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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 38

ततः स कपिशार्दूलस्तेन वाक्येन तोषितः । सीतामुवाच तच्छ्रुत्वा वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ १ ॥

भावार्थ

सीताके इस वचनसे कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे बातचीतमें कुशल थे । उन्होंने पूर्वोक्त बातें सुनकर सीतासे कहा—॥ १ ॥

युक्तरूपं त्वया देवि भाषितं शुभदर्शने । सदृशं स्त्रीस्वभावस्य साध्वीनां विनयस्य च ॥ २ ॥

भावार्थ

‘देवि ! आपका कहना बिल्कुल ठीक और युक्तिसंगत है । शुभदर्शने ! आपकी यह बात नारी-स्वभावके तथा पतिव्रताओंकी विनयशीलताके अनुरूप है ॥ २ ॥

स्त्रीत्वान्न त्वं समर्थासि सागरं व्यतिवर्तितुम् । मामधिष्ठाय विस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘इसमें संदेह नहीं कि आप अबला होनेके कारण मेरी पीठपर बैठकर सौ योजन विस्तृत समुद्रके पार जानेमें समर्थ नहीं हैं ॥ ३ ॥

द्वितीयं कारणं यच्च ब्रवीषि विनयान्विते । रामादन्यस्य नार्हामि संसर्गमिति जानकि ॥ ४ ॥ एतत् ते देवि सदृशं पत्न्यास्तस्य महात्मनः । का ह्यन्या त्वामृते देवि ब्रूयाद् वचनमीदृशम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘जनकनन्दिनि ! आपने जो दूसरा कारण बताते हुए कहा है कि मेरे लिये श्रीरामचन्द्रजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका स्वेच्छापूर्वक स्पर्श करना उचित नहीं है, यह आपके ही योग्य है । देवि ! महात्मा श्रीरामकी धर्मपत्नीके मुखसे ऐसी बात निकल सकती है । आपको छोड़कर दूसरी कौन स्त्री ऐसा वचन कह सकती है ॥ ४–५ ॥

श्रोष्यते चैव काकुत्स्थः सर्वं निरवशेषतः । चेष्टितं यत् त्वया देवि भाषितं च ममाग्रतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘देवि ! मेरे सामने आपने जो-जो पवित्र चेष्टाएँ कीं और जैसी-जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूपसे श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे ॥ ६ ॥

कारणैर्बहुभिर्देवि रामप्रियचिकीर्षया । स्नेहप्रस्कन्नमनसा मयैतत् समुदीरितम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘देवि ! मैंने जो आपको अपने साथ ले जानेका आग्रह किया, उसके बहुतसे कारण हैं । एक तो मैं श्रीरामचन्द्रजीका शीघ्र ही प्रिय करना चाहता था । अतः स्नेहपूर्ण हृदयसे ही मैंने ऐसी बात कही है ॥ ७ ॥

लङ्काया दुष्प्रवेशत्वाद् दुस्तरत्वान्महोदधेः । सामर्थ्यादात्मनश्चैव मयैतत् समुदीरितम् ॥ ८ ॥ इच्छामि त्वां समानेतुमद्यैव रघुनन्दिना । गुरुस्नेहेन भक्त्या च नान्यथा तदुदाहृतम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘दूसरा कारण यह है कि लङ्कामें प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है । तीसरा कारण है, महासागरको पार करनेकी कठिनाई । इन सब कारणोंसे तथा अपनेमें आपको ले जानेकी शक्ति होनेसे मैंने ऐसा प्रस्ताव किया था॥ ‘मैं आज ही आपको श्रीरघुनाथजीसे मिला देना चाहता था । अतः अपने परमाराध्य गुरु श्रीरामके प्रति स्नेह और आपके प्रति भक्तिके कारण ही मैंने ऐसी बात कही थी, किसी और उद्देश्यसे नहीं ॥ ९ ॥

यदि नोत्सहसे यातुं मया सार्धमनिन्दिते । अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो हि यत् ॥१०॥

भावार्थ

‘किंतु सती-साध्वी देवि ! यदि आपके मनमें मेरे साथ चलनेका उत्साह नहीं है तो आप अपनी कोई पहचान ही दे दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है’ ॥ १० ॥

एवमुक्ता हनुमता सीता सुरसुतोपमा । उवाच वचनं मन्दं बाष्पप्रग्रथिताक्षरम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर देवकन्याके समान तेजस्विनी सीता अश्रुगद्गदवाणीमें धीरे-धीरे इस प्रकार बोलीं—॥११॥

इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम् । शैलस्य चित्रकूटस्य पादे पूर्वोत्तरे पदे ॥ १२ ॥ तापसाश्रमवासिन्याः प्राज्यमूलफलोदके । तस्मिन् सिद्धाश्रिते देशे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥ १३ ॥ तस्योपवनखण्डेषु नानापुष्पसुगन्धिषु । विहृत्य सलिले क्लिन्नो ममाङ्के समुपाविशः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘वानरश्रेष्ठ ! तुम मेरे प्रियतमसे यह उत्तम पहचान बताना—‘नाथ ! चित्रकूट पर्वतके उत्तर-पूर्ववाले भागपर, जो मन्दाकिनी नदीके समीप है तथा जहाँ फल-मूल और जलकी अधिकता है, उस सिद्धसेवित प्रदेशमें तापसाश्रमके भीतर जब मैं निवास करती थी, उन्हीं दिनों नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्धसे वासित उस आश्रमके उपवनोंमें जलविहार करके आप भीगे हुए आये और मेरी गोदमें बैठ गये ॥ १२–१४ ॥

ततो मांससमायुक्तो वायसः पर्यतुण्डयत् । तमहं लोष्टमुद्यम्य वारयामि स्म वायसम् ॥ १५ ॥ दारयन् स च मां काकस्तत्रैव परिलीयते । न चाप्युपारमन्मांसाद् भक्षार्थी बलिभोजनः ॥१६॥

भावार्थ

‘तदनन्तर ( किसी दूसरे समय ) एक मांसलोलुप कौआ आकर मुझपर चोंच मारने लगा । मैंने ढेला उठाकर उसे हटानेकी चेष्टा की, परंतु मुझे बार-बार चोंच मारकर वह कौआ वहीं कहीं छिप जाता था । उस बलिभोजी कौएको खानेकी इच्छा थी, इसलिये वह मेरा मांस नोचनेसे निवृत्त नहीं होता था ॥ १५-१६ ॥

उत्कर्षन्त्यां च रशनां क्रुद्धायां मयि पक्षिणे । स्रंसमाने च वसने ततो दृष्टा त्वया ह्यहम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘‘मैं उस पक्षीपर बहुत कुपित थी । अतः अपने लहँगे-को दृढ़तापूर्वक कसनेके लिये कटिसूत्र ( नारे ) को खींचने लगी । उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्थामें आपने मुझे देख लिया ॥ १७ ॥

त्वया विहसिता चाहं क्रुद्धा संलज्जिता तदा । भक्ष्यगृद्धेन काकेन दारिता त्वामुपागता ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘‘देखकर आपने मेरी हँसी उड़ायी । इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लजित हो गयी । इतनेहीमें उस भक्ष्य-लोलुप कौएने फिर चोंच मारकर मुझे क्षत-विक्षत कर दिया और उसी अवस्थामें मैं आपके पास आयी ॥ १८ ॥

ततः श्रान्ताहमुत्सङ्गमासीनस्य तवाविशम् । क्रुध्यन्तीव प्रहृष्टेन त्वयाहं परिसान्त्विता ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘‘आप वहाँ बैठे हुए ये । मैं उस कौएकी हरकतसे तंग आ गयी थी । अतः थककर आपकी गोदमें आ बैठी । उस समय मैं कुपित-सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी ॥ १९ ॥

बाष्पपूर्णमुखी मन्दं चक्षुषी परिमार्जती । लक्षिताहं त्वया नाथ वायसेन प्रकोपिता ॥ २० ॥ परिश्रमाच्च सुप्ता हे राघवाङ्केऽस्म्यहं चिरम् । पर्यायेण प्रसुप्तश्च ममाङ्के भरताग्रजः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘‘नाथ ! कौएने मुझे कुपित कर दिया था । मेरे मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और मैं धीरे-धीरे आँखें पोंछ रही थी। आपने मेरी उस अवस्थाको लक्ष्य किया’ ॥ ‘हनुमान् ! मैं थक जानेके कारण उस दिन बहुत देरतक श्रीरघुनाथजीकी गोदमें सोयी रही । फिर उनकी बारी आयी और वे भरतके बड़े भाई मेरी गोदमें सिर रखकर सो रहे ॥ २१ ॥

स तत्र पुनरेवाथ वायसः समुपागमत् । ततः सुप्तप्रबुद्धां मां राघवाङ्कात् समुत्थिताम् । वायसः सहसागम्य विददार स्तनान्तरे ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया । मैं सोकर जगनेके बाद श्रीरघुनाथजीकी गोदसे उठकर बैठी ही थी कि उस कौएने सहसा झपटकर मेरी छातीमें चोंच मार दी ॥२२॥

पुनः पुनरथोत्पत्य विददार स मां भृशम् । ततः समुत्थितो रामो मुक्तैः शोणितबिन्दुभिः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘उसने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया । मेरे शरीरसे रक्तकी बूँदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजीकी नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे ॥ २३ ॥

स मां दृष्ट्वा महाबाहुर्वितुन्नां स्तनयोस्तदा । आशीविष इव क्रुद्धः श्वसन् वाक्यमभाषत ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘मेरी छातीमें घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेते हुए बोले—॥ २४ ॥

केन ते नागनासोरु विक्षतं वै स्तनान्तरम् । कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘‘हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली सुन्दरी ! किसने तुम्हारी छातीको क्षत-विक्षत किया है ? कौन रोषसे भरे हुए पाँच मुखवाले सर्पके साथ खेल रहा है ?’ ॥ २५ ॥

वीक्षमाणस्ततस्तं वै वायसं समवैक्षत । नखैः सरुधिरैस्तीक्ष्णैर्मामेवाभिमुखं स्थितम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘इतना कहकर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौएको देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था । उसके तीखे पंजे खूनसे रँग गये थे ॥ २६ ॥

पुत्रः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः । धरान्तरं गतः शीघ्रं पवनस्य गतौ समः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘वह पक्षियोंमें श्रेष्ठ कौआ इन्द्रका पुत्र था । उसकी गति वायुके समान तीव्र थी । वह शीघ्र ही स्वर्गसे उड़कर पृथ्वीपर आ पहुँचा था ॥ २७ ॥

ततस्तस्मिन् महाबाहुः कोपसंवर्तितेक्षणः । वायसे कृतवान् क्रूरां मतिं मतिमतां वरः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘उस समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु श्रीरामके नेत्र क्रोधसे घूमने लगे । उन्होंने उस कौएको कठोर दण्ड देनेका विचार किया ॥ २८ ॥

स दर्भसंस्तराद् गृह्य ब्रह्मणोऽस्त्रेण योजयत् । स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखो द्विजम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामने कुशकी चटाईसे एक कुश निकाला और उसे ब्रह्मास्त्रके मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया । अभिमन्त्रित करते ही वह कालाग्निके समान प्रज्वलित हो उठा । उसका लक्ष्य वह पक्षी ही था ॥ २९ ॥

स तं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भं तं वायसं प्रति । ततस्तु वायसं दर्भः सोऽम्बरेऽनुजगाम ह ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘श्रीरघुनाथजीने वह प्रज्वलित कुश उस कौएकी ओर छोड़ा । फिर तो वह आकाशमें उसका पीछा करने लगा ॥ ३० ॥

अनुसृष्टस्तदा काको जगाम विविधां गतिम् । त्राणकाम इमं लोकं सर्वं वै विचचार ह ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘वह कौआ कई प्रकारकी उड़ानें लगाता अपने प्राण बचानेके लिये इस सम्पूर्ण जगत्में भागता फिरा, किंतु उस बाणने कहीं भी उसका पीछा न छोड़ा ॥ ३१ ॥

स पित्रा च परित्यक्तः सर्वैश्च परमर्षिभिः । त्रींल्लोकान् सम्परिक्रम्य तमेव शरणं गतः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘उसके पिता इन्द्र तथा समस्त श्रेष्ठ महर्षियोंने भी उसका परित्याग कर दिया । तीनों लोकोंमें घूमकर अन्तमें वह पुनः भगवान् श्रीरामकी ही शरणमें आया ॥ ३२ ॥

स तं निपतितं भूमौ शरण्यः शरणागतम् । वधार्हमपि काकुत्स्थः कृपया पर्यपालयत् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं । उनकी शरणमें आकर जब वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब उन्हें उसपर दया आ गयी; अतः वधके योग्य होनेपर भी उस कौएको उन्होंने मारा नहीं, उबारा ॥ ३३ ॥

परिद्यूनं विवर्णं च पतमानं तमब्रवीत् । मोघमस्त्रं न शक्यं तु ब्राह्मं कर्तुं तदुच्यताम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह उदास होकर सामने गिरा था । इस अवस्थामें उसको लक्ष्य करके भगवान् बोले—‘ब्रह्मास्त्रको तो व्यर्थ किया नहीं जा सकता । अतः बताओ, इसके द्वारा तुम्हारा कौन-सा अङ्ग-भङ्ग किया जाय’ ॥ ३४ ॥

ततस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम् । दत्त्वा तु दक्षिणं नेत्रं प्राणेभ्यः परिरक्षितः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘फिर उसकी सम्मतिके अनुसार श्रीरामने उस अस्त्रसे उस कौएकी दाहिनी आँख नष्ट कर दी । इस प्रकार दायाँ नेत्र देकर वह अपने प्राण बचा सका ॥ ३५ ॥

स रामाय नमस्कृत्वा राज्ञे दशरथाय च । विसृष्टस्तेन वीरेण प्रतिपेदे स्वमालयम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर दशरथनन्दन राजा रामको नमस्कार करके उन वीरशिरोमणिसे विदा लेकर वह अपने निवासस्थानको चला गया ॥ ३६ ॥

मत्कृते काकमात्रेऽपि ब्रह्मास्त्रं समुदीरितम् । कस्माद् यो माहरत् त्वत्तः क्षमसे तं महीपते ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘कपिश्रेष्ठ ! तुम मेरे स्वामीसे जाकर कहना—‘प्राणनाथ ! पृथ्वीपते ! आपने मेरे लिये एक साधारण अपराध करनेवाले कौएपर भी ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था; फिर जो आपके पाससे मुझे हर ले आया, उसको आप कैसे क्षमा कर रहे हैं ? ॥ ३७ ॥

स कुरुष्व महोत्साहां कृपां मयि नरर्षभ । त्वया नाथवती नाथ ह्यनाथा इव दृश्यते ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘‘नरश्रेष्ठ ! मेरे ऊपर महान् उत्साहसे पूर्ण कृपा कीजिये । प्राणनाथ ! जो सदा आपसे सनाथ है, वह सीता आज अनाथ-सी दिखायी देती है ॥ ३८ ॥

आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव मया श्रुतम् । जानामि त्वां महावीर्यं महोत्साहं महाबलम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘‘दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही सुना है। मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ। आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है ॥ ३९ ॥

अपारवारमक्षोभ्यं गाम्भीर्यात् सागरोपमम् । भर्तारं ससमुद्राया धरण्या वासवोपमम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘आपका कहीं आर-पार नहीं है—आप असीम हैं। आपको कोई क्षुब्ध या पराजित नहीं कर सकता। आप गम्भीरतामें समुद्रके समान हैं। समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीके स्वामी हैं तथा इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। मैं आपके प्रभावको जानती हूँ ॥ ४० ॥

पवमन्त्रविदां श्रेष्ठो बलवान् सत्त्ववानपि । किमर्थमस्त्रं रक्षःसु न योजयसि राघव ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, बलवान् और शक्तिशाली होते हुए भी आप राक्षसोंपर अपने अस्त्रोंका प्रयोग क्यों नहीं करते हैं ?’ ॥ ४१ ॥

न नागा नापि गन्धर्वा न सुरा न मरुद्गणाः । रामस्य समरे वेगं शक्ताः प्रतिसमीहितुम् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘पवनकुमार ! नाग, गन्धर्व, देवता और मरुद्गण— कोई भी समराङ्गणमें श्रीरामचन्द्रजीका वेग नहीं सह सकते॥ ४२ ॥

तस्य वीर्यवतः कश्चिद् यद्यस्ति मयि सम्भ्रमः । किमर्थं न शरैस्तीक्ष्णैः क्षयं नयति राक्षसान् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘उन परम पराक्रमी श्रीरामके हृदयमें यदि मेरे लिये कुछ व्याकुलता है तो वे अपने तीखे सायकोंसे इन राक्षसोंका संहार क्यों नहीं कर डालते ?॥४३ ॥

भ्रातुरादेशमादाय लक्ष्मणो वा परंतपः । कस्य हेतोर्न मां वीरः परित्राति महाबलः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘अथवा शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली वीर लक्ष्मण ही अपने बड़े भाईकी आज्ञा लेकर मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हैं ? ॥ ४४ ॥

यदि तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्विन्द्रसमतेजसौ । सुराणामपि दुर्धर्षौ किमर्थं मामुपेक्षतः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘वे दोनों पुरुषसिंह वायु तथा इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। यदि वे देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं तो किस लिये मेरी उपेक्षा करते हैं ? ॥ ४५ ॥

ममैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशयः । समर्थावपि तौ यन्मां नावेक्षेते परंतपौ ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘निःसंदेह मेरा ही कोई महान् पाप उदित हुआ है, जिससे वे दोनों शत्रुसंतापी वीर मेरा उद्धार करनेमें समर्थ होते हुए भी मुझपर कृपादृष्टि नहीं कर रहे हैं’ ॥ ४६ ॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साश्रु भाषितम् । अथाब्रवीन्महातेजा हनूमान् हरियूथपः ॥ ४७ ॥

भावार्थ

विदेहकुमारी सीताने आँसू बहाते हुए जब यह करुणायुक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानरयूथपति महातेजस्वी हनुमान् इस प्रकार बोले—॥ ४७ ॥

त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे । रामे दुःखाभिपन्ने तु लक्ष्मणः परितप्यते ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘देवि ! मैं सत्यकी शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी आपके विरह-शोकसे पीड़ित हो अन्य सब कार्योंसे विमुख हो गये हैं—केवल आपका ही चिन्तन करते रहते हैं। श्रीरामके दुखी होनेसे लक्ष्मण भी सदा संतप्त रहते हैं ॥ ४८ ॥

कथंचिद् भवती दृष्टा न कालः परिशोचितुम् । इमं मुहूर्तं दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि शोभने ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया। अब शोक करनेका अवसर नहीं है। शोभने ! इसी घड़ीसे आप अपने दुःखोंका अन्त होता देखेंगी ॥ ४९ ॥

तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रौ महाबलौ । त्वद्दर्शनकृतोत्साहौ लोकान् भस्मीकरिष्यतः ॥ ५० ॥

भावार्थ

‘वे दोनों पुरुषसिंह राजकुमार बड़े बलवान् हैं तथा आपको देखनेके लिये उनके मनमें विशेष उत्साह है। अतः वे समस्त राक्षस-जगत्को भस्म कर डालेंगे ॥ ५० ॥

हत्वा च समरक्रूरं रावणं सहबान्धवम् । राघवस्त्वां विशालाक्षि स्वां पुरीं प्रति नेष्यति ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘विशाललोचने ! रघुनाथजी समराङ्गणमें क्रूरता प्रकट करनेवाले रावणको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर आपको अपनी पुरीमें ले जायँगे ॥ ५१ ॥

ब्रूहि यद् राघवो वाच्यो लक्ष्मणश्च महाबलः । सुग्रीवो वापि तेजस्वी हरयो वा समागताः ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘अब भगवान् श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, तेजस्वी सुग्रीव तथा वहाँ एकत्र हुए वानरोंके प्रति आपको जो कुछ कहना हो, वह कहिये’ ॥ ५२ ॥

इत्युक्तवति तस्मिंश्च सीता पुनरथाब्रवीत् । कौसल्या लोकभर्तारं सुषुवे यं मनस्विनी ॥ ५३ ॥ तं ममार्थे सुखं पृच्छ शिरसा चाभिवादय ।

भावार्थ

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर देवी सीताने फिर कहा— ‘कपिश्रेष्ठ ! मनस्विनी कौसल्या देवीने जिन्हें जन्म दिया है तथा जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, उन श्रीरघुनाथजीको मेरी ओरसे मस्तक झुकाकर प्रणाम करना और उनका कुशल-समाचार पूछना ॥ ५३½ ॥

स्रजश्च सर्वरत्नानि प्रिया याश्च वराङ्गनाः ॥ ५४ ॥ ऐश्वर्यं च विशालायां पृथिव्यामपि दुर्लभम् । पितरं मातरं चैव सम्मान्याभिप्रसाद्य च ॥ ५५ ॥ अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजाः । आनुकूल्येन धर्मात्मा त्यक्त्वा सुखमनुत्तमम् ॥ ५६ ॥ अनुगच्छति काकुत्स्थं भ्रातरं पालयन् वने । सिंहस्कन्धो महाबाहुर्मनस्वी प्रियदर्शनः ॥ ५७ ॥ पितृवद् वर्तते रामे मातृवन्मां समाचरत् । ह्रियमाणां तदा वीरो न तु मां वेद लक्ष्मणः ॥ ५८ ॥ वृद्धोपसेवी लक्ष्मीवाञ्शक्तो न बहुभाषिता । राजपुत्रप्रियश्रेष्ठः सदृशः श्वशुरस्य मे ॥ ५९ ॥ मत्तः प्रियतरो नित्यं भ्राता रामस्य लक्ष्मणः । नियुक्तो धुरि यस्यां तु तामुद्वहति वीर्यवान् ॥ ६० ॥ यं दृष्ट्वा राघवो नैव वृत्तमार्यमनुस्मरत् । स ममार्थाय कुशलं वक्तव्यो वचनान्मम ॥ ६१ ॥ मृदुर्नित्यं शुचिर्दक्षः प्रियो रामस्य लक्ष्मणः । यथा हि वानरश्रेष्ठ दुःखक्षयकरो भवेत् ॥ ६२ ॥ त्वमस्मिन् कार्यनिर्वाहे प्रमाणं हरियूथप । राघवस्त्वत्समारम्भान्मयि यत्नपरो भवेत् ॥ ६३ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् विशाल भूमण्डलमें भी जिसका मिलना कठिन है ऐसे उत्तम ऐश्वर्यका, भाँति-भाँतिके हारों, सब प्रकारके रत्नों तथा मनोहर सुन्दरी स्त्रियोंका भी परित्याग कर पिता-माताको सम्मानित एवं राजी करके जो श्रीरामचन्द्रजीके साथ वनमें चले आये, जिनके कारण सुमित्रा देवी उत्तम संतानवाली कही जाती हैं, जिनका चित्त सदा धर्ममें लगा रहता है, जो सर्वोत्तम सुखको त्यागकर वनमें बड़े भाई श्रीरामकी रक्षा करते हुए सदा उनके अनुकूल चलते हैं, जिनके कंधे सिंहके समान और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं, जो देखनेमें प्रिय लगते और मनको वशमें रखते हैं, जिनका श्रीरामके प्रति पिताके समान और मेरे प्रति माताके समान भाव तथा बर्ताव रहता है, जिन वीर लक्ष्मणको उस समय मेरे हरे जानेकी बात नहीं मालूम हो सकी थी, जो बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें संलग्न रहनेवाले, शोभाशाली, शक्तिमान् तथा कम बोलनेवाले हैं, राजकुमार श्रीरामके प्रिय व्यक्तियोंमें जिनका सबसे ऊँचा स्थान है, जो मेरे श्वशुरके सदृश पराक्रमी हैं तथा श्रीरघुनाथजीका जिन छोटे भाई लक्ष्मणके प्रति सदा मुझसे भी अधिक प्रेम रहता है, जो पराक्रमी वीर अपने ऊपर डाले हुए कार्यभारको बड़ी योग्यताके साथ वहन करते हैं तथा जिन्हें देखकर श्रीरघुनाथजी अपने मरे हुए पिताको भी भूल गये हैं ( अर्थात् जो पिताके समान श्रीरामके पालनमें दत्तचित्त रहते हैं ) । उन लक्ष्मणसे भी तुम मेरी ओरसे कुशल पूछना और वानरश्रेष्ठ ! मेरे कथनानुसार उनसे ऐसी बातें कहना, जिन्हें सुनकर नित्य कोमल, पवित्र, दक्ष तथा श्रीरामके प्रिय बन्धु लक्ष्मण मेरा दुःख दूर करनेको तैयार हो जायँ ॥ ‘वानरयूथपते ! अधिक क्या कहूँ ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये । इस विषयमें तुम्हीं प्रमाण हो—इसका सारा भार तुम्हारे ही ऊपर है । तुम्हारे प्रोत्साहन देनेसे ही श्रीरघुनाथजी मेरे उद्धारके लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं ॥ ६३ ॥

इदं ब्रूयाश्च मे नाथं शूरं रामं पुनः पुनः । जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज ॥ ६४ ॥ ऊर्ध्वं मासान्न जीवेयं सत्येनाहं ब्रवीमि ते ।

भावार्थ

‘तुम मेरे स्वामी शूरवीर भगवान् श्रीरामसे बारंबार कहना—‘दशरथनन्दन ! मेरे जीवनकी अवधिके लिये जो मास नियत हैं, उनमेंसे जितना शेष है, उतने ही समयतक मैं जीवन धारण करूँगी । उन अवशिष्ट दो महीनोंके बाद मैं जीवित नहीं रह सकती । यह मैं आपसे सत्यकी शपथ खाकर कह रही हूँ ॥ ६४½ ॥

रावणेनोपरुद्धां मां निकृत्या पापकर्मणा । त्रातुमर्हसि वीर त्वं पातालादिव कौशिकीम् ॥ ६५ ॥

भावार्थ

‘वीर ! पापाचारी रावणने मुझे कैद कर रक्खा है । अतः राक्षसियोंद्वारा शठतापूर्वक मुझे बड़ी पीड़ा दी जाती है । जैसे भगवान् विष्णुने इन्द्रकी लक्ष्मीका पातालसे उद्धार किया था, उसी प्रकार आप यहाँसे मेरा उद्धार करें’ ॥६५॥

ततो वस्त्रगतं मुक्त्वा दिव्यं चूडामणिं शुभम् । प्रदेयो राघवायेति सीता हनुमते ददौ ॥ ६६ ॥ प्रतिगृह्य ततो वीरो मणिरत्नमनुत्तमम् । अङ्गुल्या योजयामास नह्यस्य प्राभवद् भुजः ॥ ६७ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर सीताने कपड़ेमें बँधी हुई सुन्दर दिव्य चूड़ामणिको खोलकर निकाला और ‘इसे श्रीरामचन्द्रजीको दे देना’ ऐसा कहकर हनुमान्जीके हाथपर रख दिया ॥ उस परम उत्तम मणिरत्नको लेकर वीर हनुमान्जीने उसे अपनी अङ्गुलीमें डाल लिया । उनकी बाँह अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी उसके छेदमें न आ सकी ( इससे जान पड़ता है कि हनुमान्जीने अपना विशाल रूप दिखानेके बाद फिर सूक्ष्म रूप धारण कर लिया था ) ॥ ६७ ॥

मणिरत्नं कपिवरः प्रतिगृह्याभिवाद्य च । सीतां प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणतः पार्श्वतः स्थितः ॥ ६८ ॥

भावार्थ

वह मणिरत्न लेकर कपिवर हनुमान्ने सीताको प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करके वे विनीतभावसे उनके पास खड़े हो गये ॥ ६८ ॥

हर्षेण महता युक्तः सीतादर्शनजेन सः । हृदयेन गतो रामं लक्ष्मणं च सलक्षणम् ॥ ६९ ॥ मणिवरमुपगृह्य तं महार्हं जनकनृपात्मजया धृतं प्रभावात् । गिरिवरपवनावधूतमुक्तः सुखितमनाः प्रतिसंक्रमं प्रपेदे ॥ ७० ॥

भावार्थ

सीताजीका दर्शन होनेसे उन्हें महान् हर्ष प्राप्त हुआ था । वे मन-ही-मन भगवान् श्रीराम और शुभ-लक्षणसम्पन्न लक्ष्मणके पास पहुँच गये थे । उन दोनोंका चिन्तन करने लगे थे ॥ राजा जनककी पुत्री सीताने अपने विशेष प्रभावसे जिसे छिपाकर धारण कर रक्खा था, उस बहुमूल्य मणि-रत्नको लेकर हनुमान्जी मन-ही-मन उस पुरुषके समान सुखी एवं प्रसन्न हुए, जो किसी श्रेष्ठ पर्वतके ऊपरी भागसे उठी हुई प्रबल वायुके वेगसे कम्पित होकर पुनः उसके प्रभावसे मुक्त हो गया हो । तदनन्तर उन्होंने वहाँसे लौट जानेकी तैयारी की ॥ ७० ॥

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