बालकाण्ड, सर्ग 71
एवं ब्रुवाणं जनकः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः । श्रोतुमर्हसि भद्रं ते कुलं नः परिकीर्तितम् ॥ १ ॥ प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषतः । वक्तव्यं कुलजातेन तन्निबोध महामते ॥ २ ॥
भावार्थ
महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशका परिचय दे चुके, तब राजा जनकने हाथ जोड़कर उनसे कहा—‘मुनिश्रेष्ठ ! आपका भला हो। अब हम भी अपने कुलका परिचय दे रहे हैं, सुनिये । महामते ! कुलीन पुरुषके लिये कन्यादानके समय अपने कुलका पूर्णरूपेण परिचय देना आवश्यक है; अतः आप सुननेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥
राजाभूत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतः स्वेन कर्मणा । निमिः परमधर्मात्मा सर्वसत्त्ववतां वरः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘प्राचीन कालमें निमिनामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात थे ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रकः । प्रथमो जनको राजा जनकादप्युदावसुः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘उनके मिथिनामक एक पुत्र हुआ । मिथिके पुत्रका नाम जनक हुआ । ये ही हमारे कुलमें पहले जनक हुए हैं ( इन्हींके नामपर हमारे वंशका प्रत्येक राजा ‘जनक’ कहलाता है ) । जनकसे उदावसुका जन्म हुआ ॥ ४ ॥
उदावसोस्तु धर्मात्मा जातो वै नन्दिवर्धनः । नन्दिवर्धसुतः शूरः सुकेतुर्नाम नामतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘उदावसुसे धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए । नन्दिवर्धनके शूरवीर पुत्रका नाम सुकेतु हुआ ॥ ५ ॥
सुकेतोरपि धर्मात्मा देवरातो महाबलः । देवरातस्य राजर्षेर्बृहद्रथ इति स्मृतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘सुकेतुके भी देवरात नामक पुत्र हुआ । देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे । राजर्षि देवरातके बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥
बृहद्रथस्य शूरोऽभून्महावीरः प्रतापवान् । महावीरस्य धृतिमान् सुधृतिः सत्यविक्रमः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘बृहद्रथके पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे । महावीरके सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे ॥ ७ ॥
सुधृतेरपि धर्मात्मा धृष्टकेतुः सुधार्मिकः । धृष्टकेतोश्च राजर्षेर्हर्यश्व इति विश्रुतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘सुधृतिके भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे । राजर्षि धृष्टकेतुका पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात हुआ ॥ ८ ॥
हर्यश्वस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रतीन्धकः । प्रतीन्धकस्य धर्मात्मा राजा कीर्तिरथः सुतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘हर्यश्वके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धकके पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए ॥ ९ ॥
पुत्रः कीर्तिरथस्यापि देवमीढ इति स्मृतः । देवमीढस्य विबुधो विबुधस्य महीध्रकः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘कीर्तिरथके पुत्र देवमीढ नामसे विख्यात हुए । देवमीढ-के विबुध और विबुधके पुत्र महीध्रक हुए ॥ १० ॥
महीध्रकसुतो राजा कीर्तिरातो महाबलः । कीर्तिरातस्य राजर्षेर्महारोमा व्यजायत ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘महीध्रकके पुत्र महाबली राजा कीर्तिरात हुए । राजर्षि कीर्तिरातके महारोमा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ११ ॥
महारोम्णस्तु धर्मात्मा स्वर्णरोमा व्यजायत । स्वर्णरोम्णस्तु राजर्षेर्ह्रस्वरोमा व्यजायत ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘महारोमासे धर्मात्मा स्वर्णरोमाका जन्म हुआ । राजर्षि स्वर्णरोमासे ह्रस्वरोमा उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥
तस्य पुत्रद्वयं राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः । ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ महात्मा राजा ह्रस्वरोमाके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें ज्येष्ठ तो मैं ही हूँ और कनिष्ठ मेरा छोटा भाई वीर कुशध्वज है ॥ १३ ॥
मां तु ज्येष्ठं पिता राज्ये सोऽभिषिच्य पिता मम । कुशध्वजं समावेश्य भारं मयि वनं गतः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘मेरे पिता मुझ ज्येष्ठ पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके कुशध्वजका सारा भार मुझे सौंपकर वनमें चले गये ॥ १४ ॥
वृद्धे पितरि स्वर्याते धर्मेण धुरमावहम् । भ्रातरं देवसंकाशं स्नेहात् पश्यन् कुशध्वजम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वृद्ध पिताके स्वर्गगामी हो जानेपर अपने देवतुल्य भाई कुशध्वजको स्नेह-दृष्टिसे देखता हुआ मैं इस राज्यका भार धर्मके अनुसार वहन करने लगा ॥ १५ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागतः पुरात् । सुधन्वा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधकः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘कुछ कालके अनन्तर पराक्रमी राजा सुधन्वाने सांकाश्य नगरसे आकर मिथिलाको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १६ ॥
स च मे प्रेषयामास शैवं धनुरनुत्तमम् । सीता च कन्या पद्माक्षी मह्यं वै दीयतामिति ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उसने मेरे पास दूत भेजकर कहलाया कि ‘तुम शिवजीके परम उत्तम धनुष तथा अपनी कमलनयनी कन्या सीताको मेरे हवाले कर दो’ ॥ १७ ॥
तस्याप्रदानान्महर्षे युद्धमासीन्मया सह । स हतोऽभिमुखो राजा सुधन्वा तु मया रणे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘महर्षे ! मैंने उसकी माँग पूरी नहीं की । इसलिये मेरे साथ उसका युद्ध हुआ । उस संग्राममें सम्मुख युद्ध करता हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथसे मारा गया ॥ १८ ॥
निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम् । सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मुनिश्रेष्ठ ! राजा सुधन्वाका वध करके मैंने सांकाश्य नगरके राज्यपर अपने शूरवीर भ्राता कुशध्वजको अभिषिक्त कर दिया ॥ १९ ॥
कनीयानेष मे भ्राता अहं ज्येष्ठो महामुने । ददामि परमप्रीतः वध्वौ ते मुनिपुङ्गव ॥ २० ॥
भावार्थ
‘महामुने ! ये मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं और मैं इनका बड़ा भाई हूँ । मुनिवर ! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपको दो बहुएँ प्रदान करता हूँ ॥ २० ॥
सीतां रामाय भद्रं ते ऊर्मिलां लक्ष्मणाय वै । वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ २१ ॥ द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिर्वदामि न संशयः । ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुङ्गव ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘आपका भला हो ! मैं सीताको श्रीरामके लिये और ऊर्मिलाको लक्ष्मणके लिये समर्पित करता हूँ । पराक्रम ही जिसको पानेका शुल्क ( शर्त ) था, उस देवकन्याके समान सुन्दरी अपनी प्रथम पुत्री सीताको श्रीरामके लिये तथा दूसरी पुत्री ऊर्मिलाको लक्ष्मणके लिये दे रहा हूँ । मैं इस बातको तीन बार दुहराता हूँ, इसमें संशय नहीं है । मुनिप्रवर ! मैं परम प्रसन्न होकर आपको दो बहुएँ दे रहा हूँ’ ॥ २१-२२ ॥
रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह । पितृकार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु ॥ २३ ॥
भावार्थ
(वसिष्ठजीसे ऐसा कहकर राजा जनकने महाराज दशरथसे कहा—) ‘राजन् ! अब आप श्रीराम और लक्ष्मणके मङ्गलके लिये इनसे गोदान करवाइये, आपका कल्याण हो । नान्दीमुख श्राद्धका कार्य भी सम्पन्न कीजिये । इसके बाद विवाहका कार्य आरम्भ कीजियेगा ॥ २३ ॥
मघा ह्यद्य महाबाहो तृतीयदिवसे प्रभो । फल्गुन्यामुत्तरे राजंस्तस्मिन् वैवाहिकं कुरु । रामलक्ष्मणयोरर्थे दानं कार्यं सुखोदयम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! प्रभो ! आज मघा नक्षत्र है । राजन् ! आजके तीसरे दिन उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य कीजियेगा । आज श्रीराम और लक्ष्मणके अभ्युदयके लिये ( गो, भूमि, तिल और सुवर्ण आदिका ) दान कराना चाहिये; क्योंकि वह भविष्यमें सुख देनेवाला होता है’ ॥ २४ ॥
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