बालकाण्ड, सर्ग 75
राम दाशरथे वीर वीर्यं ते श्रूयतेऽद्भुतम् । धनुषो भेदनं चैव निखिलेन मया श्रुतम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘दशरथनन्दन श्रीराम ! वीर ! सुना जाता है कि तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है । तुम्हारेद्वारा शिव-धनुषके तोड़े जानेका सारा समाचार भी मेरे कानोंमें पड़ चुका है ॥ १ ॥
तदद्भुतमचिन्त्यं च भेदनं धनुषस्तथा । तच्छ्रुत्वाहमनुप्राप्तो धनुर्गृह्यापरं शुभम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘उस धनुषका तोड़ना अद्भुत और अचिन्त्य है; उसके टूटनेकी बात सुनकर मैं एक दूसरा उत्तम धनुष लेकर आया हूँ ॥ २ ॥
तदिदं घोरसंकाशं जामदग्न्यं महद्धनुः । पूरयस्व शरेणैव स्वबलं दर्शयस्व च ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘यह है वह जमदग्निकुमार परशुरामका भयंकर और विशाल धनुष । तुम इसे खींचकर इसके ऊपर बाण चढ़ाओ और अपना बल दिखाओ ॥ ३ ॥
तदहं ते बलं दृष्ट्वा धनुषोऽप्यस्य पूरणे । द्वन्द्वयुद्धं प्रदास्यामि वीर्यश्लाघ्यमहं तव ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘इस धनुषके चढ़ानेमें भी तुम्हारा बल कैसा है ? यह देखकर मैं तुम्हें ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रदान करूँगा,जो तुम्हारे पराक्रमके लिये स्पृहणीय होगा’ ॥ ४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा दशरथस्तदा । विषण्णवदनो दीनः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
परशुरामजीका वह वचन सुनकर उस समय राजा दशरथके मुखपर विषाद छा गया । वे दीनभावसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ५ ॥
क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपाः । बालानां मम पुत्राणामभयं दातुमर्हसि ॥ ६ ॥ भार्गवाणां कुले जातः स्वाध्यायव्रतशालिनाम् । सहस्राक्षे प्रतिज्ञाय शस्त्रं प्रक्षिप्तवानसि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! आप स्वाध्याय और व्रतसे शोभा पानेवाले भृगुवंशी ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न हुए हैं और स्वयं भी महान् तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी हैं; क्षत्रियोंपर अपना रोष प्रकट करके अब शान्त हो चुके हैं; इसलिये मेरे बालक पुत्रोंको आप अभयदान देनेकी कृपा करें; क्योंकि आपने इन्द्रके समीप प्रतिज्ञा करके शस्त्रका परित्याग कर दिया है ॥ ६-७ ॥
स त्वं धर्मपरो भूत्वा कश्यपाय वसुंधराम् । दत्त्वा वनमुपागम्य महेन्द्रकृतकेतनः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘इस तरह आप धर्ममें तत्पर हो कश्यपजीको पृथ्वीका दान करके वनमें आकर महेन्द्रपर्वतपर आश्रम बनाकर रहते हैं ॥ ८ ॥
मम सर्वविनाशाय सम्प्राप्तस्त्वं महामुने । न चैकस्मिन् हते रामे सर्वे जीवामहे वयम् ॥ ९ ॥ ब्रुवत्येवं दशरथे जामदग्न्यः प्रतापवान् । अनादृत्य तु तद्वाक्यं राममेवाभ्यभाषत ॥ १० ॥
भावार्थ
‘महामुने ! ( इस प्रकार शस्त्रत्यागकी प्रतिज्ञा करके भी) आप मेरा सर्वनाश करनेके लिये कैसे आ गये ? ( यदि कहें— मेरा रोष तो केवल रामपर है तो ) एकमात्र रामके मारे जानेपर ही हम सब लोग अपने जीवनका परित्याग कर देंगे’ ॥ राजा दशरथ इस प्रकार कहते ही रह गये; परंतु प्रतापी परशुरामने उनके उन वचनोंकी अवहेलना करके रामसे ही बातचीत जारी रक्खी ॥ १० ॥
इमे द्वे धनुषी श्रेष्ठे दिव्ये लोकाभिपूजिते । दृढे बलवती मुख्ये सुकृते विश्वकर्मणा ॥ ११ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘रघुनन्दन ! ये दो धनुष सबसे श्रेष्ठ और दिव्य थे । सारा संसार इन्हें सम्मानकी दृष्टिसे देखता था । साक्षात् विश्वकर्माने इन्हें बनाया था । ये बड़े प्रबल और दृढ़ थे ॥ ११ ॥
अनुसृष्टं सुरैरेकं त्र्यम्बकाय युयुत्सवे । त्रिपुरघ्नं नरश्रेष्ठ भग्नं काकुत्स्थ यत्त्वया ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! इनमेंसे एकको देवताओंने त्रिपुरासुरसे युद्ध करनेके लिये भगवान् शङ्करको दे दिया था । ककुत्स्थनन्दन ! जिससे त्रिपुरका नाश हुआ था, वह वही धनुष था; जिसे तुमने तोड़ डाला है ॥ १२ ॥
इदं द्वितीयं दुर्धर्षं विष्णोर्दत्तं सुरोत्तमैः । तदिदं वैष्णवं राम धनुः परपुरंजयम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘और दूसरा दुर्धर्ष धनुष यह है, जो मेरे हाथमें है । इसे श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् विष्णुको दिया था । श्रीराम ! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला वही यह वैष्णव धनुष है ॥ १३ ॥
समानसारं काकुत्स्थ रौद्रेण धनुषा त्विदम् । तदा तु देवताः सर्वाः पृच्छन्ति स्म पितामहम् ॥ १४ ॥ शितिकण्ठस्य विष्णोश्च बलाबलनिरीक्षया । अभिप्रायं तु विज्ञाय देवतानां पितामहः ॥ १५ ॥ विरोधं जनयामास तयोः सत्यवतां वरः ।
भावार्थ
‘ककुत्स्थनन्दन ! यह भी शिवजीके धनुषके समान ही प्रबल है । उन दिनों समस्त देवताओंने भगवान् शिव और विष्णुके बलाबलकी परीक्षाके लिये पितामह ब्रह्माजीसे पूछा था कि ‘इन दोनों देवताओंमें कौन अधिक बलशाली है’ ॥ ‘देवताओंके इस अभिप्रायको जानकर सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ पितामह ब्रह्माजीने उन दोनों देवताओं ( शिव और विष्णु ) में विरोध उत्पन्न कर दिया ॥ १५½ ॥
विरोधे तु महद् युद्धमभवद् रोमहर्षणम् ॥ १६ ॥ शितिकण्ठस्य विष्णोश्च परस्परजयैषिणोः ।
भावार्थ
‘विरोध पैदा होनेपर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले शिव और विष्णुमें बड़ा भारी युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १६½ ॥
तदा तु जृम्भितं शैवं धनुर्भीमपराक्रमम् ॥ १७ ॥ हुंकारेण महादेवः स्तम्भितोऽथ त्रिलोचनः ।
भावार्थ
‘उस समय भगवान् विष्णुने हुङ्कारमात्रसे शिवजीके भयंकर बलशाली धनुषको शिथिल तथा त्रिनेत्रधारी महादेवजीको भी स्तम्भित कर दिया ॥ १७½ ॥
देवैस्तदा समागम्य सर्षिसङ्घैः सचारणैः ॥ १८ ॥ याचितौ प्रशमं तत्र जग्मतुस्तौ सुरोत्तमौ ।
भावार्थ
‘तब ऋषिसमूहों तथा चारणोंसहित देवताओंने आकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंसे शान्तिके लिये याचना की; फिर वे दोनों वहाँ शान्त हो गये ॥ १८½ ॥
जृम्भितं तद् धनुर्दृष्ट्वा शैवं विष्णुपराक्रमैः ॥ १९ ॥ अधिकं मेनिरे विष्णुं देवाः सर्षिगणास्तथा ।
भावार्थ
‘भगवान् विष्णुके पराक्रमसे शिवजीके उस धनुषको शिथिल हुआ देख ऋषियोंसहित देवताओंने भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ माना ॥ १९½ ॥
धनू रुद्रस्तु संक्रुद्धो विदेहेषु महायशाः ॥ २० ॥ देवरातस्य राजर्षेर्ददौ हस्ते ससायकम् । इदं च वैष्णवं राम धनुः परपुरंजयम् ॥ २१ ॥ ऋचीकेभार्गवे प्रादाद् विष्णुः स न्यासमुत्तमम् ।
भावार्थ
‘तदनन्तर कुपित हुए महायशस्वी रुद्रने बाणसहित अपना धनुष विदेहदेशके राजर्षि देवरातके हाथमें दे दिया ॥ ‘श्रीराम ! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले इस वैष्णव-धनुषको भगवान् विष्णुने भृगुवंशी ऋचीकमुनिको उत्तम धरोहरके रूपमें दिया था ॥ २१½ ॥
ऋचीकस्तु महातेजाः पुत्रस्याप्रतिकर्मणः ॥ २२ ॥ पितुर्मम ददौ दिव्यं जमदग्नेर्महात्मनः ।
भावार्थ
‘फिर महातेजस्वी ऋचीकने प्रतीकार ( प्रतिशोध ) की भावनासे रहित अपने पुत्र एवं मेरे पिता महात्मा जमदग्निके अधिकारमें यह दिव्य धनुष दे दिया ॥ २२½ ॥
न्यस्तशस्त्रे पितरि मे तपोबलसमन्विते ॥ २३ ॥ अर्जुनो विदधे मृत्युं प्राकृतां बुद्धिमास्थितः ।
भावार्थ
‘तपोबलसे सम्पन्न मेरे पिता जमदग्नि अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग करके जब ध्यानस्थ होकर बैठे थे, उस समय प्राकृत बुद्धिका आश्रय लेनेवाले कृतवीर्यकुमार अर्जुनने उनको मार डाला ॥ २३½ ॥
वधमप्रतिरूपं तु पितुः श्रुत्वा सुदारुणम् । क्षत्रमुत्सादयं रोषाज्जातं जातमनेकशः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘पिताके इस अत्यन्त भयंकर वधका, जो उनके योग्य नहीं था, समाचार सुनकर मैंने रोषपूर्वक बारंबार उत्पन्न हुए क्षत्रियोंका अनेक बार संहार किया ॥ २४ ॥
पृथिवीं चाखिलां प्राप्य कश्यपाय महात्मने । यज्ञस्यान्तेऽददं राम दक्षिणां पुण्यकर्मणे ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! फिर सारी पृथ्वीपर अधिकार करके मैंने एक यज्ञ किया और उस यज्ञके समाप्त होनेपर पुण्यकर्मा महात्मा कश्यपको दक्षिणारूपसे यह सारी पृथ्वी दे डाली ॥ २५ ॥
दत्त्वा महेन्द्रनिलयस्तपोबलसमन्वितः । श्रुत्वा तु धनुषो भेदं ततोऽहं द्रुतमागतः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘पृथ्वीका दान करके मैं महेन्द्रपर्वतपर रहने लगा और वहाँ तपस्या करके तपोबलसे सम्पन्न हुआ । वहाँसे शिवजीके धनुषके तोड़े जानेका समाचार सुनकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ ॥ २६ ॥
तदेवं वैष्णवं राम पितृपैतामहं महत् । क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गृह्णीष्व धनुरुत्तमम् ॥ २७ ॥ योजयस्व धनुःश्रेष्ठे शरं परपुरंजयम् । यदि शक्तोऽसि काकुत्स्थ द्वन्द्वं दास्यामि ते ततः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! इस प्रकार वह महान् वैष्णवधनुष मेरे पिता-पितामहोंके अधिकारमें रहता चला आया है; अब तुम क्षत्रियधर्मको सामने रखकर यह उत्तम धनुष हाथमें लो और इस श्रेष्ठ धनुषपर एक ऐसा बाण चढ़ाओ, जो शत्रुनगरीपर विजय पानेमें समर्थ हो; यदि तुम ऐसा कर सके तो मैं तुम्हें द्वन्द्व-युद्धका अवसर दूँगा ॥ २७-२८ ॥
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