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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 42

ततः पक्षिनिनादेन वृक्षभङ्गस्वनेन च । बभूवुस्त्राससम्भ्रान्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः ॥ १ ॥

भावार्थ

उधर पक्षियोंके कोलाहल और वृक्षोंके टूटनेकी आवाज सुनकर समस्त लङ्कानिवासी भयसे घबरा उठे ॥ १ ॥

विद्रुताश्च भयत्रस्ता विनेदुर्मृगपक्षिणः । रक्षसां च निमित्तानि क्रूराणि प्रतिपेदिरे ॥ २ ॥

भावार्थ

पशु और पक्षी भयभीत होकर भागने तथा आर्तनाद करने लगे । राक्षसोंके सामने भयंकर अपशकुन प्रकट होने लगे ॥ २ ॥

ततो गतायां निद्रायां राक्षस्यो विकृताननाः । तद् वनं दद्दशुर्भग्नं तं च वीरं महाकपिम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

प्रमदावनमें सोयी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियोंकी निद्रा टूट गयी । उन्होंने उठनेपर उस वनको उजड़ा हुआ देखा । साथ ही उनकी दृष्टि उन वीर महाकपि हनुमान्जीपर भी पड़ी ॥ ३ ॥

स ता दृष्ट्वा महाबाहुर्महासत्त्वो महाबलः । चकार सुमहद्रूपं राक्षसीनां भयावहम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

महाबली, महान् साहसी एवं महाबाहु हनुमान्जीने जब उन राक्षसियोंको देखा, तब उन्हें डरानेवाला विशाल रूप धारण कर लिया ॥ ४ ॥

ततस्तु गिरिसंकाशमतिकायं महाबलम् । राक्षस्यो वानरं दृष्ट्वा पप्रच्छुर्जनकात्मजाम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

पर्वतके समान बड़े शरीरवाले महाबली वानरको देखकर वे राक्षसियाँ जनकनन्दिनी सीतासे पूछने लगीं—॥ ५ ॥

कोऽयं कस्य कुतो वायं किंनिमित्तमिहागतः । कथं त्वया सहानेन संवादः कृत इत्युत ॥ ६ ॥ आचक्ष्व नो विशालाक्षि मा भूत्ते सुभगे भयम् । संवादमसितापाङ्गि त्वया किं कृतवानयम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘विशाललोचने ! यह कौन है ? किसका है ? और कहाँसे किसलिये यहाँ आया है ? इसने तुम्हारे साथ क्यों बातचीत की है ? कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सुन्दरि ! ये सब बातें हमें बताओ। तुम्हें डरना नहीं चाहिये । इसने तुम्हारे साथ क्या बातें की थीं ?’ ॥ ६-७ ॥

अथाब्रवीत् तदा साध्वी सीता सर्वाङ्गशोभना । रक्षसां कामरूपाणां विज्ञाने का गतिर्मम ॥ ८ ॥

भावार्थ

तब सर्वाङ्गसुन्दरी साध्वी सीताने कहा—‘इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंको समझने या पहचाननेका मेरे पास क्या उपाय है ?॥ ८ ॥

यूयमेवास्य जानीत योऽयं यद् वा करिष्यति । अहिरेव ह्यहेः पादान् विजानाति न संशयः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तुम्हीं जानो यह कौन है और क्या करेगा ? साँपके पैरोंको साँप ही पहचानता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

अहमप्यतिभीतास्मि नैव जानामि को ह्ययम् । वेद्मि राक्षसमेवैनं कामरूपिणमागतम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘मैं भी इसे देखकर बहुत डरी हुई हूँ । मुझे नहीं मालूम कि यह कौन है ? मैं तो इसे इच्छानुसार रूप धारण करके आया हुआ कोई राक्षस ही समझती हूँ’ ॥ १० ॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा राक्षस्यो विद्रुता द्रुतम् । स्थिताः काश्चिद्गताः काश्चिद् रावणाय निवेदितुम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

विदेहनन्दिनी सीताकी यह बात सुनकर राक्षसियाँ बड़े वेगसे भागीं । उनमेंसे कुछ तो वहीं खड़ी हो गयीं और कुछ रावणको सूचना देनेके लिये चली गयीं ॥ ११ ॥

रावणस्य समीपे तु राक्षस्यो विकृताननाः । विरूपं वानरं भीमं रावणाय न्यवेदिषुः ॥ १२ ॥

भावार्थ

रावणके समीप जाकर उन विकराल मुखवाली राक्षसियोंने रावणको यह सूचना दी कि कोई विकटरूपधारी भयंकर वानर प्रमदावनमें आ पहुँचा है ॥ १२ ॥

अशोकवनिकामध्ये राजन् भीमवपुः कपिः । सीतया कृतसंवादस्तिष्ठत्यमितविक्रमः ॥ १३ ॥ न च तं जानकी सीता हरिं हरिणलोचना । अस्माभिर्बहुधा पृष्ठा निवेदयितुमिच्छति ॥ १४ ॥

भावार्थ

वे बोलीं— ‘राजन् ! अशोकवाटिकामें एक वानर आया है, जिसका शरीर बड़ा भयंकर है । उसने सीतासे बातचीत की है । वह महापराक्रमी वानर अभी वहीं मौजूद है ॥ ‘हमने बहुत पूछा तो भी जनककिशोरी मृगनयनी सीता उस वानरके विषयमें हमें कुछ बताना नहीं चाहती है ॥१४॥

वासवस्य भवेद् दूतो दूतो वैश्रवणस्य वा । प्रेषितो वापि रामेण सीतान्वेषणकाङ्क्षया ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘सम्भव है वह इन्द्र या कुबेरका दूत हो अथवा श्रीरामने ही उसे सीताकी खोजके लिये भेजा हो ॥ १५ ॥

तेनैवाद्भुतरूपेण यत्तत्तव मनोहरम् । नानामृगगणाकीर्णं प्रमृष्टं प्रमदावनम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘अद्भुत रूप धारण करनेवाले उस वानरने आपके मनोहर प्रमदावनको, जिसमें नाना प्रकारके पशु-पक्षी रहा करते थे, उजाड़ दिया ॥ १६ ॥

न तत्र कश्चिदुद्देशो यस्तेन न विनाशितः । यत्र सा जानकी देवी स तेन न विनाशितः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘प्रमदावनका कोई भी ऐसा भाग नहीं है, जिसको उसने नष्ट न कर डाला हो । केवल वह स्थान, जहाँ जानकी देवी रहती हैं, उसने नष्ट नहीं किया है ॥ १७ ॥

जानकीरक्षणार्थं वा श्रमाद् वा नोपलक्ष्यते । अथवा कः श्रमस्तस्य सैव तेनाभिरक्षिता ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘जानकीजीकी रक्षाके लिये उसने उस स्थानको बचा दिया है या परिश्रमसे थककर—यह निश्चित रूपसे नहीं जान पड़ता है । अथवा उसे परिश्रम तो क्या हुआ होगा ? उसने उस स्थानको बचाकर सीताकी ही रक्षा की है ॥ १८ ॥

चारुपल्लवपत्राढ्यं यं सीता स्वयमास्थिता । प्रवृद्धः शिंशपावृक्षः स च तेनाभिरक्षितः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘मनोहर पल्लवों और पत्तोंसे भरा हुआ वह विशाल अशोक वृक्ष, जिसके नीचे सीताका निवास है, उसने सुरक्षित रख छोड़ा है ॥ १९ ॥

तस्योग्ररूपस्योग्रं त्वं दण्डमाज्ञातुमर्हसि । सीता सम्भाषिता येन वनं तेन विनाशितम् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘जिसने सीतासे वार्तालाप किया और उस वनको उजाड़ डाला, उस उग्र रूपधारी वानरको आप कोई कठोर दण्ड देनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ २० ॥

मनःपरिगृहीतां तां तव रक्षोगणेश्वर । कः सीतामभिभाषेत यो न स्यात् त्यक्तजीवितः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! जिन्हें आपने अपने हृदयमें स्थान दिया है, उन सीता देवीसे कौन बातें कर सकता है ? जिसने अपने प्राणोंका मोह नहीं छोड़ा है, वह उनसे वार्तालाप कैसे कर सकता है ?’ ॥ २१ ॥

राक्षसीनां वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः । चितामिनिरिवज्वाल कोपसंवर्तितेक्षणः ॥ २२ ॥

भावार्थ

राक्षसियोंकी यह बात सुनकर राक्षसोंका राजा रावण प्रज्वलित चिताकी भाँति क्रोधसे जल उठा। उसके नेत्र रोषसे घूमने लगे ॥ २२ ॥

तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः । दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥ २३ ॥

भावार्थ

क्रोधमें भरे हुए रावणकी आँखोंसे आँसूकी बूँदें टपकने लगीं, मानो जलते हुए दो दीपकोंसे आगकी लपटोंके साथ तेलकी बूँदें झर रही हों ॥ २३ ॥

आत्मनः सदृशान् वीरान् किंकरान्नाम राक्षसान् । व्यादिदेश महातेजा निग्रहार्थं हनूमतः ॥ २४ ॥

भावार्थ

उस महातेजस्वी निशाचरने हनुमान्जीको कैद करनेके लिये अपने ही समान वीर किंकर नामधारी राक्षसोंको जानेकी आज्ञा दी ॥ २४ ॥

तेषामशीतिसाहस्रं किंकराणां तरस्विनाम् । निर्ययुर्भवनात् तस्मात् कूटमुद्गरपाणयः ॥ २५ ॥

भावार्थ

राजाकी आज्ञा पाकर अस्सी हजार वेगवान् किंकर हाथोंमें कूट और मुद्गर लिये उस महलसे बाहर निकले ॥ २५ ॥

महोदरा महादंष्ट्रा घोररूपा महाबलाः । युद्धाभिमनसः सर्वे हनूमद्ग्रहणोन्मुखाः ॥ २६ ॥

भावार्थ

उनकी दाढ़ें विशाल, पेट बड़ा और रूप भयानक था । वे सब-के-सब महान् बली, युद्धके अभिलाषी और हनुमान्जीको पकड़नेके लिये उत्सुक थे ॥ २६ ॥

ते कपिं तं समासाद्य तोरणस्थमवस्थितम् । अभिपेतुर्महावेगाः पतङ्गा इव पावकम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

प्रमदावनके फाटकपर खड़े हुए उन वानरवीरके पास पहुँचकर वे महान् वेगशाली निशाचर उनपर चारों ओरसे इस प्रकार झपटे, जैसे फतिंगे आगपर टूट पड़े हों ॥ २७ ॥

ते गदाभिर्विचित्राभिः परिघैः काञ्चनाङ्गदैः । आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं शरैरादित्यसंनिभैः ॥ २८ ॥

भावार्थ

वे विचित्र गदाओं, सोनेसे मढ़े हुए परिघों और सूर्यके समान प्रज्वलित बाणोंके साथ वानरश्रेष्ठ हनुमान्पर चढ़ आये ॥ २८ ॥

मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः प्रासतोमरपाणयः । परिवार्य हनूमन्तं सहसा तस्थुरग्रतः ॥ २९ ॥

भावार्थ

हाथमें प्रास और तोमर लिये मुद्गर, पट्टिश और शूलोंसे सुसज्जित हो वे सहसा हनुमान्को चारों ओरसे घेरकर उनके सामने खड़े हो गये ॥ २९ ॥

हनूमानपि तेजस्वी श्रीमान् पर्वतसंनिभः । क्षितावाविद्ध्य लाङ्गूलं ननाद च महाध्वनिम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

तब पर्वतके समान विशाल शरीरवाले तेजस्वी श्रीमान् हनुमान् भी अपनी पूँछको पृथ्वीपर पटककर बड़े जोरसे गर्जने लगे ॥ ३० ॥

स भूत्वा तु महाकायो हनूमान् मारुतात्मजः । पुच्छमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

पवनपुत्र हनुमान् अत्यन्त विशाल शरीर धारण करके अपनी पूँछ फटकारने और उसके शब्दसे लङ्काको प्रतिध्वनित करने लगे ॥ ३१ ॥

तस्यास्फोटितशब्देन महता चानुनादिना। पेतुर्विहङ्गा गगनादुच्चैश्चेदमघोषयत् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

उनकी पूँछ फटकारनेका गम्भीर घोष बहुत दूर तक गूँज उठता था । उससे भयभीत हो पक्षी आकाशसे गिर पड़ते थे । उस समय हनुमान्जीने उच्च स्वरसे इस प्रकार घोषणा की—॥ ३२ ॥

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः। राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ ३३ ॥ दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनूमाञ्छत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः ॥ ३४ ॥ न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्। शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः ॥ ३५ ॥ अर्दयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम्। समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘अत्यन्त बलवान् भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणकी जय हो । श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो । मैं अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजीका दास हूँ । मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायुका पुत्र तथा शत्रुसेनाका संहार करनेवाला हूँ । जब मैं हजारों वृक्ष और पत्थरोंसे प्रहार करने लगूँगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्धमें मेरे बलकी समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते । मैं लङ्कापुरीको तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीताको प्रणाम करनेके अनन्तर सब राक्षसोंके देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’ ॥ ३३—३६ ॥

तस्य संनादशब्देन तेऽभवन् भयशङ्किताः। ददृशुश्च हनूमन्तं संध्यामेघमिवोन्नतम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीकी इस गर्जनासे समस्त राक्षसोंपर भय एवं आतङ्क छा गया । उन सबने हनुमान्जीको देखा । वे संध्याकालके ऊँचे मेघके समान लाल एवं विशालकाय दिखायी देते थे ॥ ३७ ॥

खामिसंदेशनिःशङ्कास्ततस्ते राक्षसाः कपिम्। चित्रैः प्रहरणैर्भीमैरभिपेतुस्ततस्ततः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीने अपने स्वामीका नाम लेकर स्वयं ही अपना परिचय दे दिया था, इसलिये राक्षसोंको उन्हें पहचाननेमें कोई संदेह नहीं रहा । वे नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए चारों ओरसे उनपर टूट पड़े ॥ ३८ ॥

स तैः परिवृतः शूरैः सर्वतः स महाबलः। आससादायसं भीमं परिघं तोरणाश्रितम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

उन शूरवीर राक्षसोंद्वारा सब ओरसे घिर जानेपर महाबली हनुमान्ने फाटकपर रक्खा हुआ एक भयंकर लोहेका परिघ उठा लिया ॥ ३९ ॥

स तं परिघमादाय जघान रजनीचरान्। सपत्नगमिवादाय स्फुरन्तं विनतासुतः ॥ ४० ॥

भावार्थ

जैसे विनतानन्दन गरुड़ने छटपटाते हुए सर्पको पंजोंमें दाब रक्खा हो, उसी प्रकार उस परिघको हाथमें लेकर हनुमान्जीने उन निशाचरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ४० ॥

विचचाराम्बरे वीरः परिगृह्य च मारुतिः। सूदयामास वज्रेण दैत्यानिव सहस्रदृक् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

वीर पवनकुमार उस परिघको लेकर आकाशमें विचरने लगे । जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने वज्रसे दैत्योंका वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघसे सामने आये हुए समस्त राक्षसोंको मार डाला ॥ ४१ ॥

स हत्वा राक्षसान् वीरः किंकरान् मारुतात्मजः। युद्धाकाङ्क्षी महावीरस्तोरणं समवस्थितः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

उन किंकर नामधारी राक्षसोंका वध करके महावीर पवनपुत्र हनुमान्जी युद्धकी इच्छासे पुनः उस फाटकपर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥

ततस्तस्माद् भयान्मुक्ताः कतिचित्तत्र राक्षसाः। निहतान् किंकरान् सर्वान् रावणाय न्यवेदयन् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वहाँ उस भयसे मुक्त हुए कुछ राक्षसोंने जाकर रावणको यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये ॥ ४३ ॥

स राक्षसानां निहतं महाबलं निशम्य राजा परिवृत्तलोचनः। समादिदेशाप्रतिमं पराक्रमे प्रहस्तपुत्रं समरे सुदुर्जयम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

राक्षसोंकी उस विशाल सेनाको मारी गयी सुनकर राक्षसराज रावणकी आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्तके पुत्रको जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्धमें जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमान्जीका सामना करनेके लिये भेजा ॥ ४४ ॥

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