझे इस तरह देखा, मानो अपनी दृष्टिसे मुझे दग्ध कर डालेगा ॥ १४५ ॥
तेन वध्योऽहमाज्ञप्तो रक्षसा रौद्रकर्मणा । मत्प्रभावमविज्ञाय रावणेन दुरात्मना ॥ १४६॥
भावार्थ
‘भयंकर कर्म करनेवाले दुरात्मा राक्षस रावणने मेरे प्रभावको न जानकर अपने सेवकोंको आज्ञा दे दी कि इस वानरका ( मेरा ) वध कर दिया जाय ॥ १४६ ॥
ततो विभीषणो नाम तस्य भ्राता महामतिः । तेन राक्षसराजश्च याचितो मम कारणात् ॥ १४७॥
भावार्थ
‘तब उसके परम बुद्धिमान् भाई विभीषणने मेरे लिये राक्षसराज रावणसे प्रार्थना करते हुए कहा—॥ १४७ ॥
नैवं राक्षसशार्दूल त्यज्यतामेष निश्चयः । राजशास्त्रव्यपेतो हि मार्गः संलक्ष्यते त्वया ॥ १४८॥
भावार्थ
‘‘राक्षसशिरोमणे ! ऐसा करना उचित नहीं है । आप अपने इस निश्चयको त्याग दीजिये । आपकी दृष्टि इस समय राजनीतिके विरुद्ध मार्गपर जा रही है ॥ १४८ ॥
दूतवध्या न दृष्टा हि राजशास्त्रेषु राक्षस । दूतेन वेदितव्यं च यथाभिहितवादिना ॥१४९॥
भावार्थ
‘राक्षसराज! राजनीति-सम्बन्धी शास्त्रोंमें कहीं भी दूतके वधका विधान नहीं है । दूत तो वही कहता है, जैसा कहनेके लिये उसे बताया गया होता है । उसका कर्तव्य है कि वह अपने स्वामीके अभिप्रायका ज्ञान करा दे ॥ १४९ ॥
सुमहत्यपराधेऽपि दूतस्यातुलविक्रम । विरूपकरणं दृष्टं न वधोऽस्ति हि शास्त्रतः ॥१५०॥
भावार्थ
‘अनुपम पराक्रमी वीर ! दूतका महान् अपराध होनेपर भी शास्त्रमें उसके वधका दण्ड नहीं देखा गया है। उसके किसी अङ्गको विकृत कर देनामात्र ही बताया गया है’ ॥१५०॥
विभीषणेनैवमुक्तो रावणः संदिदेश तान् । राक्षसानेतदेवाद्य लाङ्गूलं दह्यतामिति ॥१५१॥
भावार्थ
‘विभीषणके ऐसा कहनेपर रावणने उन राक्षसोंको आज्ञा दी—‘अच्छा तो आज इसकी यह पूँछ ही जला दो’ ॥१५१॥
ततस्तस्य वचः श्रुत्वा मम पुच्छं समन्ततः । वेष्टितं शणवल्कैश्च पट्टैः कार्पासकैस्तथा ॥१५२॥
भावार्थ
‘उसकी यह आज्ञा सुनकर राक्षसोंने मेरी पूँछमें सब ओरसे सुतरीकी रस्सियाँ तथा रेशमी और सूती कपड़े लपेट दिये ॥ १५२ ॥
राक्षसाः सिद्धसंनाहास्ततस्ते चण्डविक्रमाः । तदादीप्यन्त मे पुच्छं हनन्तः काष्ठमुष्टिभिः ॥१५३॥
भावार्थ
‘इस प्रकार बाँध देनेके पश्चात् उन प्रचण्ड पराक्रमी राक्षसोंने काठके डंडों और मुक्कोंसे मारते हुए मेरी पूँछमें आग लगा दी ॥ १५३ ॥
बद्धस्य बहुभिः पाशैर्यन्त्रितस्य च राक्षसैः । न मे पीडाभवत् काचिद् दिदृक्षोर्नगरीं दिवा ॥१५४॥
भावार्थ
‘मैं दिनमें लङ्कापुरीको अच्छी तरह देखना चाहता था, इसलिये राक्षसोंद्वारा बहुत-सी रस्सियोंसे बाँधे और कसे जानेपर भी मुझे कोई पीड़ा नहीं हुई ॥ १५४ ॥
ततस्ते राक्षसाः शूरा बद्धं मामग्निसंवृतम् । अघोषयन् राजमार्गे नगरद्वारमागताः ॥१५५॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् नगरद्वारपर आकर वे शूरवीर राक्षस पूँछमें लगी हुई आगसे घिरे और बँधे हुए मुझको सड़कपर घुमाते हुए सब ओर मेरे अपराधकी घोषणा करने लगे ॥ १५५ ॥
ततोऽहं सुमहद्रूपं संक्षिप्य पुनरात्मनः । विमोचयित्वा तं बन्धं प्रकृतिस्थः स्थितः पुनः ॥१५६॥
भावार्थ
‘इतनेहीमें अपने उस विशाल रूपको संकुचित करके मैंने अपने आपको उस बन्धनसे छुड़ा लिया और फिर स्वाभाविक रूपमें आकर मैं वहाँ खड़ा हो गया ॥ १५६ ॥
आयसं परिघं गृह्य तानि रक्षांस्यसूदयम् । ततस्तन्नगरद्वारं वेगेन प्लुतवानहम् ॥१५७॥
भावार्थ
‘फिर फाटकपर रक्खे हुए एक लोहेके परिघको उठाकर मैंने उन सब राक्षसोंको मार डाला । इसके बाद बड़े वेगसे कूदकर मैं उस नगरद्वारपर चढ़ गया ॥ १५७ ॥
पुच्छेन च प्रदीप्तेन तां पुरीं साट्टगोपुराम् । दहाम्यहमसम्भ्रान्तो युगान्ताग्निरिव प्रजाः ॥१५८॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् समस्त प्रजाको दग्ध करनेवाली प्रलयाग्निके समान मैं बिना किसी घबराहटके अट्टालिका और गोपुरसहित उस पुरीको अपनी जलती हुई पूँछकी आगसे जलाने लगा ॥ १५८ ॥
विनष्टा जानकी व्यक्तं न ह्यदग्धः प्रदृश्यते । लङ्कायाः कश्चिदुद्देशः सर्वा भस्मीकृता पुरी ॥१५९॥ दहता च मया लङ्कां दग्धा सीता न संशयः । रामस्य च महत्कार्यं मयेदं विफलीकृतम् ॥१६०॥
भावार्थ
‘फिर मैंने सोचा ‘लङ्काका कोई भी स्थान ऐसा नहीं दिखायी देता है, जो जला हुआ न हो, सारी नगरी जलकर भस्म हो गयी है । अतः अवश्य ही जानकीजी भी नष्ट हो गयी होंगी । इसमें संदेह नहीं कि लङ्काको जलाते-जलाते मैंने सीताजीको भी जला दिया और इस प्रकार भगवान् श्रीरामके इस महान् कार्यको मैंने निष्फल कर दिया’ ॥ १५९-१६० ॥
इति शोकसमाविष्टश्चिन्तामहमुपागतः । ततोऽहं वाचमश्रौषं चारणानां शुभाक्षराम् ॥१६१॥ जानकी न च दग्धेति विस्मयोदन्तभाषिणाम् ।
भावार्थ
‘इस तरह शोकाकुल होकर मैं बड़ी चिन्तामें पड़ गया । इतनेहीमें आश्चर्ययुक्त वृत्तान्तका वर्णन करनेवाले चारणोंकी शुभ अक्षरोंसे विभूषित यह वाणी मेरे कानोंमें पड़ी कि जानकीजी इस आगसे नहीं जली हैं ॥ १६१½ ॥
ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना श्रुत्वा तामद्भुतां गिरम् ॥१६२॥ अदग्धा जानकीत्येव निमित्तैश्चोपलक्षितम् । दीप्यमाने तु लाङ्गूले न मां दहति पावकः ॥१६३॥ हृदयं च प्रहृष्टं मे वाताः सुरभिगन्धिनः ।
भावार्थ
‘उस अद्भुत वाणीको सुनकर मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ—‘शुभ शकुनोंसे भी यही जान पड़ता है कि जानकीजी नहीं जली हैं; क्योंकि पूँछमें आग लग जानेपर भी अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं । मेरे हृदयमें महान् हर्ष भरा हुआ है और उत्तम सुगन्धसे युक्त मन्द-मन्द वायु चल रही है’ ॥ १६२ १६३½ ॥
तैर्निमित्तैश्च दृष्टार्थैः कारणैश्च महागुणैः ॥१६४॥ ऋषिवाक्यैश्च दृष्टार्थैरभवं हृष्टमानसः ।
भावार्थ
‘जिनके फलोंका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो चुका था, उन उत्तम शकुनों, महान् गुणशाली कारणों तथा ऋषियों ( चारणों ) की प्रत्यक्ष देखी हुई बातोंसे भी सीताजीके सकुशल होनेका विश्वास करके मेरा मन हर्षसे भर गया ॥ १६४½ ॥
पुनर्दृष्ट्वा च वैदेही विसृष्टश्च तया पुनः ॥१६५॥ ततः पर्वतमासाद्य तत्रारिष्टमहं पुनः । प्रतिप्लवनमारेभे युष्मद्दर्शनकाङ्क्षया ॥१६६॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् मैंने पुनः विदेहनन्दिनीका दर्शन किया और फिर उनसे विदा लेकर मैं अरिष्ट पर्वतपर आ गया । वहींसे आपलोगोंके दर्शनकी इच्छासे मैंने प्रतिप्लवन ( दुबारा आकाशमें उड़ना ) आरम्भ किया ॥ १६५-१६६ ॥
ततः श्वसनचन्द्रार्कसिद्धगन्धर्वसेवितम् । पन्थानमहमाक्रम्य भवतो दृष्टवानिह ॥१६७॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् वायु, चन्द्रमा, सूर्य, सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित मार्गका आश्रय ले यहाँ पहुँचकर मैंने आपलोगोंका दर्शन किया है ॥ १६७ ॥
राघवस्य प्रसादेन भवतां चैव तेजसा । सुग्रीवस्य च कार्यार्थं मया सर्वमनुष्ठितम् ॥१६८॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और आपलोगोंके प्रभावसे मैंने सुग्रीवके कार्यकी सिद्धिके लिये सब कुछ किया है ॥ १६८ ॥
एतत् सर्वं मया तत्र यथावदुपपादितम् । तत्र यन्न कृतं शेषं तत् सर्वं क्रियतामिति ॥१६९॥
भावार्थ
‘यह सारा कार्य मैंने वहाँ यथोचित रूपसे सम्पन्न किया है । जो कार्य नहीं किया है अथवा जो शेष रह गया है, वह सब आपलोग पूर्ण करें’ ॥ १६९ ॥
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