सुन्दरकाण्ड, सर्ग 45
ततस्ते राक्षसेन्द्रेण चोदिता मन्त्रिणः सुताः । निर्ययुर्भवनात् तस्मात् सप्त सप्तार्चिवर्चसः ॥ १ ॥
भावार्थ
राक्षसोंके राजा रावणकी आज्ञा पाकर मन्त्रीके सात बेटे, जो अग्निके समान तेजस्वी थे, उस राजमहलसे बाहर निकले ॥ १ ॥
महद्बलपरीवारा धनुष्मन्तो महाबलाः । कृतास्त्रास्त्रविदां श्रेष्ठाः परस्परजयैषिणः ॥ २ ॥
भावार्थ
उनके साथ बहुत बड़ी सेना थी । वे अत्यन्त बलवान्, धनुर्धर, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा परस्पर होड़ लगाकर शत्रुपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले थे ॥ २ ॥
हेमजालपरिक्षिप्तैर्ध्वजवद्भिः पताकिभिः । तोयदस्वननिर्घोषैर्वाजियुक्तैर्महारथैः ॥ ३ ॥ तप्तकाञ्चनचित्राणि चापान्यमितविक्रमाः । विस्फारयन्तः संहृष्टास्तडिद्वन्त इवाम्बुदाः ॥ ४ ॥
भावार्थ
उनके घोड़े जुते हुए विशाल रथ सोनेकी जालीसे ढके हुए थे । उनपर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके पहियोंके चलनेसे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान ध्वनि होती थी । ऐसे रथोंपर सवार हो वे अमित पराक्रमी मन्त्रिकुमार तपाये हुए सोनेसे चित्रित अपने धनुषोंकी टङ्कार करते हुए बड़े हर्ष और उत्साहके साथ आगे बढ़े । उस समय वे सब-के-सब विद्युत्सहित मेघके समान शोभा पाते थे ॥ ३-४ ॥
जनन्यस्तास्तत्तस्तेषां विदित्वा किंकरान् हतान् । बभूवुः शोकसम्भ्रान्ताः सबान्धवसुहृज्जनाः ॥ ५ ॥
भावार्थ
तब, पहले जो किंकरनामक राक्षस मारे गये थे, उनकी मृत्युका समाचार पाकर इन सबकी माताएँ अमङ्गलकी आशङ्कासे भाई-बन्धु और सुहृदोंसहित शोकसे घबरा उठीं ॥ ५ ॥
ते परस्परसंघर्षात् तप्तकाञ्चनभूषणाः । अभिपेतुर्हनूमन्तं तोरणस्थमवस्थितम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे विभूषित वे सातों वीर परस्पर होड़-सी लगाकर फाटकपर खड़े हुए हनुमान्जीपर टूट पड़े ॥ ६ ॥
सृजन्तो बाणवृष्टिं ते रथगर्जितनिःस्वनाः । प्रावृट्काल इवाम्भोदा विबेरुर्नैर्ऋताम्बुदाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
जैसे वर्षाकालमें मेघ वर्षा करते हुए विचरते हैं, उसी प्रकार वे राक्षसरूपी बादल बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ विचरण करने लगे । रथोंकी घर्घराहट ही उनकी गर्जना थी ॥ ७ ॥
अवकीर्णस्ततस्ताभिर्हनूमाञ्शरवृष्टिभिः । अभवत् संवृताकारः शैलराडिव वृष्टिभिः ॥ ८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर राक्षसोंद्वारा की गयी उस बाण-वर्षासे हनुमान्जी उसी तरह आच्छादित हो गये, जैसे कोई गिरिराज जलकी वर्षासे ढक गया हो ॥ ८ ॥
स शरान् वञ्चयामास तेषामाशुचरः कपिः । रथवेगांश्च वीराणां विचरन् विमलेऽम्बरे ॥ ९ ॥
भावार्थ
उस समय निर्मल आकाशमें शीघ्रतापूर्वक विचरते हुए कपिवर हनुमान् उन राक्षसवीरोंके बाणों तथा रथके वेगोंको व्यर्थ करते हुए अपने-आपको बचाने लगे ॥ ९ ॥
स तैः क्रीडन् धनुष्मद्भिर्व्योम्नि वीरः प्रकाशते । धनुष्मद्भिर्यथा मेघैर्मारुतः प्रभुरम्बरे ॥ १० ॥
भावार्थ
जैसे व्योममण्डलमें शक्तिशाली वायुदेव इन्द्रधनुष-युक्त मेघोंके साथ क्रीडा करते हैं, उसी प्रकार वीर पवनकुमार उन धनुर्धर वीरोंके साथ खेल-सा करते हुए आकाशमें अद्भुत शोभा पा रहे थे ॥ १० ॥
स कृत्वा निनदं घोरं त्रासयंस्तां महाचमूम् । चकार हनुमान् वेगं तेषु रक्षःसु वीर्यवान् ॥ ११ ॥
भावार्थ
पराक्रमी हनुमान्ने राक्षसोंकी उस विशाल वाहिनीको भयभीत करते हुए घोर गर्जना की और उन राक्षसोंपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ ११ ॥
तलेनाभिहनत् कांश्चित् पादैः कांश्चित् परंतपः । मुष्टिभिश्चाहनत् कांश्चिन्नखैः कांश्चिद् व्यदारयत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
शत्रुओंको संताप देनेवाले उन वानरवीरने किन्हींको थप्पड़से ही मार गिराया, किन्हींको पैरोंसे कुचल डाला, किन्हींका घूँसोंसे काम तमाम किया और किन्हींको नखोंसे फाड़ डाला ॥ १२ ॥
प्रममाथोरसा कांश्चिदूरुभ्यामपरानपि । केचित् तस्यैव नादेन तत्रैव पतिता भुवि ॥ १३ ॥
भावार्थ
कुछ लोगोंको छातीसे दबाकर उनका कचूमर निकाल दिया और किन्हीं-किन्हींको दोनों जाँघोंसे दबोचकर मसल डाला । कितने ही निशाचर उनकी गर्जनासे ही प्राणहीन होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥
ततस्तेष्ववपन्नेषु भूमौ निपतितेषु च । तत्सैन्यमगमत् सर्वं दिशो दश भयार्दितम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार जब मन्त्रीके सारे पुत्र मारे जाकर धराशायी हो गये, तब उनकी बची-खुची सारी सेना भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग गयी ॥ १४ ॥
विनेदुर्विस्वरं नागा निपेतुर्भुवि वाजिनः । भग्ननीडध्वजच्छत्रैर्भूश्च कीर्णाभवद् रथैः ॥ १५ ॥
भावार्थ
उस समय हाथी वेदनाके मारे बुरी तरहसे चिंग्घाड़ रहे थे, घोड़े धरतीपर मरे पड़े थे तथा जिनके बैठक, ध्वज और छत्र आदि खण्डित हो गये थे, ऐसे टूटे हुए रथोंसे समूची रणभूमि पट गयी थी ॥ १५ ॥
स्रवता रुधिरेणाथ स्रवन्त्यो दर्शिताः पथि । विविधैश्च स्वनैर्लङ्का ननाद विकृतं तदा ॥ १६ ॥
भावार्थ
मार्गमें खूनकी नदियाँ बहती दिखायी दीं तथा लङ्कापुरी राक्षसोंके विविध शब्दोंके कारण मानो उस समय विकृत स्वरसे चीत्कार कर रही थी ॥ १६ ॥
स तान् प्रवृद्धान् विनिहत्य राक्षसान् महाबलश्चण्डपराक्रमः कपिः । युयुत्सुरन्यैः पुनरेव राक्षसै- स्तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
प्रचण्ड पराक्रमी और महाबली वानरवीर हनुमान्जी उन बढ़े-चढ़े राक्षसोंको मौतके घाट उतारकर दूसरे राक्षसोंके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे फिर उसी फाटकपर जा पहुँचे ॥ १७ ॥
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