बालकाण्ड, सर्ग 73
यस्मिंस्तु दिवसे राजा चक्रे गोदानमुत्तमम्। तस्मिंस्तु दिवसे वीरो युधाजित् समुपेयिवान् ॥ १ ॥ पुत्रः केकयराजस्य साक्षाद्भरतमातुलः। दृष्ट्वा पृष्ट्वा च कुशलं राजानमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
राजा दशरथने जिस दिन अपने पुत्रोंके विवाहके निमित्त उत्तम गोदान किया, उसी दिन भरतके सगे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महाराजका दर्शन करके कुशल-मङ्गल पूछा और इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥
केकयाधिपती राजा स्नेहात् कुशलमब्रवीत्। येषां कुशलकामोऽसि तेषां सम्प्रत्यनामयम् ॥ ३ ॥ स्वस्त्रीयं मम राजेन्द्र द्रष्टुकामो महीपतिः । तदर्थमुपयातोऽहमयोध्यां रघुनन्दन ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! केकयदेशके महाराजने बड़े स्नेहके साथ आपका कुशल-समाचार पूछा है और आप भी हमारे यहाँके जिन-जिन लोगोंकी कुशलवार्ता जानना चाहते होंगे, वे सब इस समय स्वस्थ और सानन्द हैं । राजेन्द्र ! केकयनरेश मेरे भान्जे भरतको देखना चाहते हैं । अतः इन्हें लेनेके लिये ही मैं अयोध्या आया था ॥ ३-४ ॥
श्रुत्वा त्वहमयोध्यायां विवाहार्थं तवात्मजान् । मिथिलामुपयातांस्तु त्वया सह महीपते ॥ ५ ॥ त्वरयाभ्युपयातोऽहं द्रष्टुकामः स्वसुः सुतम् ।
भावार्थ
‘परंतु पृथ्वीनाथ ! अयोध्यामें यह सुनकर कि ‘आपके सभी पुत्र विवाहके लिये आपके साथ मिथिला पधारे हैं’ मैं तुरंत यहाँ चला आया; क्योंकि मेरे मनमें अपनी बहिनके बेटेको देखनेकी बड़ी लालसा थी’ ॥ ५½ ॥
अथ राजा दशरथः प्रियातिथिमुपस्थितम् ॥ ६ ॥ दृष्ट्वा परमसत्कारैः पूजनार्हमपूजयत् ।
भावार्थ
महाराज दशरथने अपने प्रिय अतिथिको उपस्थित देख बड़े सत्कारके साथ उनकी आवभगत की; क्योंकि वे सम्मान पानेके ही योग्य थे ॥ ६½ ॥
ततस्तामुषितो रात्रिं सह पुत्रैर्महात्मभिः ॥ ७ ॥ प्रभाते पुनरुत्थाय कृत्वा कर्माणि तत्त्ववित् । ऋषींस्तदा पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर अपने महामनस्वी पुत्रोंके साथ वह रात व्यतीत करके वे तत्त्वज्ञ नरेश प्रातःकाल उठे और नित्य कर्म करके ऋषियोंको आगे किये जनककी यज्ञशालामें जा पहुँचे ॥७-८॥
युक्ते मुहूर्ते विजये सर्वाभरणभूषितैः । भ्रातृभिः सहितो रामः कृतकौतुकमङ्गलः ॥ ९ ॥ वसिष्ठं पुरतः कृत्वा महर्षीनपरानपि । वसिष्ठो भगवानेत्य वैदेहमिदमब्रवीत् ॥ १० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् विवाहके योग्य विजय नामक मुहूर्त आनेपर दूल्हेके अनुरूप समस्त वेष-भूषासे अलंकृत हुए भाइयोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी भी वहाँ आये । वे विवाहकालोचित मङ्गलाचार पूर्ण कर चुके थे तथा वसिष्ठ मुनि एवं अन्यान्य महर्षियोंको आगे करके उस मण्डपमें पधारे थे । उस समय भगवान् वसिष्ठने विदेहराज जनकके पास जाकर इस प्रकार कहा—॥ ९-१० ॥
राजा दशरथो राजन् कृतकौतुकमङ्गलैः । पुत्रैर्नरवरश्रेष्ठो दातारमभिकाङ्क्षते ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! नरेशोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथ अपने पुत्रोंका वैवाहिकसूत्र-बन्धनरूप मङ्गलाचार सम्पन्न करके उन सबके साथ पधारे हैं और भीतर आनेके लिये दाताके आदेशकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ ११ ॥
दातृप्रतिग्रहीतृभ्यां सर्वार्थाः सम्भवन्ति हि । स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व कृत्वा वैवाह्यमुत्तमम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘क्योंकि दाता और प्रतिग्रहीता ( दान ग्रहण करनेवाले ) का संयोग होनेपर ही समस्त दान-धर्मोंका सम्पादन सम्भव होता है; अतः आप विवाह-कालोपयोगी शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके उन्हें बुलाइये और कन्यादानरूप स्वधर्मका पालन कीजिये’ ॥ १२ ॥
इत्युक्तः परमोदारो वसिष्ठेन महात्मना । प्रत्युवाच महातेजा वाक्यं परमधर्मवित् ॥ १३ ॥ कः स्थितः प्रतिहारो मे कस्याज्ञां सम्प्रतीक्षते । स्वगृहे को विचारोऽस्ति यथा राज्यमिदं तव ॥ १४ ॥ कृतकौतुकसर्वस्वा वेदिमूलमुपागताः । मम कन्या मुनिश्रेष्ठ दीप्ता वह्नेरिवार्चिषः ॥ १५ ॥
भावार्थ
महात्मा वसिष्ठके ऐसा कहनेपर परम उदार, परम धर्मज्ञ और महातेजस्वी राजा जनकने इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ‘मुनिश्रेष्ठ ! महाराजके लिये मेरे यहाँ कौन-सा पहरेदार खड़ा है । वे किसके आदेशकी प्रतीक्षा करते हैं । अपने घरमें आनेके लिये कैसा सोच-विचार है ? यह जैसे मेरा राज्य है, वैसे ही आपका है । मेरी कन्याओंका वैवाहिक सूत्र-बन्धनरूप मङ्गलकृत्य सम्पन्न हो चुका है । अब वे यज्ञवेदीके पास आकर बैठी हैं और अग्निकी प्रज्वलित शिखाओंके समान प्रकाशित हो रही हैं ॥ १४-१५ ॥
सद्योऽहं त्वत्प्रतीक्षोऽस्मि वेद्यामस्यां प्रतिष्ठितः । अविघ्नं क्रियतां सर्वं किमर्थं हि विलम्ब्यते ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘इस समय तो मैं आपकी ही प्रतीक्षामें वेदीपर बैठा हूँ । आप निर्विघ्नतापूर्वक सब कार्य पूर्ण कीजिये । विलम्ब किसलिये करते हैं ?’ ॥ १६ ॥
तद् वाक्यं जनकेनोक्तं श्रुत्वा दशरथस्तदा । प्रवेशयामास सुतान् सर्वानृषिगणानपि ॥ १७ ॥
भावार्थ
वसिष्ठजीके मुखसे राजा जनककी कही हुई बात सुनकर महाराज दशरथ उस समय अपने पुत्रों और सम्पूर्ण महर्षियोंको महलके भीतर ले आये ॥ १७ ॥
ततो राजा विदेहानां वसिष्ठमिदमब्रवीत् । कारयस्व ऋषे सर्वामृषिभिः सह धार्मिक ॥ १८ ॥ रामस्य लोकरामस्य क्रियां वैवाहिकीं प्रभो ।
भावार्थ
तदनन्तर विदेहराजने वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा— ‘धर्मात्मा महर्षे ! प्रभो ! आप ऋषियोंको साथ लेकर लोकाभिराम श्रीरामके विवाहकी सम्पूर्ण क्रिया कराइये’ ॥१८½॥
तथेत्युक्त्वा तु जनकं वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १९ ॥ विश्वामित्रं पुरस्कृत्य शतानन्दं च धार्मिकम् । प्रपामध्ये तु विधिवद् वेदिं कृत्वा महातपाः ॥ २० ॥ अलंचकार तां वेदिं गन्धपुष्पैः समन्ततः । सुवर्णपालिकाभिश्च चित्रकुम्भैश्च साङ्कुरैः ॥ २१ ॥ अङ्कुराढ्यैः शरावैश्च धूपपात्रैः सधूपकैः । शङ्खपात्रैः स्रुवैः स्रग्भिः पात्रैरर्घ्यादिपूजितैः ॥ २२ ॥ लाजपूर्णैश्च पात्रीभिरक्षतैरपि संस्कृतैः । दर्भैः समैः समास्तीर्य विधिवन्मन्त्रपूर्वकम् ॥ २३ ॥ अग्निमाधाय तं वेद्यां विधिमन्त्रपुरस्कृतम् । जुहावाग्नौ महातेजा वसिष्ठो मुनिपुङ्गवः ॥ २४ ॥
भावार्थ
तब जनकजीसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने विश्वामित्र और धर्मात्मा शतानन्दजीको आगे करके विवाह-मण्डपके मध्यभागमें विधिपूर्वक वेदी बनायी और गन्ध तथा फूलोंके द्वारा उसे चारों ओरसे सुन्दर रूपमें सजाया । साथ ही बहुत-सी सुवर्ण-पालिकाएँ, यवके अङ्कुरोंसे युक्त चित्रित कलश, अङ्कुर जमाये हुए सकोरे, धूपयुक्त धूपपात्र, शङ्खपात्र, स्रुवा, स्रुक्, अर्घ्य आदि पूजनपात्र, लावा (खीलों) से भरे हुए पात्र तथा धोये हुए अक्षत आदि समस्त सामग्रियोंको भी यथास्थान रख दिया । तत्पश्चात् महातेजस्वी मुनिवर वसिष्ठजीने बराबर-बराबर कुशोंको वेदीके चारों ओर बिछाकर मन्त्रोच्चारण करते हुए विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन किया और विधिको प्रधानता देते हुए मन्त्रपाठपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें हवन किया ॥ १९—२४ ॥
ततः सीतां समानीय सर्वाभरणभूषिताम् । समक्षमग्नेः संस्थाप्य राघवाभिमुखे तदा ॥ २५ ॥ अब्रवीज्जनको राजा कौसल्यानन्दवर्धनम् । इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव ॥ २६ ॥ प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना । पतिव्रता महाभागा छायेवानुगता सदा ॥ २७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर राजा जनकने सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित सीताको ले आकर अग्निके समक्ष श्रीरामचन्द्रजीके सामने बिठा दिया और माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले उन श्रीरामसे कहा—‘रघुनन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो । यह मेरी पुत्री सीता तुम्हारी सहधर्मिणीके रूपमें उपस्थित है; इसे स्वीकार करो और इसका हाथ अपने हाथमें लो । यह परम पतिव्रता, महान् सौभाग्यवती और छायाकी भाँति सदा तुम्हारे पीछे चलनेवाली होगी’ ॥ २५—२७ ॥
इत्युक्त्वा प्राक्षिपद् राजा मन्त्रपूतं जलं तदा । साधुसाध्विति देवानामृषीणां वदतां तदा ॥ २८ ॥ देवदुन्दुभिनिर्घोषः पुष्पवर्षो महानभूत् । एवं दत्त्वा सुतां सीतां मन्त्रोदकपुरस्कृताम् ॥ २९ ॥ अब्रवीज्जनको राजा हर्षेणाभिपरिप्लुतः । लक्ष्मणागच्छ भद्रं ते ऊर्मिलामुद्यतां मया ॥ ३० ॥ प्रतीच्छ पाणिं गृह्णीष्व मा भूत् कालस्य पर्ययः ।
भावार्थ
यह कहकर राजाने श्रीरामके हाथमें मन्त्रसे पवित्र हुआ संकल्पका जल छोड़ दिया । उस समय देवताओं और ऋषियोंके मुखसे जनकके लिये साधुवाद सुनायी देने लगा ॥ देवताओंके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा हुई । इस प्रकार मन्त्र और संकल्पके जलके साथ अपनी पुत्री सीताका दान करके हर्षमग्न हुए राजा जनकने लक्ष्मणसे कहा—‘लक्ष्मण ! तुम्हारा कल्याण हो । आओ, मैं ऊर्मिलाको तुम्हारी सेवामें दे रहा हूँ । इसे स्वीकार करो । इसका हाथ अपने हाथमें लो । इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ २९-३०½ ॥
तमेवमुक्त्वा जनको भरतं चाभ्यभाषत ॥ ३१ ॥ गृहाण पाणिं माण्डव्याः पाणिना रघुनन्दन ।
भावार्थ
लक्ष्मणसे ऐसा कहकर जनकने भरतसे कहा—‘रघुनन्दन ! माण्डवीका हाथ अपने हाथमें लो’ ॥ ३१½ ॥
शत्रुघ्नं चापि धर्मात्मा अब्रवीन्मिथिलेश्वरः ॥ ३२ ॥ श्रुतकीर्तेर्महाबाहो पाणिं गृह्णीष्व पाणिना । सर्वे भवन्तः सौम्याश्च सर्वे सुचरितव्रताः ॥ ३३ ॥ पत्नीभिःसन्तु काकुत्स्था मा भूत् कालस्य पर्ययः ।
भावार्थ
फिर धर्मात्मा मिथिलेशने शत्रुघ्नको सम्बोधित करके कहा—‘महाबाहो ! तुम अपने हाथसे श्रुतकीर्तिका पाणिग्रहण करो । तुम चारों भाई शान्तस्वभाव हो । तुम सबने उत्तम व्रतका भलीभाँति आचरण किया है । ककुत्स्थकुलके भूषणरूप तुम चारों भाई पत्नीसे संयुक्त हो जाओ । इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ ३२-३३½ ॥
जनकस्य वचः श्रुत्वा पाणीन् पाणिभिरस्पृशन् ॥ ३४ ॥ चत्वारस्ते चतसृणां वसिष्ठस्य मते स्थिताः । अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा वेदिं राजानमेव च ॥ ३५ ॥ ऋषींश्चापि महात्मानः सहभार्या रघूद्वहाः । यथोक्तेन ततश्चक्रुर्विवाहं विधिपूर्वकम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
राजा जनकका यह वचन सुनकर उन चारों राजकुमारोंने चारों राजकुमारियोंके हाथ अपने हाथमें लिये । फिर वसिष्ठजीकी सम्मतिसे उन रघुकुलरत्न महामनस्वी राजकुमारोंने अपनी-अपनी पत्नीके साथ अग्नि, वेदी, राजा दशरथ तथा ऋषि-मुनियोंकी परिक्रमा की और वेदोक्त विधिके अनुसार वैवाहिक कार्य पूर्ण किया ॥ ३४—३६ ॥
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीदन्तरिक्षात् सुभास्वरा । दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः ॥ ३७ ॥ ननृतुश्चाप्सरःसङ्घा गन्धर्वाश्च जगुः कलम् । विवाहे रघुमुख्यानां तदद्भुतमदृश्यत ॥ ३८ ॥
भावार्थ
उस समय आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा हुई, जो सुहावनी लगती थी । दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि, दिव्य गीतोंके मनोहर शब्द और दिव्य वाद्योंके मधुर घोषके साथ झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्व मधुर गीत गाने लगे । उन रघुवंशशिरोमणि राजकुमारोंके विवाहमें वह अद्भुत दृश्य दिखायी दिया ॥ ३७-३८ ॥
ईदृशे वर्तमाने तु तूर्योद्घुष्टनिनादिते । त्रिरग्निं ते परिक्रम्य ऊहुर्भार्या महौजसः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
शहनाई आदि बाजोंके मधुर घोषसे गूँजते हुए उस वर्तमान विवाहोत्सवमें उन महातेजस्वी राजकुमारोंने अग्निकी तीन बार परिक्रमा करके पत्नियोंको स्वीकार करते हुए विवाह-कर्म सम्पन्न किया ॥ ३९ ॥
अथोपकार्य जग्मुस्ते सभार्या रघुनन्दनाः । राजाप्यनुययौ पश्यन् सर्षिसङ्घः सबान्धवः ॥ ४० ॥
भावार्थ
तदनन्तर रघुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले वे चारों भाई अपनी पत्नियोंके साथ जनवासेमें चले गये । राजा दशरथ भी ऋषियों और बन्धु-बान्धवोंके साथ पुत्रों और पुत्र-वधुओंको देखते हुए उनके पीछे-पीछे गये ॥ ४० ॥
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