सुन्दरकाण्ड, सर्ग 51
तं समीक्ष्य महासत्त्वं सत्त्ववान् हरिसत्तमः। वाक्यमर्थवदव्यग्रस्तमुवाच दशाननम् ॥ १ ॥
भावार्थ
महाबली दशमुख रावणकी ओर देखते हुए शक्तिशाली वानरशिरोमणि हनुमानने शान्तभावसे यह अर्थयुक्त बात कही—॥ १ ॥
अहं सुग्रीवसंदेशादिह प्राप्तस्तवान्तिके। राक्षसेश हरीशस्त्वां भ्राता कुशलमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! मैं सुग्रीवका संदेश लेकर यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ । वानरराज सुग्रीव तुम्हारे भाई हैं । इसी नाते उन्होंने तुम्हारा कुशल-समाचार पूछा है ॥ २ ॥
भ्रातुः शृणु समादेशं सुग्रीवस्य महात्मनः। धर्मार्थसहितं वाक्यमिह चामुत्र च क्षमम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘अब तुम अपने भाई महात्मा सुग्रीवका संदेश—धर्म और अर्थयुक्त वचन, जो इहलोक और परलोकमें भी लाभदायक है, सुनो ॥ ३ ॥
राजा दशरथो नाम रथकुञ्जरवाजिमान्। पितेव बन्धुर्लोकस्य सुरेश्वरसमद्युतिः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘अभी हालमें ही दशरथनामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो पिताकी भाँति प्रजाके हितैषी, इन्द्रके समान तेजस्वी तथा रथ, हाथी, घोड़े आदिसे सम्पन्न थे ॥ ४ ॥
ज्येष्ठस्तस्य महाबाहुः पुत्रः प्रियतरः प्रभुः । पितुर्निर्देशान्निष्क्रान्तः प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥ ५ ॥ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह भार्यया । रामो नाम महातेजा धर्म्यं पन्थानमाश्रितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘उनके परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र, महातेजस्वी, प्रभावशाली महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे धर्ममार्गका आश्रय लेकर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यमें आये थे ॥ ५-६ ॥
तस्य भार्या जनस्थाने भ्रष्टा सीतेति विश्रुता । वैदेहस्य सुता राज्ञो जनकस्य महात्मनः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सीता विदेहदेशके राजा महात्मा जनककी पुत्री हैं । जनस्थानमें आनेपर श्रीरामपत्नी सीता कहीं खो गयी हैं ॥ ७ ॥
मार्गमाणस्तु तां देवीं राजपुत्रः सहानुजः । ऋष्यमूकमनुप्राप्तः सुग्रीवेण च संगतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार श्रीराम अपने भाईके साथ उन्हीं सीतादेवीकी खोज करते हुए ऋष्यमूक पर्वतपर आये और सुग्रीवसे मिले ॥ ८ ॥
तस्य तेन प्रतिज्ञातं सीतायाः परिमार्गणम् । सुग्रीवस्यापि रामेण हरिराज्यं निवेदितुम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीवने उनसे सीताको ढूँढ़ निकालनेकी प्रतिज्ञा की और श्रीरामने सुग्रीवको वानरोंका राज्य दिलानेका वचन दिया ॥ ९ ॥
ततस्तेन मृधे हत्वा राजपुत्रेण वालिनम् । सुग्रीवः स्थापितो राज्ये हर्यृक्षाणां गणेश्वरः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् राजकुमार श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें वालीको मारकर सुग्रीवको किष्किन्धाके राज्यपर स्थापित कर दिया । इस समय सुग्रीव वानरों और भालुओंके समुदायके स्वामी हैं ॥ १० ॥
त्वया विज्ञातपूर्वश्च वाली वानरपुङ्गवः । स तेन निहतः संख्ये शरेणैकेन वानरः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘वानरराज वालीको तो तुम पहलेसे ही जानते हो । उस वानरवीरको युद्धभूमिमें श्रीरामने एक ही बाणसे मार गिराया था ॥ ११ ॥
स सीतामार्गणे व्यग्रः सुग्रीवः सत्यसंगरः । हरीन् सम्प्रेषयामास दिशः सर्वा हरीश्वरः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘अब सत्यप्रतिज्ञ सुग्रीव सीताको खोज निकालनेके लिये व्यग्र हो उठे हैं । उन वानरराजने समस्त दिशाओंमें वानरोंको भेजा है ॥ १२ ॥
तां हरीणां सहस्राणि शतानि नियुतानि च । दिक्षु सर्वासु मार्गन्ते ह्यधश्चोपरि चाम्बरे ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इस समय सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाश और पातालमें भी सीताजीकी खोज कर रहे हैं ॥ १३ ॥
वैनतेयसमाः केचित् केचित् तत्रानिलोपमाः । असङ्गगतयः शीघ्रा हरिवीरा महाबलाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘उन वानरवीरोंमेंसे कोई गरुड़के समान वेगवान् हैं तो कोई वायुके समान । उनकी गति कहीं नहीं रुकती । वे कपिवीर शीघ्रगामी और महान् बली हैं ॥ १४ ॥
अहं तु हनुमान्नाम मारुतस्यौरसः सुतः । सीतायास्तु कृते तूर्णं शतयोजनमायतम् ॥ १५ ॥ समुद्रं लङ्घयित्वैव त्वां दिदृक्षुरिहागतः । भ्रमता च मया दृष्टा गृहे ते जनकात्मजा ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मेरा नाम हनुमान् है । मैं वायुदेवताका औरस पुत्र हूँ । सीताका पता लगाने और तुमसे मिलनेके लिये सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघकर तीव्र गतिसे यहाँ आया हूँ । घूमते-घूमते तुम्हारे अन्तःपुरमें मैंने जनकनन्दिनी सीताको देखा है ॥ १५-१६ ॥
तद् भवान् दृष्टधर्मार्थस्तपःकृतपरिग्रहः । परदारान् महाप्राज्ञ नोपरोद्धुं त्वमर्हसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘महामते ! तुम धर्म और अर्थके तत्त्वको जानते हो । तुमने बड़े भारी तपका संग्रह किया है । अतः दूसरेकी स्त्रीको अपने घरमें रोक रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है ॥ १७ ॥
नहि धर्मविरुद्धेषु बह्वपायेषु कर्मसु । मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘धर्मविरुद्ध कार्योंमें बहुत-से अनर्थ भरे रहते हैं । वे कर्ताका जड़मूलसे नाश कर डालते हैं । अतः तुम-जैसे बुद्धिमान् पुरुष ऐसे कार्योंमें नहीं प्रवृत्त होते ॥ १८ ॥
कश्च लक्ष्मणमुक्तानां रामकोपानुवर्तिनाम् । शराणामग्रतः स्थातुं शक्तो देवासुरेष्वपि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘देवताओं और असुरोंमें भी कौन ऐसा वीर है, जो श्रीरामचन्द्रजीके क्रोध करनेके पश्चात् लक्ष्मणके छोड़े हुए बाणोंके सामने ठहर सके ॥ १९ ॥
न चापि त्रिषु लोकेषु राजन् विद्येत कश्चन । राघवस्य व्यलीकं यः कृत्वा सुखमवाप्नुयात् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘राजन् ! तीनों लोकोंमें एक भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो भगवान् श्रीरामका अपराध करके सुखी रह सके ॥ २० ॥
तत् त्रिकालहितं वाक्यं धर्म्यमर्थानुयायि च । मन्यस्व नरदेवाय जानकी प्रतिदीयताम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘इसलिये मेरी धर्म और अर्थके अनुकूल बात, जो तीनों कालोंमें हितकर है, मान लो और जानकीजीको श्रीरामचन्द्रजीके पास लौटा दो ॥ २१ ॥
दृष्टा हीयं मया देवी लब्धं यदिह दुर्लभम् । उत्तरं कर्म यच्छेषं निमित्तं तत्र राघवः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मैंने इन देवी सीताका दर्शन कर लिया । जो दुर्लभ वस्तु थी, उसे यहाँ पा लिया । इसके बाद जो कार्य शेष है, उसके साधनमें श्रीरघुनाथजी ही निमित्त हैं ॥ २२ ॥
लक्षितेयं मया सीता तथा शोकपरायणा । गृहे यां नाभिजानासि पञ्चास्यामिव पन्नगीम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘मैंने यहाँ सीताकी अवस्थाको लक्ष्य किया है । वे निरन्तर शोकमें डूबी रहती हैं । सीता तुम्हारे घरमें पाँच फनवाली नागिनके समान निवास करती हैं, जिन्हें तुम नहीं जानते हो ॥ २३ ॥
नेयं जरयितुं शक्या सासुरैरमरैरपि । विषसंसृष्टमत्यर्थं भुक्तमन्नमिवौजसा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘जैसे अत्यन्त विषमिश्रित अन्नको खाकर कोई उसे बलपूर्वक नहीं पचा सकता, उसी प्रकार सीताजीको अपनी शक्तिसे पचा लेना देवताओं और असुरोंके लिये भी असम्भव है ॥ २४ ॥
तपःसंतापलब्धस्ते सोऽयं धर्मपरिग्रहः । न स नाशयितुं न्याय्य आत्मप्राणपरिग्रहः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘तुमने तपस्याका कष्ट उठाकर धर्मके फलस्वरूप जो यह ऐश्वर्यका संग्रह किया है तथा शरीर और प्राणोंको चिरकालतक धारण करनेकी शक्ति प्राप्त की है, उसका विनाश करना उचित नहीं ॥ २५ ॥
अवध्यतां तपोभिर्यो भवान् समनुपश्यति । आत्मनः सासुरैर्देवैर्हेतुस्तत्राप्ययं महान् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘तुम तपस्याके प्रभावसे देवताओं और असुरोंद्वारा जो अपनी अवध्यता देख रहे हो, उसमें भी तपस्याजनित यह धर्म ही महान् कारण है ( अथवा उस अवध्यताके होते हुए भी तुम्हारे वधका दूसरा महान् कारण उपस्थित है ) ॥ २६ ॥
सुग्रीवो न च देवोऽयं न यक्षो न च राक्षसः । मानुषो राघवो राजन् सुग्रीवश्च हरीश्वरः । तस्मात् प्राणपरित्राणं कथं राजन् करिष्यसि ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजी न तो देवता हैं, न यक्ष हैं और न राक्षस ही हैं । श्रीरघुनाथजी मनुष्य हैं और सुग्रीव वानरोंके राजा । अतः उनके हाथसे तुम अपने प्राणोंकी रक्षा कैसे करोगे ? ॥ २७ ॥
न तु धर्मोपसंहारमधर्मफलसंहितम् । तदेव फलमन्वेति धर्मश्चाधर्मनाशनः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘जो पुरुष प्रबल अधर्मके फलसे बँधा हुआ है, उसे धर्मका फल नहीं मिलता । वह उस अधर्मफलको ही पाता है । हाँ, यदि उस अधर्मके बाद किसी प्रबल धर्मका अनुष्ठान किया गया हो तो वह पहलेके अधर्मका नाशक होता है* ॥ २८ ॥
प्राप्तं धर्मफलं तावद् भवता नात्र संशयः । फलमस्याप्यधर्मस्य क्षिप्रमेव प्रपत्स्यसे ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘तुमने पहले जो धर्म किया था, उसका पूरा-पूरा फल तो यहाँ पा लिया, अब इस सीताहरणरूपी अधर्मका फल भी तुम्हें शीघ्र ही मिलेगा ॥ २९ ॥
जनस्थानवधं बुद्ध्वा वालिनश्च वधं तथा । रामसुग्रीवसख्यं च बुद्ध्यस्व हितमात्मनः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘जनस्थानके राक्षसोंका संहार, वालीका वध और श्रीराम तथा सुग्रीवकी मैत्री—इन तीनों कार्योंको अच्छी तरह समझ लो । उसके बाद अपने हितका विचार करो ॥ ३० ॥
कामं खल्वहमप्येकः सवाजिरथकुञ्जराम् । लङ्कां नाशयितुं शक्तस्तस्यैष तु न निश्चयः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि मैं अकेला ही हाथी, घोड़े और रथोंसहित समूची लङ्काका नाश कर सकता हूँ, तथापि श्रीरघुनाथजीका ऐसा विचार नहीं है—उन्होंने मुझे इस कार्यके लिये आज्ञा नहीं दी है ॥ ३१ ॥
रामेण हि प्रतिज्ञातं हर्यृक्षगणसंनिधौ । उत्सादनममित्राणां सीता यैस्तु प्रधर्षिता ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जिन लोगोंने सीताका तिरस्कार किया है, उन शत्रुओंका स्वयं ही संहार करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीने वानरों और भालुओंके सामने प्रतिज्ञा की है ॥ ३२ ॥
अपकुर्वन् हि रामस्य साक्षादपि पुरंदरः । न सुखं प्राप्नुयादन्यः किं पुनस्त्वद्विधो जनः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘भगवान् श्रीरामका अपराध करके साक्षात् इन्द्र भी सुख नहीं पा सकते, फिर तुम्हारे-जैसे साधारण लोगोंकी तो बात ही क्या है ! ॥ ३३ ॥
यां सीतेत्यभिजानासि येयं तिष्ठति ते गृहे । कालरात्रीति तां विद्धि सर्वलङ्काविनाशिनीम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘जिनको तुम सीताके नामसे जानते हो और जो इस समय तुम्हारे अन्तःपुरमें मौजूद हैं, उन्हें सम्पूर्ण लङ्काका विनाश करनेवाली कालरात्रि समझो ॥ ३४ ॥
तदलं कालपाशेन सीताविग्रहरूपिणा । स्वयं स्कन्धावसक्तेन क्षेममात्मनि चिन्त्यताम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘सीताका शरीर धारण करके तुम्हारे पास कालकी फाँसी आ पहुँची है, उसमें स्वयं गला फँसाना ठीक नहीं है; अतः अपने कल्याणकी चिन्ता करो ॥ ३५ ॥
सीतायास्तेजसा दग्धां रामकोपप्रदीपिताम् । दह्यमानामिमां पश्य पुरीं साट्टप्रतोलिकाम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘देखो, अट्टालिकाओं और गलियोंसहित यह लङ्कापुरी सीताजीके तेज और श्रीरामकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्म होने जा रही है ( बचा सको तो बचाओ ) ॥ ३६ ॥
स्वानि मित्राणि मन्त्रींश्च ज्ञातीन् भ्रातॄन् सुतान् हितान् । भोगान् दारांश्च लङ्कां च मा विनाशमुपानय ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘इन मित्रों, मन्त्रियों, कुटुम्बीजनों, भाइयों, पुत्रों, हितकारियों, स्त्रियों, सुख-भोगके साधनों तथा समूची लङ्काको मौतके मुखमें न झोंको ॥ ३७ ॥
सत्यं राक्षसराजेन्द्र शृणुष्व वचनं मम । रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषतः ॥ ३८ ॥ सर्वाल्लोकान् सुसंहृत्य सभूतान् सचराचरान् । पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशाः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘राक्षसोंके राजाधिराज ! मैं भगवान् श्रीरामका दास हूँ, दूत हूँ और विशेषतः वानर हूँ । मेरी सच्ची बात सुनो—॥ ‘महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके फिर उनका नये सिरेसे निर्माण करनेकी शक्ति रखते हैं ॥ ३९ ॥
देवासुरनरेन्द्रेषु यक्षरक्षोरगेषु च । विद्याधरेषु नागेषु गन्धर्वेषु मृगेषु च ॥ ४० ॥ सिद्धेषु किंनरेन्द्रेषु पतत्रिषु च सर्वतः । सर्वत्र सर्वभूतेषु सर्वकालेषु नास्ति सः ॥ ४१ ॥ यो रामं प्रति युध्येत विष्णुतुल्यपराक्रमम् ।
भावार्थ
‘भगवान् श्रीराम श्रीविष्णुके तुल्य पराक्रमी हैं । देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर, नाग, गन्धर्व, मृग, सिद्ध, किंनर, पक्षी एवं अन्य समस्त प्राणियोंमें कहीं किसी समय कोई भी ऐसा नहीं है, जो श्रीरघुनाथजीके साथ लोहा ले सके ॥ ४०-४१½ ॥
सर्वलोकेश्वरस्येह कृत्वा विप्रियमीदृशम् । रामस्य राजसिंहस्य दुर्लभं तव जीवितम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर राजसिंह श्रीरामका ऐसा महान् अपराध करके तुम्हारा जीवित रहना कठिन है ॥ ४२ ॥
देवाश्च दैत्याश्च निशाचरेन्द्र गन्धर्वविद्याधरनागयक्षाः । रामस्य लोकत्रयनायकस्य स्थातुं न शक्ताः समरेषु सर्वे ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘निशाचरराज ! श्रीरामचन्द्रजी तीनों लोकोंके स्वामी हैं। देवता, दैत्य, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा यक्ष—ये सब मिलकर भी युद्धमें उनके सामने नहीं टिक सकते ॥ ४३ ॥
ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘चार मुखोंवाले स्वयम्भू ब्रह्मा, तीन नेत्रोंवाले त्रिपुरनाशक रुद्र अथवा देवताओंके स्वामी महान् ऐश्वर्यशाली इन्द्र भी समराङ्गणमें श्रीरघुनाथजीके सामने नहीं ठहर सकते’ ॥ ४४ ॥
स सौष्ठवोपेतमदीनवादिनः कपेर्निशम्याप्रतिमोऽप्रियं वचः । दशाननः कोपविवृत्तलोचनः समादिशत् तस्य वधं महाकपेः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
वीरभावसे निर्भयतापूर्वक भाषण करनेवाले महाकपि हनुमान्जीकी बातें बड़ी सुन्दर एवं युक्तियुक्त थीं, तथापि वे रावणको अप्रिय लगीं । उन्हें सुनकर अनुपम शक्तिशाली दशानन रावणने क्रोधसे आँखें तरेरकर सेवकोंको उनके वधके लिये आज्ञा दी ॥ ४५ ॥
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