सुन्दरकाण्ड, सर्ग 46
हतान् मन्त्रिसुतान् बुद्ध्वा वानरेण महात्मना। रावणः संवृताकारश्चकार मतिमुत्तमाम् ॥ १ ॥
भावार्थ
महात्मा हनुमान्जीके द्वारा मन्त्रीके पुत्र भी मारे गये—यह जानकर रावणने भयभीत होनेपर भी अपने आकारको प्रयत्नपूर्वक छिपाया और उत्तम बुद्धिका आश्रय ले आगेके कर्तव्यका निश्चय किया ॥ १ ॥
स विरूपाक्षयूपाक्षौ दुर्धरं चैव राक्षसम्। प्रघसं भासकर्णं च पञ्च सेनाग्रनायकान् ॥ २ ॥ संदिदेश दशग्रीवो वीरान् नयविशारदान्। हनूमद्ग्रहणेऽव्यग्रान् वायुवेगसमान् युधि ॥ ३ ॥
भावार्थ
दशग्रीवने विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण—इन पाँच सेनापतियोंको, जो बड़े वीर, नीति-निपुण, धैर्यवान् तथा युद्धमें वायुके समान वेगशाली थे, हनुमान्जीको पकड़नेके लिये आज्ञा दी ॥ २-३ ॥
यात सेनाग्रगाः सर्वे महाबलपरिग्रहाः। सवाजिरथमातङ्गाः स कपिः शास्यतामिति ॥ ४ ॥
भावार्थ
उसने कहा—‘सेनाके अग्रगामी वीरो ! तुमलोग घोड़े, रथ और हाथियोंसहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानरको बलपूर्वक पकड़कर उसे अच्छी तरह शिक्षा दो ॥ ४ ॥
यत्तैश्च खलु भाव्यं स्यात् तमासाद्य वनालयम्। कर्म चापि समाधेयं देशकालाविरोधितम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘उस वनचारी वानरके पास पहुँचकर तुम सब लोगोंको सावधान और अत्यन्त प्रयत्नशील हो जाना चाहिये तथा काम वही करना चाहिये, जो देश और कालके अनुरूप हो ॥ ५ ॥
न ह्यहं तं कपिं मन्ये कर्मणा प्रति तर्कयन्। सर्वथा तन्महद् भूतं महाबलपरिग्रहम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जब मैं उसके अलौकिक कर्मको देखते हुए उसके स्वरूपपर विचार करता हूँ, तब वह मुझे वानर नहीं जान पड़ता है। वह सर्वथा कोई महान् प्राणी है, जो महान् बलसे सम्पन्न है ॥ ६ ॥
वानरोऽयमिति ज्ञात्वा नहि शुद्ध्यति मे मनः। नैवाहं तं कपिं मन्ये यथेयं प्रस्तुता कथा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘‘यह वानर है’ ऐसा समझकर मेरा मन उसकी ओरसे शुद्ध (विश्वस्त) नहीं हो रहा है। यह जैसा प्रसङ्ग उपस्थित है, या जैसी बातें चल रही हैं. उन्हें देखते हुए मैं उसे वानर नहीं मानता हूँ ॥ ७ ॥
भवेदिन्द्रेण वा सृष्टमस्मदर्थं तपोबलात्। सनागयक्षगन्धर्वदेवासुरमहर्षयः ॥ ८ ॥ युष्माभिः प्रहितैः सर्वैर्मया सह विनिर्जिताः। तैरवश्यं विधातव्यं व्यलीकं किंचिदेव नः ॥ ९ ॥ तदेव नात्र संदेहः प्रसह्य परिगृह्यताम्। यात सेनाग्रगाः सर्वे महाबलपरिग्रहाः ॥ १० ॥ सवाजिरथमातङ्गाः स कपिः शास्यतामिति।
भावार्थ
‘सम्भव है इन्द्रने हमलोगोंका विनाश करनेके लिये अपने तपोबलसे इसकी सृष्टि की हो। मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंने मेरे साथ रहकर नागोंसहित यक्षों, गन्धर्वों, देवताओं, असुरों और महर्षियोंको भी अनेक बार पराजित किया है; अतः वे अवश्य हमारा कुछ अनिष्ट करना चाहेंगे ॥ ‘अतः यह उन्हींका रचा हुआ प्राणी है, इसमें संदेह नहीं। तुमलोग उसे हठपूर्वक पकड़ ले आओ। मेरी सेनाके अग्रगामी वीरो ! तुम हाथी, घोड़े और रथोंसहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानरको अच्छी तरह शिक्षा दो ॥ १०½ ॥
नावमन्यो भवद्भिश्च कपिर्धीरपराक्रमः ॥ ११ ॥ दृष्टा हि हरयः पूर्वे मया विपुलविक्रमाः।
भावार्थ
‘वानर समझकर तुम्हें उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह धीर और पराक्रमी है। मैंने पहले बड़े-बड़े पराक्रमी वानर और भालू देखे हैं ॥ ११½ ॥
वाली च सह सुग्रीवो जाम्बवांश्च महाबलः ॥ १२ ॥ नीलः सेनापतिश्चैव ये चान्ये द्विविदादयः।
भावार्थ
‘जिनके नाम इस प्रकार हैं—वाली, सुग्रीव, महाबली जाम्बवान्, सेनापति नील तथा द्विविद आदि अन्य वानर ॥ १२½ ॥
नैव तेषां गतिर्भीमा न तेजो न पराक्रमः ॥ १३ ॥ न मतिर्न बलोत्साहो न रूपपरिकल्पनम्।
भावार्थ
‘किंतु उनका वेग ऐसा भयंकर नहीं है और न उनमें ऐसा तेज, पराक्रम, बुद्धि, बल, उत्साह तथा रूप धारण करनेकी शक्ति ही है ॥ १३½ ॥
महत्सत्त्वमिदं ज्ञेयं कपिरूपं व्यवस्थितम् ॥ १४ ॥ प्रयत्नं महदास्थाय क्रियतामस्य निग्रहः ।
भावार्थ
‘वानरके रूपमें यह कोई बड़ा शक्तिशाली जीव प्रकट हुआ है, ऐसा जानना चाहिये । अतः तुमलोग महान् प्रयत्न करके उसे कैद करो ॥ १४½ ॥
कामं लोकास्त्रयः सेन्द्राः ससुरासुरमानवाः ॥ १५ ॥ भवतामग्रतः स्थातुं न पर्याप्ता रणाजिरे ।
भावार्थ
‘भले ही इन्द्रसहित देवता, असुर, मनुष्य एवं तीनों लोक उतर आयें, वे रणभूमिमें तुम्हारे सामने ठहर नहीं सकते ॥ १५½ ॥
तथापि तु नयज्ञेन जयमाकाङ्क्षता रणे ॥ १६ ॥ आत्मा रक्ष्यः प्रयत्नेन युद्धसिद्धिर्हि चञ्चला ।
भावार्थ
‘तथापि समराङ्गणमें विजयकी इच्छा रखनेवाले नीतिज्ञ पुरुषको यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि युद्धमें सफलता अनिश्चित होती है’ ॥ १६½ ॥
ते स्वामिवचनं सर्वे प्रतिगृह्य महौजसः ॥ १७ ॥ समुत्पेतुर्महावेगा हुताशसमतेजसः । रथैश्च मत्तैर्नागैश्च वाजिभिश्च महाजवैः ॥ १८ ॥ शस्त्रैश्च विविधैस्तीक्ष्णैः सर्वैश्चोपहिता बलैः ।
भावार्थ
स्वामीकी आज्ञा स्वीकार करके वे सब-के-सब अग्निके समान तेजस्वी, महान् वेगशाली और अत्यन्त बलवान् राक्षस तेज चलनेवाले घोड़ों, मतवाले हाथियों तथा विशाल रथोंपर बैठकर युद्धके लिये चल दिये । वे सब प्रकारके तीखे शस्त्रों और सेनाओंसे सम्पन्न थे ॥ १७-१८½ ॥
ततस्तु दद्दशुर्वीरा दीप्यमानं महाकपिम् ॥ १९ ॥ रश्मिमन्तमिवोद्यन्तं स्वतेजोरश्मिमालिनम् । तोरणस्थं महावेगं महासत्त्वं महाबलम् ॥ २० ॥ महामतिं महोत्साहं महाकायं महाभुजम् ।
भावार्थ
आगे जानेपर उन वीरोंने देखा महाकपि हनुमान्जी फाटकपर खड़े हैं और अपनी तेजोमयी किरणोंसे मण्डित हो उदयकालके सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं । उनकी शक्ति, बल, वेग, बुद्धि, उत्साह, शरीर और भुजाएँ सभी महान् थीं ॥ १९-२०½ ॥
तं समीक्ष्यैव ते सर्वे दिक्षु सर्वास्ववस्थिताः ॥ २१ ॥ तैस्तैः प्रहरणैर्भीमैरभिपेतुस्ततस्ततः ।
भावार्थ
उन्हें देखते ही वे सब राक्षस, जो सभी दिशाओंमें खड़े थे, भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए चारों ओरसे उनपर टूट पड़े ॥ २१½ ॥
तस्य पञ्चायसास्तीक्ष्णाः सिताः पीतमुखाः शराः । शिरस्युत्पलपत्राभा दुर्धरेण निपातिताः ॥ २२ ॥
भावार्थ
निकट पहुँचनेपर पहले दुर्धरने हनुमान्जीके मस्तकपर लोहेके बने हुए पाँच बाण मारे । वे सभी बाण मर्मभेदी और पैनी धारवाले थे । उनके अग्रभागपर सोनेका पानी दिया गया था । जिससे वे पीतमुख दिखायी देते थे । वे पाँचों बाण उनके सिरपर प्रफुल्लकमलदलके समान शोभा पा रहे थे ॥ २२ ॥
स तैः पञ्चभिराविद्धः शरैः शिरसि वानरः । उत्पपात नदन् व्योम्नि दिशो दश विनादयन् ॥ २३ ॥ ततस्तु दुर्धरो वीरः सरथः सज्जकार्मुकः । किरञ्शरशतैर्नैकैरभिपेदे महाबलः ॥ २४ ॥
भावार्थ
मस्तकमें उन पाँच बाणोंसे गहरी चोट खाकर वानरवीर हनुमान्जी अपनी भीषण गर्जनासे दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए आकाशमें ऊपरकी ओर उछल पड़े ॥ तब रथमें बैठे हुए महाबली वीर दुर्धरने धनुष चढ़ाये कई सौ बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया ॥ २४ ॥
स कपिर्वारयामास तं व्योम्नि शरवर्षिणम् । वृष्टिमन्तं पयोदान्ते पयोदमिव मारुतः ॥ २५ ॥
भावार्थ
आकाशमें खड़े हुए उन वानरवीरने बाणोंकी वर्षा करते हुए दुर्धरको अपने हुंकारमात्रसे उसी प्रकार रोक दिया, जैसे वर्षा-ऋतुके अन्तमें वृष्टि करनेवाले बादलको वायु रोक देती है ॥ २५ ॥
अर्द्यमानस्ततस्तेन दुर्धरेणानिलात्मजः । चकार निनदं भूयो व्यवर्धत च वीर्यवान् ॥ २६ ॥
भावार्थ
जब दुर्धर अपने बाणोंसे अधिक पीड़ा देने लगा, तब वे परम पराक्रमी पवनकुमार पुनः विकट गर्जना करने और अपने शरीरको बढ़ाने लगे ॥ २६ ॥
स दूरं सहसोत्पत्य दुर्धरस्य रथे हरिः । निपपात महावेगो विद्युद्राशिर्गिराविव ॥ २७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वे महावेगशाली वानरवीर बहुत दूरतक ऊँचे उछलकर सहसा दुर्धरके रथपर कूद पड़े, मानो किसी पर्वतपर बिजलीका समूह गिर पड़ा हो ॥ २७ ॥
ततः स मथिताष्टाश्वं रथं भग्नाक्षकूबरम् । विहाय न्यपतद् भूमौ दुर्धरस्त्यक्तजीवितः ॥ २८ ॥
भावार्थ
उनके भारसे रथके आठों घोड़ोंका कचूमर निकल गया, धुरी और कूबर टूट गये तथा दुर्धर प्राणहीन हो उस रथको छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २८ ॥
तं विरूपाक्षयूपाक्षौ दृष्ट्वा निपतितं भुवि । तौ जातरोषौ दुर्धर्षावुत्पेततुररिन्दमौ ॥ २९ ॥
भावार्थ
दुर्धरको धराशायी हुआ देख शत्रुओंका दमन करनेवाले दुर्धर्ष वीर विरूपाक्ष और यूपाक्षको बड़ा क्रोध हुआ । वे दोनों आकाशमें उछले ॥ २९ ॥
स ताभ्यां सहसोत्प्लुत्य विष्ठितो विमलेऽम्बरे । मुद्गराभ्यां महाबाहुर्वक्षस्यभिहतः कपिः ॥ ३० ॥
भावार्थ
उन दोनोंने सहसा उछलकर निर्मल आकाशमें खड़े हुए महाबाहु कपिवर हनुमान्जीकी छातीमें मुद्गरोंसे प्रहार किया ॥ ३० ॥
तयोर्वेगवतोर्वेगं निहत्य स महाबलः। निपपात पुनर्भूमौ सुपर्ण इव वेगितः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उन दोनों वेगवान् वीरोंके वेगको विफल करके महाबली हनुमान्जी वेगशाली गरुड़के समान पुनः पृथ्वीपर कूद पड़े ॥ ३१ ॥
स सालवृक्षमासाद्य समुत्पाट्य च वानरः । तावुभौ राक्षसौ वीरौ जघान पवनात्मजः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वहाँ वानरशिरोमणि पवनकुमारने एक साल-वृक्षके पास जाकर उसे उखाड़ लिया और उसीके द्वारा उन दोनों राक्षसवीरोंको मार डाला ॥ ३२ ॥
ततस्तांस्त्रीन् हताञ्ज्ञात्वा वानरेण तरस्विना । अभिपेदे महावेगः प्रहस्य प्रघसो बली ॥ ३३ ॥ भासकर्णश्च संक्रुद्धः शूलमादाय वीर्यवान् । एकतः कपिशार्दूलं यशस्विनमवस्थितौ ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उन वेगशाली वानरवीरके द्वारा उन तीनों राक्षसोंको मारा गया देख महान् वेगसे युक्त बलवान् वीर प्रघस हँसता हुआ उनके पास आया । दूसरी ओरसे पराक्रमी वीर भासकर्ण भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर शूल हाथमें लिये वहाँ आ पहुँचा । वे दोनों यशस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीके निकट एक ही ओर खड़े हो गये ॥ ३३-३४ ॥
पट्टिशेन शिताग्रेण प्रघसः प्रत्यपोथयत् । भासकर्णश्च शूलेन राक्षसः कपिकुञ्जरम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
प्रघसने तेज धारवाले पट्टिशसे तथा राक्षस भासकर्णने शूलसे कपिकुञ्जर हनुमान्जीपर प्रहार किया ॥ ३५ ॥
स ताभ्यां विक्षतैर्गात्रैरसृग्दिग्धतनूरुहः । अभवद् वानरः क्रुद्धो बालसूर्यसमप्रभः ॥ ३६ ॥ समुत्पाट्य गिरेः शृङ्गं समृगव्यालपादपम् । जघान हनुमान् वीरो राक्षसौ कपिकुञ्जरः । गिरिशृङ्गसुनिष्पिष्टौ तिलशस्तौ बभूवतुः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उन दोनोंके प्रहारोंसे हनुमान्जीके शरीरमें कई जगह घाव हो गये और उनके शरीरकी रोमावली रक्तसे रँग गयी । उस समय क्रोधमें भरे हुए वानरवीर हनुमान् प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे॥ तब मृग, सर्प और वृक्षोंसहित एक पर्वत-शिखरको उखाड़कर कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान्ने उन दोनों राक्षसोंपर दे मारा । पर्वत-शिखरके आघातसे वे दोनों पिस गये और उनके शरीर तिलके समान खण्ड-खण्ड हो गये ॥ ३७ ॥
ततस्तेष्ववसन्नेषु सेनापतिषु पञ्चसु । बलं तद्वशेषं तु नाशयामास वानरः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उन पाँचों सेनापतियोंके नष्ट हो जानेपर हनुमान्जीने उनकी बची-खुची सेनाका भी संहार आरम्भ किया ॥ ३८ ॥
अश्वैरश्वान् गजैर्नागान् योधैर्योधान् रथै रथान् । स कपिर्नाशयामास सहस्राक्ष इवासुरान् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
जैसे देवराज इन्द्र असुरोंका विनाश करते हैं, उसी प्रकार उन वानरवीरने घोड़ोंसे घोड़ोंका, हाथियोंसे हाथियोंका, योद्धाओंसे योद्धाओंका और रथोंसे रथोंका संहार कर डाला ॥ ३९ ॥
हयैर्नागैस्तुरंगैश्च भग्नाक्षैश्च महारथैः । हतैश्च राक्षसैर्भूमी रुद्धमार्गा समन्ततः ॥ ४० ॥
भावार्थ
मरे हुए हाथियों और तीव्रगामी घोड़ोंसे, टूटी हुई धुरीवाले विशाल रथोंसे तथा मारे गये राक्षसोंकी लाशोंसे वहाँकी सारी भूमि चारों ओरसे इस तरह पट गयी थी कि आने-जानेका रास्ता बंद हो गया था ॥ ४० ॥
ततः कपिस्तान् ध्वजिनीपतीन् रणे निहत्य वीरान् सबलान् सवाहनान् । तथैव वीरः परिगृह्य तोरणं कृतक्षणः काल इव प्रजाक्षये ॥ ४१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार सेना और वाहनोंसहित उन पाँचों वीर सेनापतियोंको रणभूमिमें मौतके घाट उतारकर महावीर वानर हनुमान्जी पुनः युद्धके लिये अवसर पाकर पहलेकी ही भाँति फाटकपर जाकर खड़े हो गये । उस समय वे प्रजाका संहार करनेके लिये उद्यत हुए कालके समान जान पड़ते थे ॥ ४१ ॥
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