सुन्दरकाण्ड, सर्ग 44
संदिष्टो राक्षसेन्द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली । जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्धरः ॥ १ ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावणकी आज्ञा पाकर प्रहस्तका बलवान् पुत्र जम्बुमाली, जिसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, हाथमें धनुष लिये राजमहलसे बाहर निकला ॥ १ ॥
रक्तमाल्याम्बरधरः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः । महान् विवृत्तनयनश्चण्डः समरदुर्जयः ॥ २ ॥
भावार्थ
वह लाल रंगके फूलोंकी माला और लाल रंगके ही वस्त्र पहने हुए था । उसके गलेमें हार और कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभा दे रहे थे । उसकी आँखें घूम रही थीं । वह विशालकाय, क्रोधी और संग्राममें दुर्जय था ॥ २ ॥
धनुः शक्रधनुःप्रख्यं महद् रुचिरसायकम् । विस्फारयाणो वेगेन वज्राशनिसमस्वनम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
उसका धनुष इन्द्रधनुषके समान विशाल था । उसके द्वारा छोड़े जानेवाले बाण भी बड़े सुन्दर थे । जब वह वेगसे उस धनुषको खींचता, तब उससे वज्र और अशनिके समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी ॥ ३ ॥
तस्य विस्फारघोषेण धनुषो महता दिशः । प्रदिशश्च नभश्चैव सहसा समपूर्यत ॥ ४ ॥
भावार्थ
उस धनुषकी महती टंकार-ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाएँ, विदिशाएँ और आकाश सभी सहसा गूँज उठे ॥ ४ ॥
रथेन खरयुक्तेन तमागतमुदीक्ष्य सः । हनूमान् वेगसम्पन्नो जहर्ष च ननाद च ॥ ५ ॥
भावार्थ
वह गधे जुते हुए रथपर बैठकर आया था । उसे देखकर वेगशाली हनुमान्जी बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ५ ॥
तं तोरणविटङ्कस्थं हनूमन्तं महाकपिम् । जम्बुमाली महातेजा विव्याध निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी जम्बुमालीने महाकपि हनुमान्जीको फाटकके छज्जेपर खड़ा देख उन्हें तीखे बाणोंसे बींधना आरम्भ कर दिया ॥ ६ ॥
अर्धचन्द्रेण वदने शिरस्येकेन कर्णिना । बाह्वोर्विव्याध नाराचैर्दशभिस्तु कपीश्वरम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
उसने अर्धचन्द्रनामक बाणसे उनके मुखपर, कर्णीनामक एक बाणसे मस्तकपर और दस नाराचोंसे उन कपीश्वरकी दोनों भुजाओंपर गहरी चोट की ॥ ७ ॥
तस्य तच्छुशुभे ताम्रं शरेणाभिहतं मुखम् । शरदीवाम्बुजं फुल्लं विद्धं भास्कररश्मिना ॥ ८ ॥
भावार्थ
उसके बाणसे घायल हुआ हनुमान्जीका लाल मुँह शरद्-ऋतुमें सूर्यकी किरणोंसे विद्ध हो खिले हुए लाल कमलके समान शोभा पा रहा था ॥ ८ ॥
तत्तस्य रक्तं रक्तेन रञ्जितं शुशुभे मुखम् । यथाऽऽकाशे महापद्मं सिक्तं काञ्चनबिन्दुभिः ॥ ९ ॥
भावार्थ
रक्तसे रञ्जित हुआ उनका वह रक्तवर्णका मुख ऐसी शोभा पा रहा था, मानो आकाशमें लाल रंगके विशाल कमलको सुवर्णमय जलकी बूँदोंसे सींच दिया गया हो—उस पर सोनेका पानी चढ़ा दिया गया हो ॥ ९ ॥
चुकोप बाणाभिहतो राक्षसस्य महाकपिः । ततः पार्श्वेऽतिविपुलां ददर्श महतीं शिलाम् ॥ १० ॥ तरसा तां समुत्पाट्य चिक्षेप जववद् बली ।
भावार्थ
राक्षस जम्बुमालीके बाणोंकी चोट खाकर महाकपि हनुमान्जी कुपित हो उठे । उन्होंने अपने पास ही पत्थरकी एक बहुत बड़ी चट्टान पड़ी देखी और उसे वेगसे उठाकर उन बलवान् वीरने बड़े जोरसे उस राक्षसकी ओर फेंका ॥ १०½ ॥
तां शरैर्दशभिः क्रुद्धस्ताडयामास राक्षसः ॥ ११ ॥ विपन्नं कर्म तद् दृष्ट्वा हनूमांश्चण्डविक्रमः । सालं विपुलमुत्पाट्य भ्रामयामास वीर्यवान् ॥ १२ ॥
भावार्थ
किंतु क्रोधमें भरे उस राक्षसने दस बाण मारकर उस प्रस्तर-शिलाको तोड़-फोड़ डाला । अपने उस कर्मको व्यर्थ हुआ देख प्रचण्ड पराक्रमी और बलशाली हनुमान्ने एक विशाल सालका वृक्ष उखाड़कर उसे घुमाना आरम्भ किया ॥ ११-१२ ॥
भ्रामयन्तं कपिं दृष्ट्वा सालवृक्षं महाबलम् । चिक्षेप सुबहून् बाणाञ्जम्बुमाली महाबलः ॥ १३ ॥
भावार्थ
उन महान् बलशाली वानरवीरको सालका वृक्ष घुमाते देख महाबली जम्बुमालीने उनके ऊपर बहुत-से बाणोंकी वर्षा की ॥ १३ ॥
सालं चतुर्भिश्चिच्छेद वानरं पञ्चभिर्भुजे । उरस्येकेन बाणेन दशभिस्तु स्तनान्तरे ॥ १४ ॥ स शरैः पूरिततनुः क्रोधेन महता वृतः । तमेव परिघं गृह्य भ्रामयामास वेगितः ॥ १५ ॥
भावार्थ
उसने चार बाणोंसे सालवृक्षको काट गिराया, पाँचसे हनुमान्जीकी भुजाओंमें, एक बाणसे उनकी छातीमें और दस बाणोंसे उनके दोनों स्तनोंके मध्यभागमें चोट पहुँचायी ॥ बाणोंसे हनुमान्जीका सारा शरीर भर गया । फिर तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उसी परिघको उठाकर उसे बड़े वेगसे घुमाना आरम्भ किया ॥ १५ ॥
अतिवेगोऽतिवेगेन भ्रामयित्वा बलोत्कटः । परिघं पातयामास जम्बुमालेर्महोरसि ॥ १६ ॥
भावार्थ
अत्यन्त वेगवान् और उत्कट बलशाली हनुमान्ने बड़े वेगसे घुमाकर उस परिघको जम्बुमालीकी विशाल छातीपर दे मारा ॥ १६ ॥
तस्य चैव शिरो नास्ति न बाहू जानुनी न च । न धनुर्न रथो नाश्वास्तत्रादृश्यन्त नेषवः ॥ १७ ॥
भावार्थ
फिर तो न उसके मस्तकका पता लगा और न दोनों भुजाओं तथा घुटनोंका ही । न धनुष बचा न रथ, न वहाँ घोड़े दिखायी दिये और न बाण ही ॥ १७ ॥
स हतस्तरसा तेन जम्बुमाली महारथः । पपात निहतो भूमौ चूर्णिताङ्ग इव द्रुमः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस परिघसे वेगपूर्वक मारा गया महारथी जम्बुमाली चूर-चूर हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १८ ॥
जम्बुमालिं सुनिहतं किंकरांश्च महाबलान् । चुकोप रावणः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १९ ॥
भावार्थ
जम्बुमाली तथा महाबली किंकरोंके मारे जानेका समाचार सुनकर रावणको बड़ा क्रोध हुआ । उसकी आँखें रोषसे रक्तवर्णकी हो गयीं ॥ १९ ॥
स रोषसंवर्तितताम्रलोचनः प्रहस्तपुत्रे निहते महाबले । अमात्यपुत्रानतिवीर्यविक्रमान् समादिदेशाशु निशाचरेश्वरः ॥ २० ॥
भावार्थ
महाबली प्रहस्तपुत्र जम्बुमालीके मारे जानेपर निशाचरराज रावणके नेत्र रोषसे लाल होकर घूमने लगे । उसने तुरंत ही अपने मन्त्रीके पुत्रोंको, जो बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी ॥ २० ॥
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