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बालकाण्ड, सर्ग 74

अथ रात्र्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनिः । आपृष्ट्वा तौ च राजानौ जगामोत्तरपर्वतम् ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र राजा जनक और महाराज दशरथ दोनों राजाओंसे पूछकर उनकी स्वीकृति ले उत्तरपर्वतपर ( हिमालयकी शाखाभूत पर्वतपर, जहाँ कौशिकीके तटपर उनका आश्रम था, वहाँ ) चले गये ॥ १ ॥

विश्वामित्रे गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम् । आपृष्ट्वैव जगामाशु राजा दशरथः पुरीम् ॥ २ ॥

भावार्थ

विश्वामित्रजीके चले जानेपर महाराज दशरथ भी विदेहराज मिथिलानरेशसे अनुमति लेकर ही शीघ्र अपनी पुरी अयोध्याको जानेके लिये तैयार हो गये ॥ २ ॥

अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु । गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वरः ॥ ३ ॥ कम्बलानां च मुख्यानां क्षौमान् कोट्यम्बराणि च । हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलंकृतम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

उस समय विदेहराज जनकने अपनी कन्याओंके निमित्त दहेजमें बहुत अधिक धन दिया । उन मिथिला-नरेशने कई लाख गौएँ, कितनी ही अच्छी-अच्छी कालीनें तथा करोड़ोंकी संख्यामें रेशमी और सूती वस्त्र दिये, भाँति-भाँतिके गहनोंसे सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये ॥ ३-४ ॥

ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम् । हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च ॥ ५ ॥

भावार्थ

अपनी पुत्रियोंके लिये सहेलीके रूपमें उन्होंने सौ-सौ कन्याएँ तथा उत्तम दास-दासियाँ अर्पित कीं । इन सबके अतिरिक्त राजाने उन सबके लिये एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रजतमुद्रा, मोती तथा मूँगे भी दिये ॥ ५ ॥

ददौ राजा सुसंहृष्टः कन्याधनमनुत्तमम् । दत्त्वा बहुविधं राजा समनुज्ञाप्य पार्थिवम् ॥ ६ ॥ प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वरः । राजाप्ययोध्याधिपतिः सह पुत्रैर्महात्मभिः ॥ ७ ॥ ऋषीन् सर्वान् पुरस्कृत्य जगाम सबलानुगः।

भावार्थ

इस प्रकार मिथिलापति राजा जनकने बड़े हर्षके साथ उत्तमोत्तम कन्याधन ( दहेज ) दिया । नाना प्रकारकी वस्तुएँ दहेजमें देकर महाराज दशरथकी आज्ञा ले वे पुनः मिथिला-नगरके भीतर अपने महलमें लौट आये । उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियोंको आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकोंके साथ अपनी राजधानीकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ६-७½ ॥

गच्छन्तं तु नरव्याघ्रं सर्षिसङ्घं सराघवम् ॥ ८ ॥ घोरास्तु पक्षिणो वाचो व्याहरन्ति समन्ततः । भौमाश्चैव मृगाः सर्वे गच्छन्ति स्म प्रदक्षिणम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

उस समय ऋषि-समूह तथा श्रीरामचन्द्रजीके साथ यात्रा करते हुए पुरुषसिंह महाराज दशरथके चारों ओर भयंकर बोली बोलनेवाले पक्षी चहचहाने लगे और भूमिपर बिचरनेवाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे ॥ ८-९ ॥

तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत । असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः॥ १० ॥ किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति ।

भावार्थ

उन सबको देखकर राजसिंह दशरथने वसिष्ठजीसे पूछा— ‘मुनिवर ! एक ओर तो ये भयंकर पक्षी घोर शब्द कर रहे हैं और दूसरी ओर ये मृग हमें दाहिनी ओर करके जा रहे हैं; यह अशुभ और शुभ दो प्रकारका शकुन कैसा ? यह मेरे हृदयको कम्पित किये देता है । मेरा मन विषादमें डूबा जाता है’ ॥ १०½ ॥

राज्ञो दशरथस्यैतच्छ्रुत्वा वाक्यं महानृषिः॥ ११ ॥ उवाच मधुरां वाणीं श्रूयतामस्य यत् फलम् । उपस्थितं भयं घोरं दिव्यं पक्षिमुखाच्च्युतम् ॥ १२ ॥ मृगाः प्रशमयन्त्येते संतापस्त्यज्यतामयम् ।

भावार्थ

राजा दशरथका यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मधुर वाणीमें कहा—‘राजन् ! इस शकुनका जो फल है, उसे सुनिये—आकाशमें पक्षियोंके मुखसे जो बात निकल रही है, वह बताती है कि इस समय कोई घोर भय उपस्थित होनेवाला है, परंतु हमें दाहिने रखकर जानेवाले ये मृग उस भयके शान्त हो जानेकी सूचना दे रहे हैं; इसलिये आप यह चिन्ता छोड़िये’ ॥ ११-१२½ ॥

तेषां संवदतां तत्र वायुः प्रादुर्बभूव ह ॥ १३ ॥ कम्पयन् मेदिनीं सर्वां पातयंश्च महाद्रुमान् । तमसा संवृतः सूर्यः सर्वे नावेदिषुर्दिशः ॥ १४ ॥ भस्मना चावृतं सर्वं सम्मूढमिव तद्बलम् ।

भावार्थ

इन लोगोंमें इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि वहाँ बड़े जोरोंकी आँधी उठी । वह सारी पृथ्वीको कँपाती हुई बड़े-बड़े वृक्षोंको धराशायी करने लगी । सूर्य अन्धकारसे आच्छन्न हो गये । किसीको दिशाओंका भान न रहा । धूलसे ढक जानेके कारण वह सारी सेना मूर्च्छित-सी हो गयी ॥ १३-१४½ ॥

वसिष्ठ ऋषयश्चान्ये राजा च ससुतस्तदा ॥ १५ ॥ ससंज्ञा इव तत्रासन् सर्वमन्यद्विचेतनम् । तस्मिंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमूः ॥ १६ ॥

भावार्थ

उस समय केवल वसिष्ठ मुनि, अन्यान्य ऋषियों तथा पुत्रोंसहित राजा दशरथको ही चेत रह गया था, शेष सभी लोग अचेत हो गये थे । उस घोर अन्धकारमें राजाकी वह सेना धूलसे आच्छादित-सी हो गयी थी ॥ १५-१६ ॥

ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम् । भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम् ॥ १७ ॥ कैलासमिव दुर्धर्षं कालाग्निमिव दुःसहम् । ज्वलन्तमिव तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनैः ॥ १८ ॥ स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धनुर्विद्युद्गणोपमम् । प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपुरघ्नं यथा शिवम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

उस समय राजा दशरथने देखा—क्षत्रिय राजाओंका मान-मर्दन करनेवाले भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार परशुराम सामनेसे आ रहे हैं । वे बड़े भयानक-से दिखायी देते थे । उन्होंने मस्तकपर बड़ी-बड़ी जटाएँ धारण कर रखी थीं । वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दुःसह प्रतीत होते थे । तेजोमण्डलद्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे । साधारण लोगोंके लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था । वे कंधेपर फरसा रखे और हाथमें विद्युद्गणोंके समान दीप्तिमान् धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान् शिवके समान जान पड़ते थे ॥ १७—१९ ॥

तं दृष्ट्वा भीमसंकाशं ज्वलन्तमिव पावकम् । वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जपहोमपरायणाः ॥ २० ॥ संगता मुनयः सर्वे संजजल्पुरथो मिथः ।

भावार्थ

प्रज्वलित अग्निके समान भयानक-से प्रतीत होनेवाले परशुरामको उपस्थित देख जप और होममें तत्पर रहनेवाले वसिष्ठ आदि सभी ब्रह्मर्षि एकत्र हो परस्पर इस प्रकार बातें करने लगे—॥ २०½ ॥

कच्चित् पितृवधामर्षी क्षत्रं नोत्सादयिष्यति ॥ २१ ॥ पूर्वं क्षत्रवधं कृत्वा गतमन्युर्गतज्वरः । क्षत्रस्योत्सादनं भूयो न खल्वस्य चिकीर्षितम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘क्या अपने पिताके वधसे अमर्षके वशीभूत हो ये क्षत्रियोंका संहार नहीं कर डालेंगे ? पूर्वकालमें क्षत्रियोंका वध करके इन्होंने अपना क्रोध उतार लिया है । अब इनकी बदला लेनेकी चिन्ता दूर हो चुकी है । अतः फिर क्षत्रियोंका संहार करना इनके लिये अभीष्ट नहीं है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है’ ॥ २१-२२ ॥

एवमुक्त्वार्घ्यमादाय भार्गवं भीमदर्शनम् । ऋषयो रामरामेति मधुरं वाक्यमब्रुवन् ॥ २३ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर ऋषियोंने भयंकर दिखायी देनेवाले भृगुनन्दन परशुरामको अर्घ्य लेकर दिया और ‘राम ! राम !’ कहकर उनसे मधुर वाणीमें बातचीत की ॥ २३ ॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान् । रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्योऽभ्यभाषत ॥ २४ ॥

भावार्थ

ऋषियोंकी दी हुई उस पूजाको स्वीकार करके प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुरामने दशरथनन्दन श्रीरामसे इस प्रकार कहा ॥ २४ ॥

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