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बालकाण्ड, सर्ग 70

ततः प्रभाते जनकः कृतकर्मा महर्षिभिः । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शतानन्दं पुरोहितम् ॥ १ ॥ भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिकः । कुशध्वज इति ख्यातः पुरीमध्यवसच्छुभाम् ॥ २ ॥ वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमतीं नदीम् । सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियोंके सहयोगसे अपना यज्ञ-कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजीसे इस प्रकार बोले—॥ ‘ब्रह्मन् ! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदीका जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरीमें निवास करते हैं। उसके चारों ओरके परकोटोंकी रक्षाके लिये शत्रुओंके निवारणमें समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पक विमानके समान विस्तृत तथा पुण्यसे उपलब्ध होनेवाले स्वर्गलोकके सदृश सुन्दर है ॥ २-३ ॥

तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मतः । प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वहाँ रहनेवाले अपने भाईको इस शुभ अवसरपर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टिमें वे मेरे इस यज्ञके संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीता-रामके विवाहसम्बन्धी इस मङ्गल समारोहका सुख उठायेंगे’ ॥ ४ ॥

एवमुक्ते तु वचने शतानन्दस्य संनिधौ । आगताः केचिदव्यग्राजनकस्तान् समादिशत् ॥ ५ ॥

भावार्थ

राजाके इस प्रकार कहनेपर शतानन्दजीके समीप कुछ धीर स्वभावके पुरुष आये और राजा जनकने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया ॥ ५ ॥

शासनात् तु नरेन्द्रस्य प्रययुः शीघ्रवाजिभिः । समानेतुं नरव्याघ्रं विष्णुमिन्द्राज्ञया यथा ॥ ६ ॥

भावार्थ

राजाकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ दूत तेज चलनेवाले घोड़ोंपर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वजको बुला लानेके लिये चल दिये। मानो इन्द्रकी आज्ञासे उनके दूत भगवान् विष्णुको बुलाने जा रहे हों ॥ ६ ॥

सांकाश्यां ते समागम्य ददृशुश्च कुशध्वजम् । न्यवेदयन् यथावृत्तं जनकस्य च चिन्तितम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

सांकाश्यामें पहुँचकर उन्होंने कुशध्वजसे मेंट की और मिथिलाका यथार्थ समाचार एवं जनकका अभिप्राय भी निवेदन किया ॥ ७ ॥

तद्वृत्तं नृपतिः श्रुत्वा दूतश्रेष्ठैर्महाजवैः । आज्ञया तु नरेन्द्रस्य आजगाम कुशध्वजः ॥ ८ ॥

भावार्थ

उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतोंके मुखसे मिथिलाका सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनककी आज्ञाके अनुसार मिथिलामें आये ॥ ८ ॥

स ददर्श महात्मानं जनकं धर्मवत्सलम् । सोऽभिवाद्य शतानन्दं जनकं चातिधार्मिकम् ॥ ९ ॥ राजार्हं परमं दिव्यमासनं सोऽध्यरोहत ।

भावार्थ

वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनकका दर्शन किया । फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनकको प्रणाम करके वे राजाके योग्य परम दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए ॥ ९½ ॥

उपविष्टावुभौ तौ तु भ्रातरावमितद्युती ॥ १० ॥ प्रेषयामासतुर्वीरौ मन्त्रिश्रेष्ठं सुदामनम् । गच्छ मन्त्रिपते शीघ्रमिक्ष्वाकुममितप्रभम् ॥ ११ ॥ आत्मजैः सह दुर्धर्षमानयस्व समन्त्रिणम् ।

भावार्थ

सिंहासनपर बैठे हुए उन दोनों अमिततेजस्वी वीर-बन्धुओंने मन्त्रिप्रवर सुदामनको भेजा और कहा—‘मन्त्रिवर ! आप शीघ्र ही अमिततेजस्वी इक्ष्वाकुकुलभूषण महाराज दशरथके पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियोंसहित उन दुर्जय नरेशको यहाँ बुला लाइये’ ॥ १०-११½ ॥

औपकार्यां स गत्वा तु रघूणां कुलवर्धनम् ॥ १२ ॥ ददर्श शिरसा चैनमभिवाद्येदमब्रवीत् ।

भावार्थ

आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथके खेमेमें जाकर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले उन नरेशसे मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् इस प्रकार बोले—॥ १२½ ॥

अयोध्याधिपते वीर वैदेहो मिथिलाधिपः ॥ १३ ॥ स त्वां द्रष्टुं व्यवसितः सोपाध्यायपुरोहितम् ।

भावार्थ

‘वीर अयोध्यानरेश ! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहितसहित आपका दर्शन करना चाहते हैं’ ॥ १३½ ॥

मन्त्रिश्रेष्ठवचः श्रुत्वा राजा सर्षिगणस्तथा ॥ १४ ॥ सबन्धुरगमत् तत्र जनको यत्र वर्तते ।

भावार्थ

मन्त्रिवर सुदामनकी बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु-बान्धवोंके साथ उस स्थानपर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे ॥ १४½ ॥

राजा च मन्त्रिसहितः सोपाध्यायः सबान्धवः ॥ १५ ॥ वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो वैदेहमिदमब्रवीत् ।

भावार्थ

मन्त्री, उपाध्याय और भाई-बन्धुओंसहित राजा दशरथ, जो बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ थे, विदेहराज जनकसे इस प्रकार बोले—॥ १५½ ॥

विदितं ते महाराज इक्ष्वाकुकुलदैवतम् ॥ १६ ॥ वक्ता सर्वेषु कृत्येषु वसिष्ठो भगवानृषिः ।

भावार्थ

‘महाराज ! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुलके देवता ये महर्षि वसिष्ठजी हैं । हमारे यहाँ सभी कार्योंमें ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ही कर्तव्यका उपदेश करते हैं और इन्हींकी आज्ञाका पालन किया जाता है ॥ १६½ ॥

विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः सह सर्वैर्महर्षिभिः ॥ १७ ॥ एष वक्ष्यति धर्मात्मा वसिष्ठो मे यथाक्रमम् ।

भावार्थ

‘यदि सम्पूर्ण महर्षियोंसहित विश्वामित्रजीकी आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वसिष्ठ ही पहले मेरी कुल-परम्पराका क्रमशः परिचय देंगे’ ॥ १७½ ॥

तूष्णींभूते दशरथे वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १८ ॥ उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो वैदेहं सपुरोधसम् ।

भावार्थ

यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान् वसिष्ठ मुनि पुरोहितसहित विदेहराजसे इस प्रकार बोले--॥ १८½ ॥

अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः ॥ १९ ॥ तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः । विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्मृतः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है—ये स्वयम्भू हैं । नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं । उनसे मरीचिकी उत्पत्ति हुई । मरीचिके पुत्र कश्यप हैं, कश्यपसे विवस्वान्का और विवस्वान्से वैवस्वत मनुका जन्म हुआ ॥ १९-२० ॥

मनुः प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुश्च मनोः सुतः । तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ । उन इक्ष्वाकुको ही आप अयोध्याके प्रथम राजा समझें ॥ २१ ॥

इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः । कुक्षेरथात्मजः श्रीमान् विकुक्षिरुदपद्यत ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘इक्ष्वाकुके पुत्रका नाम कुक्षि था । वे बड़े तेजस्वी थे । कुक्षिसे विकुक्षि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ ॥ २२ ॥

विकुक्षेस्तु महातेजा बाणः पुत्रः प्रतापवान् । बाणस्य तु महातेजा अनरण्यः प्रतापवान् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘विकुक्षिके पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए । बाणके पुत्रका नाम अनरण्य था । वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे ॥ २३ ॥

अनरण्यात् पृथुर्जज्ञे त्रिशङ्कुस्तु पृथोरपि । त्रिशङ्कोरभवत् पुत्रो धुन्धुमारो महायशाः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘अनरण्यसे पृथु और पृथुसे त्रिशङ्कुका जन्म हुआ । त्रिशङ्कुके पुत्र महायशस्वी धुन्धुमार थे ॥ २४ ॥

धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो महारथः । युवनाश्वसुतश्चासीन्मान्धाता पृथिवीपतिः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘धुन्धुमारसे महातेजस्वी महारथी युवनाश्वका जन्म हुआ । युवनाश्वके पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डलके स्वामी थे ॥ २५ ॥

मान्धातुस्तु सुतः श्रीमान् सुसंधिरुदपद्यत । सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधिः प्रसेनजित् ॥ २६ ॥ यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो नाम नामतः । भरतात् तु महातेजा असितो नाम जायत ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘मान्धातासे सुसन्धिनामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ । समुन्धिके भी दो पुत्र हुए—ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित् ॥ ‘ध्रुवसन्धिसे भरतनामक यशस्वी पुत्रका जन्म हुआ । भरतसे महातेजस्वी असितकी उत्पत्ति हुई ॥ २७ ॥

यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः । हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः ॥२८॥

भावार्थ

‘राजा असितके साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु— इन तीन राजवंशोंके लोग शत्रुता रखने लगे थे ॥ २८ ॥

तांश्च स प्रतियुध्यन् वै युद्धे राजा प्रवासितः । हिमवन्तमुपागम्य भार्याभ्यां सहितस्तदा ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘युद्धमें इन तीनों शत्रुओंका सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये । वे अपनी दो रानियोंके साथ हिमालयपर आकर रहने लगे ॥ २९ ॥

असितोऽल्पबलो राजा कालधर्ममुपेयिवान् । द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘राजा असितके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी । वे हिमालयपर ही मृत्युको प्राप्त हो गये । उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है ॥३०॥

एका गर्भविनाशार्थं सपत्न्यै सगरं ददौ । ततः शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः ॥ ३१ ॥ भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः । तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम् ॥ ३२ ॥ ववन्दे पद्मपत्राक्षी काङ्क्षन्ती सुतमुत्तमम् । तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘उनमेंसे एक रानीने अपनी सौतका गर्भ नष्ट करनेके लिये उसे विषयुक्त भोजन दे दिया ॥ ३०॥ ॥ ‘उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वतपर भृगुकुलमें उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्यामें लगे हुए थे । हिमालयपर ही उनका आश्रम था । उन दोनों रानियोंमेंसे एक ( जिसे जहर दिया गया था ) कालिन्दीनामसे प्रसिद्ध थी । विकसित कमलदलके समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पानेकी इच्छा रखती थी । उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ३१—३३ ॥

स तामभ्यवदद् विप्रः पुत्रेप्सुं पुत्रजन्मनि । तव कुक्षौ महाभागे सुपुत्रः सुमहाबलः ॥ ३४ ॥ महावीर्यो महातेजा अचिरात् संजनिष्यति । गरेण सहितः श्रीमान् मा शुचः कमलेक्षणे ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘उस समय ब्रह्मर्षि च्यवनने पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली कालिन्दीसे पुत्र-जन्मके विषयमें कहा—‘महाभागे ! तुम्हारे उदरमें एक महान् बलवान्, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनोंमें गर ( जहर ) के साथ उत्पन्न होगा । अतः कमललोचने ! तुम पुत्रके लिये चिन्ता न करो’ ॥ ३४-३५ ॥

च्यवनं च नमस्कृत्य राजपुत्री पतिव्रता । पत्या विरहिता तस्मात् पुत्रं देवी व्यजायत ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी । महर्षि च्यवनको नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रमपर लौट आयी । फिर समय आनेपर उसने एक पुत्रको जन्म दिया ॥ ३६ ॥

सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया । सह तेन गरेणैव संजातः सगरोऽभवत् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘उसकी सौतने उसके गर्भको नष्ट कर देनेके लिये जो गर ( विष ) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होनेके कारण वह राजकुमार ‘सगर’ नामसे विख्यात हुआ ॥३७॥

सगरस्यासमञ्जस्तु असमञ्जादथांशुमान् । दिलीपोऽंशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘सगरके पुत्र असमंज और असमंजके पुत्र अंशुमान् हुए । अंशुमान्के पुत्र दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए ॥ ३८ ॥

भगीरथात् ककुत्स्थश्च ककुत्स्थाच्च रघुस्तथा । रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘भगीरथसे ककुत्स्थ और ककुत्स्थसे रघुका जन्म हुआ । रघुके तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शापसे राक्षस हो गये थे ॥ ३९ ॥

कल्माषपादोऽप्यभवत् तस्माज्जातस्तु शङ्खणः । सुदर्शनः शङ्खणस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘वे ही कल्माषपाद नामसे भी प्रसिद्ध हुए थे । उनसे शङ्खण नामक पुत्रका जन्म हुआ था । शङ्खणके पुत्र सुदर्शन और सुदर्शनके अग्निवर्ण हुए ॥ ४० ॥

शीघ्रगस्त्वग्निवर्णस्य शीघ्रगस्य मरुः सुतः । मरोः प्रशुश्रुकस्त्वासीदम्बरीषः प्रशुश्रुकात् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘अग्निवर्णके शीघ्रग और शीघ्रगके पुत्र मरु थे । मरुसे प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुकसे अम्बरीषकी उत्पत्ति हुई ॥ ४१ ॥

अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषश्च महीपतिः । नहुषस्य ययातिस्तु नाभागस्तु ययातिजः ॥ ४२ ॥ नाभागस्य बभूवाज अजाद् दशरथोऽभवत् । अस्माद् दशरथाज्जातौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘अम्बरीषके पुत्र राजा नहुष हुए । नहुषके ययाति और ययातिके पुत्र नाभाग थे । नाभागके अज हुए । अजसे दशरथका जन्म हुआ । इन्हीं महाराज दशरथसे ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं ॥ ४२-४३ ॥

आदिवंशविशुद्धानां राज्ञां परमधर्मिणाम् । इक्ष्वाकुकुलजातानां वीराणां सत्यवादिनाम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए राजाओंका वंश आदिकालसे ही शुद्ध रहा है । ये सब-के-सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं ॥ ४४ ॥

रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप । सदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! नरेश्वर ! इसी इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये मैं आपकी दो कन्याओंका वरण करता हूँ । ये आपकी कन्याओंके योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य । अतः आप इन्हें कन्यादान करें’ ॥ ४५ ॥

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