सुन्दरकाण्ड, सर्ग 50
तमुद्वीक्ष्य महाबाहुः पिङ्गाक्षं पुरतः स्थितम् । रोषेण महताऽऽविष्टो रावणो लोकरावणः ॥ १ ॥
भावार्थ
समस्त लोकोंको रुलानेवाला महाबाहु रावण भूरी आँखोंवाले हनुमान्जीको सामने खड़ा देख महान् रोषसे भर गया ॥ १ ॥
शङ्काहतात्मा दध्यौ स कपीन्द्रं तेजसावृतम् । किमेष भगवान् नन्दी भवेत् साक्षादिहागतः ॥ २ ॥ येन शप्तोऽस्मि कैलासे मया प्रहसिते पुरा । सोऽयं वानरमूर्तिः स्यात्किंखिद् बाणोऽपि वासुरः ॥३॥
भावार्थ
साथ ही तरह-तरहकी आशङ्काओंसे उसका दिल बैठ गया । अतः वह तेजस्वी वानरराजके विषयमें विचार करने लगा—‘क्या इस वानरके रूपमें साक्षात् भगवान् नन्दी यहाँ पधारे हुए हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें कैलास पर्वतपर जब कि मैंने उनका उपहास किया था, मुझे शाप दे दिया था ? वे ही तो वानरका स्वरूप धारण करके यहाँ नहीं आये हैं ? अथवा इस रूपमें बाणासुरका आगमन तो नहीं हुआ है ?’ ॥ २३ ॥
स राजा रोषताम्राक्षः प्रहस्तं मन्त्रिसत्तमम् । कालयुक्तमुवाचेदं वचो विपुलमर्थवत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘इस तरह तर्क-वितर्क करते हुए राजा रावणने क्रोधसे लाल आँखें करके मन्त्रिवर प्रहस्तसे समयानुकूल गम्भीर एवं अर्थयुक्त बात कही—॥ ४ ॥
दुरात्मा पृच्छ्यतामेष कुतः किं चास्य कारणम् । वनभङ्गे च कोऽस्यार्थो राक्षसानां च तर्जने ॥ ५ ॥ मत्पुरीमप्रधृष्यां वै गमने किं प्रयोजनम् । आयोधने वा किं कार्यं पृच्छ्यतामेष दुर्मतिः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘अमात्य ! इस दुरात्मासे पूछो तो सही, यह कहाँसे आया है ? इसके आनेका क्या कारण है ? प्रमदावनको उजाड़ने तथा राक्षसोंको मारनेमें इसका क्या उद्देश्य था ? ॥ ‘मेरी दुर्जय पुरीमें जो इसका आना हुआ है, इसमें इसका क्या प्रयोजन है ? अथवा इसने जो राक्षसोंके साथ युद्ध छेड़ दिया है, उसमें इसका क्या उद्देश्य है ? ये सारी बातें इस दुर्बुद्धि वानरसे पूछो’ ॥ ६ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्तो वाक्यमब्रवीत् । समाश्वसिहि भद्रं ते न भीः कार्या त्वया कपे ॥ ७ ॥
भावार्थ
रावणकी बात सुनकर प्रहस्तने हनुमान्जीसे कहा— ‘वानर ! तुम घबराओ न, धैर्य रक्खो । तुम्हारा भला हो । तुम्हें डरनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ७ ॥
यदि तावत् त्वमिन्द्रेण प्रेषितो रावणालयम् । तत्त्वमाख्याहि मा ते भूद् भयं वानर मोक्ष्यसे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘यदि तुम्हें इन्द्रने महाराज रावणकी नगरीमें भेजा है तो ठीक-ठीक बता दो । वानर ! डरो न । छोड़ दिये जाओगे ॥ ८ ॥
यदि वैश्रवणस्य त्वं यमस्य वरुणस्य च । चारुरूपमिदं कृत्वा प्रविष्टो नः पुरीमिमाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘अथवा यदि तुम कुबेर, यम या वरुणके दूत हो और यह सुन्दर रूप धारण करके हमारी इस पुरीमें घुस आये हो तो यह भी बता दो ॥ ९ ॥
विष्णुना प्रेषितो वापि दूतो विजयकाङ्क्षिणा। नहि ते वानरं तेजो रूपमात्रं तु वानरम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘अथवा विजयकी अभिलाषा रखनेवाले विष्णुने तुम्हें दूत बनाकर भेजा है ? तुम्हारा तेज वानरोंका-सा नहीं है। केवल रूपमात्र वानरका है ॥ १० ॥
तत्त्वतः कथयस्वाद्य ततो वानर मोक्ष्यसे। अनृतं वदतश्चापि दुर्लभं तव जीवितम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘वानर ! इस समय सच्ची बात कह दो, फिर तुम छोड़ दिये जाओगे । यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारा जीना असम्भव हो जायगा ॥ ११ ॥
अथ वा यन्निमित्तस्ते प्रवेशो रावणालये। एवमुक्तो हरिवरस्तदा रक्षोगणेश्वरम् ॥ १२ ॥ अब्रवीन्नास्मि शक्रस्य यमस्य वरुणस्य च। धनदेन न मे सख्यं विष्णुना नास्मि चोदितः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अथवा और सब बातें छोड़ो । तुम्हारा इस रावणके नगरमें आनेका क्या उद्देश्य है ? यही बता दो ।’ प्रहस्तके इस प्रकार पूछनेपर उस समय वानरश्रेष्ठ हनुमानने राक्षसोंके स्वामी रावणसे कहा—‘मैं इन्द्र, यम अथवा वरुणका दूत नहीं हूँ । कुबेरके साथ भी मेरी मैत्री नहीं है और भगवान् विष्णुने भी मुझे यहाँ नहीं भेजा है ॥ १२-१३ ॥
जातिरेव मम त्वेषा वानरोऽहमिहागतः। दर्शने राक्षसेन्द्रस्य तदिदं दुर्लभं मया ॥ १४ ॥ वनं राक्षसराजस्य दर्शनार्थे विनाशितम् । ततस्ते राक्षसाः प्राप्ता बलिनो युद्धकाङ्क्षिणः ॥ १५ ॥ रक्षणार्थं च देहस्य प्रतियुद्धा मया रणे।
भावार्थ
‘मैं जन्मसे ही वानर हूँ और राक्षस रावणसे मिलनेके उद्देश्यसे ही मैंने उनके इस दुर्लभ वनको उजाड़ा है । इसके बाद तुम्हारे बलवान् राक्षस युद्धकी इच्छासे मेरे पास आये और मैंने अपने शरीरकी रक्षाके लिये रणभूमिमें उनका सामना किया ॥ १४-१५½ ॥
अस्त्रपाशैर्न शक्योऽहं बद्धुं देवासुरैरपि ॥ १६ ॥ पितामहादेष वरो ममापि हि समागतः।
भावार्थ
‘देवता अथवा असुर भी मुझे अस्त्र अथवा पाशसे बाँध नहीं सकते । इसके लिये मुझे भी ब्रह्माजीसे वरदान मिल चुका है ॥ १६½ ॥
राजानं द्रष्टुकामेन मयास्त्रमनुवर्तितम् ॥ १७ ॥ विमुक्तोऽप्यहमस्त्रेण राक्षसैस्त्वभिवेदितः।
भावार्थ
‘राक्षसराजको देखनेकी इच्छासे ही मैंने अस्त्रसे बँधना स्वीकार किया है । यद्यपि इस समय मैं अस्त्रसे मुक्त हूँ तथापि इन राक्षसोंने मुझे बँधा समझकर ही यहाँ लाकर तुम्हें सौंपा है ॥ १७½ ॥
केनचिद् रामकार्येण आगतोऽस्मि तवान्तिकम् ॥ १८ ॥ दूतोऽहमिति विज्ञाय राघवस्यामितौजसः। श्रूयतामेव वचनं मम पथ्यमिदं प्रभो ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका कुछ कार्य है, जिसके लिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ । प्रभो ! मैं अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजीका दूत हूँ, ऐसा समझकर मेरे इस हितकारी वचनको अवश्य सुनो’ ॥ १८-१९ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें