सुन्दरकाण्ड, सर्ग 48
ततस्तु रक्षोऽधिपतिर्महात्मा हनूमताक्षे निहते कुमारे । मनः समाधाय स देवकल्पं समादिदेशेन्द्रजितं सरोषः ॥ १ ॥ त्वमस्त्रविच्छस्त्रभृतां वरिष्ठः सुरासुराणामपि शोकदाता । सुरेषु सेन्द्रेषु च दृष्टकर्मा पितामहाराधनसंचिताखः ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर हनुमान्जीके द्वारा अक्षकुमारके मारे जानेपर राक्षसोंका स्वामी महाकाय रावण अपने मनको किसी तरह सुस्थिर करके रोषसे जल उठा और देवताओंके तुल्य पराक्रमी कुमार इन्द्रजित् ( मेघनाद ) को इस प्रकार आज्ञा दी—॥ ‘बेटा ! तुमने ब्रह्माजीकी आराधना करके अनेक प्रकारके अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त किया है । तुम अस्त्रवेत्ता, शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा देवताओं और असुरोंको भी शोक प्रदान करनेवाले हो । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके समुदायमें तुम्हारा पराक्रम देखा गया है । २ ॥
त्वदस्त्रबलमासाद्य ससुराः समरुद्गणाः । न शेकुः समरे स्थातुं सुरेश्वरसमाश्रिताः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रके आश्रयमें रहनेवाले देवता और मरुद्गण भी समरभूमिमें तुम्हारे अस्त्र-बलका सामना होनेपर टिक नहीं सके हैं ॥ ३ ॥
न कश्चित् त्रिषु लोकेषु संयुगेन गतश्रमः । भुजवीर्याभिगुप्तश्च तपसा चाभिरक्षितः । देशकालप्रधानश्च त्वमेव मतिसत्तमः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो युद्धसे थकता न हो । तुम अपने बाहुबलसे तो सुरक्षित हो ही, तपस्याके बलसे भी पूर्णतः निरापद हो । देश-कालका ज्ञान रखनेवालोंमें प्रधान और बुद्धिकी दृष्टिसे भी सर्वश्रेष्ठ तुम्हीं हो ॥ ४ ॥
न तेऽस्त्यशक्यं समरेषु कर्मणां न तेऽस्त्यकार्यं मतिपूर्वमन्त्रणे । न सोऽस्ति कश्चित् त्रिषु संग्रहेषु न वेद यस्तेऽस्त्रबलं बलं च ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें तुम्हारे वीरोचित कर्मोंके द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है । शास्त्रानुकूल बुद्धिपूर्वक राजकार्यका विचार करते समय तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है । तुम्हारा कोई भी विचार ऐसा नहीं होता, जो कार्यका साधक न हो । त्रिलोकीमें एक भी ऐसा वीर नहीं है, जो तुम्हारी शारीरिक शक्ति और अस्त्र-बलको न जानता हो ॥ ५ ॥
ममानुरूपं तपसो बलं च ते पराक्रमश्चास्त्रबलं च संयुगे । न त्वां समासाद्य रणावमर्दे मनःश्रमं गच्छति निश्चितार्थम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारा तपोबल, युद्धविषयक पराक्रम और अस्त्र-बल मेरे ही समान है । युद्धस्थलमें तुमको पाकर मेरा मन कभी खेद या विषादको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि इसे यह निश्चित विश्वास रहता है कि विजय तुम्हारे पक्षमें होगी ॥६॥
निहताः किंकराः सर्वे जम्बुमाली च राक्षसः । अमात्यपुत्रा वीराश्च पञ्च सेनाग्रगामिनः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘देखो, किंकर नामवाले समस्त राक्षस मार डाले गये । जम्बुमाली नामका राक्षस भी जीवित न रह सका, मन्त्रीके सातों वीर पुत्र तथा मेरे पाँच सेनापति भी कालके गालमें चले गये ॥ ७ ॥
बलानि सुसमृद्धानि साश्वनागरथानि च । सहोदरस्ते दयितः कुमारोऽक्षश्च सूदितः । न तु तेष्वेव मे सारो यस्त्वय्यरिनिषूदन ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘उनके साथ ही हाथी, घोड़े और रथोंसहित मेरी बहुत-सी बल-वीर्यसे सम्पन्न सेनाएँ भी नष्ट हो गयीं और तुम्हारा प्रिय बन्धु कुमार अक्ष भी मार डाला गया । शत्रुसूदन ! मुझमें जो तीनों लोकोंपर विजय पानेकी शक्ति है, वह तुम्हींमें है । पहले जो लोग मारे गये हैं, उनमें वह शक्ति नहीं थी ( इसलिये तुम्हारी विजय निश्चित है ) ॥८॥
इदं च दृष्ट्वा निहतं महद् बलं कपेः प्रभावं च पराक्रमं च । त्वमात्मनश्चापि निरीक्ष्य सारं कुरुष्व वेगं स्वबलानुरूपम् ॥ ९ ॥ बलावमर्दस्त्वयि संनिकृष्टे यथा गते शाम्यति शान्तशत्रौ । तथा समीक्ष्यात्मबलं परं च समारभस्वास्त्रभृतां वरिष्ठ ॥ १० ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार अपनी विशाल सेनाका संहार और उस वानरका प्रभाव एवं पराक्रम देखकर तुम अपने बलका भी विचार कर लो; फिर अपनी शक्तिके अनुसार उद्योग करो ॥ ‘शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ वीर ! तुम्हारे सब शत्रु शान्त हो चुके हैं । तुम अपने और पराये बलका विचार करके ऐसा प्रयत्न करो, जिससे युद्धभूमिके निकट तुम्हारे पहुँचते ही मेरी सेनाका विनाश रुक जाय ॥ १० ॥
न वीर सेना गणशो च्यवन्ति न वज्रमादाय विशालसारम् । न मारुतस्यास्ति गतिप्रमाणं न चाग्निकल्पः करणेन हन्तुम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘वीरवर ! तुम्हें अपने साथ सेना नहीं ले जानी चाहिये; क्योंकि वे सेनाएँ समूह-की-समूह या तो भाग जाती हैं या मारी जाती हैं । इसी तरह अधिक तीक्ष्णता और कठोरतासे युक्त वज्र लेकर भी जानेकी कोई आवश्यकता नहीं है ( क्योंकि उसके ऊपर वह भी व्यर्थ सिद्ध हो चुका है ) । उस वायुपुत्र हनुमान्की गति अथवा शक्तिका कोई माप-तोल या सीमा नहीं है । वह अग्नि-तुल्य तेजस्वी वानर किसी साधनविशेष-से नहीं मारा जा सकता ॥ ११ ॥
तमेवमर्थं प्रसमीक्ष्य सम्यक् स्वकर्मसाम्याद्धि समाहितात्मा । स्मरंश्च दिव्यं धनुषोऽस्य वीर्यं व्रजाक्षतं कर्म समारभस्व ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘इन सब बातोंका अच्छी तरह विचार करके प्रतिपक्षीमें अपने समान ही पराक्रम समझकर तुम अपने चित्तको एकाग्र कर लो — सावधान हो जाओ । अपने इस धनुषके दिव्य प्रभावको याद रखते हुए आगे बढ़ो और ऐसा पराक्रम करके दिखाओ, जो खाली न जाय ॥ १२ ॥
न खल्वियं मतिश्रेष्ठ यत्त्वां सम्प्रेषयाम्यहम् । इयं च राजधर्माणां क्षत्रस्य च मतिर्मता ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘उत्तम बुद्धिवाले वीर ! मैं तुम्हें जो ऐसे संकटमें भेज रहा हूँ, यह यद्यपि ( स्नेहकी दृष्टिसे ) उचित नहीं है, तथापि मेरा यह विचार राजनीति और क्षत्रिय-धर्मके अनुकूल है ॥ १३ ॥
नानाशास्त्रेषु संग्रामे वैशारद्यमरिंदम । अवश्यमेव बोद्धव्यं काम्यश्च विजयो रणे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन ! वीर पुरुषको संग्राममें नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कुशलता अवश्य प्राप्त करनी चाहिये, साथ ही युद्धमें विजय पानेकी भी अभिलाषा रखनी चाहिये’ ॥ १४ ॥
ततः पितुस्तद्वचनं निशम्य प्रदक्षिणं दक्षसुतप्रभावः । चकार भर्तारमतित्वरेण रणाय वीरः प्रतिपन्नबुद्धिः ॥ १५ ॥
भावार्थ
अपने पिता राक्षसराज रावणके इस वचनको सुनकर देवताओंके समान प्रभावशाली वीर मेघनादने युद्धके लिये निश्चित विचार करके जल्दीसे अपने स्वामी रावणकी परिक्रमा की ॥ १५ ॥
ततस्तैः स्वगणैरिष्टैरिन्द्रजित् प्रतिपूजितः । युद्धोद्धतकृतोत्साहः संग्रामं सम्प्रपद्यत ॥ १६ ॥ श्रीमान् पद्मविशालाक्षो राक्षसाधिपतेः सुतः । निर्जगाम महातेजाः समुद्र इव पर्वणि ॥ १७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् सभामें बैठे हुए अपने दलके प्रिय राक्षसोंद्वारा भूरि-भूरि प्रशंसित हो इन्द्रजित् विकट युद्धके लिये मनमें उत्साह भरकर संग्रामभूमिकी ओर जानेको उद्यत हुआ ॥ उस समय प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाला राक्षसराज रावणका पुत्र महातेजस्वी श्रीमान् इन्द्रजित् पर्वके दिन उमड़े हुए समुद्रके समान विशेष हर्ष और उत्साहसे पूर्ण हो राजमहलसे बाहर निकला ॥ १७ ॥
स पक्षिराजोपमतुल्यवेगै- र्व्याघ्रैश्चतुर्भिः स तु तीक्ष्णदंष्ट्रैः । रथं समायुक्तमसह्यवेगः समारुरोहेन्द्रजिदिन्द्रकल्पः ॥ १८ ॥
भावार्थ
जिसका वेग शत्रुओंके लिये असह्य था, वह इन्द्रके समान पराक्रमी मेघनाद पक्षिराज गरुड़के समान तीव्र गति तथा तीखे दाढ़ोंवाले चार सिंहोंसे जुते हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ॥ १८ ॥
स रथी धन्विनां श्रेष्ठः शस्त्रज्ञोऽस्त्रविदां वरः । रथेनाभिययौ क्षिप्रं हनुमान् यत्र सोऽभवत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता, अस्त्रवेत्ताओंमें अग्रगण्य और धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ वह रथी वीर रथके द्वारा शीघ्र उस स्थानपर गया, जहाँ हनुमान्जी उसकी प्रतीक्षामें बैठे थे ॥ १९ ॥
स तस्य रथनिर्घोषं ज्यास्वनं कार्मुकस्य च । निशम्य हरिवीरोऽसौ सम्प्रहृष्टतरोऽभवत् ॥ २० ॥
भावार्थ
उसके रथकी घर्घराहट और धनुषकी प्रत्यञ्चाका गम्भीर घोष सुनकर वानरवीर हनुमान्जी अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे भर गये ॥ २० ॥
इन्द्रजिच्चापमादाय शितशल्यांश्च सायकान् । हनूमन्तमभिप्रेत्य जगाम रणपण्डितः ॥ २१ ॥
भावार्थ
इन्द्रजित् युद्धकी कलामें प्रवीण था । वह धनुष और तीखे अग्रभागवाले सायकोंको लेकर हनुमान्जीको लक्ष्य करके आगे बढ़ा ॥ २१ ॥
तस्मिंस्ततः संयति जातहर्षे रणाय निर्गच्छति बाणपाणौ । दिशश्च सर्वाः कलुषा बभूवु- र्मृगाश्च रौद्रा बहुधा विनेदुः ॥ २२ ॥
भावार्थ
हृदयमें हर्ष और उत्साह तथा हाथोंमें बाण लेकर वह ज्यों ही युद्धके लिये निकला, त्यों ही सम्पूर्ण दिशाएँ मलिन हो गयीं और भयानक पशु नाना प्रकारसे आर्तनाद करने लगे ॥ २२ ॥
समागतास्तत्र तु नागयक्षा महर्षयश्चक्रचराश्च सिद्धाः । नभः समावृत्य च पक्षिसङ्घा विनेदुरुच्चैः परमप्रहृष्टाः ॥ २३ ॥
भावार्थ
उस समय वहाँ नाग, यक्ष, महर्षि और नक्षत्र-मण्डलमें विचरनेवाले सिद्धगण भी आ गये । साथ ही पक्षियोंके समुदाय भी आकाशको आच्छादित करके अत्यन्त हर्षमें भरकर उच्चस्वरसे चहचहाने लगे ॥ २३ ॥
आयान्तं स रथं दृष्ट्वा तूर्णमिन्द्रध्वजं कपिः । ननाद च महानादं व्यवर्धत च वेगवान् ॥ २४ ॥
भावार्थ
इन्द्राकार चिह्नवाली ध्वजासे सुशोभित रथपर बैठकर शीघ्रतापूर्वक आते हुए मेघनादको देखकर वेगशाली वानरवीर हनुमान्ने बड़े जोरसे गर्जना की और अपने शरीरको बढ़ाया ॥ २४ ॥
इन्द्रजित् स रथं दिव्यमाश्रितश्चित्रकार्मुकः । धनुर्विस्फारयामास तडिदूर्जितनिःस्वनम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
उस दिव्य रथपर बैठकर विचित्र धनुष धारण करनेवाले इन्द्रजित्ने बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान टंकार करनेवाले अपने धनुषको खींचा ॥ २५ ॥
ततः समेतावतितीक्ष्णवेगौ महाबलौ तौ रणनिर्विशङ्कौ। कपिश्च रक्षोऽधिपतेस्तनूजः सुरासुरेन्द्राविव बद्धवैरौ ॥ २६ ॥
भावार्थ
फिर तो अत्यन्त दुःसह वेग और महान् बलसे सम्पन्न हो युद्धमें निर्भय होकर आगे बढ़नेवाले वे दोनों वीर कपिवर हनुमान् तथा राक्षसराजकुमार मेघनाद परस्पर वैर बाँधकर देवराज इन्द्र और दैत्यराज बलिकी भाँति एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ २६ ॥
स तस्य वीरस्य महारथस्य धनुष्मतः संयति सम्मतस्य। शरप्रवेगं व्यहनत् प्रवृद्ध- श्चचार मार्गे पितुरप्रमेयः ॥ २७ ॥
भावार्थ
अप्रमेय शक्तिशाली हनुमान्जी विशाल शरीर धारण करके अपने पिता वायुके मार्गपर विचरने और युद्धमें सम्मानित होनेवाले उस धनुर्धर महारथी राक्षसवीरके बाणोंके महान् वेगको व्यर्थ करने लगे ॥ २७ ॥
ततः शरानायततीक्ष्णशल्यान् सुपत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खान्। मुमोच वीरः परवीरहन्ता सुसंततान् वज्रसमानवेगान् ॥ २८ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रजित्ने बड़ी और तीखी नोक तथा सुन्दर परोंवाले, सोनेकी विचित्र पंखोंसे सुशोभित और वज्रके समान वेगशाली बाणोंको लगातार छोड़ना आरम्भ किया ॥ २८ ॥
ततः स तत्स्यन्दननिःस्वनं च मृदङ्गभेरीपटहस्वनं च। विकृष्यमाणस्य च कार्मुकस्य निशम्य घोषं पुनरुत्पपात ॥ २९ ॥
भावार्थ
उस समय उसके रथकी घर्घराहट, मृदङ्ग, भेरी और पटह आदि बाजोंके शब्द एवं खींचे जाते हुए धनुषकी टंकार सुनकर हनुमान्जी फिर ऊपरकी ओर उछले ॥२९॥
शराणामन्तरेष्वाशु व्यावर्तत महाकपिः। हरिस्तस्याभिलक्ष्यस्य मोक्षयंल्लक्ष्यसंग्रहम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
ऊपर जाकर वे महाकपि वानरवीर लक्ष्य बेधनेमें प्रसिद्ध मेघनादके साधे हुए निशानेको व्यर्थ करते हुए उसके छोड़े हुए बाणोंके बीचसे शीघ्रतापूर्वक निकलकर अपनेको बचाने लगे ॥ ३० ॥
शराणामग्रतस्तस्य पुनः समभिवर्तत। प्रसार्य हस्तौ हनुमानुत्पपातानिलात्मजः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
वे पवनकुमार हनुमान् बारंबार उसके बाणोंके सामने आकर खड़े हो जाते और फिर दोनों हाथ फैलाकर बात-की-बातमें उड़ जाते थे ॥ ३१ ॥
तावुभौ वेगसम्पन्नौ रणकर्मविशारदौ। सर्वभूतमनोग्राहि चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वे दोनों वीर महान् वेगसे सम्पन्न तथा युद्ध करनेकी कलामें चतुर थे। वे सम्पूर्ण भूतोंके चित्तको आकर्षित करनेवाला उत्तम युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥
हनूमतो वेद न राक्षसोऽन्तरं न मारुतिस्तस्य महात्मनोऽन्तरम्। परस्परं निर्विषहौ बभूवतुः समेत्य तौ देवसमानविक्रमौ ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वह राक्षस हनुमान्जीपर प्रहार करनेका अवसर नहीं पाता था और पवनकुमार हनुमान्जी भी उस महामनस्वी वीरको धर दबानेका मौका नहीं पाते थे। देवताओंके समान पराक्रमी वे दोनों वीर परस्पर भिड़कर एक दूसरेके लिये दुःसह हो उठे थे ॥ ३३ ॥
ततस्तु लक्ष्ये स विहन्यमाने शरेष्वमोघेषु च सम्पतत्सु। जगाम चिन्तां महतीं महात्मा समाधिसंयोगसमाहितात्मा ॥ ३४ ॥
भावार्थ
लक्ष्यवेधके लिये चलाये हुए मेघनादके वे अमोघ बाण भी जब व्यर्थ होकर गिर पड़े, तब लक्ष्यपर बाणोंका संधान करनेमें सदा एकाग्रचित्त रहनेवाले उस महामनस्वी वीरको बड़ी चिन्ता हुई ॥ ३४ ॥
ततो मतिं राक्षसराजसूनु- श्चकार तस्मिन् हरिवीरमुख्ये। अवध्यतां तस्य कपेः समीक्ष्य कथं निगच्छेदिति निग्रहार्थम्॥ ३५ ॥
भावार्थ
उन कपिश्रेष्ठको अवध्य समझकर राक्षसराजकुमार मेघनाद वानरवीरोंमें प्रमुख हनुमान्जीके विषयमें यह विचार करने लगा कि ‘इन्हें किसी तरह कैद कर लेना चाहिये, परंतु ये मेरी पकड़में आ कैसे सकते हैं ?’ ॥ ३५ ॥
ततः पैतामहं वीरः सोऽस्त्रमस्त्रविदां वरः। संदधे सुमहातेजास्तं हरिप्रवरं प्रति ॥ ३६ ॥
भावार्थ
फिर तो अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उस महातेजस्वी वीरने उन कपिश्रेष्ठको लक्ष्य करके अपने धनुषपर ब्रह्माजीके दिये हुए अस्त्रका संधान किया ॥ ३६ ॥
अवध्योऽयमिति ज्ञात्वा तमस्त्रेणास्त्रतत्त्ववित्। निजग्राह महाबाहुं मारुतात्मजमिन्द्रजित् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
अस्त्रतत्त्वके ज्ञाता इन्द्रजित्ने महाबाहु पवनकुमारको अवध्य जानकर उन्हें उस अस्त्रसे बाँध लिया ॥ ३७ ॥
तेन बद्धस्ततोऽस्त्रेण राक्षसेन स वानरः। अभवन्निर्विचेष्टश्च पपात च महीतले ॥ ३८ ॥
भावार्थ
राक्षसद्वारा उस अस्त्रसे बाँध लिये जानेपर वानरवीर हनुमान्जी निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३८ ॥
ततोऽथ बुद्ध्वा स तदस्त्रबन्धं प्रभोः प्रभावाद् विगतात्पवेगः । पितामहानुग्रहमात्मनश्च विचिन्तयामास हरिप्रवीरः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
अपनेको ब्रह्मास्त्रसे बँधा हुआ जानकर भी उन्हीं भगवान् ब्रह्माके प्रभावसे हनुमान्जीको थोड़ी-सी भी पीड़ाका अनुभव नहीं हुआ । वे प्रमुख वानरवीर अपने ऊपर ब्रह्माजीके महान् अनुग्रहका विचार करने लगे ॥ ३९ ॥
ततः स्वायम्भुवैर्मन्त्रैर्ब्रह्मास्त्रं चाभिमन्त्रितम् । हनूमांश्चिन्तयामास वरदानं पितामहात् ॥ ४० ॥
भावार्थ
जिन मन्त्रोंके देवता साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्मा हैं, उनसे अभिमन्त्रित हुए उस ब्रह्मास्त्रको देखकर हनुमान्जीको पितामह ब्रह्मासे अपने लिये मिले हुए वरदानका स्मरण हो आया ( ब्रह्माजीने उन्हें वर दिया था कि मेरा अस्त्र तुम्हें एक ही मुहूर्तमें अपने बन्धनसे मुक्त कर देगा ) ॥ ४० ॥
न मेऽस्य बन्धस्य च शक्तिरस्ति विमोक्षणे लोकगुरोः प्रभावात् । इत्येवमेवं विहितोऽस्त्रबन्धो मयाऽऽत्मयोनेरनुवर्तितव्यः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
फिर वे सोचने लगे ‘लोकगुरु ब्रह्माके प्रभावसे मुझमें इस अस्त्रके बन्धनसे छुटकारा पानेकी शक्ति नहीं है—ऐसा मानकर ही इन्द्रजित्ने मुझे इस प्रकार बाँधा है, तथापि मुझे भगवान् ब्रह्माके सम्मानार्थ इस अस्त्रबन्धनका अनुसरण करना चाहिये’ ॥ ४१ ॥
स वीर्यमस्त्रस्य कपिर्विचार्य पितामहानुग्रहमात्मनश्च । विमोक्षशक्तिं परिचिन्तयित्वा पितामहाज्ञामनुवर्तते स्म ॥ ४२ ॥
भावार्थ
कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीने उस अस्त्रकी शक्ति, अपने ऊपर पितामहकी कृपा तथा अपनेमें उसके बन्धनसे छूट जानेकी सामर्थ्य—इन तीनोंपर विचार करके अन्तमें ब्रह्माजीकी आज्ञाका ही अनुसरण किया ॥ ४२ ॥
अस्त्रेणापि हि बद्धस्य भयं मम न जायते । पितामहमहेन्द्राभ्यां रक्षितस्यानिलेन च ॥ ४३ ॥
भावार्थ
उनके मनमें यह बात आयी कि ‘इस अस्त्रसे बँध जानेपर भी मुझे कोई भय नहीं है; क्योंकि ब्रह्मा, इन्द्र और वायुदेवता तीनों मेरी रक्षा करते हैं ॥ ४३ ॥
ग्रहणे चापि रक्षोभिर्महन्मे गुणदर्शनम् । राक्षसेन्द्रेण संवादस्तस्माद् गृह्णन्तु मां परे ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘राक्षसोंद्वारा पकड़े जानेमें भी मुझे महान् लाभ ही दिखायी देता है; क्योंकि इससे मुझे राक्षसराज रावणके साथ बातचीत करनेका अवसर मिलेगा । अतः शत्रु मुझे पकड़कर ले चलें’ ॥ ४४ ॥
स निश्चितार्थः परवीरहन्ता समीक्ष्यकारी विनिवृत्तचेष्टः । परैः प्रसह्याभिगतैर्निगृह्य ननाद तैस्तैः परिभर्त्स्यमानः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
ऐसा निश्चय करके विचारपूर्वक कार्य करनेवाले शत्रु-वीरोंके संहारक हनुमान्जी निश्चेष्ट हो गये । फिर तो सभी शत्रु निकट आकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ने और डाँट बताने लगे । उस समय हनुमान्जी, मानो कष्ट पा रहे हों, इस प्रकार चीखते और कटकटाते थे ॥ ४५ ॥
ततस्ते राक्षसा दृष्ट्वा विनिश्चेष्टमरिंदमम् । बबन्धुः शणवल्कैश्च द्रुमचीरैश्च संहतैः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
राक्षसोंने देखा अब यह हाथ-पैर नहीं हिलाता, तब वे शत्रुहन्ता हनुमान्जीको सुतरी और वृक्षोंके वल्कलको बटकर बनाये गये रस्सोंसे बाँधने लगे ॥ ४६ ॥
स रोचयामास परैश्च बन्धं प्रसह्य वीरैरभिगर्हणं च । कौतूहलान्मां यदि राक्षसेन्द्रो द्रष्टुं व्यवस्येदिति निश्चितार्थः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
शत्रुवीरोंने जो उन्हें हठपूर्वक बाँधा और उनका तिरस्कार किया, यह सब कुछ उस समय उन्हें अच्छा लगा । उनके मनमें यह निश्चित विचार हो गया था कि ऐसी अवस्थामें राक्षसराज रावण सम्भवतः कौतूहलवश मुझे देखनेकी इच्छा करेगा ( इसीलिये वे सब कुछ सह रहे थे ) ॥ ४७ ॥
स बद्धस्तेन वल्केन विमुक्तोऽस्त्रेण वीर्यवान् । अस्त्रबन्धः स चान्यं हि न बन्धमनुवर्तते ॥ ४८ ॥
भावार्थ
वल्कलके रस्सेसे बँध जानेपर पराक्रमी हनुमान् ब्रह्मास्त्रके बन्धनसे मुक्त हो गये; क्योंकि उस अस्त्रका बन्धन किसी दूसरे बन्धनके साथ नहीं रहता ॥ ४८ ॥
अथेन्द्रजित् तं द्रुमचीरबद्धं विचार्य वीरः कपिसत्तमं तम् । विमुक्तमस्त्रेण जगाम चिन्ता- मन्येन बद्धोऽप्यनुवर्ततेऽस्त्रम् ॥ ४९ ॥ अहो महत् कर्म कृतं निरर्थं न राक्षसैर्मन्त्रगतिर्विमृष्टा । पुनश्च नास्त्रे विहतेऽस्त्रमन्यत् प्रवर्तते संशयिताः स्म सर्वे ॥ ५० ॥
भावार्थ
वीर इन्द्रजित्ने जब देखा कि यह वानरशिरोमणि तो केवल वृक्षोंके वल्कलसे बँधा है, दिव्यास्त्रके बन्धनसे मुक्त हो चुका है, तब उसे बड़ी चिन्ता हुई । वह सोचने लगा—‘दूसरी वस्तुओंसे बँधा हुआ होनेपर भी यह अस्त्रबन्धनमें बँधे हुएकी भाँति बर्ताव कर रहा है । ओह ! इन राक्षसोंने मेरा किया हुआ बहुत बड़ा काम चौपट कर दिया । इन्होंने मन्त्रकी शक्तिपर विचार नहीं किया । यह अस्त्र जब एक बार व्यर्थ हो जाता है, तब पुनः दूसरी बार इसका प्रयोग नहीं हो सकता । अब तो विजयी होकर भी हम सब लोग संशयमें पड़ गये ॥ ४९-५० ॥
अस्त्रेण हनुमान् मुक्तो नात्मानमवबुध्यते । कृष्यमाणस्तु रक्षोभिस्तैश्च बन्धैर्निपीडितः ॥ ५१ ॥ हन्यमानस्ततः क्रूरै राक्षसैः कालमुष्टिभिः । समीपं राक्षसेन्द्रस्य प्राकृष्यत स वानरः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
हनुमान्जी यद्यपि अस्त्रके बन्धनसे मुक्त हो गये थे तो भी उन्होंने ऐसा बर्ताव किया, मानो वे इस बातको जानते ही न हों । क्रूर राक्षस उन्हें बन्धनोंसे पीड़ा देते और कठोर मुक्कोंसे मारते हुए खींचकर ले चले । इस तरह वे वानरवीर राक्षसराज रावणके पास पहुँचाये गये ॥५१-५२॥
अथेन्द्रजित् तं प्रसमीक्ष्य मुक्त- मस्त्रेण बद्धं द्रुमचीरसूत्रैः । व्यदर्शयत् तत्र महाबलं तं हरिप्रवीरं सगणाय राज्ञे ॥ ५३ ॥
भावार्थ
तब इन्द्रजित्ने उन महाबली वानरवीरको ब्रह्मास्त्रसे मुक्त तथा वृक्षके वल्कलोंकी रस्सियोंसे बँधा देख उन्हें वहाँ सभासद्गणोंसहित राजा रावणको दिखाया ॥ ५३ ॥
तं मत्तमिव मातङ्गं बद्धं कपिवरोत्तमम् । राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
मतवाले हाथीके समान बँधे हुए उन वानरशिरोमणिको राक्षसोंने राक्षसराज रावणकी सेवामें समर्पित कर दिया ॥५४॥
कोऽयं कस्य कुतो वापि किं कार्यं कोऽभ्युपाश्रयः । इति राक्षसवीराणां श्रुत्वा संजज्ञिरे कथाः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
उन्हें देखकर राक्षसवीर आपसमें कहने लगे—‘यह कौन है ? किसका पुत्र या सेवक है ? कहाँसे आया है ? यहाँ इसका क्या काम है ?- तथा इसे सहारा देनेवाला कौन है ?’ ॥ ५५ ॥
हन्यतां दह्यतां वापि भक्ष्यतामिति चापरे । राक्षसास्तत्र संक्रुद्धाः परस्परमथाब्रुवन् ॥ ५६ ॥
भावार्थ
कुछ दूसरे राक्षस जो अत्यन्त क्रोधसे भरे थे, परस्पर इस प्रकार बोले—‘इस वानरको मार डालो, जला डालो या खा डालो’ ॥ ५६ ॥
अतीत्य मार्गं सहसा महात्मा स तत्र रक्षोऽधिपपादमूले । ददर्श राज्ञः परिचारवृद्धान् गृहं महारत्नविभूषितं च ॥ ५७ ॥
भावार्थ
महात्मा हनुमान्जी सारा रास्ता तै करके जब सहसा राक्षसराज रावणके पास पहुँच गये, तब उन्होंने उसके चरणोंके समीप बहुत-से बड़े-बूढ़े सेवकोंको और बहुमूल्य रत्नोंसे विभूषित सभाभवनको भी देखा ॥ ५७ ॥
स ददर्श महातेजा रावणः कपिसत्तमम् । रक्षोभिर्विकृताकारैः कृष्यमाणमितस्ततः ॥ ५८ ॥
भावार्थ
उस समय महातेजस्वी रावणने विकट आकारवाले राक्षसोंके द्वारा इधर-उधर घसीटे जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीको देखा ॥ ५८ ॥
राक्षसाधिपतिं चापि ददर्श कपिसत्तमः । तेजोबलसमायुक्तं तपन्तमिव भास्करम् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने भी राक्षसराज रावणको तपते हुए सूर्यके समान तेज और बलसे सम्पन्न देखा ॥ ५९ ॥
स रोषसंवर्तितताम्रदृष्टि- र्दशाननस्तं कपिमन्ववेक्ष्य । अथोपविष्टान् कुलशीलवृद्धान् समादिशत् तं प्रति मुख्यमन्त्रीन् ॥ ६० ॥
भावार्थ
हनुमान्जीको देखकर दशमुख रावणकी आँखें रोषसे चञ्चल और लाल हो गयीं । उसने वहाँ बैठे हुए कुलीन, सुशील और मुख्य मन्त्रियोंको उनसे परिचय पूछनेके लिये आज्ञा दी ॥ ६० ॥
यथाक्रमं तैः स कपिश्च पृष्टः कार्यार्थमर्थस्य च मूलमादौ । निवेदयामास हरीश्वरस्य दूतः सकाशादहमागतोऽस्मि ॥ ६१ ॥
भावार्थ
उन सबने पहले क्रमशः कपिवर हनुमान्से उनका कार्य, प्रयोजन तथा उसके मूल कारणके विषयमें पूछा । तब उन्होंने यह बताया कि ‘मैं वानरराज सुग्रीवके पाससे उनका दूत होकर आया हूँ’ ॥ ६१ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें