सुन्दरकाण्ड, सर्ग 49
ततः स कर्मणा तस्य विस्मितो भीमविक्रमः । हनूमान् क्रोधताम्राक्षो रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥ १ ॥
भावार्थ
इन्द्रजित्के उस नीतिपूर्ण कर्मसे विस्मित तथा रावणके सीताहरण आदि कर्मोंसे कुपित हो रोषसे लाल आँखें किये भयंकर पराक्रमी हनुमान्जीने राक्षसराज रावणकी ओर देखा ॥ १ ॥
भ्राजमानं महार्हेण काञ्चनेन विराजता । मुक्ताजालवृतेनाथ मुकुटेन महाद्युतिम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वह महातेजस्वी राक्षसराज सोनेके बने हुए बहुमूल्य एवं दीप्तिमान् मुकुटसे, जिसमें मोतियोंका काम किया हुआ था, उद्भासित हो रहा था ॥ २ ॥
वज्रसंयोगसंयुक्तैर्महार्हमणिविग्रहैः । हैमैराभरणैश्चित्रैर्मनसेव प्रकल्पितैः ॥ ३ ॥
भावार्थ
उसके विभिन्न अङ्गोंमें सोनेके विचित्र आभूषण ऐसे सुन्दर लगते थे मानो मानसिक संकल्पद्वारा बनाये गये हों। उनमें हीरे तथा बहुमूल्य मणिरत्न जड़े हुए थे, उन आभूषणोंसे रावणकी अद्भुत शोभा होती थी ॥ ३ ॥
महार्हक्षौमसंवीतं रक्तचन्दनरूषितम् । स्वनुलिप्तं विचित्राभिर्विविधाभिश्च भक्तिभिः ॥ ४ ॥
भावार्थ
बहुमूल्य रेशमी वस्त्र उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह लाल चन्दनसे चर्चित था और भाँति-भाँतिकी विचित्र रचनाओंसे युक्त सुन्दर अङ्गरागोंसे उसका सारा अङ्ग सुशोभित हो रहा था ॥ ४ ॥
विचित्रं दर्शनीयैश्च रक्ताक्षैर्भीमदर्शनैः । दीप्ततीक्ष्णमहादंष्ट्रं प्रलम्बं दशनच्छदैः ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसकी आँखें देखने योग्य, लाल-लाल और भयावनी थीं; उनसे और चमकीली तीखी एवं बड़ी-बड़ी दाढ़ों तथा लंबे-लंबे ओठोंके कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी ॥ ५ ॥
शिरोभिर्दशभिर्वीरो भ्राजमानं महौजसम् । नानाव्यालसमाकीर्णैः शिखरैरिव मन्दरम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
वीर हनुमान्जीने देखा, अपने दस मस्तकोंसे सुशोभित महाबली रावण नाना प्रकारके सर्पोंसे भरे हुए अनेक शिखरोंद्वारा शोभा पानेवाले मन्दराचलके समान प्रतीत हो रहा है ॥ ६ ॥
नीलाञ्जनचयप्रख्यं हारेणोरसि राजता । पूर्णचन्द्राभवक्त्रेण सबालार्कमिवाम्बुदम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
उसका शरीर काले कोयलेके ढेरकी भाँति काला था और वक्षःस्थल चमकीले हारसे विभूषित था । वह पूर्ण चन्द्रके समान मनोरम मुखद्वारा प्रातःकालके सूर्यसे युक्त मेघकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥
बाहुभिर्बद्धकेयूरैश्चन्दनोत्तमरूषितैः । भ्राजमानाङ्गदैर्भीमैः पञ्चशीर्षैरिवोरगैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
जिनमें केयूर बँधे थे, उत्तम चन्दनका लेप हुआ था और चमकीले अङ्गद शोभा दे रहे थे, उन भयंकर भुजाओंसे सुशोभित रावण ऐसा जान पड़ता था, मानो पाँच सिरवाले अनेक सर्पोंसे सेवित हो रहा हो ॥ ८ ॥
महति स्फाटिके चित्रे रत्नसंयोगचित्रिते । उत्तमास्तरणास्तीर्णे सूपविष्टं वरासने ॥ ९ ॥
भावार्थ
वह स्फटिकमणिके बने हुए विशाल एवं सुन्दर सिंहासनपर, जो नाना प्रकारके रत्नोंके संयोगसे चित्रित, विचित्र तथा सुन्दर बिछौनोंसे आच्छादित था, बैठा हुआ था ॥ ९ ॥
अलंकृताभिरत्यर्थे प्रमदाभिः समन्ततः । वालव्यजनहस्ताभिरारात्समुपसेवितम् ॥ १० ॥
भावार्थ
वस्त्र और आभूषणोंसे खूब सजी हुई बहुत-सी युवतियाँ हाथमें चँवर लिये सब ओरसे आसपास खड़ी हो उसकी सेवा करती थीं ॥ १० ॥
दुर्धरेण प्रहस्तेन महापार्श्वेन रक्षसा । मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्निकुम्भेन च मन्त्रिणा ॥ ११ ॥ उपोपविष्टं रक्षोभिश्चतुर्भिर्बलदर्पितम् । कृत्स्नं परिवृतं लोकं चतुर्भिरिव सागरैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
मन्त्र-तत्त्वको जाननेवाले दुर्धर, प्रहस्त, महापार्श्व तथा निकुम्भ— ये चार राक्षसजातीय मन्त्री उसके पास बैठे थे । उन चारों राक्षसोंसे घिरा हुआ बलाभिमानी रावण चार समुद्रोंसे घिरे हुए समस्त भूलोककी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ११-१२ ॥
मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैरन्यैश्च शुभदर्शिभिः । आश्वास्यमानं सचिवैः सुरैरिव सुरेश्वरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
जैसे देवता देवराज इन्द्रको सान्त्वना देते हैं, उसी प्रकार मन्त्रतत्त्वके ज्ञाता मन्त्री तथा दूसरे-दूसरे शुभचिन्तक सचिव उसे आश्वासन दे रहे थे ॥ १३ ॥
अपश्यद् राक्षसपतिं हनूमानतितेजसम् । वेष्टितं मेरुशिखरे सतोयमिव तोयदम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार हनुमान्जीने मन्त्रियोंसे घिरे हुए अत्यन्त तेजस्वी, सिंहासनारूढ़ राक्षसराज रावणको मेरुशिखरपर विराजमान सजल जलधरके समान देखा ॥ १४ ॥
स तैः सम्पीड्यमानोऽपि रक्षोभिर्भीमविक्रमैः । विस्मयं परमं गत्वा रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥ १५ ॥
भावार्थ
उन भयानक पराक्रमी राक्षसोंसे पीड़ित होनेपर भी हनुमान्जी अत्यन्त विस्मित होकर राक्षसराज रावणको बड़े गौरसे देखते रहे ॥ १५ ॥
भ्राजमानं ततो दृष्ट्वा हनुमान् राक्षसेश्वरम् । मनसा चिन्तयामास तेजसा तस्य मोहितः ॥ १६ ॥
भावार्थ
उस दीप्तिशाली राक्षसराजको अच्छी तरह देखकर उसके तेजसे मोहित हो हनुमान्जी मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगे—॥ १६ ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः । अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘अहो ! इस राक्षसराजका रूप कैसा अद्भुत है ! कैसा अनोखा धैर्य है ! कैसी अनुपम शक्ति है ! और कैसा आश्चर्यजनक तेज है ! इसका सम्पूर्ण राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होना कितने आश्चर्यकी बात है ! ॥ १७ ॥
यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः । स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता ॥ १८ ॥ अस्य क्रूरैर्नृशंसैश्च कर्मभिर्लोककुत्सितैः । सर्वे बिभ्यति खल्वस्माल्लोकाः सामरदानवाः ॥ १९ ॥ अयं ह्युत्सहते क्रुद्धः कर्तुमेकार्णवं जगत् । इति चिन्तां बहुविधामकरोन्मतिमान् कपिः । दृष्ट्वा राक्षसराजस्य प्रभावममितौजसः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘यदि इसमें प्रबल अधर्म न होता तो यह राक्षसराज रावण इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवलोकका संरक्षक हो सकता था ॥ ‘इसके लोकनिन्दित क्रूरतापूर्ण निष्ठुर कर्मोंके कारण देवताओं और दानवोंसहित सम्पूर्ण लोक इससे भयभीत रहते हैं । यह कुपित होनेपर समस्त जगत्को एकार्णवमें निमग्न कर सकता है— संसारमें प्रलय मचा सकता है ।’ अमिततेजस्वी राक्षसराजके प्रभावको देखकर वे बुद्धिमान् वानरवीर ऐसी अनेक प्रकारकी चिन्ताएँ करते रहे ॥ १९-२० ॥
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