सुन्दरकाण्ड, सर्ग 34
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनुमान् हरिपुङ्गवः । दुःखाद् दुःखाभिभूतायाः सान्त्वमुत्तरमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
दुःख-पर-दुःख उठानेके कारण पीड़ित हुई सीताका उपर्युक्त वचन सुनकर वानरशिरोमणि हनुमान्जीने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ १ ॥
अहं रामस्य संदेशाद् देवि दूतस्त्वागतः । वैदेहि कुशली रामः स त्वां कौशलमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘देवि ! मैं श्रीरामचन्द्रजीका दूत हूँ और आपके लिये उनका संदेश लेकर आया हूँ । विदेहनन्दिनी!श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल-समाचार पूछा है ॥ २ ॥
यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः । स त्वां दाशरथी रामो देवि कौशलमब्रवीत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! जिन्हें ब्रह्मास्त्र और वेदोंका भी पूर्ण ज्ञान है, वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीराम स्वयं सकुशल रहकर आपकी भी कुशल पूछ रहे हैं ॥ ३ ॥
लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्तेऽनुचरः प्रियः । कृतवाञ्छोकसंतप्तः शिरसा तेऽभिवादनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘आपके पतिके अनुचर तथा प्रिय महातेजस्वी लक्ष्मणने भी शोकसे संतप्त हो आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम कहलाया है’ ॥ ४ ॥
सा तयोः कुशलं देवी निशम्य नरसिंहयोः । प्रतिसंहृष्टसर्वाङ्गी हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणका समाचार सुनकर देवी सीताके सम्पूर्ण अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया और वे हनुमान्जीसे बोलीं—॥ ५ ॥
कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मा । पति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘यदि मनुष्य जीवित रहे तो उसे सौ वर्ष बाद भी आनन्द प्राप्त होता ही है, यह लौकिक कहावत आज मुझे बिल्कुल सत्य एवं कल्याणमयी जान पड़ती है’ ॥ ६ ॥
तयोः समागमे तस्मिन् प्रीतिरुत्पादिताद्भुता । परस्परेण चालापं विश्वस्तौ तौ प्रचक्रतुः ॥ ७ ॥
भावार्थ
सीता और हनुमान्के इस मिलाप ( परस्पर दर्शन ) से दोनोंको ही अद्भुत प्रसन्नता प्राप्त हुई । वे दोनों विश्वस्त होकर एक-दूसरेसे वार्तालाप करने लगे ॥ ७ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः । सीतायाः शोकतप्तायाः समीपमुपचक्रमे ॥ ८ ॥
भावार्थ
शोकसंतप्त सीताकी वे बातें सुनकर पवनकुमार हनुमान्जी उनके कुछ निकट चले गये ॥ ८ ॥
यथा यथा समीपं स हनूमानुपसर्पति । तथा तथा रावणं सा तं सीता परिशङ्कते ॥ ९ ॥
भावार्थ
हनुमान्जी ज्यों-ज्यों निकट आते, त्यों-ही-त्यों सीताको यह शङ्का होती कि यह कहीं रावण न हो ॥ ९ ॥
अहो धिग् धिक्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे । रूपान्तरमुपागम्य स एवायं हि रावणः ॥ १० ॥
भावार्थ
ऐसा विचार आते ही वे मन-ही-मन कहने लगीं— ‘अहो ! धिक्कार है, जो इसके सामने मैंने अपने मनकी बात कह दी । यह दूसरा रूप धारण करके आया हुआ वह रावण ही है’ ॥ १० ॥
तामशोकस्य शाखां तु विमुक्त्वा शोककर्शिता । तस्यामेवानवद्याङ्गी धरण्यां समुपाविशत् ॥ ११ ॥ अवन्दत महाबाहुस्ततस्तां जनकात्मजाम् । सा चैनं भयसंत्रस्ता भूयो नैनमुदैक्षत ॥ १२ ॥
भावार्थ
फिर तो निर्दोष अङ्गोंवाली सीता उस अशोक वृक्षकी शाखाको छोड़ शोकसे कातर हो वहीं जमीनपर बैठ गयीं ॥ तत्पश्चात् महाबाहु हनुमान्ने जनकनन्दिनी सीताके चरणोंमें प्रणाम किया; किंतु वे भयभीत होनेके कारण फिर उनकी ओर देख न सकीं ॥ १२ ॥
तं दृष्ट्वा वन्दमानं च सीता शशिनिभानना । अब्रवीद् दीर्घमुच्छ्वस्य वानरं मधुरस्वरा ॥ १३ ॥
भावार्थ
वानर हनुमान्को बारंबार वन्दना करते देख चन्द्रमुखी सीता लंबी साँस खींचकर उनसे मधुर वाणीमें बोलीं—॥ १३ ॥
मायां प्रविष्टो मायावी यदि त्वं रावणः स्वयम् । उत्पादयसि मे भूयः संतापं तत्र शोभनम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘यदि तुम स्वयं मायावी रावण हो और मायामय शरीरमें प्रवेश करके फिर मुझे कष्ट दे रहे हो तो यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है ॥ १४ ॥
स्वं परित्यज्य रूपं यः परिव्राजकरूपवान् । जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘जिसे मैंने जनस्थानमें देखा था तथा जो अपने यथार्थ रूपको छोड़कर संन्यासीका रूप धारण करके आया था, तुम वही रावण हो ॥ १५ ॥
उपवासकृशां दीनां कामरूप निशाचर । संतापयसि मां भूयः संतापं तत्र शोभनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले निशाचर ! मैं उपवास करते-करते दुबली हो गयी हूँ और मन-ही-मन दुखी रहती हूँ । इतनेपर भी जो तुम फिर मुझे संताप दे रहे हो, यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है ॥ १६ ॥
अथवा नैतदेवं हि यन्मया परिशङ्कितम् । मनसो हि मम प्रीतिरुत्पन्ना तव दर्शनात् ॥ १७ ॥ यदि रामस्य दूतस्त्वमागतो भद्रमस्तु ते । पृच्छामि त्वां हरिश्रेष्ठ प्रिया रामकथा हि मे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘अथवा जिस बातकी मेरे मनमें शङ्का हो रही है, वह न भी हो; क्योंकि तुम्हें देखनेसे मेरे मनमें प्रसन्नता हुई है॥ ‘वानरश्रेष्ठ ! सचमुच ही यदि तुम भगवान् श्रीरामके दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुमसे उनकी बातें पूछती हूँ; क्योंकि श्रीरामकी चर्चा मुझे बहुत ही प्रिय है ॥ १८ ॥
गुणान् रामस्य कथय प्रियस्य मम वानर । चित्तं हरसि मे सौम्य नदीकूलं यथा रयः ॥ १९ ॥ अहो स्वप्नस्य सुखता याद्दमेव चिराहृता । प्रेषितं नाम पश्यामि राघवेण वनौकसम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वानर ! मेरे प्रियतम श्रीरामके गुणोंका वर्णन करो । सौम्य ! जैसे जलका वेग नदीके तटको हर लेता है, उसी प्रकार तुम श्रीरामकी चर्चासे मेरे चित्तको चुराये लेते हो ॥ ‘अहो ! यह स्वप्न कैसा सुखद हुआ ? जिससे यहाँ चिरकालसे हरकर लायी गयी मैं आज भगवान् श्रीरामके भेजे हुए दूत वानरको देख रही हूँ ॥ २० ॥
स्वप्नेऽपि यद्यहं वीरं राघवं सहलक्ष्मणम् । पश्येयं नावसीदेयं स्वप्नोऽपि मम मत्सरी ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘यदि मैं लक्ष्मणसहित वीरवर श्रीरघुनाथजीको स्वप्नमें भी देख लिया करूँ तो मुझे इतना कष्ट न हो; परंतु स्वप्न भी मुझसे डाह करता है ॥ २१ ॥
नाहं स्वप्नमिमं मन्ये स्वप्ने दृष्ट्वा हि वानरम् । न शक्योऽभ्युदयः प्राप्तुं प्राप्तश्चाभ्युदयो मम ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मैं इसे स्वप्न नहीं समझती; क्योंकि स्वप्नमें वानरको देख लेनेपर किसीका अभ्युदय नहीं हो सकता और मैंने यहाँ अभ्युदय प्राप्त किया है (अभ्युदयकालमें जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता मेरे मनमें छा रही है । ) ॥२२॥
किं नु स्याच्चित्तमोहोऽयं भवेद् वातगतिस्त्वियम् । उन्मादजो विकारो वा स्यादयं मृगतृष्णिका ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘अथवा यह मेरे चित्तका मोह तो नहीं है । वात-विकारसे होनेवाला भ्रम तो नहीं है । उन्मादका विकार तो नहीं उमड़ आया अथवा यह मृगतृष्णा तो नहीं है ॥ २३ ॥
अथवा नायमुन्मादो मोहोऽप्युन्मादलक्षणः । सम्बुध्ये चाहमात्मानमिमं चापि वनौकसम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘अथवा यह उन्मादजनित विकार नहीं है । उन्मादके समान लक्षणवाला मोह भी नहीं है; क्योंकि मैं अपने-आपको देख और समझ रही हूँ तथा इस वानरको भी ठीक-ठीक देखती और समझती हूँ ( उन्माद आदिकी अवस्थाओंमें इस तरह ठीक-ठीक ज्ञान होना सम्भव नहीं है । )’ ॥२४॥
इत्येवं बहुधा सीता सम्प्रधार्य बलाबलम् । रक्षसां कामरूपत्वान्मेने तं राक्षसाधिपम् ॥ २५ ॥ पतां बुद्धिं तदा कृत्वा सीता सा तनुमध्यमा । न प्रतिव्याजहाराथ वानरं जनकात्मजा ॥ २६ ॥ सीताया निश्चितं बुद्ध्वा हनूमान् मारुतात्मजः । श्रोत्रानुकूलैर्वचनैस्तदा तां सम्प्रहर्षयन् ॥ २७ ॥
भावार्थ
इस तरह सीता अनेक प्रकारसे राक्षसोंकी प्रबलता और वानरकी निर्बलताका निश्चय करके उन्हें राक्षसराज रावण ही माना; क्योंकि राक्षसोंमें इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्ति होती है । ऐसा विचारकर सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली जनककुमारी सीताने कपिवर हनुमान्जीसे फिर कुछ नहीं कहा ॥ सीताके इस निश्चयको समझकर पवनकुमार हनुमान्जी उस समय कानोंको सुख पहुँचानेवाले अनुकूल वचनोंद्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले—॥ २७ ॥
आदित्य इव तेजस्वी लोककान्तः शशी यथा । राजा सर्वस्य लोकस्य देवो वैश्रवणो यथा ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘भगवान् श्रीराम सूर्यके समान तेजस्वी, चन्द्रमाके समान लोककमनीय तथा देव कुबेरकी भाँति सम्पूर्ण जगत्के राजा हैं ॥ २८ ॥
विक्रमेणोपपन्नश्च यथा विष्णुर्महायशाः । सत्यवादी मधुरवाग् देवो वाचस्पतिर्यथा ॥ २९ ॥ रूपवान् सुभगः श्रीमान् कंदर्प इव मूर्तिमान् । स्थानक्रोधे प्रहर्ता च श्रेष्ठो लोके महारथः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘महायशस्वी भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी तथा बृहस्पतिजीकी भाँति सत्यवादी एवं मधुरभाषी हैं ॥ ‘रूपवान्, सौभाग्यशाली और कान्तिमान् तो वे इतने हैं, मानो मूर्तिमान् कामदेव हों । वे क्रोधके पात्रपर ही प्रहार करनेमें समर्थ और संसारके श्रेष्ठ महारथी हैं ॥ ३० ॥
बाहुच्छायामवष्टब्धो यस्य लोको महात्मनः । अपक्रम्याश्रमपदान्मृगरूपेण राघवम् ॥ ३१ ॥ शून्ये येनापनीतासि तस्य द्रक्ष्यसि तत्फलम् ॥
भावार्थ
‘सम्पूर्ण विश्व उन महात्माकी भुजाओंके आश्रयमें— उन्हींकी छत्रछायामें विश्राम करता है । मृगरूपधारी निशाचरद्वारा श्रीरघुनाथजीको आश्रमसे दूर हटाकर जिसने सूने आश्रममें पहुँचकर आपका अपहरण किया है, उसे उस पापका जो फल मिलनेवाला है, उसको आप अपनी आँखों देखेंगी ॥ ३१½ ॥
अचिराद् रावणं संख्ये यो वधिष्यति वीर्यवान् ॥ ३२ ॥ क्रोधप्रमुक्तैरिषुभिर्ज्वलद्भिरिव पावकैः ।
भावार्थ
‘पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी क्रोधपूर्वक छोड़े गये प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करेंगे ॥ ३२½ ॥
तेनाहं प्रेषितो दूतस्त्वत्सकाशमिहागतः ॥ ३३ ॥ त्वद्वियोगेन दुःखार्तः स त्वां कौशलमब्रवीत् ।
भावार्थ
‘मैं उन्हींका भेजा हुआ दूत होकर यहाँ आपके पास आया हूँ । भगवान् श्रीराम आपके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित हैं । उन्होंने आपके पास अपनी कुशल कहलायी है और आपकी भी कुशल पूछी है ॥ ३३½ ॥
लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ३४ ॥ अभिवाद्य महाबाहुः स त्वां कौशलमब्रवीत् । रामस्य च सखा देवि सुग्रीवो नाम वानरः ॥ ३५ ॥ राजा वानरमुख्यानां स त्वां कौशलमब्रवीत् । नित्यं स्मरति ते रामः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी महाबाहु लक्ष्मणने भी आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है ॥ ‘देवि ! श्रीरघुनाथजीके सखा एक सुग्रीव नामक वानर हैं, जो मुख्य-मुख्य वानरोंके राजा हैं, उन्होंने भी आपसे कुशल पूछी है । सुग्रीव और लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन आपका स्मरण करते हैं ॥ ३५-३६ ॥
दिष्ट्या जीवसि वैदेहि राक्षसीवशमागता । नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं लक्ष्मणं च महारथम् ॥ ३७ ॥ मध्ये वानरकोटीनां सुग्रीवं चामितौजसम् । अहं सुग्रीवसचिवो हनूमान् नाम वानरः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! राक्षसियोंके चंगुलमें फँसकर भी आप अभीतक जीवित हैं, यह बड़े सौभाग्यकी बात है । अब आप शीघ्र ही महारथी श्रीराम और लक्ष्मणका दर्शन करेंगी ॥ ‘साथ ही करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए अमिततेजस्वी सुग्रीवको भी आप देखेंगी । मैं सुग्रीवका मन्त्री हनुमान् नामक वानर हूँ ॥ ३८ ॥
प्रविष्टो नगरीं लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम् । कृत्वा मूर्ध्नि पदन्यासं रावणस्य दुरात्मनः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘मैंने महासागरको लाँघकर और दुरात्मा रावणके सिरपर पैर रखकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया है ॥ ३९ ॥
त्वां द्रष्टुमुपयातोऽहं समाश्रित्य पराक्रमम् । नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि । विशङ्का त्यज्यतामेषा श्रद्धत्स्व वदतो मम ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘मैं अपने पराक्रमका भरोसा करके आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ । देवि ! आप मुझे जैसा समझ रही हैं, मैं वैसा नहीं हूँ । आप यह विपरीत आशङ्का छोड़ दीजिये और मेरी बातपर विश्वास कीजिये’ ॥ ४० ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें