सुन्दरकाण्ड, सर्ग 40
श्रुत्वा तु वचनं तस्य वायुसूनोर्महात्मनः । उवाचात्महितं वाक्यं सीता सुरसुतोपमा ॥ १ ॥
भावार्थ
वायुपुत्र महात्मा हनुमान्जीका वचन सुनकर देवकन्याके समान तेजस्विनी सीताने अपने हितके विचारसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
त्वां दृष्ट्वा प्रियवक्तारं सम्प्रहृष्यामि वानर । अर्धसंजातसस्येव वृष्टिं प्राप्य वसुंधरा ॥ २ ॥ यथा तं पुरुषव्याघ्रं गात्रैः शोकाभिकर्शितैः । संस्प्रशेयं सकामाहं तथा कुरु दयां मयि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वानरवीर ! तुमने मुझे बड़ा ही प्रिय संवाद सुनाया है। तुम्हें देखकर हर्षके मारे मेरे शरीरमें रोमाञ्च हो आया है। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाका पानी पड़नेसे आधी जमी हुई खेतीवाली भूमि हरी-भरी हो जाती है॥ ‘मुझपर ऐसी दया करो, जिससे मैं शोकके कारण दुर्बल हुए अपने अङ्गोंद्वारा नरश्रेष्ठ श्रीरामका प्रेमपूर्वक स्पर्श कर सकूँ ॥ ३ ॥
अभिज्ञानं च रामस्य दद्या हरिगणोत्तम । क्षिप्तामिषीकां काकस्य कोपादेकाक्षिशातनीम्॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ ! श्रीरामने क्रोधवश जो कौएकी एक आँखको फोड़नेवाली सींकका बाण चलाया था, उस प्रसङ्गकी तुम पहचानके रूपमें उन्हें याद दिलाना ॥ ४ ॥
मनःशिलायास्तिलको गण्डपार्श्वे निवेशितः । त्वया प्रणष्टे तिलके तं किल स्मर्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मेरी ओरसे यह भी कहना कि प्राणनाथ ! पहलेकी उस बातको भी याद कीजिये, जब कि मेरे कपोलमें लगे हुए तिलकके मिट जानेपर आपने अपने हाथसे मैन्सिलका तिलक लगाया था ॥ ५ ॥
स वीर्यवान् कथं सीतां हृतां समनुमन्यसे । वसन्तीं रक्षसां मध्ये महेन्द्रवरुणोपम ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी प्रियतम ! आप बलवान् होकर भी अपहृत होकर राक्षसोंके घरमें निवास करनेवाली मुझ सीताका तिरस्कार कैसे सहन करते हैं ? ॥६॥
एष चूडामणिर्दिव्यो मया सुपरिरक्षितः । एतं दृष्ट्वा प्रहृष्यामि व्यसने त्वामिवानघ ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप प्राणेश्वर ! इस दिव्य चूडामणिको मैंने बड़े यत्नसे सुरक्षित रक्खा था और संकटके समय इसे देखकर मानो मुझे आपका ही दर्शन हो गया हो, इस तरह मैं हर्षका अनुभव करती थी ॥ ७ ॥
एष निर्यातितः श्रीमान् मया ते वारिसम्भवः । अतः परं न शक्ष्यामि जीवितुं शोकलालसा ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘समुद्रके जलसे उत्पन्न हुआ यह कान्तिमान् मणिरत्न आज आपको लौटा रही हूँ । अब शोकसे आतुर होनेके कारण मैं अधिक समयतक जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ ८ ॥
असह्यानि च दुःखानि वाचश्च हृदयच्छिदः । राक्षसैः सह संवासं त्वत्कृते मर्षयाम्यहम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘दुःसह दुःख, हृदयको छेदनेवाली बातें और राक्षसियोंके साथ निवास—यह सब कुछ मैं आपके लिये ही सह रही हूँ ॥ ९ ॥
धारयिष्यामि मासं तु जीवितं शत्रुसूदन । मासादूर्ध्वं न जीविष्ये त्वया हीना नृपात्मज ॥ १० ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! शत्रुसूदन ! मैं आपकी प्रतीक्षामें किसी तरह एक मासतक जीवन धारण करूँगी । इसके बाद आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ १० ॥
घोरो राक्षसराजोऽयं दृष्टिश्च न सुखा मयि । त्वां च श्रुत्वा विषज्जन्तं न जीवेयमपि क्षणम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘यह राक्षसराज रावण बड़ा क्रूर है । मेरे प्रति इसकी दृष्टि भी अच्छी नहीं है । अब यदि आपको भी विलम्ब करते सुन लूँगी तो मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकती’ ॥ ११ ॥
वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साश्रुभाषितम् । अथाब्रवीन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १२ ॥ त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे । रामे शोकाभिभूते तु लक्ष्मणः परितप्यते ॥ १३ ॥
भावार्थ
सीताजीके यह आँसू बहाते कहे हुए करुणाजनक वचन सुनकर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् जी बोले—॥ ‘देवि ! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरघुनाथजी आपके शोकसे ही सब कामोंसे विमुख हो रहे हैं । श्रीरामके शोकातुर होनेसे लक्ष्मण भी बहुत दुखी रहते हैं ॥ १३ ॥
दृष्टा कथंचिद् भवती न कालः परिदेवितुम् । इमं मुहूर्तं दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि भामिनि ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अब किसी तरह आपका दर्शन हो गया, इसलिये रोने-धोने या शोक करनेका अवसर नहीं रहा । भामिनि ! आप इसी मुहूर्तमें अपने सारे दुःखोंका अन्त हुआ देखेंगी ॥ १४ ॥
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रावनिन्दितौ । त्वद्दर्शनकृतोत्साहौ लङ्कां भस्मीकरिष्यतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वे दोनों भाई पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण सर्वत्र प्रशंसित वीर हैं । आपके दर्शनके लिये उत्साहित होकर वे लङ्कापुरीको भस्म कर डालेंगे ॥ १५ ॥
हत्वा तु समरे रक्षो रावणं सहबान्धवैः । राघवौ त्वां विशालाक्षि स्वां पुरीं प्रति नेष्यतः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘विशाललोचने राक्षस रावणको समराङ्गणमें उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर वे दोनों रघुवंशी बन्धु आपको अपनी पुरीमें ले जायँगे ॥ १६ ॥
यत्तु रामो विजानीयादभिज्ञानमनिन्दिते । प्रीतिसंजननं भूयस्तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘सती-साध्वी देवि ! जिसे श्रीरामचन्द्रजी जान सकें और जो उनके हृदयमें प्रेम एवं प्रसन्नताका संचार करनेवाली हो, ऐसी कोई और भी पहचान आपके पास हो तो वह उनके लिये आप मुझे दें’ ॥ १७ ॥
साब्रवीद् दत्तमेवाहो मयाभिज्ञानमुत्तमम् । एतदेव हि रामस्य दृष्ट्वा यत्नेन भूषणम् ॥ १८ ॥ श्रद्धेयं हनुमन् वाक्यं तव वीर भविष्यति ।
भावार्थ
तब सीताजीने कहा—‘कपिश्रेष्ठ ! मैंने तुम्हें उत्तम-से-उत्तम पहचान तो दे ही दी । वीर हनुमन् ! इसी आभूषणको यत्नपूर्वक देख लेनेपर श्रीरामके लिये तुम्हारी सारी बातें विश्वसनीय हो जायँगी’ ॥ १८½ ॥
स तं मणिवरं गृह्य श्रीमान् प्लवगसत्तमः ॥ १९ ॥ प्रणम्य शिरसा देवीं गमनायोपचक्रमे ।
भावार्थ
उस श्रेष्ठ मणिको लेकर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान् देवी सीताको सिर झुका प्रणाम करनेके पश्चात् वहाँसे जानेको उद्यत हुए ॥ १९½ ॥
तमुत्पातकृतोत्साहमवेक्ष्य हरियूथपम् ॥ २० ॥ वर्धमानं महावेगमुवाच जनकात्मजा । अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद्गदया गिरा ॥ २१ ॥
भावार्थ
वानरयूथपति महावेगशाली हनुमान्को वहाँसे छलाँग मारनेके लिये उत्साहित हो बढ़ते देख जनकनन्दिनी सीताके मुखपर आँसुओंकी धारा बहने लगी । वे दुखी हो अश्रुगद्गद वाणीमें बोलीं—॥ २०-२१ ॥
हनूमन् सिंहसंकाशौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् ब्रूया अनामयम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘हनूमन् ! सिंहके समान पराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे तथा मन्त्रियोंसहित सुग्रीव एवं अन्य सब वानरोंसे मेरा कुशल-मङ्गल कहना ॥ २२ ॥
यथा च स महाबाहुर्मां तारयति राघवः । अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् त्वं समाधातुमर्हसि ॥ २३ ॥ इदं च तीव्रं मम शोकवेगं रक्षोभिरेभिः परिभर्त्सनं च । ब्रूयास्तु रामस्य गतः समीपं शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘महाबाहु श्रीरघुनाथजीको तुम्हें इस प्रकार समझाना चाहिये, जिससे वे दुःखके इस महासागरसे मेरा उद्धार करें ॥ ‘वानरोंके प्रमुख वीर ! मेरा यह दुःसह शोक-वेग और इन राक्षसोंकी यह डाँट-डपट भी तुम श्रीरामके समीप जाकर कहना । जाओ, तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो’ ॥२४॥
स राजपुत्र्या प्रतिवेदितार्थः कपिः कृतार्थः परिहृष्टचेताः । तदल्पशेषं प्रसमीक्ष्य कार्यं दिशं ह्युदीर्चीं मनसा जगाम ॥ २५ ॥
भावार्थ
राजकुमारी सीताके उक्त अभिप्रायको जानकर कपिवर हनुमान्ने अपनेको कृतार्थ समझा और प्रसन्नचित्त होकर थोड़े-से शेष रहे कार्यका विचार करते हुए वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ २५ ॥
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