सुन्दरकाण्ड, सर्ग 60
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वालिसूनुरभाषत। अश्विपुत्रौ महावेगौ बलवन्तौ प्लवंगमौ ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीकी यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गदने कहा—‘अश्विनीकुमारके पुत्र ये मैन्द और द्विविद दोनों वानर अत्यन्त वेगशाली और बलवान् हैं ॥ १ ॥
पितामहवरोत्सेकात् परमं दर्पमाश्रितौ। अश्विनोर्माननार्थं हि सर्वलोकपितामहः ॥ २ ॥ सर्वावध्यत्वमतुलमनयोर्दत्तवान् पुरा । वरोत्सेकेन मत्तौ च प्रमथ्य महतीं चमूम् ॥ ३ ॥ सुराणाममृतं वीरौ पीतवन्तौ महाबलौ।
भावार्थ
‘पूर्वकालमें ब्रह्माजीका वर मिलनेसे इनका अभिमान बढ़ गया और ये बड़े घमंडमें भर गये थे। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने अश्विनीकुमारोंका मान रखनेके लिये पहले इन दोनोंको यह अनुपम वरदान दिया था कि तुम्हें कोई भी मार नहीं सकता। उस वरके अभिमानसे मत्त हो इन दोनों महाबली वीरोंने देवताओंकी विशाल सेनाको मथकर अमृत पी लिया था ॥ २-३½ ॥
पतावेव हि संकुद्धौ सवाजिरथकुञ्जरम् ॥ ४ ॥ लङ्कां नाशयितुं शक्तौ सर्वे तिष्ठन्तु वानराः।
भावार्थ
‘ये ही दोनों यदि क्रोधमें भर जायँ तो हाथी, घोड़े और रथोंसहित समूची लङ्काका नाश कर सकते हैं। भले ही और सब वानर बैठे रहें ॥ ४½ ॥
अहमेकोऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम् ॥ ५ ॥ तां लङ्कां तरसा हन्तुं रावणं च महाबलम्। किं पुनः सहितो वीरैर्बलवद्भिः कृतात्मभिः ॥ ६ ॥ कृतास्त्रैः प्लवगैः शक्तैर्भवद्भिर्विजयैषिभिः।
भावार्थ
‘मैं अकेला भी राक्षसगणोंसहित समस्त लङ्कापुरीका वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावणको मार डालनेके लिये पर्याप्त हूँ। फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रोंको जाननेवाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरोंकी सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है ? ॥ ५-६½ ॥
वायुसूनोर्बलेनैव दग्धा लङ्केति नः श्रुतम् ॥ ७ ॥ दृष्ट्वा देवी न चानीता इति तत्र निवेदितुम्। न युक्तमिव पश्यामि भवद्भिः ख्यातपौरुषैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वायुपुत्र हनुमान्जीने अकेले जाकर अपने पराक्रमसे ही लङ्काको फूँक डाला—यह बात हम सब लोगोंने सुन ही ली। आप-जैसे ख्यातनामा पुरुषार्थी वीरोंके रहते हुए मुझे भगवान् श्रीरामके सामने यह निवेदन करना उचित नहीं जान पड़ता कि ‘हमने सीतादेवीका दर्शन तो किया, किंतु उन्हें ला नहीं सके’ ॥ ७-८ ॥
नहि वः प्लवने कश्चिन्नापि कश्चित् पराक्रमे। तुल्यः सामरदैत्येषु लोकेषु हरिसत्तमाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणियो ! देवताओं और दैत्योंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो दूरतककी छलाँग मारने और पराक्रम दिखानेमें आपलोगोंकी समानता कर सके ॥ ९ ॥
जित्वा लङ्कां सरक्षौघां हत्वा तं रावणं रणे। सीतामादाय गच्छामः सिद्धार्था हृष्टमानसाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘अतः निशाचरसमुदायसहित लङ्काको जीतकर, युद्धमें रावणका वध करके, सीताको साथ ले, सफलमनोरथ एवं प्रसन्नचित्त होकर हमलोग श्रीरामचन्द्रजीके पास चलें ॥१०॥
तेष्वेवं हतवीरेषु राक्षसेषु हनूमता। किमन्यदत्र कर्तव्यं गृहीत्वा याम जानकीम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जब हनुमान्जीने राक्षसोंके प्रमुख वीरोंको मार डाला है, ऐसी परिस्थितिमें हमारा इसके सिवा और क्या कर्तव्य हो सकता है कि हम जनकनन्दिनी सीताको साथ लेकर ही चलें ॥ ११ ॥
रामलक्ष्मणयोर्मध्ये न्यस्याम जनकात्मजाम्। किं व्यलीकैस्तु तान् सर्वान् वानरान् वानरर्षभान् ॥ वयमेव हि गत्वा तान् हत्वा राक्षसपुङ्गवान्। राघवं द्रष्टुमर्हामः सुग्रीवं सहलक्ष्मणम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘कपिवरो ! हम जनककिशोरीको ले चलकर श्रीराम और लक्ष्मणके बीचमें खड़ी कर दें। किष्किन्धामें जुटे हुए उन सब वानरोंको कष्ट देनेकी क्या आवश्यकता है। हमलोग ही लङ्कामें चलकर वहाँके मुख्य-मुख्य राक्षसोंका वध कर डालें, उसके बाद लौटकर श्रीराम, लक्ष्मण तथा सुग्रीवका दर्शन करें’ ॥ १२-१३ ॥
तमेवं कृतसंकल्पं जाम्बवान् हरिसत्तमः। उवाच परमप्रीतो वाक्यमर्थवदर्थवित् ॥ १४ ॥
भावार्थ
अङ्गदका ऐसा संकल्प जानकर वानर-भालुओंमें श्रेष्ठ और अर्थतत्त्वके ज्ञाता जाम्बवान्ने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह सार्थक बात कही—॥ १४ ॥
नैषा बुद्धिर्महाबुद्धे यद् ब्रवीषि महाकपे। विचेतुं वयमाज्ञप्ता दक्षिणां दिशमुत्तमाम् ॥ १५ ॥ नानेतुं कपिराजेन नैव रामेण धीमता।
भावार्थ
‘महाकपे ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो तथापि इस समय जो कुछ कह रहे हो, यह बुद्धिमानीकी बात नहीं है; क्योंकि वानरराज सुग्रीव तथा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने हमें उत्तम दक्षिण दिशामें केवल सीताको खोजनेकी आज्ञा दी है, साथ ले आनेकी नहीं ॥ १५½ ॥
कथंचिन्निर्जितां सीतामस्माभिर्नाभिरोचयेत् ॥ १६ ॥ राघवो नृपशार्दूलः कुलं व्यपदिशन् स्वकम्।
भावार्थ
‘यदि हमलोग किसी तरह सीताको जीतकर उनके पास ले भी चलें तो नृपश्रेष्ठ श्रीराम अपने कुलके व्यवहारका स्मरण करते हुए हमारे इस कार्यको पसंद नहीं करेंगे ॥ १६½ ॥
प्रतिज्ञाय स्वयं राजा सीताविजयमग्रतः ॥ १७ ॥ सर्वेषां कपिमुख्यानां कथं मिथ्या करिष्यति।
भावार्थ
‘राजा श्रीरामने सभी प्रमुख वानरवीरोंके सामने स्वयं ही सीताको जीतकर लानेकी प्रतिज्ञा की है, उसे वे मिथ्या कैसे करेंगे ? ॥ १७½ ॥
विफलं कर्म च कृतं भवेत् तुष्टिर्न तस्य च ॥ १८ ॥ वृथा च दर्शितं वीर्यं भवेद् वानरपुङ्गवाः।
भावार्थ
‘अतः वानरशिरोमणियो ! ऐसी अवस्थामें हमारा किया-कराया कार्य निष्फल हो जायगा। भगवान् श्रीरामको संतोष भी नहीं होगा और हमारा पराक्रम दिखाना भी व्यर्थ सिद्ध होगा ॥ १८½ ॥
तस्माद् गच्छाम वै सर्वे यत्र रामः सलक्ष्मणः। सुग्रीवश्च महातेजाः कार्यस्यास्य निवेदने ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इसलिये हम सब लोग इस कार्यकी सूचना देनेके लिये वहीं चलें, जहाँ लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीराम और महातेजस्वी सुग्रीव विद्यमान हैं ॥ १९ ॥
न तावदेषा मतिरक्षमा नो यथा भवान् पश्यति राजपुत्र। यथा तु रामस्य मतिर्निविष्टा तथा भवान् पश्यतु कार्यसिद्धिम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! तुम जैसा देखते या सोचते हो, यह विचार हमलोगोंके योग्य ही है—हम इसे न कर सकें, ऐसी बात नहीं है; तथापि इस विषयमें भगवान् श्रीरामका जैसा निश्चय हो, उसीके अनुसार तुम्हें कार्यसिद्धिपर दृष्टि रखनी चाहिये’ ॥ २० ॥
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