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बालकाण्ड, सर्ग 72

तमुक्तवन्तं वैदेहं विश्वामित्रो महामुनिः । उवाच वचनं वीरं वसिष्ठसहितो नृपम् ॥ १ ॥

भावार्थ

विदेहराज जनक जब अपनी बात समाप्त कर चुके, तब वसिष्ठसहित महामुनि विश्वामित्र उन वीर नरेशसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

अचिन्त्यान्यप्रमेयाणि कुलानि नरपुङ्गव । इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्योऽस्ति कश्चन ॥ २ ॥ सदृशो धर्मसम्बन्धः सदृशो रूपसम्पदा । रामलक्ष्मणयो राजन् सीता चोर्मिलया सह ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! इक्ष्वाकु और विदेह दोनों ही राजाओंके वंश अचिन्तनीय हैं । दोनोंके ही प्रभावकी कोई सीमा नहीं है । इन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई राजवंश नहीं है॥ ‘राजन् ! इन दोनों कुलोंमें जो यह धर्म-सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा है, सर्वथा एक दूसरेके योग्य है । रूप-वैभवकी दृष्टिसे भी समान योग्यताका है; क्योंकि ऊर्मिलासहित सीता श्रीराम और लक्ष्मणके अनुरूप है ॥ ३ ॥

वक्तव्यं च नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम । भ्राता यवीयान् धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वजः ॥ ४ ॥ अस्य धर्मात्मनो राजन् रूपेणाप्रतिमं भुवि । सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्न्यर्थं वरयामहे ॥ ५ ॥ भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य च धीमतः । वरये ते सुते राजंस्तयोरर्थे महात्मनोः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! इसके बाद मुझे भी कुछ कहना है; आप मेरी बात सुनिये । राजन् ! आपके छोटे भाई जो ये धर्मज्ञ राजा कुशध्वज बैठे हैं, इन धर्मात्मा नरेशके भी दो कन्याएँ हैं, जो इस भूमण्डलमें अनुपम सुन्दरी हैं । नरश्रेष्ठ ! भूपाल ! मैं आपकी उन दोनों कन्याओंका कुमार भरत और बुद्धिमान् शत्रुघ्न इन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंके लिये इनकी धर्मपत्नी बनानेके उद्देश्यसे वरण करता हूँ ॥ ४–६ ॥

पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवनशालिनः । लोकपालसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः ॥ ७ ॥ उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम् । इक्ष्वाकुकुलमव्यग्रं भवतः पुण्यकर्मणः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘राजा दशरथके ये सभी पुत्र रूप और यौवनसे सुशोभित, लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा देवताओंके तुल्य पराक्रमी हैं॥ ‘राजेन्द्र ! इन दोनों भाइयों ( भरत और शत्रुघ्न ) को भी कन्यादान करके आप इस समस्त इक्ष्वाकुकुलको अपने सम्बन्धसे बाँध लीजिये । आप पुण्यकर्मा पुरुष हैं; आपके चित्तमें व्यग्रता नहीं आनी चाहिये ( अर्थात् आप यह सोचकर व्यग्र न हों कि ऐसे महान् सम्राट्के साथ मैं एक ही समय चार वैवाहिक-सम्बन्धोंका निर्वाह कैसे कर सकता हूँ । )’ ॥८॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा वसिष्ठस्य मते तदा । जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच मुनिपुङ्गवौ ॥ ९ ॥

भावार्थ

वसिष्ठजीकी सम्मतिके अनुसार विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर उस समय राजा जनकने हाथ जोड़कर उन दोनों मुनिवरोंसे कहा—॥ ९ ॥

कुलं धन्यमिदं मन्ये येषां तौ मुनिपुङ्गवौ । सदृशं कुलसम्बन्धं यदाज्ञापयतः स्वयम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘मुनिपुङ्गवो ! मैं अपने इस कुलको धन्य मानता हूँ, जिसे आप दोनों इक्ष्वाकुवंशके योग्य समझकर इसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये स्वयं आज्ञा दे रहे हैं ॥ १० ॥

एवं भवतु भद्रं वः कुशध्वजसुते इमे । पत्न्यौ भजेतां सहितौ शत्रुघ्नभरतावुभौ ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘आपका कल्याण हो । आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही हो । ये सदा साथ रहनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न कुशध्वजकी इन दोनों कन्याओं ( मेंसे एक-एक ) को अपनी-अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करें ॥ ११ ॥

एकाह्ना राजपुत्रीणां चतसृणां महामुने । पाणीन् गृह्णन्तु चत्वारो राजपुत्रा महाबलाः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘महामुने ! ये चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करें ॥ १२ ॥

उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिणः । वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापतिः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘ब्रह्मन् ! अगले दो दिन फाल्गुनी नामक नक्षत्रोंसे युक्त हैं । इनमें ( पहले दिन तो पूर्वा फाल्गुनी है और ) दूसरे दिन ( अर्थात् परसों ) उत्तराफाल्गुनी नामक नक्षत्र होगा, जिसके देवता प्रजापति भग ( तथा अर्यमा ) हैं । मनीषी पुरुष उस नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम बताते हैं’ ॥१३॥

एवमुक्त्वा वचः सौम्यं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः । उभौ मुनिवरौ राजा जनको वाक्यमब्रवीत् ॥ १४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार सौम्य ( मनोहर ) वचन कहकर राजा जनक उठकर खड़े हो गये और उन दोनों मुनिवरोंसे हाथ जोड़कर बोले—॥ १४ ॥

परो धर्मः कृतो मह्यं शिष्योऽस्मि भवतोस्तथा। इमान्यासनमुख्यानि आस्यतां मुनिपुङ्गवौ ॥ १५ ॥ यथा दशरथस्येयं तथायोध्या पुरी मम। प्रभुत्वे नास्ति संदेहो यथार्हं कर्तुमर्हथ ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘आपलोगोंने कन्याओंका विवाह निश्चित करके मेरे लिये महान् धर्मका सम्पादन कर दिया; मैं आप दोनोंका शिष्य हूँ। मुनिवरो ! इन श्रेष्ठ आसनोंपर आप दोनों विराजमान हों ॥ ‘आपके लिये जैसी राजा दशरथकी अयोध्या है, वैसी ही यह मेरी मिथिलापुरी भी है। आपका इसपर पूरा अधिकार है, इसमें संदेह नहीं; अतः आप हमें यथायोग्य आज्ञा प्रदान करते रहें’ ॥ १६ ॥

तथा ब्रुवति वैदेहे जनके रघुनन्दनः। राजा दशरथो हृष्टः प्रत्युवाच महीपतिम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

विदेहराज जनकके ऐसा कहनेपर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले राजा दशरथने प्रसन्न होकर उन मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १७ ॥

युवामसंख्येयगुणौ भ्रातरौ मिथिलेश्वरौ। ऋषयो राजसङ्घाश्च भवद्भ्यामभिपूजिताः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘मिथिलेश्वर ! आप दोनों भाइयोंके गुण असंख्य हैं; आपलोगोंने ऋषियों तथा राजसमूहोंका भलीभाँति सत्कार किया है ॥ १८ ॥

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गमिष्यामः स्वमालयम्। श्राद्धकर्माणि विधिवद्विधास्य इति चाब्रवीत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘आपका कल्याण हो, आप मङ्गलके भागी हों। अब हम अपने विश्रामस्थानको जायँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्धका कार्य सम्पन्न करूँगा।’ यह बात भी राजा दशरथने कही ॥ १९ ॥

तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा। मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशाः ॥ २० ॥

भावार्थ

तदनन्तर मिथिलानरेशकी अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठको आगे करके तुरंत अपने आवासस्थानपर चले गये ॥ २० ॥

स गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानतः। प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

डेरेपर जाकर राजा दशरथने (अपराह्णकालमें) विधिपूर्वक आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। तत्पश्चात् (रात बीतनेपर) प्रातःकाल उठकर राजाने तत्कालोचित उत्तम गोदान-कर्म किया ॥ २१ ॥

गवां शतसहस्रं च ब्राह्मणेभ्यो नराधिपः। एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मतः ॥ २२ ॥

भावार्थ

राजा दशरथने अपने एक-एक पुत्रके मङ्गलके लिये धर्मानुसार एक-एक लाख गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं ॥ २२ ॥

सुवर्णशृङ्गयः सम्पन्नाः सवत्साः कांस्यदोहनाः। गवां शतसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभः ॥ २३ ॥ वित्तमन्यच्च सुबहु द्विजेभ्यो रघुनन्दनः। ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सलः ॥ २४ ॥

भावार्थ

उन सबके सींग सोनेसे मढ़े हुए थे। उन सबके साथ बछड़े और काँसेके दुग्धपात्र थे। इस प्रकार पुत्रवत्सल रघुकुलनन्दन पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने चार लाख गौओंका दान किया तथा और भी बहुत-सा धन पुत्रोंके लिये गोदानके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दिया ॥ २३-२४ ॥

स सुतैः कृतगोदानैर्वृतः सन्नृपतिस्तदा। लोकपालैरिवाभाति वृतः सौम्यः प्रजापतिः ॥ २५ ॥

भावार्थ

गोदान-कर्म सम्पन्न करके आये हुए पुत्रोंसे घिरे हुए राजा दशरथ उस समय लोकपालोंसे घिरकर बैठे हुए शान्तस्वभाव प्रजापति ब्रह्माके समान शोभा पा रहे थे ॥ २५ ॥

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