सुन्दरकाण्ड, सर्ग 47
सेनापतीन् पञ्च स तु प्रमापितान् हनूमता सानुचरान् सवाहनान् । निशम्य राजा समरोद्धतोन्मुखं कुमारमक्षं प्रसमैक्षताक्षम् ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके द्वारा अपने पाँच सेनापतियोंको सेवकों और वाहनोंसहित मारा गया सुनकर राजा रावणने अपने सामने बैठे हुए पुत्र अक्षकुमारकी ओर देखा, जो युद्धमें उद्धत और उसके लिये उत्कण्ठित रहनेवाला था ॥ १ ॥
स तस्य दृष्ट्यर्पणसम्प्रचोदितः प्रतापवान् काञ्चनचित्रकार्मुकः । समुत्पपाताथ सदस्युदीरितो द्विजातिमुख्यैर्हविषेव पावकः ॥ २ ॥
भावार्थ
पिताके दृष्टिपात मात्रसे प्रेरित हो वह प्रतापी वीर युद्धके लिये उत्साहपूर्वक उठा । उसका धनुष सुवर्णजटित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करता था । जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञशालामें हविष्यकी आहुति देनेपर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभामें उठकर खड़ा हो गया ॥ २ ॥
ततो महान् बालदिवाकरप्रभं प्रतप्तजाम्बूनदजालसंततम् । रथं समास्थाय ययौ स वीर्यवान् महाहरिं तं प्रति नैर्ऋतर्षभः ॥ ३ ॥
भावार्थ
वह महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि अक्ष प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिमान् तथा तपाये हुए सुवर्णके जालसे आच्छादित रथपर आरूढ़ हो उन महाकपि हनुमान्जीके पास चल दिया ॥ ३ ॥
ततस्तपःसंग्रहसंचयार्जितं प्रतप्तजाम्बूनदजालचित्रितम् । पताकिनं रत्नविभूषितध्वजं मनोजवाष्टाश्ववरैः सुयोजितम् ॥ ४ ॥ सुरासुराधृष्यमसङ्गचारिणं तडित्प्रभं व्योमचरं समाहितम् । सतूणमष्टासिनिबद्धबन्धुरं यथाक्रमावेशितशक्तितोमरम् ॥ ५ ॥ विराजमानं प्रतिपूर्णवस्तुना सहेमदाम्ना शशिसूर्यवर्चसा । दिवाकराभं रथमास्थितस्ततः स निर्जगामामरतुल्यविक्रमः ॥ ६ ॥
भावार्थ
वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओंके संग्रहसे प्राप्त हुआ था । उसमें तपे हुए जाम्बूनद ( सुवर्ण ) की जाली जड़ी हुई थी । पताका फहरा रही थी । उसका ध्वजदण्ड रत्नोंसे विभूषित था । उसमें मनके समान वेगवाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे । देवता और असुर कोई भी उस रथको नष्ट नहीं कर सकते थे । उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी । वह बिजलीके समान प्रकाशित होता और आकाशमें भी चलता था । उस रथको सब सामग्रियों-से सुसज्जित किया गया था । उसमें तरकस रक्खे गये थे । आठ तलवारोंके बँधे रहनेसे वह और भी सुन्दर दिखायी देता था । उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रमसे रक्खे गये थे । चन्द्रमा और सूर्यके समान दीप्तिमान् तथा सोनेकी रस्सीसे युक्त युद्धके समस्त उपकरणोंसे सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर बैठकर देवताओंके तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहलसे बाहर निकला॥४–६॥
स पूरयन् खंच महीं च साचलां तुरङ्गमातङ्गमहारथस्वनैः । बलैः समेतैः सहतोरणस्थितं समर्थमासीनमुपागमत् कपिम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
घोड़े, हाथी और बड़े-बड़े रथोंकी भयंकर आवाजसे पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा आकाशको गुँजाता हुआ वह बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिकाके द्वारपर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमान्जीके पास जा पहुँचा ॥ ७ ॥
स तं समासाद्य हरिं हरीक्षणो युगान्तकालाग्निमिव प्रजाक्षये । अवस्थितं विस्मितजातसम्भ्रमं समैक्षताक्षो बहुमानचक्षुषा ॥ ८ ॥
भावार्थ
सिंहके समान भयंकर नेत्रवाले अक्षने वहाँ पहुँचकर लोकसंहारके समय प्रज्वलित हुई प्रलयाग्निके समान स्थित और विस्मय एवं सम्भ्रममें पड़े हुए हनुमान्जीको अत्यन्त गर्वभरी दृष्टिसे देखा ॥ ८ ॥
स तस्य वेगं च कपेर्महात्मनः पराक्रमं चारिषु रावणात्मजः । विचारयन् स्वं च बलं महाबलो युगक्षये सूर्य इवाभिवर्धत ॥ ९ ॥
भावार्थ
उन महात्मा कपिश्रेष्ठके वेग तथा शत्रुओंके प्रति उनके पराक्रमका और अपने बलका भी विचार करके वह महाबली रावणकुमार प्रलयकालके सूर्यकी भाँति बढ़ने लगा ॥ ९ ॥
स जातमन्युः प्रसमीक्ष्य विक्रमं स्थितः स्थिरः संयति दुर्निवारणम् । समाहितात्मा हनुमन्तमाहवे प्रचोदयामास शितैः शरैस्त्रिभिः ॥ १० ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके पराक्रमपर दृष्टिपात करके उसे क्रोध आ गया । अतः स्थिरतापूर्वक स्थित हो उसने एकाग्रचित्तसे तीन तीखे बाणोंद्वारा रणदुर्जय हनुमान्जीको युद्धके लिये प्रेरित किया ॥ १० ॥
ततः कपिं तं प्रसमीक्ष्य गर्वितं जितश्रमं शत्रुपराजयोचितम् । अवैक्षताक्षः समुदीर्णमानसं सबाणपाणिः प्रगृहीतकार्मुकः ॥ ११ ॥
भावार्थ
तदनन्तर हाथमें धनुष और बाण लिये अक्षने यह जानकर कि ‘ये खेद या थकावटको जीत चुके हैं, शत्रुओंको पराजित करनेकी योग्यता रखते हैं और युद्धके लिये इनके मनका उत्साह बढ़ा हुआ है; इसीलिये ये गर्वीले दिखायी देते हैं’ उनकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ११ ॥
स हेमनिष्काङ्गदचारुकुण्डलः समाससादाशुपराक्रमः कपिम् । तयोर्बभूवाप्रतिमः समागमः सुरासुराणामपि सम्भ्रमप्रदः ॥ १२ ॥
भावार्थ
गलेमें सुवर्णके निष्क ( पदक ), बाँहोंमें बाजूबंद और कानोंमें मनोहर कुण्डल धारण किये वह शीघ्रपराक्रमी रावणकुमार हनुमान्जीके पास आया । उस समय उन दोनों वीरोंमें जो टक्कर हुई, उसकी कहीं तुलना नहीं थी । उनका युद्ध देवताओं और असुरोंके मनमें भी घबराहट पैदा कर देनेवाला था ॥ १२ ॥
ररास भूमिर्न तताप भानुमान् ववौ न वायुः प्रचचाल चाचलः। कपेः कुमारस्य च वीर्यसंयुगं ननाद च द्यौरुदधिश्च चुक्षुभे ॥ १३ ॥
भावार्थ
कपिश्रेष्ठ हनुमान् और अक्षकुमारका वह संग्राम देखकर भूतलके सारे प्राणी चीख उठे । सूर्यका ताप कम हो गया । वायुकी गति रुक गयी । पर्वत हिलने लगे । आकाशमें भयंकर शब्द होने लगा और समुद्रमें तूफान आ गया ॥१३॥
स तस्य वीरः सुमुखान् पतत्रिणः सुवर्णपुङ्खान् सविषानिवोरगान् । समाधिसंयोगविमोक्षतत्त्ववि- च्छरानथ त्रीन् कपिमूर्ध्न्यताडयत्॥१४॥
भावार्थ
अक्षकुमार निशाना साधने, बाणको धनुषपर चढ़ाने और उसे लक्ष्यकी ओर छोड़नेमें बड़ा प्रवीण था । उस वीरने विषधर सर्पोंके समान भयंकर, सुवर्णमय पंखोंसे युक्त, सुन्दर अग्रभागवाले तथा पत्रयुक्त तीन बाण हनुमान्जीके मस्तकमें मारे ॥ १४ ॥
स तैः शरैर्मूर्ध्नि समं निपातितैः क्षरन्नसृग्दिग्धविवृत्तनेत्रः । नवोदितादित्यनिभः शरांशुमान् व्यराजतादित्य इवांशुमालिकः ॥ १५ ॥
भावार्थ
उन तीनोंकी चोट हनुमान्जीके माथेमें एक साथ ही लगी, इससे खूनकी धारा गिरने लगी । वे उस रक्तसे नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं । उस समय बाणरूपी किरणोंसे युक्त हो वे तुरंतके उगे हुए अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पाने लगे ॥ १५ ॥
ततः प्लवङ्गाधिपमन्त्रिसत्तमः समीक्ष्य तं राजवरात्मजं रणे । उदग्रचित्रायुधचित्रकार्मुकं जहर्ष चापूर्यत चाहवोन्मुखः ॥ १६ ॥ स मन्दराग्रस्थ इवांशुमाली विवृद्धकोपो बलवीर्यसंवृतः । कुमारमक्षं सबलं सवाहनं ददाह नेत्राग्निमरीचिभिस्तदा ॥ १७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वानरराजके श्रेष्ठ मन्त्री हनुमान्जी राक्षसराज रावणके राजकुमार अक्षको अति उत्तम विचित्र आयुध एवं अद्भुत धनुष धारण किये देख हर्ष और उत्साहसे भर गये और युद्धके लिये उत्कण्ठित हो अपने शरीरको बढ़ाने लगे ॥ हनुमान्जीका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था । वे बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे, अतः मन्दराचलके शिखरपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवके समान वे अपनी नेत्राग्निमयी किरणोंसे उस समय सेना और सवारियोंसहित राजकुमार अक्षको दग्ध-सा करने लगे ॥ १७ ॥
ततः स बाणासनशक्रकार्मुकः शरप्रवर्षो युधि राक्षसाम्बुदः । शरान् मुमोचाशु हरीश्वराचले बलाहको वृष्टिमिवाचलोत्तमे ॥ १८ ॥
भावार्थ
तब जैसे बादल श्रेष्ठ पर्वतपर जल बरसाता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें अपने शरासनरूपी इन्द्र-धनुषसे युक्त वह राक्षसरूपी मेघ बाणवर्षी होकर कपिश्रेष्ठ हनुमानरूपी पर्वतपर बड़े वेगसे बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १८ ॥
कपिस्ततस्तं रणचण्डविक्रमं प्रवृद्धतेजोबलवीर्यसायकम् । कुमारमक्षं प्रसमीक्ष्य संयुगे ननाद हर्षाद् घनतुल्यनिःस्वनः ॥ १९ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें अक्षकुमारका पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखायी देता था । उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े-चढ़े थे । युद्धस्थलमें उसकी ओर दृष्टिपात करके हनुमान्जीने हर्षे और उत्साहमें भरकर मेघके समान भयानक गर्जना की ॥ १९ ॥
स बालभावाद् युधि वीर्यदर्पितः प्रवृद्धमन्युः क्षतजोपमेक्षणः । समाससादाप्रतिमं रणे कपिं गजो महाकूपमिवावृतं तृणैः ॥ २० ॥
भावार्थ
समराङ्गणमें बलके घमंडमें भरे हुए अक्षकुमारको उनकी गर्जना सुनकर बड़ा क्रोध हुआ । उसकी आँखें रक्तके समान लाल हो गयीं । वह अपने बालोचित अज्ञानके कारण अनुपम पराक्रमी हनुमान्जीका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा । ठीक उसी तरह, जैसे कोई हाथी तिनकोंसे ढके हुए विशाल कूपकी ओर अग्रसर होता है ॥ २० ॥
स तेन बाणैः प्रसभं निपातितै- श्चकार नादं घननादनिःस्वनः । समुत्सहेनाशु नभः समारुजन् भुजोरुविक्षेपणघोरदर्शनः ॥ २१ ॥
भावार्थ
उसके बलपूर्वक चलाये हुए बाणोंसे विद्ध होकर हनुमान्जीने तुरंत ही उत्साहपूर्वक आकाशको विदीर्ण करते हुए-से मेघके समान गम्भीर स्वरसे भीषण गर्जना की । उस समय दोनों भुजाओं और जाँघोंको चलानेके कारण वे बड़े भयंकर दिखायी देते थे ॥ २१ ॥
तमुत्पतन्तं समभिद्रवद् बली स राक्षसानां प्रवरः प्रतापवान् । रथी रथश्रेष्ठतरः किरञ्छरैः पयोधरः शैलमिवाश्मवृष्टिभिः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उन्हें आकाशमें उछलते देख रथियोंमें श्रेष्ठ और रथपर चढ़े हुए उस बलवान्, प्रतापी एवं राक्षसशिरोमणि वीरने बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ किसी पर्वतपर ओले और पत्थरोंकी वर्षा कर रहा हो ॥ २२ ॥
स ताञ्छरांस्तस्य हरिर्विमोक्षयं- श्चचार वीरः पथि वायुसेविते । शरान्तरे मारुतवद् विनिष्पतन् मनोजवः संयति भीमविक्रमः ॥ २३ ॥
भावार्थ
उस युद्धस्थलमें मनके समान वेगवाले वीर हनुमान्जी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे । वे अक्षकुमारके उन बाणोंको व्यर्थ करते हुए वायुके पथपर विचरते और दो बाणोंके बीचसे हवाकी भाँति निकल जाते थे ॥ २३ ॥
तमात्तबाणासनमाहवोन्मुखं खमास्तृणन्तं विविधैः शरोत्तमैः । अवेक्षताक्षं बहुमानचक्षुषा जगाम चिन्तां स च मारुतात्मजः ॥ २४ ॥
भावार्थ
अक्षकुमार हाथमें धनुष लिये युद्धके लिये उन्मुख हो नाना प्रकारके उत्तम बाणोंद्वारा आकाशको आच्छादित किये देता था । पवनकुमार हनुमान्ने उसे बड़े आदरकी दृष्टिसे देखा और वे मन-ही-मन कुछ सोचने लगे ॥ २४ ॥
ततः शरैर्भिन्नभुजान्तरः कपिः कुमारवर्येण महात्मना नदन् । महाभुजः कर्मविशेषतत्त्वविद् विचिन्तयामास रणे पराक्रमम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें महामना वीर अक्षकुमारने अपने बाणोंद्वारा कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग—छातीमें गहरा आघात किया । वे महाबाहु वानरवीर समयोचित कर्तव्यविशेषको ठीक-ठीक जानते थे; अतः वे रणक्षेत्रमें उस चोटको सहकर सिंहनाद करते हुए उसके पराक्रमके विषयमें इस प्रकार विचार करने लगे—॥ २५ ॥
अबालवद् बालदिवाकरप्रभः करोत्ययं कर्म महन्महाबलः । न चास्य सर्वाहवकर्मशालिनः प्रमापणे मे मतिरत्र जायते ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्यके समान तेजस्वी है और बालक होकर भी बड़ोंके समान महान् कर्म कर रहा है । युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मोंमें कुशल होनेके कारण अद्भुत शोभा पानेवाले इस वीरको यहाँ मार डालनेकी मेरी इच्छा नहीं हो रही है ॥ २६ ॥
अयं महात्मा च महांश्च वीर्यतः समाहितश्चातिसहश्च संयुगे । असंशयं कर्मगुणोदयादयं सनागयक्षैर्मुनिभिश्च पूजितः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘यह महामनस्वी राक्षसकुमार बल-पराक्रमकी दृष्टिसे महान् है । युद्धमें सावधान एवं एकाग्रचित्त है तथा शत्रुके वेगको सहन करनेमें अत्यन्त समर्थ है । अपने कर्म और गुणोंकी उत्कृष्टताके कारण यह नागों, यक्षों और मुनियोंके द्वारा भी प्रशंसित हुआ होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २७ ॥
पराक्रमोत्साहविवृद्धमानसः समीक्षते मां प्रमुखोऽग्रतः स्थितः । पराक्रमो ह्यस्य मनांसि कम्पयेत् सुरासुराणामपि शीघ्रकारिणः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘पराक्रम और उत्साहसे इसका मन बढ़ा हुआ है । यह युद्धके मुहानेपर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है । शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेवाले इस वीरका पराक्रम देवताओं और असुरोंके हृदयको भी कम्पित कर सकता है ॥ २८ ॥
न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षितः पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते । प्रमापणं ह्यस्य ममाद्य रोचते न वर्धमानोऽग्निरुपेक्षितुं क्षमः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘किंतु यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह मुझे परास्त किये बिना नहीं रहेगा; क्योंकि संग्राममें इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है । अतः अब इसे मार डालना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है । बढ़ती हुई आगकी उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है’ ॥ २९ ॥
इति प्रवेगं तु परस्य तर्कयन् स्वकर्मयोगं च विधाय वीर्यवान् । चकार वेगं तु महाबलस्तदा मतिं च चक्रेऽस्य वधे तदानीम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
इस प्रकार शत्रुके वेगका विचार कर उसके प्रतीकारके लिये अपने कर्तव्यका निश्चय करके महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हनुमान्जीने उस समय अपना वेग बढ़ाया और उस शत्रुको मार डालनेका विचार किया ॥ ३० ॥
स तस्य तानष्ट वरान् महाहयान् समाहितान् भारसहान् विवर्तने । जघान वीरः पथि वायुसेविते तलप्रहारैः पवनात्मजः कपिः ॥ ३१ ॥ ततस्तलेनाभिहतो महारथः स तस्य पिङ्गाधिपमन्त्रिनिर्जितः । स भग्ननीडः परिवृत्तकूबरः पपात भूमौ हतवाजिरम्बरात् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् आकाशमें विचरते हुए वीर वानर पवनकुमारने थप्पड़ोंकी मारसे अक्षकुमारके उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ोंको, जो भार सहन करनेमें समर्थ और नाना प्रकारके पैंतरे बदलनेकी कलामें सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया ॥ तदनन्तर वानरराज सुग्रीवके मन्त्री हनुमान्जीने अक्षकुमारके उस विशाल रथको भी अभिभूत कर दिया, उन्होंने हाथसे ही पीटकर रथकी बैठक तोड़ डाली और उसके हरसे-को उलट दिया । घोड़े तो पहले ही मर चुके थे, अतः वह महान् रथ आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३२ ॥
स तं परित्यज्य महारथो रथं सकार्मुकः खड्गधरः खमुत्पतन् । ततोऽभियोगादृषिरुग्रवीर्यवान् विहाय देहं मरुतामिवालयम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले रथ छोड़कर अन्तरिक्षमें ही उड़ने लगा । ठीक वैसे ही, जैसे कोई उग्रशक्तिसे सम्पन्न महर्षि योगमार्गसे शरीर त्यागकर स्वर्गलोककी ओर चला जा रहा हो ॥ ३३ ॥
कपिस्ततस्तं विचरन्तमम्बरे पतत्त्रिराजानिलसिद्धसेविते । समेत्य तं मारुतवेगविक्रमः क्रमेण जग्राह च पादयोर्दृढम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
तब वायुके समान वेग और पराक्रमवाले कपिवर हनुमान्जीने पक्षिराज गरुड़, वायु तथा सिद्धोंसे सेवित व्योम-मार्गमें विचरते हुए उस राक्षसके पास पहुँचकर क्रमशः उसके दोनों पैर दृढ़तापूर्वक पकड़ लिये ॥ ३४ ॥
स तं समाविध्य सहस्रशः कपि- र्महोरगं गृह्य इवाण्डजेश्वरः । मुमोच वेगात् पितृतुल्यविक्रमो महीतले संयति वानरोत्तमः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
फिर तो अपने पिता वायु देवताके तुल्य पराक्रमी वानरशिरोमणि हनुमान्ने जिस प्रकार गरुड़ बड़े-बड़े सर्पोंको घुमाते हैं, उसी तरह उसे हजारों बार घुमाकर बड़े वेगसे उस युद्धभूमिमें पटक दिया ॥ ३५ ॥
स भग्नबाहूरुकटीपयोधरः क्षरन्नसृङ्निर्मथितास्थिलोचनः । सभिन्नसंधिः प्रविकीर्णबन्धनो हतः क्षितौ वायुसुतेन राक्षसः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
नीचे गिरते ही उसकी भुजा, जाँघ, कमर और छातीके टुकड़े-टुकड़े हो गये, खूनकी धारा बहने लगी, शरीरकी हड्डियाँ चूर-चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल आयीं, अस्थियोंके जोड़ टूट गये और नस-नाड़ियोंके बन्धन शिथिल हो गये । इस तरह वह राक्षस पवनकुमार हनुमान्जीके हाथसे मारा गया ॥ ३६ ॥
महाकपिर्भूमितले निपीड्य तं चकार रक्षोऽधिपतेर्महद्भयम् । महर्षिभिश्चक्रचरैः समागतैः समेत्य भूतैश्च सयक्षपन्नगैः । सुरैश्च सेन्द्रैर्भृशजातविस्मयै- र्हते कुमारे स कपिर्निरीक्षितः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
अक्षकुमारको पृथ्वीपर पटककर महाकपि हनुमान्जीने राक्षसराज रावणके हृदयमें बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया । उसके मारे जानेपर नक्षत्र-मण्डलमें विचरनेवाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओंने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मयके साथ हनुमान्जीका दर्शन किया ॥ ३७ ॥
निहत्य तं वज्रिसुतोपमं रणे कुमारमक्षं क्षतजोपमेक्षणम् । तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणं कृतक्षणः काल इव प्रजाक्षये ॥ ३८ ॥
भावार्थ
युद्धमें इन्द्रपुत्र जयन्तके समान पराक्रमी और लाल-लाल आँखोंवाले अक्षकुमारका काम तमाम करके वीरवर हनुमान्जी प्रजाके संहारके लिये उद्यत हुए कालकी भाँति पुनः युद्धकी प्रतीक्षा करते हुए वाटिकाके उसी द्वारपर जा पहुँचे ॥ ३८ ॥
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