सुन्दरकाण्ड, सर्ग 36
भूय एव महातेजा हनूमान् पवनात्मजः । अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सीताप्रत्ययकारणात् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान्जी सीताजीको विश्वास दिलानेके लिये पुनः विनययुक्त वचन बोले—॥ १॥
वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः । रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यङ्गुलीयकम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘महाभागे ! मैं परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामका दूत वानर हूँ । देवि ! यह श्रीरामनामसे अङ्कित मुद्रिका है, इसे लेकर देखिये ॥ २ ॥
प्रत्ययार्थं तवानीतं तेन दत्तं महात्मना । समाश्वसिहि भद्रं ते क्षीणदुःखफला ह्यसि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘आपको विश्वास दिलानेके लिये ही मैं इसे लेता आया हूँ । महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने स्वयं यह अंगूठी मेरे हाथमें दी थी । आपका कल्याण हो । अब आप धैर्य धारण करें । आपको जो दुःखरूपी फल मिल रहा था, वह अब समाप्त हो चला है’ ॥ ३ ॥
गृहीत्वा प्रेक्षमाणा सा भर्तुः करविभूषितम् । भर्तारमिव सम्प्राप्तं जानकी मुदिताभवत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
पतिके हाथको सुशोभित करनेवाली उस मुद्रिकाको लेकर सीताजी उसे ध्यानसे देखने लगीं । उस समय जानकीजीको इतनी प्रसन्नता हुई, मानो स्वयं उनके पतिदेव ही उन्हें मिल गये हों ॥ ४ ॥
चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम् । बभूव हर्षोदग्रं च राहुमुक्त इवोडुराट् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उनका लाल, सफेद और विशाल नेत्रोंसे युक्त मनोहर मुख हर्षसे खिल उठा, मानो चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे मुक्त हो गया हो ॥ ५ ॥
ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुः संदेशहर्षिता । परितुष्टा प्रियं कृत्वा प्रशशंस महाकपिम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
वे लजीली विदेहबाला प्रियतमका संदेश पाकर बहुत प्रसन्न हुईं । उनके मनको बड़ा संतोष हुआ । वे महाकपि हनूमान्जीका आदर करके उनकी प्रशंसा करने लगीं—॥ ६ ॥
विक्रान्तस्त्वं समर्थस्त्वं प्राज्ञस्त्वं वानरोत्तम । येनेदं राक्षसपदं त्वयैकेन प्रधर्षितम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ ! तुम बड़े पराक्रमी, शक्तिशाली और बुद्धिमान् हो; क्योंकि तुमने अकेले ही इस राक्षसपुरीको पददलित कर दिया है ॥ ७ ॥
शतयोजनविस्तीर्णः सागरो मकरालयः । विक्रमश्लाघनीयेन क्रमता गोष्पदीकृतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘तुम अपने पराक्रमके कारण प्रशंसाके योग्य हो; क्योंकि तुमने मगर आदि जन्तुओंसे भरे हुए सौ योजन विस्तारवाले महासागरको लाँघते समय उसे गायकी खुरीके बराबर समझा है । इसलिये प्रशंसाके पात्र हो ॥ ८ ॥
नहि त्वां प्राकृतं मन्ये वानरं वानरर्षभ । यस्य ते नास्ति संत्रासो रावणादपि संभ्रमः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! मैं तुम्हें कोई साधारण वानर नहीं मानती हूँ; क्योंकि तुम्हारे मनमें रावण-जैसे राक्षससे भी न तो भय होता है और न घबराहट ही ॥ ९ ॥
अर्हसे च कपिश्रेष्ठ मया समभिभाषितुम् । यद्यसि प्रेषितस्तेन रामेण विदितात्मना ॥ १० ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! यदि तुम्हें आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरामने भेजा है तो तुम अवश्य इस योग्य हो कि मैं तुमसे बातचीत करूँ ॥ १० ॥
प्रेषयिष्यति दुर्धर्षो रामो ह्यपरीक्षितम् । पराक्रममविज्ञाय मत्सकाशं विशेषतः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘दुर्धर्ष वीर श्रीरामचन्द्रजी विशेषतः मेरे निकट ऐसे किसी पुरुषको नहीं भेजेंगे, जिसके पराक्रमका उन्हें ज्ञान न हो तथा जिसके शीलस्वभावकी उन्होंने परीक्षा न कर ली हो ॥ ११ ॥
दिष्ट्या च कुशली रामो धर्मात्मा सत्यसंगरः । लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम सकुशल हैं तथा सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी लक्ष्मण भी स्वस्थ एवं सुखी हैं, यह जानकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ है और यह शुभ संवाद मेरे लिये सौभाग्यका सूचक है ॥ १२ ॥
कुशली यदि काकुत्स्थः किं न सागरमेखलाम् । मही दहति कोपेन युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यदि ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम सकुशल हैं तो वे प्रलयकालमें उठे हुए प्रलयंकर अग्निके समान कुपित हो समुद्रोंसे घिरी हुई सारी पृथ्वीको दग्ध क्यों नहीं कर देते हैं ?॥१३॥
अथवा शक्तिमन्तौ तौ सुराणामपि निग्रहे । ममैव तु न दुःखानामस्ति मन्ये विपर्ययः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अथवा वे दोनों भाई देवताओंको भी दण्ड देनेकी शक्ति रखते हैं ( तो भी अबतक जो चुप बैठे हैं, इसमें उनका नहीं मेरे ही भाग्यका दोष है )। मैं समझती हूँ कि अभी मेरे ही दुःखोंका अन्त नहीं आया है ॥ १४ ॥
कच्चिन्न व्यथते रामः कच्चिन्न परितप्यते । उत्तराणि च कार्याणि कुरुते पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘अच्छा’, यह तो बताओ, पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजीके मनमें कोई व्यथा तो नहीं है ? वे संतप्त तो नहीं होते ? उन्हें आगे जो कुछ करना है, उसे वे करते हैं या नहीं ? ॥१५॥
कच्चिन्न दीनः सम्भ्रान्तः कार्येषु च न मुह्यति । कच्चित् पुरुषकार्याणि कुरुते नृपतेः सुतः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उन्हें किसी प्रकारकी दीनता या घबराहट तो नहीं है ? वे काम करते-करते मोहके वशीभूत तो नहीं हो जाते ? क्या राजकुमार श्रीराम पुरुषोचित कार्य ( पुरुषार्थ ) करते हैं ? ॥ १६ ॥
द्विविधं त्रिविधोपायमुपायमपि सेवते । विजिगीषुः सुहृत् कच्चिन्मित्रेषु च परंतपः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘क्या शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम मित्रोंके प्रति मित्रभाव रखकर साम और दान रूप दो उपायोंका ही अवलम्बन करते हैं ? तथा शत्रुओंके प्रति उन्हें जीतनेकी इच्छा रखकर दान, भेद और दण्ड—इन तीन प्रकारके उपायोंका ही आश्रय लेते हैं ? ॥१७॥
कच्चिन्मित्राणि लभतेऽमित्रैश्चाप्यभिगम्यते । कच्चित् कल्याणमित्रश्च मित्रैश्चापि पुरस्कृतः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘क्या श्रीराम स्वयं प्रयत्नपूर्वक मित्रोंका संग्रह करते हैं ? क्या उनके शत्रु भी शरणागत होकर अपनी रक्षाके लिये उनके पास आते हैं ? क्या उन्होंने मित्रोंका उपकार करके उन्हें अपने लिये कल्याणकारी बना लिया है ? क्या वे कभी अपने मित्रोंसे भी उपकृत या पुरस्कृत होते हैं ? ॥१८॥
कच्चिदाशास्ति देवानां प्रसादं पार्थिवात्मजः । कच्चित् पुरुषकारं च दैवं च प्रतिपद्यते ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘क्या राजकुमार श्रीराम कभी देवताओंका भी कृपाप्रसाद चाहते हैं—उनकी कृपाके लिये प्रार्थना करते हैं ? क्या वे पुरुषार्थ और दैव दोनोंका आश्रय लेते हैं ? ॥१९॥
कच्चिन्न विगतस्नेहो विवासान्मयि राघवः । कच्चिन्मां व्यसनादस्मान्मोक्षयिष्यति राघवः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘दुर्भाग्यवश मैं उनसे दूर हो गयी हूँ । इस कारण श्रीरघुनाथजी मुझपर स्नेहहीन तो नहीं हो गये हैं ? क्या वे मुझे कभी इस संकटसे छुड़ायेंगे ॥ २० ॥
सुखानामुचितो नित्यमसुखानामनूचितः । दुःखमुत्तरमासाद्य कच्चिद् रामो न सीदति ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वे सदा सुख भोगनेके ही योग्य हैं, दुःख भोगनेके योग्य कदापि नहीं हैं; परंतु इन दिनों दुःख-पर-दुःख उठानेके कारण श्रीराम अधिक खिन्न और शिथिल तो नहीं हो गये हैं ? ॥ २१ ॥
कौसल्यायास्तथा कच्चित् सुमित्रायास्तथैव च । अभीक्ष्णं श्रूयते कच्चित् कुशलं भरतस्य च ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘क्या उन्हें माता कौसल्या, सुमित्रा तथा भरतका कुशल-समाचार बराबर मिलता रहता है ? ॥ २२ ॥
मन्निमित्तेन मानार्हः कच्चिच्छोकेन राघवः । कच्चिन्नान्यमना रामः कच्चिन्मां तारयिष्यति ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘क्या सम्माननीय श्रीरघुनाथजी मेरे लिये होनेवाले शोकसे अधिक संतप्त हैं ? वे मेरी ओरसे अन्यमनस्क तो नहीं हो गये हैं ? क्या श्रीराम मुझे इस संकटसे उबारेंगे ? ॥ २३ ॥
कच्चिदक्षौहिणीं भीमां भरतो भ्रातृवत्सलः । ध्वजिनीं मन्त्रिभिर्गुप्तां प्रेषयिष्यति मत्कृते ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘क्या भाईपर अनुराग रखनेवाले भरतजी मेरे उद्धारके लिये मन्त्रियोंद्वारा सुरक्षित भयंकर अक्षौहिणी सेना भेजेंगे ? ॥ २४ ॥
वानराधिपतिः श्रीमान् सुग्रीवः कच्चिदेष्यति । मत्कृते हरिभिर्वीरैर्वृतो दन्तनखायुधैः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘क्या श्रीमान् वानरराज सुग्रीव दाँत और नखोंसे प्रहार करनेवाले वीर वानरोंको साथ ले मुझे छुड़ानेके लिये यहाँतक आनेका कष्ट करेंगे ? ॥ २५ ॥
कच्चिच्च लक्ष्मणः शूरः सुमित्रानन्दवर्धनः । अस्त्रविच्छरजालेन राक्षसान् विधमिष्यति ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘क्या सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले शूरवीर लक्ष्मण, जो अनेक अस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अपने बाणोंकी वर्षासे राक्षसोंका संहार करेंगे ? ॥ २६ ॥
रौद्रेण कच्चिदस्त्रेण रामेण निहतं रणे । द्रक्ष्याम्यल्पेन कालेन रावणं ससुहृज्जनम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘क्या मैं रावणको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित थोड़े ही दिनोंमें श्रीरघुनाथजीके द्वारा युद्धमें भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे मारा गया देखूँगी ? ॥ २७ ॥
कच्चिन्न तद्धेमसमानवर्णं तस्याननं पद्मसमानगन्धि । मया विना शुष्यति शोकदीनं जलक्षये पद्ममिवातपेन ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘जैसे पानी सूख जानेपर धूपसे कमल सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे बिना शोकसे दुखी हुआ श्रीरामका वह सुवर्णके समान कान्तिमान् और कमलके सदृश सुगन्धित मुख सूख तो नहीं गया है ? ॥ २८ ॥
धर्मोपदेशात् त्यजतः स्वराज्यं मां चाप्यरण्यं नयतः पदातेः । नासीद् यथा यस्य न भीर्न शोकः कच्चित् स धैर्यं हृदये करोति ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘धर्मपालनके उद्देश्यसे अपने राज्यका त्याग करते और मुझे पैदल ही वनमें लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीरघुनाथजी इस संकटके समय हृदयमें धैर्य तो धारण करते हैं न ? ॥ २९ ॥
न चास्य माता न पिता न चान्यः स्नेहाद् विशिष्टोऽस्ति मया समो वा । तावद्ध्यहं दूत जिजीविषेयं यावत् प्रवृत्तिं शृणुयां प्रियस्य ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘दूत ! उनके माता-पिता तथा अन्य कोई सम्बन्धी भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें उनका स्नेह मुझसे अधिक अथवा मेरे बराबर भी मिला हो । मैं तो तभीतक जीवित रहना चाहती हूँ, जबतक यहाँ आनेके सम्बन्धमें अपने प्रियतमकी प्रवृत्ति सुन रही हूँ’ ॥ ३० ॥
इतीव देवी वचनं महार्थं तं वानरेन्द्रं मधुरार्थमुक्त्वा । श्रोतुं पुनस्तस्य वचोऽभिरामं रामार्थयुक्तं विरराम रामा ॥ ३१ ॥
भावार्थ
देवी सीता वानरश्रेष्ठ हनुमान्के प्रति इस प्रकार महान् अर्थसे युक्त मधुर वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजीसे सम्बन्ध रखनेवाली उनकी मनोहर वाणी पुनः सुननेके लिये चुप हो गयीं ॥ ३१ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा मारुतिर्भीमविक्रमः । शिरस्यञ्जलिमाधाय वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
सीताजीका वचन सुनकर भयंकर पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् मस्तकपर अञ्जलि बाँधे उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगे—॥ ३२ ॥
न त्वामिहस्थां जानीते रामः कमललोचनः । तेन त्वां नानयत्याशु शचीमिव पुरंदरः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! कमलनयन भगवान् श्रीरामको यह पता ही नहीं है कि आप लङ्कामें रह रही हैं । इसीलिये जैसे इन्द्र दानवोंके यहाँसे शचीको उठा ले गये, उस प्रकार वे शीघ्र यहाँसे आपको नहीं ले जा रहे हैं ॥ ३३ ॥
श्रुत्वैव च वचो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः । चमूं प्रकर्षन् महतीं हर्यृक्षगणसंयुताम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘जब मैं यहाँसे लौटकर जाऊँगा, तब मेरी बात सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओंकी विशाल सेना लेकर तुरंत वहाँसे चल देंगे ॥ ३४ ॥
विष्टम्भयित्वा बाणौघैरक्षोभ्यं वरुणालयम् । करिष्यति पुरीं लङ्कां काकुत्स्थः शान्तराक्षसाम्॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम अपने बाण-समूहोंद्वारा अक्षोभ्य महासागरको भी स्तब्ध करके उसपर सेतु बाँधकर लङ्कापुरीमें पहुँच जायँगे और उसे राक्षसोंसे सूनी कर देंगे ॥ ३५ ॥
तत्र यद्यन्तरा मृत्युर्यदि देवा महासुराः । स्थास्यन्ति पथि रामस्य स तानपि वधिष्यति ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘उस समय श्रीरामके मार्गमें यदि मृत्यु, देवता अथवा बड़े-बड़े असुर भी विघ्न बनकर खड़े होंगे तो वे उन सबका भी संहार कर डालेंगे ॥ ३६ ॥
तवादर्शनजेनार्ये शोकेन परिपूरितः । न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘आर्ये ! आपको न देखनेके कारण उत्पन्न हुए शोकसे उनका हृदय भरा रहता है; अतः श्रीराम सिंहसे पीड़ित हुए हाथीकी भाँति क्षणभरको भी चैन नहीं पाते हैं ॥ ३७ ॥
मन्दरेण च ते देवि शपे मूलफलेन च । मलयेन च विन्ध्येन मेरुणा दर्दुरेण च ॥ ३८ ॥ यथा सुनयनं वल्गु बिम्बोष्ठं चारुकुण्डलम् । मुखं द्रक्ष्यसि रामस्य पूर्णचन्द्रमिवोदितम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘देवि ! मन्दर आदि पर्वत हमारे वासस्थान हैं और फल-मूल भोजन । अतः मैं मन्दराचल, मलय, विन्ध्य, मेरु तथा दर्दुर पर्वतकी और अपनी जीविकाके साधन फल-मूलकी सौगंध खाकर कहता हूँ कि आप शीघ्र ही श्रीरामका नवोदित पूर्ण चन्द्रमाके समान वह मनोहर मुख देखेंगी, जो सुन्दर नेत्र, बिम्बफलके समान लाल-लाल ओठ और सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत एवं चित्ताकर्षक है ॥ ३८-३९ ॥
क्षिप्रं द्रक्ष्यसि वैदेहि रामं प्रस्रवणे गिरौ । शतक्रतुमिवासीनं नागपृष्ठस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! ऐरावतकी पीठपर बैठे हुए देवराज इन्द्रके समान प्रस्रवण गिरिके शिखरपर विराजमान श्रीरामका आप शीघ्र दर्शन करेंगी ॥ ४० ॥
न मांसं राघवो भुङ्क्ते न चैव मधु सेवते । वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधुका ही सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओंका सेवन क्यों करते ? वे सदा चार समय उपवास करके पाँचवें समय शास्त्रविहित जंगली फल-मूल और नीवार आदि भोजन करते हैं ॥ ४१ ॥
नैव दंशान् न मशकान् न कीटान् न सरीसृपान् । राघवोऽपनयेद् गात्रात् त्वद्गतेनान्तरात्मना ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘श्रीरघुनाथजीका चित्त सदा आपमें लगा रहता है, अतः उन्हें अपने शरीरपर चढ़े हुए डाँस, मच्छर, कीड़ों और सर्पोंको हटानेकी भी सुधि नहीं रहती ॥ ४२ ॥
नित्यं ध्यानपरो रामो नित्यं शोकपरायणः । नान्यच्चिन्तयते किंचित् स तु कामवशं गतः ॥ ४३ ॥ अनिद्रः सततं रामः सुप्तोऽपि च नरोत्तमः । सीतेति मधुरां वाणीं व्याहरन् प्रतिबुध्यते ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम आपके प्रेमके वशीभूत हो सदा आपका ही ध्यान करते और निरन्तर आपके ही विरह-शोकमें डूबे रहते हैं । आपको छोड़कर दूसरी कोई बात वे सोचते ही नहीं हैं ॥ ‘नरश्रेष्ठ ! श्रीरामको सदा आपकी चिन्ताके कारण कभी नींद नहीं आती है । यदि कभी आँख लगी भी तो ‘सीता-सीता’ इस मधुर वाणीका उच्चारण करते हुए वे जल्दी ही जाग उठते हैं ॥ ४४ ॥
दृष्ट्वा फलं वा पुष्पं वा यच्चान्यत् स्त्रीमनोहरम् । बहुशो हा प्रियेत्येवं श्वसंस्त्वामभिभाषते ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘किसी फल, फूल अथवा स्त्रियोंके मनको लुभानेवाली दूसरी वस्तुको भी जब वे देखते हैं, तब लंबी साँस लेकर बारंबार ‘हा प्रिये ! हा प्रिये !’ कहते हुए आपको पुकारने लगते हैं ॥ ४५ ॥
स देवि नित्यं परितप्यमान- स्त्वामेव सीतेत्यभिभाषमाणः । धृतव्रतो राजसुतो महात्मा तवैव लाभाय कृतप्रयत्नः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘देवि ! राजकुमार महात्मा श्रीराम आपके लिये सदा दुखी रहते हैं, सीता-सीता कहकर आपकी ही रट लगाते हैं तथा उत्तम व्रतका पालन करते हुए आपकी ही प्राप्तिके प्रयत्नमें लगे हुए हैं’ ॥ ४६ ॥
सा रामसंकीर्तनवीतशोका रामस्य शोकेन समानशोका । शरन्मुखेनाम्बुदशेषचन्द्रा निशेव वैदेहसुता बभूव ॥ ४७ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चासे सीताका अपना शोक तो दूर हो गया; किंतु श्रीरामके शोककी बात सुनकर वे पुनः उन्हींके समान शोकमें निमग्न हो गयीं । उस समय विदेहनन्दिनी सीता शरद्-ऋतु आनेपर मेघोंकी घटा और चन्द्रमा— दोनोंसे युक्त ( अन्धकार और प्रकाशपूर्ण ) रात्रिके समान हर्ष और शोकसे युक्त प्रतीत होती थीं ॥ ४७ ॥
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