सुन्दरकाण्ड, सर्ग 35
तां तु रामकथां श्रुत्वा वैदेही वानरर्षभात् । उवाच वचनं सान्त्वमिदं मधुरया गिरा ॥ १ ॥
भावार्थ
वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चा सुनकर विदेहराजकुमारी सीता शान्तिपूर्वक मधुर वाणीमें बोलीं—॥ १ ॥
क्व ते रामेण संसर्गः कथं जानासि लक्ष्मणम् । वानराणां नराणां च कथमासीत् समागमः ॥ २ ॥ यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च वानर । तानि भूयः समाचक्ष्व नमां शोकः समाविशेत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कपिवर ! तुम्हारा श्रीरामचन्द्रजीके साथ सम्बन्ध कहाँ हुआ ? तुम लक्ष्मणको कैसे जानते हो ? मनुष्यों और वानरोंका यह मेल किस प्रकार सम्भव हुआ ॥ २ ॥ ? ‘वानर ! श्रीराम और लक्ष्मणके जो चिह्न हैं, उनका फिरसे वर्णन करो, जिससे मेरे मनमें किसी प्रकारके शोकका समावेश न हो ॥ ३ ॥
कीदृशं तस्य संस्थानं रूपं तस्य च कीदृशम् । कथमूरू कथं बाहू लक्ष्मणस्य च शंस मे ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘मुझे बताओ भगवान् श्रीराम और लक्ष्मणकी आकृति कैसी है ? उनका रूप किस तरहका है ? उनकी जाँघें और भुजाएँ कैसी हैं ?’ ॥ ४ ॥
एवमुक्तस्तु वैदेह्या हनूमान् मारुतात्मजः । ततो रामं यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥
भावार्थ
विदेहराजकुमारी सीताके इस प्रकार पूछनेपर पवनकुमार हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीके स्वरूपका यथावत् वर्णन आरम्भ किया—॥ ५ ॥
जानन्ती बत दिष्ट्या मां वैदेहि परिपृच्छसि । भर्तुः कमलपत्राक्षि संस्थानं लक्ष्मणस्य च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहराजकुमारी ! आप अपने पतिदेव श्रीरामके तथा देवर लक्ष्मणजीके शरीरके विषयमें जानती हुई भी जो मुझसे पूछ रही हैं, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ६ ॥
यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च यानि वै । लक्षितानि विशालाक्षि वदतः शृणु तानि मे ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘विशाललोचने ! श्रीराम और लक्ष्मणके जिन-जिन चिह्नोंको मैंने लक्ष्य किया है, उन्हें बताता हूँ । मुझसे सुनिये ॥ ७ ॥
रामः कमलपत्राक्षः पूर्णचन्द्रनिभाननः । रूपदाक्षिण्यसम्पन्नः प्रसूतो जनकात्मजे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जनकनन्दिनि ! श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र प्रफुल्लकमलदलके समान विशाल एवं सुन्दर हैं । मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मनोहर है । वे जन्मकालसे ही रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ८ ॥
तेजसाऽऽदित्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या यशसा वासवोपमः ॥ ९ ॥ रक्षिता जीवलोकस्य स्वजनस्य च रक्षिता । रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य धर्मस्य च परंतपः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वे तेजमें सूर्यके समान, क्षमामें पृथ्वीके तुल्य, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और यशमें इन्द्रके समान हैं । वे सम्पूर्ण जीव-जगत्के तथा स्वजनोंके भी रक्षक हैं । शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्मकी रक्षा करते हैं ॥ ९-१० ॥
रामो भामिनि लोकस्य चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता । मर्यादानां च लोकस्य कर्ता कारयिता च सः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘भामिनि ! श्रीरामचन्द्रजी जगत्के चारों वर्णोंकी रक्षा करते हैं । लोकमें धर्मकी मर्यादाओंको बाँधकर उनका पालन करने और करानेवाले भी वे ही हैं ॥ ११ ॥
अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थं ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः । साधूनामुपकारज्ञः प्रचारज्ञश्च कर्मणाम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभावसे उनकी पूजा होती है । ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य-व्रतके पालनमें लगे रहते हैं, साधु पुरुषोंका उपकार मानते और आचरणोंद्वारा सत्कर्मोंके प्रचारका ढंग जानते हैं ॥ १२ ॥
राजनीत्यां विनीतश्च ब्राह्मणानामुपासकः । ज्ञानवाञ्शीलसम्पन्नो विनीतश्च परंतपः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वे राजनीतिमें पूर्ण शिक्षित, ब्राह्मणोंके उपासक, ज्ञानवान्, शीलवान्, विनम्र तथा शत्रुओंको संताप देनेमें समर्थ हैं ॥ १३ ॥
यजुर्वेदविनीतश्च वेदविद्भिः सुपूजितः । धनुर्वेदे च वेदे च वेदाङ्गेषु च निष्ठितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘उन्हें यजुर्वेदकी भी अच्छी शिक्षा मिली है । वेदवेत्ता विद्वानोंने उनका बड़ा सम्मान किया है । वे चारों वेद, धनुर्वेद और छहों वेदाङ्गोंके भी परिनिष्ठित विद्वान् हैं ॥१४॥
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवः शुभाननः । गूढजत्रुः सुताम्राक्षो रामो नाम जनैः श्रुतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘उनके कंधे मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, गला शङ्खके समान और मुख सुन्दर है । गलेकी हँसली मांसले ढकी हुई है तथा नेत्रोंमें कुछ-कुछ लालिमा है । वे लोगोंमें ‘श्रीराम’ के नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ १५ ॥
दुन्दुभिस्वननिर्घोषः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् । समश्च सुविभक्ताङ्गो वर्णं श्यामं समाश्रितः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उनका स्वर दुन्दुभिके समान गम्भीर और शरीरका रंग सुन्दर एवं चिकना है । उनका प्रताप बहुत बढ़ा-चढ़ा है । उनके सभी अङ्ग सुडौल और बराबर हैं । उनकी कान्ति श्याम है ॥ १६ ॥
त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमस्त्रिषु चोन्नतः । त्रिताम्रस्त्रिषु च स्निग्धो गम्भीरस्त्रिषु नित्यशः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उनके तीन अङ्ग ( वक्षःस्थल, कलाई और मुट्ठी ) स्थिर ( सुदृढ़ ) हैं । भौंहें, भुजाएँ और मेढ्र—ये तीन अङ्ग लंबे हैं । केशोंका अग्रभाग, अण्डकोष और घुटने— ये तीन समान–बराबर हैं । वक्षःस्थल, नाभिके किनारेका भाग और उदर—ये तीन उभरे हुए हैं । नेत्रोंके कोने, नख और हाथ-पैरके तलवे—ये तीन लाल हैं । शिश्नका अग्रभाग, दोनों पैरोंकी रेखाएँ और सिरके बाल—ये तीन चिकने हैं तथा स्वर, चाल और नाभि—ये तीन गम्भीर हैं ॥ १७ ॥
त्रिवलीमांस्त्र्यवनतश्चतुर्व्यङ्गस्त्रिशीर्षवान् । चतुष्कलश्चतुर्लेखश्चतुष्किष्कुश्चतुःसमः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उनके उदर तथा गलेमें तीन रेखाएँ हैं ! तलवोंके मध्यभाग, पैरोंकी रेखाएँ और स्तनोंके अग्रभाग—ये तीन धँसे हुए हैं । गला, पीठ तथा दोनों पिण्डलियाँ—ये चार अङ्ग छोटे हैं । मस्तकमें तीन भँवरें हैं। पैरोंके अँगूठेके नीचे तथा ललाटमें चार-चार रेखाएँ हैं । वे चार हाथ ऊँचे हैं । उनके कपोल, भुजाएँ, जाँघें और घुटने--ये चार अङ्ग बराबर हैं ॥ १८ ॥
चतुर्दशसमद्वन्द्वश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्गतिः । महोष्ठहनुनासश्च पञ्चस्निग्धोऽष्टवंशवान् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘शरीरमें जो दो-दोकी संख्यामें चौदह अङ्ग होते हैं, वे भी उनके परस्पर सम हैं । उनकी चारों कोनोंकी चारों दाढ़ें शास्त्रीय लक्षणोंसे युक्त हैं । वे सिंह, बाघ, हाथी और साँड़--इन चारके समान चार प्रकारकी गतिसे चलते हैं । उनके ओठ, ठोढ़ी और नासिका—सभी प्रशस्त हैं । केश, नेत्र, दाँत, त्वचा और पैरके तलवे—इन पाँचों अङ्गोंमें स्निग्धता भरी है। दोनों भुजाएँ, दोनों जाँघें, दोनों पिंडलियाँ, हाथ और पैरोंकी अँगुलियाँ—ये आठ अङ्ग उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न ( लंबे ) हैं ॥ १९ ॥
दशपद्मो दशबृहत्त्रिभिर्व्याप्तो द्विशुक्लवान् । षडुन्नतो नवतनुस्त्रिभिर्व्याप्नोति राघवः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उनके नेत्र, मुख-विवर, मुख-मण्डल, जिह्वा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर—ये दस अङ्ग कमलके समान हैं । छाती, मस्तक, ललाट, गला, भुजाएँ, कंधे, नाभि, चरण, पीठ और कान—ये दस अङ्ग विशाल हैं । वे श्री, यश और प्रताप—इन तीनोंसे व्याप्त हैं । उनके मातृकुल और पितृकुल दोनों अत्यन्त शुद्ध हैं । पार्श्वभाग, उदर, वक्षःस्थल, नासिका, कंधे और ललाट—ये छः अङ्ग ऊँचे हैं । केश, नख, लोम, त्वचा, अंगुलियोंके पोर, शिश्न, बुद्धि और दृष्टि आदि नौ सूक्ष्म ( पतले ) हैं तथा वे श्रीरघुनाथजी पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न—इन तीन कालोंद्वारा क्रमशः धर्म, अर्थ और कामका अनुष्ठान करते हैं ॥ २० ॥
सत्यधर्मरतः श्रीमान् संग्रहानुग्रहे रतः । देशकालविभागज्ञः सर्वलोकप्रियंवदः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजी सत्यधर्मके अनुष्ठानमें संलग्न, श्रीसम्पन्न, न्यायसङ्गत धनका संग्रह और प्रजापर अनुग्रह करनेमें तत्पर, देश और कालके विभागको समझनेवाले तथा सब लोगोंसे प्रिय वचन बोलनेवाले हैं ॥ २१ ॥
भ्राता चास्य च वैमात्रः सौमित्रिरमितप्रभः । अनुरागेण रूपेण गुणैश्चापि तथाविधः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘उनके सौतेले भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी बड़े तेजस्वी हैं । अनुराग, रूप और सद्गुणोंकी दृष्टिसे भी वे श्रीरामचन्द्रजीके ही समान हैं ॥ २२ ॥
स सुवर्णच्छविः श्रीमान् रामः श्यामो महायशाः । तावुभौ नरशार्दूलौ त्वद्दर्शनकृतोत्सवौ ॥ २३ ॥ विचिन्वन्तौ महीं कृत्स्नामस्माभिः सह संगतौ ।
भावार्थ
‘उन दोनों भाइयोंमें अन्तर इतना ही है कि लक्ष्मणके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान गौर है और महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजीका विग्रह श्याम-सुन्दर है । वे दोनों नरश्रेष्ठ आपके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो सारी पृथ्वीपर आपकी ही खोज करते हुए हमलोगोंसे मिले थे ॥ २३½ ॥
त्वामेव मार्गमाणौ तौ विचरन्तौ वसुंधराम् ॥ २४ ॥ ददर्शतुर्मृगपतिं पूर्वजेनावरोपितम् ।
भावार्थ
‘आपको ही ढूँढ़नेके लिये पृथ्वीपर विचरते हुए उन दोनों भाइयोंने वानरराज सुग्रीवका साक्षात्कार किया, जो अपने बड़े भाईके द्वारा राज्यसे उतार दिये गये थे ॥२४½॥
ऋष्यमूकस्य मूले तु बहुपादपसंकुले ॥ २५ ॥ भ्रातुर्भयार्तमासीनं सुग्रीवं प्रियदर्शनम् ।
भावार्थ
‘ऋष्यमूक पर्वतके मूलभागमें जो बहुत-से वृक्षोंद्वारा घिरा हुआ है, भाईके भयसे पीड़ित हो बैठे हुए प्रियदर्शन सुग्रीवसे वे दोनों भाई मिले ॥ २५½ ॥
वयं च हरिराजं तं सुग्रीवं सत्यसङ्गरम् ॥ २६ ॥ परिचर्यामहे राज्यात् पूर्वजेनावरोपितम् ।
भावार्थ
‘उन दिनों जिन्हें बड़े भाईने राज्यसे उतार दिया था, उन सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीवकी सेवामें हम सब लोग रहा करते थे ॥ २६½ ॥
ततस्तौ चीरवसनौ धनुःप्रवरपाणिनौ ॥ २७ ॥ ऋष्यमूकस्य शैलस्य रम्यं देशमुपागतौ । स तौ दृष्ट्वा नरव्याघ्रौ धन्विनौ वानरर्षभः ॥ २८ ॥ अभिप्लुतो गिरेस्तस्य शिखरं भयमोहितः ।
भावार्थ
‘शरीरपर वल्कलवस्त्र तथा हाथमें धनुष धारण किये वे दोनों भाई जब ऋष्यमूक पर्वतके रमणीय प्रदेशमें आये, तब धनुष धारण करनेवाले उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंको वहाँ उपस्थित देख वानरशिरोमणि सुग्रीव भयसे घबरा उठे और उछलकर उस पर्वतके उच्चतम शिखरपर जा चढ़े ॥२७-२८½॥
ततः स शिखरे तस्मिन् वानरेन्द्रो व्यवस्थितः ॥ २९ ॥ तयोः समीपं मामेव प्रेषयामास सत्वरम् ।
भावार्थ
‘उस शिखरपर बैठनेके पश्चात् वानरराज सुग्रीवने मुझे ही शीघ्रतापूर्वक उन दोनों बन्धुओंके पास भेजा ॥ २९½ ॥
तावहं पुरुषव्याघ्रौ सुग्रीववचनात् प्रभू ॥ ३० ॥ रूपलक्षणसम्पन्नौ कृताञ्जलिरुपस्थितः ।
भावार्थ
‘सुग्रीवकी आज्ञासे उन प्रभावशाली रूपवान् तथा शुभलक्षणसम्पन्न दोनों पुरुषसिंह वीरोंकी सेवामें मैं हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ ॥ ३०½ ॥
तौ परिज्ञाततत्त्वार्थौ मया प्रीतिसमन्वितौ ॥ ३१ ॥ पृष्ठमारोप्य तं देशं प्रापितौ पुरुषर्षभौ । निवेदितौ च तत्त्वेन सुग्रीवाय महात्मने ॥ ३२ ॥ तयोरन्योन्यसम्भाषाद् भृशं प्रीतिरजायत ।
भावार्थ
‘मुझसे यथार्थ बातें जानकर उन दोनोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । फिर मैं अपनी पीठपर चढ़ाकर उन दोनों पुरुषोत्तम बन्धुओंको उस स्थानपर ले गया (जहाँ वानरराज सुग्रीव थे)॥ ‘वहाँ महात्मा सुग्रीवको मैंने इन दोनों बन्धुओंका यथार्थ परिचय दिया । तत्पश्चात् श्रीराम और सुग्रीवने परस्पर बातें कीं, इससे उन दोनोंमें बड़ा प्रेम हो गया ॥ ३२½ ॥
तत्र तौ कीर्तिसम्पन्नौ हरीश्वरनरेश्वरौ ॥ ३३ ॥ परस्परकृताश्वासौ कथया पूर्ववृत्तया ।
भावार्थ
‘वहाँ उन दोनों यशस्वी वानरेश्वर और नरेश्वरोंने अपने ऊपर बीती हुई पहलेकी घटनाएँ सुनायीं तथा दोनोंने दोनोंको आश्वासन दिया ॥ ३३½ ॥
तं ततः सान्त्वयामास सुग्रीवं लक्ष्मणाग्रजः ॥ ३४ ॥ स्त्रीहेतोर्वालिना भ्रात्रा निरस्तं पुरुतेजसा ।
भावार्थ
‘उस समय लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने स्त्रीके लिये अपने महातेजस्वी भाई वालीद्वारा घरसे निकाले हुए सुग्रीवको सान्त्वना दी ॥ ३४½ ॥
ततस्त्वन्नाशजं शोकं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३५ ॥ लक्ष्मणो वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयत् ।
भावार्थ
‘तत्पश्चात् अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामको आपके वियोगसे जो शोक हो रहा था, उसे लक्ष्मणने वानरराज सुग्रीवको सुनाया ॥ ३५½ ॥
स श्रुत्वा वानरेन्द्रस्तु लक्ष्मणेनेरितं वचः ॥ ३६ ॥ तदासीन्निष्प्रभोऽत्यर्थं ग्रहग्रस्त इवांशुमान् ।
भावार्थ
‘लक्ष्मणजीकी कही हुई वह बात सुनकर वानरराज सुग्रीव उस समय ग्रहग्रस्त सूर्यके समान अत्यन्त कान्तिहीन हो गये ॥ ३६½ ॥
ततस्त्वद्गात्रशोभीनि रक्षसा ह्रियमाणया ॥ ३७ ॥ यान्याभरणजालानि पातितानि महीतले । तानि सर्वाणि रामाय आनीय हरियूथपाः ॥ ३८ ॥ संहृष्टा दर्शयामासुर्गतिं तु न विदुस्तव ।
भावार्थ
‘तदनन्तर वानर-यूथपतियोंने आपके शरीरपर शोभा पानेवाले उन सब आभूषणोंको ले आकर बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीरामचन्द्रजीको दिखाया, जिन्हें आपने उस समय पृथ्वीपर गिराया था, जब कि राक्षस आपको हरकर लिये जा रहा था । वानरोंने आभूषण तो दिखाये, किंतु उन्हें आपका पता कुछ भी मालूम नहीं था ॥ ३७-३८½ ॥
तानि रामाय दत्तानि मयैवोपहृतानि च ॥ ३९ ॥ स्वनवन्त्यवकीर्णानि तस्मिन् विहतचेतसि । तान्यङ्के दर्शनीयानि कृत्वा बहुविधं तदा ॥ ४० ॥ तेन देवप्रकाशेन देवेन परिदेवितम् ।
भावार्थ
‘आपके द्वारा गिराये जानेपर वे सब आभूषण झन-झनकी आवाजके साथ जमीनपर गिरे और बिखर गये थे । मैं ही उन सबको बटोरकर ले आया था । उस दिन जब वे गहने श्रीरामचन्द्रजीको दिये गये, उस समय वे उन्हें अपनी गोदमें लेकर अचेत-से हो गये थे । उन दर्शनीय आभूषणोंको छातीसे लगाकर देवतुल्य आभावाले भगवान् श्रीरामने बहुत विलाप किया ॥ ३९-४०½ ॥
पश्यतस्तानि रुदतस्ताम्यतश्च पुनः पुनः ॥ ४१ ॥ प्रादीपयद् दाशरथेस्तदा शोकहुताशनम् ॥ ४२ ॥ शायितं च चिरं तेन दुःखार्तेन महात्मना । मयापि विविधैर्वाक्यैः कृच्छ्रादुत्थापितः पुनः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘उन आभूषणोंको बारंबार देखते, रोते और तिलमिला उठते थे । उस समय दशरथनन्दन श्रीरामकी शोकाग्नि प्रज्वलित हो उठी । उस दुःखसे आतुर हो वे महात्मा रघुवीर बहुत देरतक मूर्छित अवस्थामें पड़े रहे । तब मैंने नाना प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर बड़ी कठिनाईसे उन्हें उठाया ॥ ४१–४३ ॥
तानि दृष्ट्वा महार्हाणि दर्शयित्वा मुहुर्मुहुः । राघवः सहसौमित्रिः सुग्रीवे संन्यवेशयत् ॥ ४४ ॥ स तवादर्शनादार्ये राघवः परितप्यते । महता ज्वलता नित्यमग्निनेवाग्निपर्वतः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने उन बहुमूल्य आभूषणोंको बारंबार देखा और दिखाया । फिर वे सब सुग्रीवको दे दिये ॥ ‘आर्ये ! आपको न देख पानेके कारण श्रीरघुनाथजीको बड़ा दुःख और संताप हो रहा है । जैसे ज्वालामुखी पर्वत जलती हुई बड़ी भारी आगसे सदा तपता रहता है, उसी प्रकार वे आपकी विरहाग्निसे जल रहे हैं ॥ ४५ ॥
त्वत्कृते तमनिद्रा च शोकश्चिन्ता च राघवम् । तापयन्ति महात्मानमग्न्यगारमिवाग्नयः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘आपके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीको अनिद्रा ( निरन्तर जागरण ), शोक और चिन्ता—ये तीनों उसी प्रकार संताप देते हैं, जैसे आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ अग्निशाला-को तपाती रहती हैं ॥ ४६ ॥
तवादर्शनशोकेन राघवः परिचाल्यते । महता भूमिकम्पेन महानिव शिलोच्चयः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘देवि ! आपको न देख पानेका शोक श्रीरघुनाथजीको उसी प्रकार विचलित कर देता है, जैसे भारी भूकम्पसे महान् पर्वत भी हिल जाता है ॥ ४७ ॥
काननानि सुरम्याणि नदीप्रस्रवणानि च । चरन् न रतिमाप्नोति त्वामपश्यन् नृपात्मजे ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘राजकुमारि ! आपको न देखनेके कारण रमणीय काननों, नदियों और झरनोंके पास विचरनेपर भी श्रीरामको सुख नहीं मिलता है ॥ ४८ ॥
स त्वां मनुजशार्दूलः क्षिप्रं प्राप्स्यति राघवः । समित्रबान्धवं हत्वा रावणं जनकात्मजे ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘जनकनन्दिनि ! पुरुषसिंह भगवान् श्रीराम रावणको उसके मित्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर शीघ्र ही आपसे मिलेंगे ॥ ४९ ॥
सहितौ रामसुग्रीवावुभावकुरुतां तदा । समयं वालिनं हन्तुं तव चान्वेषणं प्रति ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘उन दिनों श्रीराम और सुग्रीव जब मित्रभावसे मिले, तब दोनोंने एक-दूसरेकी सहायताके लिये प्रतिज्ञा की । श्रीरामने वालीको मारनेका और सुग्रीवने आपकी खोज करानेका वचन दिया ॥ ५० ॥
ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यां वीराभ्यां सहरीश्वरः । किष्किन्धां समुपागम्य वाली युद्धे निपातितः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘इसके बाद उन दोनों वीर राजकुमारोंने किष्किन्धामें जाकर वानरराज वालीको युद्धमें मार गिराया ॥ ५१ ॥
ततो निहत्य तरसा रामो वालिनमाहवे । सर्वर्क्षहरिसङ्घानां सुग्रीवमकरोत् पतिम् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें वेगपूर्वक वालीको मारकर श्रीरामने सुग्रीवको समस्त भालुओं और वानरोंका राजा बना दिया ॥ ५२ ॥
रामसुग्रीवयोरैक्यं देव्येवं समजायत । हनूमन्तं च मां विद्धि तयोर्दूतमुपागतम् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! श्रीराम और सुग्रीवमें इस प्रकार मित्रता हुई है । मैं उन दोनोंका दूत बनकर यहाँ आया हूँ । आप मुझे हनुमान् समझें ॥ ५३ ॥
स्वं राज्यं प्राप्य सुग्रीवः स्वानानीय महाकपीन् । त्वदर्थं प्रेषयामास दिशो दश महाबलान् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘अपना राज्य पानेके अनन्तर सुग्रीवने अपने आश्रयमें रहनेवाले बड़े-बड़े बलवान् वानरोंको बुलाया और उन्हें आपकी खोजके लिये दसों दिशाओंमें भेजा ॥ ५४ ॥
आदिष्टा वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महौजसः । अद्रिराजप्रतीकाशाः सर्वतः प्रस्थिता महीम् ॥ ५५ ॥ ततस्ते मार्गमाणा वै सुग्रीववचनातुराः । चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः ॥ ५६ ॥ अङ्गदो नाम लक्ष्मीवान् वालिसूनुर्महाबलः । प्रस्थितः कपिशार्दूलस्त्रिभागबलसंवृतः ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘वानरराज सुग्रीवकी आज्ञा पाकर गिरिराजके समान विशालकाय महाबली वानर पृथ्वीपर सब ओर चल दिये ॥ ‘सुग्रीवकी आज्ञासे भयभीत हो हम तथा अन्य वानर आपकी खोज करते हुए समस्त भूमण्डलमें विचर रहे हैं ॥ ‘वालीके शोभाशाली पुत्र महाबली कपिश्रेष्ठ अंगद वानरोंकी एक तिहाई सेना साथ लेकर आपकी खोजमें निकले थे (उन्हींके दलमें मैं भी था) ॥ ५७ ॥
तेषां नो विप्रणष्टानां विन्ध्ये पर्वतसत्तमे । भृशं शोकपरीतानामहोरात्रगणा गताः ॥ ५८ ॥ ते वयं कार्यनैराश्यात् कालस्यातिक्रमेण च । भयाच्च कपिराजस्य प्राणांस्त्यक्तुमुपस्थिताः ॥ ५९ ॥
भावार्थ
‘पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्यमें आकर खो जानेके कारण हमने वहाँ बड़ा कष्ट उठाया और वहीं हमारे बहुत दिन बीत गये ॥ ‘अब हमें कार्य-सिद्धिकी कोई आशा नहीं रह गयी और निश्चित अवधिसे भी अधिक समय बिता देनेके कारण वानरराज सुग्रीवका भी भय था, इसलिये हम सब लोग अपने प्राण त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ५९ ॥
विचित्य गिरिदुर्गाणि नदीप्रस्रवणानि च । अनासाद्य पदं देव्याः प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिताः ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘पर्वतके दुर्गम स्थानोंमें, नदियोंके तटोंपर और झरनोंके आस-पासकी सारी भूमि छान डाली तो भी जब हमें देवी सीता ( आप ) के स्थानका पता न चला, तब हम प्राण त्याग देनेको तैयार हो गये ॥ ६० ॥
ततस्तस्य गिरेर्मूर्ध्नि वयं प्रायमुपास्महे । दृष्ट्वा प्रायोपविष्टांश्च सर्वान् वानरपुङ्गवान् ॥ ६१ ॥ भृशं शोकार्णवे मग्नः पर्यदेवयदङ्गदः ।
भावार्थ
‘मरणान्त उपवासका निश्चय करके हम सब-के-सब उस पर्वतके शिखरपर बैठ गये । उस समय समस्त वानर-शिरोमणियोंको प्राण त्याग देनेके लिये बैठे देख कुमार अङ्गद अत्यन्त शोकके समुद्रमें डूब गये और विलाप करने लगे ॥ ६१½ ॥
तव नाशं च वैदेहि वालिनश्च तथा वधम् ॥ ६२ ॥ प्रायोपवेशमस्माकं मरणं च जटायुषः ।
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! आपका पता न लगने, वालीके मारे जाने, हमलोगोंके मरणान्त उपवास करने तथा जटायुके मरनेकी बातपर विचार करके कुमार अङ्गदको बड़ा दुःख हुआ था ॥ ६२½ ॥
तेषां नः स्वामिसंदेशान्निराशानां मुमूर्षताम् ॥ ६३ ॥ कार्यहेतोरिहायातः शकुनिर्वीर्यवान् महान् । गृध्रराजस्य सोदर्यः सम्पातिर्नाम गृध्रराट् ॥ ६४ ॥
भावार्थ
‘स्वामीके आज्ञापालनसे निराश होकर हम मरना ही चाहते थे कि दैववश हमारा कार्य सिद्ध करनेके लिये गृध्रराज जटायुके बड़े भाई सम्पाति, जो स्वयं भी गीधोंके राजा और महान् बलवान् पक्षी हैं, वहाँ आ पहुँचे ॥ ६३-६४ ॥
श्रुत्वा भ्रातृवधं कोपादिदं वचनमब्रवीत् । यवीयान् केन मे भ्राता हतः क च निपातितः ॥ ६५ ॥ एतदाख्यातुमिच्छामि भवद्भिर्वानरोत्तमाः ।
भावार्थ
‘हमारे मुँहसे अपने भाईके वधकी चर्चा सुनकर वे कुपित हो उठे और बोले—‘वानरशिरोमणियो ! बताओ, मेरे छोटे भाई जटायुका वध किसने किया है ? वह कहाँ मारा गया है ? यह सब वृत्तान्त मैं तुमलोगोंसे सुनना चाहता हूँ’ ॥ ६५½ ॥
अङ्गदोऽकथयत् तस्य जनस्थाने महद्वधम् ॥ ६६ ॥ रक्षसा भीमरूपेण त्वामुद्दिश्य यथार्थतः ।
भावार्थ
‘तब अंगदने जनस्थानमें आपकी रक्षाके उद्देश्यसे जूझते समय जटायुका उस भयानक रूपधारी राक्षसके द्वारा जो महान् वध किया गया था, वह सब प्रसंग ज्यों-का-त्यों कह सुनाया ॥ ६६½ ॥
जटायोस्तु वधं श्रुत्वा दुःखितः सोऽरुणात्मजः ॥ ६७ ॥ त्वामाह स वरारोहे वसन्तीं रावणालये ।
भावार्थ
‘जटायुके वधका वृत्तान्त सुनकर अरुणपुत्र सम्पातिको बड़ा दुःख हुआ । वरारोहे ! उन्होंने ही हमें बताया कि आप रावणके घरमें निवास कर रही हैं ॥ ६७½ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्पातेः प्रीतिवर्धनम् ॥ ६८ ॥ अङ्गदप्रमुखाः सर्वे ततः प्रस्थापिता वयम् । विन्ध्यादुत्थाय सम्प्राप्ताः सागरस्यान्तमुत्तमम् ॥ ६९ ॥ त्वद्दर्शने कृतोत्साहा हृष्टाः पुष्टाः प्लवङ्गमाः । अङ्गदप्रमुखाः सर्वे वेलोपान्तमुपागताः ॥ ७० ॥
भावार्थ
‘सम्पातिका वह वचन वानरोंके लिये बड़ा हर्षवर्धक था । उसे सुनकर उन्हींके भेजनेसे अङ्गद आदि हम सभी वानर आपके दर्शनकी आशासे उत्साहित हो विन्ध्यपर्वतसे उठकर समुद्रके उत्तम तटपर आये । इस प्रकार अङ्गद आदि सभी हृष्ट-पुष्ट वानर समुद्रके किनारे आ पहुँचे ॥ ६८–७० ॥
चिन्तां जग्मुः पुनर्भीमां त्वद्दर्शनसमुत्सुकाः । अथाहं हरिसैन्यस्य सागरं दृश्य सीदतः ॥ ७१ ॥ व्यवधूय भयं तीव्रं योजनानां शतं प्लुतः ।
भावार्थ
‘आपके दर्शनके लिये उत्सुक होनेपर भी सामने अपार समुद्रको देखकर सब वानर फिर भयानक चिन्तामें पड़ गये । समुद्रको देखकर वानर-सेना कष्टमें पड़ गयी है, यह जानकर मैं उन सबके तीव्र भयको दूर करता हुआ सौ योजन समुद्रको लाँघकर यहाँ आ गया ॥ ७१½ ॥
लङ्का चापि मया रात्रौ प्रविष्टा राक्षसाकुला ॥ ७२ ॥ रावणश्च मया दृष्टस्त्वं च शोकनिपीडिता ।
भावार्थ
‘राक्षसोंसे भरी हुई लङ्कामें मैंने रातमें ही प्रवेश किया है । यहाँ आकर रावणको देखा है और शोकसे पीड़ित हुई आपका भी दर्शन किया है ॥ ७२½ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथावृत्तमनिन्दिते ॥ ७३ ॥ अभिभाषस्व मां देवि दूतो दाशरथेरहम् ।
भावार्थ
‘सतीशिरोमणे ! यह सारा वृत्तान्त मैंने ठीक-ठीक आपके सामने रक्खा है । देवि ! मैं दशरथनन्दन श्रीरामका दूत हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये ॥ ७३½ ॥
तन्मां रामकृतोद्योगं त्वन्निमित्तमिहागतम् ॥ ७४ ॥ सुग्रीवसचिवं देवि बुद्ध्यस्व पवनात्मजम् ।
भावार्थ
‘मैंने श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये ही यह सारा उद्योग किया है और आपके दर्शनके निमित्त मैं यहाँ आया हूँ । देवि ! आप मुझे सुग्रीवका मन्त्री तथा वायुदेवताका पुत्र हनुमान् समझें ॥ ७४½ ॥
कुशली तव काकुत्स्थः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ७५ ॥ गुरोराराधने युक्तो लक्ष्मणः शुभलक्षणः । तस्य वीर्यवतो देवि भर्तुस्तव हिते रतः ॥ ७६ ॥
भावार्थ
‘देवि ! आपके पतिदेव समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं तथा बड़े भाईकी सेवामें संलग्न रहनेवाले शुभलक्षण लक्ष्मण भी प्रसन्न हैं । वे आपके उन पराक्रमी पतिदेवके हित-साधनमें ही तत्पर रहते हैं ॥ ७५-७६ ॥
अहमेकस्तु सम्प्राप्तः सुग्रीववचनादिह । मयेयमसहायेन चरता कामरूपिणा ॥ ७७ ॥ दक्षिणा दिगनुक्रान्ता त्वन्मार्गविचयैषिणा ।
भावार्थ
‘मैं सुग्रीवकी आज्ञासे अकेला ही यहाँ आया हूँ । इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्ति रखता हूँ । आपका पता लगानेकी इच्छासे मैंने बिना किसी सहायकके अकेले ही घूम-फिरकर इस दक्षिण दिशाका अनुसंधान किया है ॥ ७७½ ॥
दिष्ट्याहं हरिसैन्यानां त्वन्नाशमनुशोचताम् ॥ ७८ ॥ अपनेष्यामि संतापं तवाधिगमशासनात् ।
भावार्थ
‘आपके विनाशकी सम्भावनासे जो निरन्तर शोकमें डूबे रहते हैं, उन वानरसैनिकोंको यह बताकर कि आप मिल गयीं, मैं उनका संताप दूर करूँगा । यह मेरे लिये बड़े हर्षकी बात होगी ॥ ७८½ ॥
दिष्ट्या हि न मम व्यर्थं सागरस्येह लङ्घनम् ॥ ७९ ॥ प्राप्स्याम्यहमिदं देवि त्वद्दर्शनकृतं यशः ।
भावार्थ
‘देवि ! मेरा समुद्रको लाँघकर यहाँतक आना व्यर्थ नहीं हुआ । सबसे पहले आपके दर्शनका यह यश मुझे ही मिलेगा । यह मेरे लिये सौभाग्यकी बात है ॥ ७९½ ॥
राघवश्च महावीर्यः क्षिप्रं त्वामभिपत्स्यते ॥ ८० ॥ सपुत्रबान्धवं हत्वा रावणं राक्षसाधिपम् ।
भावार्थ
‘महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावणको उसके पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर शीघ्र ही आपसे आ मिलेंगे ॥ ८०½ ॥
माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः ॥ ८१ ॥ ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरिः । स च देवर्षिभिर्दिष्टः पिता मम महाकपिः । तीर्थे नदीपतेः पुण्ये शम्बसादनमुद्धरन् ॥ ८२ ॥ यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि । हनूमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा ॥ ८३ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! पर्वतोंमें माल्यवान् नामसे प्रसिद्ध एक उत्तम पर्वत है । वहाँ केसरी नामक वानर निवास करते थे । एक दिन वे वहाँसे गोकर्ण पर्वतपर गये। महाकपि केसरी मेरे पिता हैं । उन्होंने समुद्रके तटपर विद्यमान उस पवित्र गोकर्ण तीर्थमें देवर्षियोंकी आज्ञासे शम्बसादन नामक दैत्यका संहार किया था । मिथिलेशकुमारी ! उन्हीं कपिराज केसरीकी स्त्रीके गर्भसे वायुदेवताके द्वारा मेरा जन्म हुआ है । मैं लोकमें अपने ही कर्मद्वारा ‘हनुमान्’ नामसे विख्यात हूँ ॥ ८१-८३ ॥
विश्वासार्थं तु वैदेहि भर्तुरुक्ता मया गुणाः । अचिरात् त्वामितो देवि राघवो नयिता ध्रुवम् ॥ ८४ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! आपको विश्वास दिलानेके लिये मैंने आपके स्वामीके गुणोंका वर्णन किया है । देवि ! श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही आपको यहाँसे ले चलेंगे—यह निश्चित बात है’ ॥ ८४ ॥
एवं विश्वासिता सीता हेतुभिः शोककर्शिता । उपपन्नैरभिज्ञानैर्दूतं तमधिगच्छति ॥ ८५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार युक्तियुक्त एवं विश्वसनीय कारणों तथा पहचानके रूपमें बताये गये श्रीराम और लक्ष्मणके शारीरिक चिह्नोंद्वारा हनूमान्जीने शोकसे दुर्बल हुई सीताको अपना विश्वास दिलाया । तब उन्होंने हनुमान्जीको श्रीरामका दूत समझा ॥ ८५ ॥
अतुलं च गता हर्षं प्रहर्षेण तु जानकी । नेत्राभ्यां वक्रपक्ष्माभ्यां मुमोचानन्दजं जलम् ॥ ८६ ॥
भावार्थ
उस समय जनकनन्दिनी सीताको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । उस महान् हर्षके कारण वे कुटिल बरौनियोंवाले दोनों नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाने लगीं ॥ ८६ ॥
चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम् । अशोभत विशालाक्ष्या राहुमुक्त इवोडुराट् ॥ ८७ ॥
भावार्थ
उस अवसरपर विशाललोचना सीताका मनोहर मुख, जो लाल, सफेद और बड़े-बड़े नेत्रोंसे युक्त था, राहुके ग्रहणसे मुक्त हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥८७॥
हनूमन्तं कपिं व्यक्तं मन्यते नान्यथेति सा । अथोवाच हनूमांस्तामुत्तरं प्रियदर्शनाम् ॥ ८८ ॥
भावार्थ
अब वे हनुमान्को वास्तविक वानर मानने लगीं । इसके विपरीत मायामय रूपधारी राक्षस नहीं । तदनन्तर हनुमान्जीने प्रियदर्शना सीतासे फिर कहा—॥ ८८ ॥
पतत् ते सर्वमाख्यातं समाश्वसिहि मैथिलि । किं करोमि कथं वा ते रोचते प्रतियाम्यहम् ॥ ८९ ॥ हतेऽसुरे संयति शम्बसादने कपिप्रवीरेण महर्षिचोदनात् । ततोऽस्मि वायुप्रभवो हि मैथिलि प्रभावतस्तत्प्रतिमश्च वानरः ॥ ९० ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! इस प्रकार आपने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने बता दिया । अब आप धैर्य धारण करें । बताइये, मैं आपकी कैसी और क्या सेवा करूँ । इस समय आपकी रुचि क्या है, आज्ञा हो तो अब मैं लौट जाऊँ ॥ ‘महर्षियोंकी प्रेरणासे कपिवर केसरीद्वारा युद्धमें शम्बसादन नामक असुरके मारे जानेपर मैंने पवनदेवताके द्वारा जन्म ग्रहण किया । अतः मैथिलि ! मैं उन वायुदेवताके समान ही प्रभावशाली वानर हूँ’ ॥९०॥
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