सुन्दरकाण्ड, सर्ग 41
स च वाग्भिः प्रशस्ताभिर्गमिष्यन् पूजितस्तया । तस्माद् देशादपाक्रम्य चिन्तयामास वानरः ॥ १ ॥
भावार्थ
सीताजीसे उत्तम वचनोंद्वारा समादर पाकर वानरवीर हनुमानजी जब वहाँसे जाने लगे, तब उस स्थानसे दूसरी जगह हटकर वे इस प्रकार विचार करने लगे—॥ १ ॥
अल्पशेषमिदं कार्यं दृष्टेयमसितेक्षणा । त्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ इह दृश्यते ॥ २ ॥
भावार्थ
‘मैंने कजरारे नेत्रोंवाली सीताजीका दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्यका थोड़ा-सा अंश ( शत्रुकी शक्तिका पता लगाना ) शेष रह गया है । इसके लिये चार उपाय हैं—साम, दान, भेद और दण्ड । यहाँ साम आदि तीन उपायोंको लाँघकर केवल चौथे उपाय ( दण्ड ) का प्रयोग ही उपयोगी दिखायी देता है ॥ २ ॥
न साम रक्षःसु गुणाय कल्पते न दानमर्थोपचितेषु युज्यते । न भेदसाध्या बलदर्पिता जनाः पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘राक्षसोंके प्रति सामनीतिका प्रयोग करनेसे कोई लाभ नहीं होता । इनके पास धन भी बहुत है, अतः इन्हें दान देनेका भी कोई उपयोग नहीं है । इसके सिवा, ये बलके अभिमानमें चूर रहते हैं. अतः भेदनीतिके द्वारा भी इन्हें वशमें नहीं किया जा सकता । ऐसी दशामें मुझे यहाँ पराक्रम दिखाना ही उचित जान पड़ता है ॥ ३ ॥
न चान्य कार्यस्य पराक्रमादृते विनिश्चयः कश्चिदिहोपपद्यते । हतप्रवीराश्च रणे तु राक्षसाः कथंचिदीयुर्यदिहाद्य मार्दवम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘इस कार्यकी सिद्धिके लिये पराक्रमके सिवा यहाँ और किसी उपायका अवलम्बन ठीक नहीं जँचता । यदि युद्धमें राक्षसोंके मुख्य-मुख्य वीर मारे जायँ तो ये लोग किसी तरह कुछ नरम पड़ सकते हैं ॥ ४ ॥
कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत् । पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जो पुरुष प्रधान कार्यके सम्पन्न हो जानेपर दूसरे-दूसरे बहुत-से कार्योंको भी सिद्ध कर लेता है और पहलेके कार्योंमें बाधा नहीं आने देता, वही कार्यको सुचारु रूपमें कर सकता है ॥ ५ ॥
न ह्येकः साधको हेतुः स्वल्पस्यापीह कर्मणः । यो ह्यर्थे बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘छोटे-से-छोटे कर्मकी भी सिद्धिके लिये कोई एक ही साधक हेतु नहीं हुआ करता । जो पुरुष किसी कार्य या प्रयोजनको अनेक प्रकारसे सिद्ध करनेकी कला जानता हो, वही कार्य-साधनमें समर्थ हो सकता है ॥ ६ ॥
इहैव तावत्कृतनिश्चयो ह्यहं व्रजेयमद्य प्लवगेश्वरालयम् । परात्मसम्मर्दविशेषतत्त्ववित् ततः कृतं स्यान्मम भर्तृशासनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘यदि इसी यात्रामें मैं इस बातको ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्षमें युद्ध होनेपर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्यके कार्यका भी निश्चय करके आज सुग्रीवके पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामीकी आज्ञाका पूर्णरूपसे पालन हुआ समझा जायगा ॥ ७ ॥
कथं नु खल्वद्य भवेत् सुखागतं प्रसह्य युद्धं मम राक्षसैः सह । तथैव खल्वात्मबलं च सारवत् समानयेन्मां च रणे दशाननः ॥ ८ ॥ ततः समासाद्य रणे दशाननं समन्त्रिवर्गं सबलं सयायिनम् । हृदि स्थितं तस्य मतं बलं च सुखेन मत्वाहमितः पुनर्व्रजे ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘परंतु आज मेरा यहाँतक आना सुखद अथवा शुभ परिणामका जनक कैसे होगा ? राक्षसोंके साथ हठात् युद्ध करनेका अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा ? तथा दशमुख रावण समरमें अपनी सेनाको और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टिसे देखकर कैसे यह समझ सकेगा कि कौन सबल है ? ॥ ‘उस युद्धमें मन्त्री, सेना और सहायकोंसहित रावणका सामना करके मैं उसके हार्दिक अभिप्राय तथा सैनिक-शक्तिका अनायास ही पता लगा लूँगा । उसके बाद यहाँसे जाऊँगा ॥ ९ ॥
इदमस्य नृशंसस्य नन्दनोपममुत्तमम् । वनं नेत्रमनःकान्तं नानाद्रुमलतायुतम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘इस निर्दयी रावणका यह सुन्दर उपवन नेत्रोंको आनन्द देनेवाला और मनोरम है । नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त होनेके कारण यह नन्दनवनके समान उत्तम प्रतीत होता है ॥ १० ॥
इदं विध्वंसयिष्यामि शुष्कं वनमिवानलः । अस्मिन् भग्नेततः कोपं करिष्यति स रावणः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जैसे आग सूखे वनको जला डालती है, उसी प्रकार मैं भी आज इस उपवनका विध्वंस कर डालूँगा । इसके भग्न हो जानेपर रावण अवश्य मुझपर क्रोध करेगा ॥ ११ ॥
ततो महत्साश्वमहारथद्विपं बलं समानेष्यति राक्षसाधिपः । त्रिशूलकालायसपट्टिशायुधं ततो महद्युद्धमिदं भविष्यति ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथोंसे युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा । फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा’ ॥ १२ ॥
अहं च तैः संयति चण्डविक्रमैः समेत्य रक्षोभिरभङ्गविक्रमः । निहत्य तद् रावणचोदितं बलं सुखं गमिष्यामि हरीश्वरालयम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘उस युद्धमें मेरी गति रुक नहीं सकती । मेरा पराक्रम कुण्ठित नहीं हो सकता । मैं प्रचण्ड पराक्रम दिखानेवाले उन राक्षसोंसे भिड़ जाऊँगा और रावणकी भेजी हुई उस सारी सेनाको मौतके घाट उतारकर सुखपूर्वक सुग्रीवके निवासस्थान किष्किन्धापुरीको लौट जाऊँगा’ ॥ १३ ॥
ततो मारुतवत् क्रुद्धो मारुतिर्भीमविक्रमः । ऊरुवेगेन महता द्रुमान् क्षेप्तुमथारभत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसा सोचकर भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले पवनकुमार हनुमानजी क्रोधसे भर गये और वायुके समान बड़े भारी वेगसे वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगे ॥ १४ ॥
ततस्तद्धनुमान् वीरो बभञ्ज प्रमदावनम् । मत्तद्विजसमाघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम् ॥ १५ ॥ तद्वनं मथितैर्वृक्षैर्भिन्नैश्च सलिलाशयैः । चूर्णितैः पर्वताग्रैश्च बभूवाप्रियदर्शनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वीर हनुमान्ने मतवाले पक्षियोंके कलरवसे मुखरित और नाना प्रकारके वृक्षों एवं लताओंसे भरे-पूरे उस प्रमदावन ( अन्तःपुरके उपवन ) को उजाड़ डाला ।१५। वहाँके वृक्षोंको खण्ड-खण्ड कर दिया । जलाशयोंको मथ डाला और पर्वत-शिखरोंको चूर-चूर कर डाला । इससे वह सुन्दर वन कुछ ही क्षणोंमें अभव्य दिखायी देने लगा ॥ १६ ॥
नानाशकुन्तविरुतैः प्रभिन्नसलिलाशयैः । ताम्रैः किसलयैः क्लान्तैः क्लान्तद्रुमलतायुतैः ॥ १७ ॥ न बभौ तद् वनं तत्र दावानलहतं यथा । व्याकुलावरणा रेजुर्विह्वला इव ता लताः ॥ १८ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके पक्षी वहाँ भयके मारे चें-चें करने लगे, जलाशयोंके घाट टूट-फूट गये, तामेके समान वृक्षोंके लाल-लाल पल्लव मुरझा गये तथा वहाँके वृक्ष और लताएँ भी रौंद डाली गयीं । इन सब कारणोंसे वह प्रमदावन वहाँ ऐसा जान पड़ता था, मानो दावानलसे झुलस गया हो । वहाँकी लताएँ अपने आवरणोंके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेसे घबरायी हुई स्त्रियोंके समान प्रतीत होती थीं ॥ १७-१८ ॥
लतागृहैश्चित्रगृहैश्च सादितै- र्व्यालैर्मृगैरार्तरवैश्च पक्षिभिः । शिलागृहैरुन्मथितैस्तथा गृहैः प्रणष्टरूपं तदभून्महद् वनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
लतामण्डप और चित्रशालाएँ उजाड़ हो गयीं । पाले हुए हिंसक जन्तु, मृग तथा तरह-तरहके पक्षी आर्तनाद करने लगे । प्रस्तरनिर्मित प्रासाद तथा अन्य साधारण गृह भी तहस-नहस हो गये । इससे उस महान् प्रमदावनका सारा रूप-सौन्दर्य नष्ट हो गया ॥ १९ ॥
सा विह्वलाशोकलताप्रताना वनस्थली शोकलताप्रताना । जाता दशास्यप्रमदावनस्य कपेर्बलाद्धि प्रमदावनस्य ॥ २० ॥
भावार्थ
दशमुख रावणकी स्त्रियोंकी रक्षा करनेवाले तथा अन्तःपुरके क्रीडाविहारके लिये उपयोगी उस विशाल कानन-की भूमि, जहाँ चञ्चल अशोक-लताओंके समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमान्जीके बलप्रयोगसे श्रीहीन होकर शोचनीय लताओंके विस्तारसे युक्त हो गयी ( उसकी दुरवस्था देखकर दर्शकके मनमें दुःख होता था ) ॥ २० ॥
ततः स कृत्वा जगतीपतेर्महान् महद् व्यलीकं मनसो महात्मनः । युयुत्सुरेको बहुभिर्महाबलैः श्रिया ज्वलंस्तोरणमाश्रितः कपिः॥ २१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार महामना राजा रावणके मनको विशेष कष्ट पहुँचानेवाला कार्य करके अनेक महाबलियोंके साथ अकेले ही युद्ध करनेका हौसला लेकर कपिश्रेष्ठ हनुमानजी प्रमदावनके फाटकपर आ गये । उस समय वे अपने अद्भुत तेजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ २१ ॥
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