सुन्दरकाण्ड, सर्ग 37
सा सीता वचनं श्रुत्वा पूर्णचन्द्रनिभानना । हनूमन्तमुवाचेदं धर्मार्थसहितं वचः ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीका पूर्वोक्त वचन सुनकर पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली सीताने उनसे धर्म और अर्थसे युक्त बात कही—॥ १ ॥
अमृतं विषसम्पृक्तं त्वया वानर भाषितम् । यच्च नान्यमना रामो यच्च शोकपरायणः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘वानर ! तुमने जो कहा कि श्रीरघुनाथजीका चित्त दूसरी ओर नहीं जाता और वे शोकमें डूबे रहते हैं, तुम्हारा यह कथन मुझे विषमिश्रित अमृतके समान लगा है ॥ २ ॥
ऐश्वर्ये वा सुविस्तीर्णे व्यसने वा सुदारुणे । रज्ज्वेव पुरुषं बद्ध्वा कृतान्तः परिकर्षति ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कोई बड़े भारी ऐश्वर्यमें स्थित हो अथवा अत्यन्त भयंकर विपत्तिमें पड़ा हो, काल मनुष्यको इस तरह खींच लेता है, मानो उसे रस्सीमें बाँध रक्खा हो ॥ ३ ॥
विधिर्नूनमसंहार्यः प्राणिनां प्लवगोत्तम । सौमित्रिं मां च रामं च व्यसनैःपश्य मोहितान् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! दैवके विधानको रोकना प्राणियोंके वशकी बात नहीं है । उदाहरणके लिये सुमित्राकुमार लक्ष्मणको, मुझको और श्रीरामको भी देख लो । हमलोग किस तरह वियोग-दुःखसे मोहित हो रहे हैं ॥ ४ ॥
शोकस्यास्य कथं पारं राघवोऽधिगमिष्यति । प्लवमानः परिक्रान्तो हतनौः सागरे यथा ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘समुद्रमें नौकाके नष्ट हो जानेपर अपने हाथोंसे तैरने-वाले पराक्रमी पुरुषकी भाँति श्रीरघुनाथजी कैसे इस शोकसागरसे पार होंगे ? ॥ ५ ॥
राक्षसानां वधं कृत्वा सूदयित्वा च रावणम् । लङ्कामुन्मथितां कृत्वा कदा द्रक्ष्यति मां पतिः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राक्षसोंका वध, रावणका संहार और लङ्कापुरीका विध्वंस करके मेरे पतिदेव मुझे कब देखेंगे ? ॥ ६ ॥
स वाच्यः संत्वरस्वेति यावदेव न पूर्यते । अयं संवत्सरः कालस्तावद्धि मम जीवितम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तुम उनसे जाकर कहना, वे शीघ्रता करें । यह वर्ष जबतक पूरा नहीं हो जाता, तभीतक मेरा जीवन शेष है ॥ ७ ॥
वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम । रावणेन नृशंसेन समयो यः कृतो मम ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वानर ! यह दसवाँ महीना चल रहा है । अब वर्ष पूरा होनेमें दो ही मास शेष हैं । निर्दयी रावणने मेरे जीवनके लिये जो अवधि निश्चित की है, उसमें इतना ही समय बाकी रह गया है ॥ ८ ॥
विभीषणेन च भ्रात्रा मम निर्यातनं प्रति । अनुनीतः प्रयत्नेन न च तत् कुरुते मतिम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘रावणके भाई विभीषणने मुझे लौटा देनेके लिये उससे यत्नपूर्वक बड़ी अनुनय-विनय की थी, किंतु वह उनकी बात नहीं मानता है ॥ ९ ॥
मम प्रतिप्रदानं हि रावणस्य न रोचते । रावणं मार्गते संख्ये मृत्युः कालवशंगतम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मेरा लौटाया जाना रावणको अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वह कालके अधीन हो रहा है और युद्धमें मौत उसे ढूँढ़ रही है ॥ १० ॥
ज्येष्ठा कन्या कला नाम विभीषणसुता कपे । तया ममैतदाख्यातं मात्रा प्रहितया स्वयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘कपे ! विभीषणकी ज्येष्ठ पुत्रीका नाम कला है । उसकी माताने स्वयं उसे मेरे पास भेजा था । उसीने ये सारी बातें मुझसे कही हैं ॥ ११ ॥
अविन्ध्यो नाम मेधावी विद्वान् राक्षसपुङ्गवः । धृतिमाञ्छीलवान् वृद्धो रावणस्य सुसम्मतः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘अविन्ध्य नामका एक श्रेष्ठ राक्षस है, जो बड़ा ही बुद्धिमान्, विद्वान्, धीर, सुशील, वृद्ध तथा रावणका सम्मानपात्र है ॥ १२ ॥
रामात् क्षयमनुप्राप्तं रक्षसां प्रत्यचोदयत् । न च तस्य स दुष्टात्मा शृणोति वचनं हितम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘उसने रावणको यह बताकर कि श्रीरामके हाथसे राक्षसोंके विनाशका अवसर आ पहुँचा है, मुझे लौटा देनेके लिये प्रेरित किया था, किंतु वह दुष्टात्मा उसके हितकारी वचनोंको भी नहीं सुनता है ॥ १३ ॥
आशंसेयं हरिश्रेष्ठ क्षिप्रं मां प्राप्स्यते पतिः । अन्तरात्मा हि मे शुद्धस्तस्मिंश्च बहवो गुणाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! मुझे तो यह आशा हो रही है कि मेरे पतिदेव मुझसे शीघ्र ही आ मिलेंगे; क्योंकि मेरी अन्तरात्मा शुद्ध है और श्रीरघुनाथजीमें बहुत-से गुण हैं ॥ १४ ॥
उत्साहः पौरुषं सत्त्वमानृशंस्यं कृतज्ञता । विक्रमश्च प्रभावश्च सन्ति वानर राघवे ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वानर ! श्रीरामचन्द्रजीमें उत्साह, पुरुषार्थ, बल, दयालुता, कृतज्ञता, पराक्रम और प्रभाव आदि सभी गुण विद्यमान हैं ॥ १५ ॥
चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां जघान यः । जनस्थाने विना भ्रात्रा शत्रुः कस्तस्य नोद्विजेत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘जिन्होंने जनस्थानमें अपने भाईकी सहायता लिये बिना ही चौदह हजार राक्षसोंका संहार कर डाला, उनसे कौन शत्रु भयभीत न होगा ? ॥ १६ ॥
न स शक्यस्तुलयितुं व्यसनैः पुरुषर्षभः । अहं तस्यानुभावज्ञा शक्रस्येव पुलोमजा ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजी पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं । वे संकटोंसे तोले या विचलित किये जायँ, यह सर्वथा असम्भव है । जैसे पुलोम-कन्या शची इन्द्रके प्रभावको जानती हैं, उसी तरह मैं श्रीरघुनाथजीकी शक्ति-सामर्थ्यको अच्छी तरह जानती हूँ ॥१७॥
शरजालांशुमाञ्छूरः कपे रामदिवाकरः । शत्रुरक्षोमयं तोयमुपशोषं नयिष्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘कपिवर ! शूरवीर भगवान् श्रीराम सूर्यके समान हैं । उनके बाणसमूह ही उनकी किरणें हैं । वे उनके द्वारा शत्रुभूत राक्षसरूपी जलको शीघ्र ही सोख लेंगे’ ॥ १८ ॥
इति संजल्पमानां तां रामार्थे शोककर्शिताम् । अश्रुसम्पूर्णवदनामुवाच हनुमान् कपिः ॥ १९ ॥
भावार्थ
इतना कहते-कहते सीताके मुखपर आँसुओंकी धारा वह चली । वे श्रीरामचन्द्रजीके लिये शोकसे पीड़ित हो रही थीं । उस समय कपिवर हनुमान्जीने उनसे कहा—॥१९॥
श्रुत्वैव च वचो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः । चमूं प्रकर्षन् महतीं हर्यृक्षगणसंकुलाम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘देवि ! आप धैर्य धारण करें । मेरा वचन सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओंकी विशाल सेना लेकर शीघ्र यहाँके लिये प्रस्थान कर देंगे ॥ २० ॥
अथवा मोचयिष्यामि त्वामद्यैव सराक्षसात् । अस्माद् दुःखादुपारोह मम पृष्ठमनिन्दिते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘अथवा मैं अभी आपको इस राक्षसजनित दुःखसे छुटकारा दिला दूँगा । सती-साध्वी देवि ! आप मेरी पीठपर बैठ जाइये ॥ २१ ॥
त्वां तु पृष्ठगतां कृत्वा संतरिष्यामि सागरम् । शक्तिरस्ति हि मे वोढुं लङ्कामपि सरावणाम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘आपको पीठपर बैठाकर मैं समुद्रको लाँघ जाऊँगा । मुझमें रावणसहित सारी लङ्काको भी ढो ले जानेकी शक्ति है ॥ २२ ॥
अहं प्रस्रवणस्थाय राघवायाद्य मैथिलि । प्रापयिष्यामि शक्राय हव्यं हुतमिवानलः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! रघुनाथजी प्रस्रवणगिरिपर रहते हैं । मैं आज ही आपको उनके पास पहुँचा दूँगा । ठीक उसी तरह, जैसे अग्निदेव हवन किये गये हविष्यको इन्द्रकी सेवामें ले जाते हैं ॥ २३ ॥
द्रक्ष्यस्यद्यैव वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम् । व्यवसायसमायुक्तं विष्णुं दैत्यवधे यथा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! दैत्योंके वधके लिये उत्साह रखनेवाले भगवान् विष्णुकी भाँति राक्षसोंके संहारके लिये सचेष्ट हुए श्रीराम और लक्ष्मणका आप आज ही दर्शन करेंगी ॥ २४ ॥
त्वद्दर्शनकृतोत्साहमाश्रमस्थं महाबलम् । पुरंदरमिवासीनं नगराजस्य मूर्धनि ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘आपके दर्शनका उत्साह मनमें लिये महाबली श्रीराम पर्वत-शिखरपर अपने आश्रममें उसी प्रकार बैठे हैं, जैसे देवराज इन्द्र गजराज ऐरावतकी पीठपर विराजमान होते हैं ॥ २५ ॥
पृष्ठमारोह मे देवि मा विकाङ्क्षस्व शोभने । योगमन्विच्छ रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी ॥ २६ ॥ कथयन्तीव शशिना संगमिष्यसि रोहिणी । मत्पृष्ठमधिरोह त्वं तराकाशं महार्णवम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘देवि ! आप मेरी पीठपर बैठिये । शोभने ! मेरे कथनकी उपेक्षा न कीजिये । चन्द्रमासे मिलनेवाली रोहिणीकी भाँति आप श्रीरामचन्द्रजीके साथ मिलनेका निश्चय कीजिये ॥ ‘मुझे भगवान् श्रीरामसे मिलना है, इतना कहते ही आप चन्द्रमासे रोहिणीकी भाँति श्रीरघुनाथजीसे मिल जायँगी। आप मेरी पीठपर आरूढ़ होइये और आकाशमार्गसे ही महासागरको पार कीजिये ॥ २७ ॥
नहि मे सम्प्रयातस्य त्वामितो नयतोऽङ्गने । अनुगन्तुं गतिं शक्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘कल्याणि ! मैं आपको लेकर जब यहाँसे चलूँगा, उस समय समूचे लङ्का-निवासी मिलकर भी मेरा पीछा नहीं कर सकते ॥ २८ ॥
यथैवाहमिह प्राप्तस्तथैवाहमसंशयम् । यास्यामि पश्य वैदेहि त्वामुद्यम्य विहायसम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! जिस प्रकार मैं यहाँ आया हूँ, उसी तरह आपको लेकर आकाशमार्गसे चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है । आप मेरा पराक्रम देखिये’ ॥ २९ ॥
मैथिली तु हरिश्रेष्ठाच्छ्रुत्वा वचनमद्भुतम् । हर्षविस्मितसर्वाङ्गी हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ३० ॥
भावार्थ
वानरश्रेष्ठ हनुमान्के मुखसे यह अद्भुत वचन सुनकर मिथिलेशकुमारी सीताके सारे शरीरमें हर्ष और विस्मयके कारण रोमाञ्च हो आया । उन्होंने हनुमान्जीसे कहा—॥३०॥
हनूमन् दूरमध्वानं कथं मां नेतुमिच्छसि । तदेव खलु ते मन्ये कपित्वं हरियूथप ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘वानरयूथपति हनुमान् ! तुम इतने दूरके मार्गपर मुझे कैसे ले चलना चाहते हो ? तुम्हारे इस दुःसाहसको मैं वानरोचित चपलता ही समझती हूँ ॥३१॥
कथं चाल्पशरीरस्त्वं मामितो नेतुमिच्छसि । सकाशं मानवेन्द्रस्य भर्तुर्मे प्लवगर्षभ ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! तुम्हारा शरीर तो बहुत छोटा है । फिर तुम मुझे मेरे स्वामी महाराज श्रीरामके पास ले जानेकी इच्छा कैसे करते हो ?’ ॥ ३२ ॥
सीतायास्तु वचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः । चिन्तयामास लक्ष्मीवान् नवं परिभवं कृतम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
सीताजीकी यह बात सुनकर शोभाशाली पवनकुमार हनुमान्ने इसे अपने लिये नया तिरस्कार ही माना ॥ ३३ ॥
न मे जानाति सत्त्वं वा प्रभावं वासितेक्षणा । तस्मात् पश्यतु वैदेही यद् रूपं मम कामतः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
वे सोचने लगे—‘कजरारे नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता मेरे बल और प्रभावको नहीं जानतीं । इसलिये आज मेरे उस रूपको, जिसे मैं इच्छानुसार धारण कर लेता हूँ, ये देख लें’ ॥ ३४ ॥
इति संचिन्त्य हनुमांस्तदा प्लवगसत्तमः । दर्शयामास सीतायाः स्वरूपमरिमर्दनः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
ऐसा विचार करके शत्रुमर्दन वानरशिरोमणि हनुमान्ने उस समय सीताको अपना स्वरूप दिखाया ॥ ३५ ॥
स तस्मात् पादपाद् घीमानाप्लुत्य प्लवगर्षभः । ततो वर्धितुमारेभे सीताप्रत्ययकारणात् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वे बुद्धिमान् कपिवर उस वृक्षसे नीचे कूद पड़े और सीताजीको विश्वास दिलानेके लिये बढ़ने लगे ॥ ३६ ॥
मेरुमन्दरसंकाशो बभौ दीप्तानलप्रभः । अग्रतो व्यवतस्थे च सीताया वानरर्षभः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
बात-की-बातमें उनका शरीर मेरुपर्वतके समान ऊँचा हो गया । वे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी प्रतीत होने लगे । इस तरह विशाल रूप धारण करके वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् सीताजीके सामने खड़े हो गये ॥ ३७ ॥
हरिः पर्वतसंकाशस्ताम्रवक्त्रो महाबलः । वज्रदंष्ट्रनखो भीमो वैदेहीमिदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥ सपर्वतवनोद्देशां साट्टप्राकारतोरणाम् । लङ्कामिमां सनाथां वा नयितुं शक्तिरस्ति मे ॥ ३९ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् पर्वतके समान विशालकाय, तामेके समान लाल मुख तथा वज्रके समान दाढ़ और नखवाले भयानक महाबली वानरवीर हनुमान् विदेहनन्दिनीसे इस प्रकार बोले—।३८। ‘देवि ! मुझमें पर्वत, वन, अट्टालिका, चहारदिवारी और नगरद्वारसहित इस लङ्कापुरीको रावणके साथ ही उठा ले जानेकी शक्ति है ॥ ३९ ॥
तदवस्थाप्यतां बुद्धिरलं देवि विकाङ्क्षया । विशोकं कुरु वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘अतः आप मेरे साथ चलनेका निश्चय कर लीजिये । आपकी आशङ्का व्यर्थ है । देवि ! विदेहनन्दिनि ! आप मेरे साथ चलकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीका शोक दूर कीजिये’ ॥ ४० ॥
तं दृष्ट्वाचलसंकाशमुवाच जनकात्मजा । पद्मपत्रविशालाक्षी मारुतस्यौरसं सुतम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
वायुके औरस पुत्र हनुमान्जीको पर्वतके समान विशाल शरीर धारण किये देख प्रफुल्ल कमलदलके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाली जनककिशोरीने उनसे कहा—॥ ४१ ॥
तव सत्त्वं बलं चैव विजानामि महाकपे । वायोरिव गतिश्चापि तेजश्चाग्नेरिवाद्भुतम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘महाकपे ! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रमको जानती हूँ । वायुके समान तुम्हारी गति और अग्निके समान तुम्हारा अद्भुत तेज है ॥ ४२ ॥
प्राकृतोऽन्यः कथं चेमां भूमिमागन्तुमर्हति । उदधेरप्रमेयस्य पारं वानरयूथप ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘वानरयूथपते ! दूसरा कोई साधारण वानर अपार महासागरके पारकी इस भूमिमें कैसे आ सकता है ? ॥४३॥
जानामि गमने शक्तिं नयने चापि ते मम । अवश्यं सम्प्रधार्याशु कार्यसिद्धिरिवात्मनः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘मैं जानती हूँ, तुम समुद्र पार करने और मुझे ले जानेमें भी समर्थ हो, तथापि तुम्हारी तरह मुझे भी अपनी कार्यसिद्धिके विषयमें अवश्य भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये ॥ ४४ ॥
अयुक्तं तु कपिश्रेष्ठ मया गन्तुं त्वया सह । वायुवेगसवेगस्य वेगो मां मोहयेत् तव ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! तुम्हारे साथ मेरा जाना किसी भी दृष्टिसे उचित नहीं है; क्योंकि तुम्हारा वेग वायुके वेगके समान तीव्र है । जाते समय यह वेग मुझे मूर्छित कर सकता है ॥ ४५ ॥
अहमाकाशमासक्ता उपर्युपरि सागरम् । प्रपतेयं हि ते पृष्ठाद् भूयो वेगेन गच्छतः ॥ ४६ ॥ पतिता सागरे चाहं तिमिनक्रझषाकुले । भवेयमाशु विवशा यादसामन्नमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘मैं समुद्रके ऊपर-ऊपर आकाशमें पहुँच जानेपर अधिक वेगसे चलते हुए तुम्हारे पृष्ठभागसे नीचे गिर सकती हूँ ॥ ‘इस तरह समुद्रमें, जो तिमि नामक बड़े-बड़े मत्स्यों, नाकों और मछलियोंसे भरा हुआ है, गिरकर विवश हो मैं शीघ्र ही जल-जन्तुओंका उत्तम आहार बन जाऊँगी ॥ ४७ ॥
न च शक्ष्ये त्वया सार्धं गन्तुं शत्रुविनाशन । कलत्रवति संदेहस्त्वयि स्याद्प्यसंशयम् ॥ ४८ ॥ ह्रियमाणां तु मां दृष्ट्वा राक्षसा भीमविक्रमाः । अनुगच्छेयुरादिष्टा रावणेन दुरात्मना ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘इसलिये शत्रुनाशन वीर ! मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगी । एक स्त्रीको साथ लेकर जब तुम जाने लगोगे, उस समय राक्षसोंको तुमपर संदेह होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ‘मुझे हरकर ले जायी जाती देख दुरात्मा रावणकी आज्ञासे भयंकर पराक्रमी राक्षस तुम्हारा पीछा करेंगे ॥४९॥
तैस्त्वं परिवृतः शूरैः शूलमुद्गरपाणिभिः । भवेस्त्वं संशयं प्राप्तो मया वीर कलत्रवान् ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘वीर ! उस समय मुझ-जैसी रक्षणीया अबलाके साथ होनेके कारण तुम हाथोंमें शूल और मुद्गर धारण करनेवाले उन शौर्यशाली राक्षसोंसे घिरकर प्राणसंशयकी अवस्थामें पहुँच जाओगे ॥ ५० ॥
सायुधा बहवो व्योम्नि राक्षसास्त्वं निरायुधः । कथं शक्ष्यसि संयातुं मां चैव परिरक्षितुम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘आकाशमें अस्त्र-शस्त्रधारी बहुत-से राक्षस तुमपर आक्रमण करेंगे और तुम्हारे हाथमें कोई भी अस्त्र न होगा । उस दशामें तुम उन सबके साथ युद्ध और मेरी रक्षा दोनों कार्य कैसे कर सकोगे ? ॥ ५१ ॥
युध्यमानस्य रक्षोभिस्ततस्तैः क्रूरकर्मभिः । प्रपतेयं हि ते पृष्ठाद् भयार्ता कपिसत्तम ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! उन क्रूरकर्मा राक्षसोंके साथ जब तुम युद्ध करने लगोगे, उस समय मैं भयसे पीड़ित होकर तुम्हारी पीठसे अवश्य ही गिर जाऊँगी ॥ ५२ ॥
अथ रक्षांसि भीमानि महान्ति बलवन्ति च । कथंचित् साम्पराये त्वां जयेयुः कपिसत्तम ॥ ५३ ॥ अथवा युध्यमानस्य पतेयं विमुखस्य ते । पतितां च गृहीत्वा मां नयेयुः पापराक्षसाः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! यदि कहीं वे महान् बलवान् भयानक राक्षस किसी तरह तुम्हें युद्धमें जीत लें अथवा युद्ध करते समय मेरी रक्षाकी ओर तुम्हारा ध्यान न रहनेसे यदि मैं गिर गयी तो वे पापी राक्षस मुझ गिरी हुई अबलाको फिर पकड़ ले जायँगे ॥ ५३-५४ ॥
मां वा हरेयुस्त्वद्धस्ताद् विशसेयुरथापि वा । अनवस्थौ हि दृश्येते युद्धे जयपराजयौ ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘अथवा यह भी सम्भव है कि वे निशाचर मुझे तुम्हारे हाथसे छीन ले जायँ या मेरा वध ही कर डालें; क्योंकि युद्धमें विजय और पराजयको अनिश्चित ही देखा जाता है ॥५५॥
अहं वापि विपद्येयं रक्षोभिरभितर्जिता । त्वत्प्रयत्नो हरिश्रेष्ठ भवेन्निष्फल एव तु ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘अथवा वानरशिरोमणे ! यदि राक्षसोंकी अधिक डाँट पड़नेपर मेरे प्राण निकल गये तो फिर तुम्हारा यह सारा प्रयत्न निष्फल ही हो जायगा ॥ ५६ ॥
कामं त्वमपि पर्याप्तो निहन्तुं सर्वराक्षसान् । राघवस्य यशो हीयेत् त्वया शस्तैस्तु राक्षसैः ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि तुम भी सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार करनेमें समर्थ हो तथापि तुम्हारे द्वारा राक्षसोंका वध हो जानेपर श्रीरघुनाथजीके सुयशमें बाधा आयेगी ( लोग यही कहेंगे कि श्रीराम स्वयं कुछ भी न कर सके ) ॥ ५७ ॥
अथवाऽऽदाय रक्षांसि न्यसेयुः संवृते हि माम् । यत्र ते नाभिजानीयुर्हरयो नापि राघवः ॥ ५८ ॥
भावार्थ
‘अथवा यह भी सम्भव है कि राक्षसलोग मुझे ले जाकर किसी ऐसे गुप्त स्थानमें रख दें, जहाँ न तो वानरोंको मेरा पता लगे और न श्रीरघुनाथजीको ही ॥ ५८ ॥
आरम्भस्तु मदर्थोऽयं ततस्तव निरर्थकः । त्वया हि सह रामस्य महानागमने गुणः ॥ ५९ ॥ मयि जीवितमायत्तं राघवस्यामितौजसः । भ्रातॄणां च महाबाहो तव राजकुलस्य च ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘यदि ऐसा हुआ तो मेरे लिये किया गया तुम्हारा यह सारा उद्योग व्यर्थ हो जायगा । यदि तुम्हारे साथ श्रीरामचन्द्रजी यहाँ पधारें तो उनके आनेसे बहुत बड़ा लाभ होगा ॥ ‘महाबाहो ! अमित पराक्रमी श्रीरघुनाथजीका, उनके भाइयोंका, तुम्हारा तथा वानरराज सुग्रीवके कुलका जीवन मुझपर ही निर्भर है ॥ ६० ॥
तौ निराशौ मदर्थं च शोकसंतापकर्शितौ । सह सर्वर्क्षहरिभिस्त्यक्ष्यतः प्राणसंग्रहम् ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘शोक और संतापसे पीड़ित हुए वे दोनों भाई जब मेरी प्राप्तिकी ओरसे निराश हो जायँगे, तब सम्पूर्ण रीछों और वानरोंके साथ अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ६१ ॥
भर्तुर्भक्तिं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर । नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ॥ ६२ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ ! ( तुम्हारे साथ न चल सकनेका एक प्रधान कारण और भी है—) वानरवीर ! पतिभक्तिकी ओर दृष्टि रखकर मैं भगवान् श्रीरामके सिवा दूसरे किसी पुरुषके शरीरका स्वेच्छासे स्पर्श करना नहीं चाहती ॥६२॥
यदहं गात्रसंस्पर्शं रावणस्य गता बलात् । अनीशा किं करिष्यामि विनाथा विवशा सती ॥ ६३ ॥
भावार्थ
‘रावणके शरीरसे जो मेरा स्पर्श हो गया है, वह तो उसके बलात्कारके कारण हुआ है । उस समय मैं असमर्थ, अनाथ और बेबस थी, क्या करती ॥ ६३ ॥
यदि रामो दशग्रीवमिह हत्वा सराक्षसम् । मामितो गृह्य गच्छेत तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ ६४॥
भावार्थ
‘यदि श्रीरघुनाथजी यहाँ राक्षसोंसहित दशमुख रावणका वध करके मुझे यहाँसे ले चलें तो वह उनके योग्य कार्य होगा ॥ ६४ ॥
श्रुताश्च दृष्टा हि मया पराक्रमा महात्मनस्तस्य रणावमर्दिनः । न देवगन्धर्वभुजङ्गराक्षसा भवन्ति रामेण समा हि संयुगे ॥ ६५ ॥
भावार्थ
‘मैंने युद्धमें शत्रुओंका मर्दन करनेवाले महात्मा श्रीरामके पराक्रम अनेक बार देखे और सुने हैं । देवता, गन्धर्व, नाग और राक्षस सब मिलकर भी संग्राममें उनकी समानता नहीं कर सकते ॥ ६५ ॥
समीक्ष्य तं संयति चित्रकार्मुकं महाबलं वासवतुल्यविक्रमम् । सलक्ष्मणं को विषहेत राघवं हुताशनं दीप्तमिवानिलेरितम् ॥ ६६ ॥
भावार्थ
‘युद्धस्थलमें विचित्र धनुष धारण करनेवाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली श्रीरघुनाथजी लक्ष्मणके साथ रह वायुका सहारा पाकर प्रज्वलित हुए अग्निकी भाँति उद्दीप्त हो उठते हैं । उस समय उन्हें देखकर उनका वेग कौन सह सकता है ? ॥ ६६ ॥
सलक्ष्मणं राघवमाजिमर्दनं दिशागजं मत्तमिव व्यवस्थितम् । सहेत को वानरमुख्य संयुगे युगान्तसूर्यप्रतिमं शरार्चिषम् ॥ ६७ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! समराङ्गणमें अपने बाणरूपी तेजसे प्रलयकालीन सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले और मतवाले दिग्गजकी भाँति खड़े हुए रणमर्दन श्रीराम और लक्ष्मणका सामना कौन कर सकता है ? ॥ ६७ ॥
स मे कपिश्रेष्ठ सलक्ष्मणं प्रियं सयूथपं क्षिप्रमिहोपपादय । चिराय रामं प्रति शोककर्शितां कुरुष्व मां वानरवीर हर्षिताम् ॥ ६८ ॥
भावार्थ
‘इसलिये कपिश्रेष्ठ ! वानरवीर ! तुम प्रयत्न करके यूथपति सुग्रीव और लक्ष्मणसहित मेरे प्रियतम श्रीरामचन्द्रजीको शीघ्र यहाँ बुला ले आओ । मैं श्रीरामके लिये चिरकालसे शोकाकुल हो रही हूँ । तुम उनके शुभागमनसे मुझे हर्ष प्रदान करो’ ॥ ६८ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें