सुन्दरकाण्ड, सर्ग 39
मणिं दत्त्वा ततः सीता हनूमन्तमथात्रवीत् । अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः ॥ १ ॥ मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति । वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च ॥ २ ॥
भावार्थ
मणि देनेके पश्चात् सीता हनुमान्जीसे बोलीं—‘मेरे इस चिह्नको भगवान् श्रीरामचन्द्रजी भलीभाँति पहचानते हैं॥ ‘इस मणिको देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियोंका—मेरी माताका, मेरा तथा महाराज दशरथका एक साथ ही स्मरण करेंगे ॥ २ ॥
स भूयस्त्वं समुत्साहचोदितो हरिसत्तम । अस्मिन् कार्यसमुत्साहे प्रचिन्तय यदुत्तरम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! तुम पुनः विशेष उत्साहसे प्रेरित हो इस कार्यकी सिद्धिके लिये जो भावी कर्तव्य हो, उसे सोचो ॥३॥
त्वमस्मिन् कार्यनियोगे प्रमाणं हरिसत्तम । तस्य चिन्तय यो यत्नो दुःखक्षयकरो भवेत् ॥ ४ ॥ हनूमन् यत्नमास्थाय दुःखक्षयकरो भव । स तथेति प्रतिज्ञाय मारुतिर्भीमविक्रमः ॥ ५ ॥ शिरसाऽऽवन्द्य वैदेहीं गमनायोपचक्रमे ।
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! इस कार्यको निभानेमें तुम्हीं प्रमाण हो—तुमपर ही सारा भार है । तुम इसके लिये कोई ऐसा उपाय सोचो, जो मेरे दुःखका निवारण करनेवाला हो ॥ ‘हनूमन् ! तुम विशेष प्रयत्न करके मेरा दुःख दूर करनेमें सहायक बनो ।’ तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सीताजीकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके वे भयंकर पराक्रमी पवनकुमार विदेहनन्दिनीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर वहाँसे जानेको तैयार हुए ॥ ५½ ॥
ज्ञात्वा सम्प्रस्थितं देवी वानरं पवनात्मजम् ॥ ६ ॥ बाष्पगद्गदया वाचा मैथिली वाक्यमब्रवीत् ।
भावार्थ
पवनपुत्र वानरवीर हनुमान्को वहाँसे लौटनेके लिये उद्यत जान मिथिलेशकुमारीका गला भर आया और वे अश्रुगद्गद वाणीमें बोलीं—॥ ६½ ॥
हनूमन् कुशलं ब्रूयाः सहितौ रामलक्ष्मणौ ॥ ७ ॥ सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् वृद्धांश्च वानरान् । ब्रूयास्त्वं वानरश्रेष्ठ कुशलं धर्मसंहितम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘हनूमन् ! तुम श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंको एक साथ ही मेरा कुशल-समाचार बताना और उनका कुशल-मङ्गल पूछना । वानरश्रेष्ठ ! फिर मन्त्रियोंसहित सुग्रीव तथा अन्य सब बड़े-बूढ़े वानरोंसे धर्मयुक्त कुशल-समाचार कहना और पूछना ॥ ७-८ ॥
यथा च स महाबाहुर्मां तारयति राघवः । अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् त्वं समाधातुमर्हसि ॥ ९ ॥ जीवन्तीं मां यथा रामः सम्भावयति कीर्तिमान् । तत् त्वया हनुमन् वाच्यं वाचा धर्ममवाप्नुहि ॥ १० ॥
भावार्थ
‘महाबाहु श्रीरघुनाथजी जिस प्रकार इस दुःखके समुद्रसे मेरा उद्धार करें, वैसा ही यत्न तुम्हें करना चाहिये ॥ ‘हनुमन् ! यशस्वी रघुनाथजी जिस प्रकार मेरे जीते-जी यहाँ आकर मुझसे मिलें—मुझे सँभालें वैसी ही बातें तुम उनसे कहो और ऐसा करके वाणीके द्वारा धर्माचरणका फल प्राप्त करो ॥ १० ॥
नित्यमुत्साहयुक्तस्य वाचः श्रुत्वा मयेरिताः । वर्धिष्यते दाशरथेः पौरुषं मदवाप्तये ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘यों तो दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम सदा ही उत्साहसे भरे रहते हैं, तथापि मेरी कही हुई बातें सुनकर मेरी प्राप्तिके लिये उनका पुरुषार्थ और भी बढ़ेगा ॥ ११ ॥
मत्संदेशयुता वाचस्त्वत्तः श्रुत्वैव राघवः । पराक्रमे मतिं वीरो विधिवत् संविधास्यति ॥ १२ ॥ सीतायास्तद् वचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः । शिरस्यञ्जलिमाधाय वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे मुखसे मेरे संदेशसे युक्त बातें सुनकर ही वीर रघुनाथजी पराक्रम करनेमें विधिवत् अपना मन लगायेंगे’ ॥ सीताकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान्ने माथेपर अञ्जलि बाँधकर विनयपूर्वक उनकी बातका उत्तर दिया–॥१३॥
क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हर्यृक्षप्रवरैर्वृतः । यस्ते युधि विजित्यारीन्शोकं व्यपनयिष्यति ॥ १४ ॥ नहि पश्यामि मर्त्येषु नासुरेषु सुरेषु वा । यस्तस्य वमतो बाणान् स्थातुमुत्सहतेऽग्रतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘देवि ! जो युद्धमें सारे शत्रुओंको जीतकर आपके शोकका निवारण करेंगे, वे ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम श्रेष्ठ वानरों और भालुओंके साथ शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे ।१४। ‘मैं मनुष्यों, असुरों अथवा देवताओंमें भी किसीको ऐसा नहीं देखता, जो बाणोंकी वर्षा करते हुए भगवान् श्रीरामके सामने ठहर सके ॥ १५ ॥
अप्यर्कमपि पर्जन्यमपि वैवस्वतं यमम् । स हि सोढुं रणे शक्तस्तव हेतोर्विशेषतः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘भगवान् श्रीराम विशेषतः आपके लिये तो युद्धमें सूर्य, इन्द्र और सूर्यपुत्र यमका भी सामना कर सकते हैं ॥ १६ ॥
स हि सागरपर्यन्तां महीं साधितुमर्हति । त्वन्निमित्तो हि रामस्य जयो जनकनन्दिनि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीको भी जीत लेने योग्य हैं । जनकनन्दिनि ! आपके लिये युद्ध करते समय श्रीरामचन्द्रजीको निश्चय ही विजय प्राप्त होगी’ ॥ १७ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्यक् सत्यं सुभाषितम् । जानकी बहु मेने तं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीका कथन युक्तियुक्त, सत्य और सुन्दर था । उसे सुनकर जनकनन्दिनीने उनका बड़ा आदर किया और वे उनसे फिर कुछ कहनेको उद्यत हुईं ॥ १८ ॥
ततस्तं प्रस्थितं सीता वीक्षमाणा पुनः पुनः । भर्तृस्नेहान्वितं वाक्यं सौहार्दादनुमानयत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वहाँसे प्रस्थित हुए हनुमान्जीकी ओर बार-बार देखती हुई सीताने सौहार्दवश स्वामीके प्रति स्नेहसे युक्त सम्मानपूर्ण बात कही— ॥ १९ ॥
यदि वा मन्यसे वीर वसैकाहमरिंदम । कस्मिश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥ २० ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर ! यदि तुम ठीक समझो तो यहाँ एक दिन किसी गुप्त स्थानमें निवास करो । इस तरह एक दिन विश्राम करके कल चले जाना ॥२०॥
मम चैवाल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर । अस्य शोकस्य महतो मुहूर्तं मोक्षणं भवेत् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वानरवीर ! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीके महान् शोकका थोड़ी देरके लिये निवारण हो जायगा ॥२१॥
ततो हि हरिशार्दूल पुनरागमनाय तु । प्राणानामपि संदेहो मम स्यान्नात्र संशयः ॥ २२ ॥ तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत् । दुःखाद्दुःखपरामृष्टां दीपयन्निव वानर ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! विश्रामके पश्चात् यहाँसे यात्रा करनेके अनन्तर यदि फिर तुमलोगोंके आनेमें संदेह या विलम्ब हुआ तो मेरे प्राणोंपर भी संकट आ जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ‘वानरवीर ! मैं दुःख-पर-दुःख उठा रही हूँ । तुम्हारे चले जानेपर तुम्हें न देख पानेका शोक मुझे पुनः दग्ध करता हुआ-सा संताप देता रहेगा ॥ २३ ॥
अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः । सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्यृक्षेषु हरीश्वर ॥ २४ ॥ कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम् । तानि हर्यृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘वीर वानरेश्वर ! तुम्हारे साथी रीछों और वानरोंके विषयमें मेरे सामने अब भी यह महान् संदेह तो विद्यमान ही है कि वे रीछ और वानरोंकी सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस दुष्पार महासागरको कैसे पार करेंगे ॥ २४-२५ ॥
त्रयाणामेव भूतानां सागरस्येह लङ्घने । शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य तव वा मारुतस्य वा ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘इस संसारमें समुद्रको लाँघनेकी शक्ति तो केवल तीन प्राणियोंमें ही देखी गयी है । तुममें, गरुड़में अथवा वायुदेवतामें ॥ २६ ॥
तदस्मिन् कार्यनियोगे वीरैवं दुरतिक्रमे । किं पश्यसे समाधानं त्वं हि कार्यविदां वरः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘वीर ! इस प्रकार इस समुद्रलङ्घनरूपी कार्यको निभाना अत्यन्त कठिन हो गया है । ऐसी दशामें तुम्हें कार्यसिद्धिका कौन-सा उपाय दिखायी देता है ? यह बताओ; क्योंकि कार्यसिद्धिका उपाय जाननेवाले लोगोंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो ॥२७॥
काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने । पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पवनकुमार ! इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे उद्धाररूपी कार्यको सिद्ध करनेमें पूर्णतः समर्थ हो; परंतु ऐसा करनेसे जो विजयरूप फल प्राप्त होगा, उसका यश केवल तुम्हींको मिलेगा, भगवान् श्रीरामको नहीं ॥ २८ ॥
बलैः समग्रैर्युधि मां रावणं जित्य संयुगे । विजयी स्वपुरं यायात् तत्तस्य सदृशं भवेत् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘यदि रघुनाथजी सारी सेनाके साथ रावणको युद्धमें पराजित करके विजयी हो मुझे साथ ले अपनी पुरीको पधारें तो वह उनके अनुरूप कार्य होगा ॥ २९ ॥
बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः । मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘शत्रुसेनाका संहार करनेवाले श्रीराम यदि अपनी सेनाओंद्वारा लङ्काको पददलित करके मुझे अपने साथ ले चलें तो वही उनके योग्य होगा ॥ ३० ॥
तद्यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः । भवेदाहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘अतः तुम ऐसा उपाय करो जिससे समरशूर महात्मा श्रीरामका उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो’ ॥ ३१ ॥
तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् । निशम्य हनुमाञ्शेषं वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
देवी सीताकी उपर्युक्त बात अर्थयुक्त, स्नेहयुक्त तथा युक्तियुक्त थी । उनकी उस अवशिष्ट बातको सुनकर हनुमान्जीने इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३२ ॥
देवि हर्यृक्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः । सुग्रीवः सत्यसम्पन्नस्तवार्थे कृतनिश्चयः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! वानर और भालुओंकी सेनाके स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव सत्यवादी हैं। वे आपके उद्धारके लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं ॥ ३३ ॥
स वानरसहस्राणां कोटीभिरभिसंवृतः । क्षिप्रमेष्यति वैदेहि राक्षसानां निबर्हणः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! उनमें राक्षसोंका संहार करनेकी शक्ति है । वे सहस्रों कोटि वानरोंकी सेना साथ लेकर शीघ्र ही लङ्कापर चढ़ाई करेंगे ॥ ३४ ॥
तस्य विक्रमसम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः । मनःसंकल्पसम्पाता निदेशे हरयः स्थिताः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘उनके पास पराक्रमी, धैर्यशाली, महाबली और मानसिक संकल्पके समान बहुत दूरतक उछलकर जानेवाले बहुत-से वानर हैं, जो उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा तैयार रहते हैं ॥ ३५ ॥
येषां नोपरि नाधस्तान्न तिर्यक् सज्जते गतिः । न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘जिनकी ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर कहीं भी गति नहीं रुकती । वे बड़े-से-बड़े कार्योंके आ पड़नेपर भी कभी हिम्मत नहीं हारते । उनमें महान् तेज है ॥ ३६ ॥
असकृत् तैर्महोत्साहैः ससागरधराधरा । प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने अत्यन्त उत्साहसे पूर्ण होकर वायुपथ (आकाश) का अनुसरण करते हुए समुद्र और पर्वतोंसहित इस पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा की है ॥ ३७ ॥
मद्विशिष्टाश्च तुल्याश्च सन्ति तत्र वनौकसः । मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीवकी सेनामें मेरे समान तथा मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी वानर हैं । उनके पास कोई भी ऐसा वानर नहीं है जो बल-पराक्रममें मुझसे कम हो ॥ ३८ ॥
अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः । नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘जब मैं ही यहाँ आ गया, तब अन्य महाबली वीरोंके आनेमें क्या संदेह है ? जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उन्हें संदेशवाहक दूत बनाकर नहीं भेजा जाता । साधारण कोटिके लोग ही भेजे जाते हैं ॥ ३९ ॥
तदलं परितापेन देवि शोको व्यपैतु ते । एकोत्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘अतः देवि ! आपको संताप करनेकी आवश्यकता नहीं है । आपका शोक दूर हो जाना चाहिये । वानरयूथपति एक ही छलाँगमें लङ्का पहुँच जायँगे ॥ ४० ॥
मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ । त्वत्सकाशं महासत्त्वौ नृसिंहावागमिष्यतः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘उदयकालके सूर्य और चन्द्रमाकी भाँति शोभा पानेवाले और महान् वानर-समुदायके साथ रहनेवाले वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण मेरी पीठपर बैठकर आपके पास आ पहुँचेंगे ॥ ४१ ॥
तौ हि वीरौ नरवरौ सहितौ रामलक्ष्मणौ । आगम्य नगरीं लङ्कां सायकैर्विधमिष्यतः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीराम और लक्ष्मण एक साथ आकर अपने सायकोंसे लङ्कापुरीका विध्वंस कर डालेंगे ॥४२॥
सगणं रावणं हत्वा राघवो रघुनन्दनः । त्वामादाय वरारोहे स्वपुरीं प्रति यास्यति ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘वरारोहे ! रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीरघुनाथजी रावणको उसके सैनिकोंसहित मारकर आपको साथ ले अपनी पुरीको लौटेंगे ॥ ४३ ॥
तदाश्वसिहि भद्रं ते भव त्वं कालकाङ्क्षिणी । नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं प्रज्वलन्तमिवानलम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘इसलिये आप धैर्य धारण करें । आपका कल्याण हो । आप समयकी प्रतीक्षा करें । प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी श्रीरघुनाथजी आपको शीघ्र ही दर्शन देंगे ॥ ४४ ॥
निहते राक्षसेन्द्रे च सपुत्रामात्यबान्धवे । त्वं समेष्यसि रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘पुत्र, मन्त्री और बन्धु-बान्धवोंसहित राक्षसराज रावणके मारे जानेपर आप श्रीरामचन्द्रजीसे उसी प्रकार मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमासे मिलती है ॥ ४५ ॥
क्षिप्रं त्वं देवि शोकस्य पारं द्रक्ष्यसि मैथिलि । रावणं चैव रामेण द्रक्ष्यसे निहतं बलात् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘देवि ! मिथिलेशकुमारी ! आप शीघ्र ही अपने शोकका अन्त हुआ देखेंगी । आपको यह भी दृष्टिगोचर होगा कि श्रीरामचन्द्रजीने रावणको बलपूर्वक मार डाला है’ ॥४६॥
एवमाश्वास्य वैदेहीं हनुमान् मारुतात्मजः । गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीं पुनरब्रवीत् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
विदेहनन्दिनी सीताको इस प्रकार आश्वासन दे पवनकुमार हनुमान्जीने वहाँसे लौटनेका निश्चय करके उनसे फिर कहा—॥ ४७ ॥
तमरिघ्नं कृतात्मानं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् । लक्ष्मणं च धनुष्पाणिं लङ्काद्वारमुपागतम् ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘देवि ! आप शीघ्र ही देखेंगी कि शुद्ध हृदयवाले शत्रुनाशक श्रीरघुनाथजी तथा लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये लङ्काके द्वारपर आ पहुँचे हैं ॥ ४८ ॥
नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान् । वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान्॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘नख और दाढ़ ही जिनके अस्त्र-शस्त्र हैं तथा जो सिंह और व्याघ्रके समान पराक्रमी एवं गजराजोंके समान विशालकाय हैं, ऐसे वानरोंको भी आप शीघ्र ही एकत्र हुआ देखेंगी ॥ ४९ ॥
शैलाम्बुदनिकाशानां लङ्कामलयसानुषु । नर्दतां कपिमुख्यानामार्ये यूथान्यनेकशः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘आर्ये ! पर्वत और मेघके समान विशालकाय मुख्य-मुख्य वानरोंके बहुत-से झुंड लङ्कावर्ती मलयपर्वतके शिखरोंपर गर्जते दिखायी देंगे ॥ ५० ॥
स तु मर्मणि घोरेण ताडितो मन्मथेषुणा । न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीके मर्मस्थलमें कामदेवके भयंकर बाणोंसे चोट पहुँची है। इसलिये वे सिंहसे पीड़ित हुए गजराजकी भाँति चैन नहीं पाते हैं ॥ ५१ ॥
रुद मा देवि शोकेन मा भूत् ते मनसो भयम् । शचीव भर्त्रा शक्रेण सङ्गमेष्यसि शोभने ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘देवि ! आप शोकके कारण रोदन न करें। आपके मनका भय दूर हो जाय । शोभने ! जैसे शची देवराज इन्द्रसे मिलती हैं, उसी प्रकार आप अपने पतिदेवसे मिलेंगी ॥ ५२ ॥
रामाद् विशिष्टः कोऽन्योऽस्ति कश्चित् सौमित्रिणा समः। अग्निमारुतकल्पौ तौ भ्रातरौ तव संश्रयौ ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘भला, श्रीरामचन्द्रजीसे बढ़कर दूसरा कौन है ? तथा लक्ष्मणजीके समान भी कौन हो सकता है ? अग्नि और वायुके तुल्य तेजस्वी वे दोनों भाई आपके आश्रय हैं ( आपको कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये ) ॥ ५३ ॥
नासिन्निरं वत्स्यसि देवि देशे रक्षोगणैरध्युषितेऽतिरौद्रे । न ते चिरादागमनं प्रियस्य क्षमस्व मत्संगमकालमात्रम् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘देवि ! राक्षसोंद्वारा सेवित इस अत्यन्त भयंकर देशमें आपको अधिक दिनोंतक नहीं रहना पड़ेगा । आपके प्रियतमके आनेमें विलम्ब नहीं होगा । जबतक मेरी उनसे भेंट न हो, उतने समय तकके विलम्बको आप क्षमा करें’ ॥ ५४ ॥
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