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बालकाण्ड, सर्ग 69

ततो राज्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः। राजा दशरथो हृष्टः सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर उपाध्याय और बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दशरथ हर्षमें भरकर सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम् । व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः ॥ २ ॥ चतुरङ्गबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः । ममाज्ञासमकालं च यानं युग्यमनुत्तमम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘आज हमारे सभी धनाध्यक्ष ( खजांची ) बहुत-सा धन लेकर नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न हो सबसे आगे चलें । उनकी रक्षाके लिये हर तरहकी सुव्यवस्था होनी चाहिये ॥ ‘सारी चतुरङ्गिणी सेना भी यहाँसे शीघ्र ही कूच कर दे । अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर-सुन्दर पालकियाँ और अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें ॥ ३ ॥

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यपः । मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुर्ऋषिः कात्यायनस्तथा ॥ ४ ॥ एते द्विजाः प्रयान्त्वग्रे स्यन्दनं योजयस्व मे । यथा कालात्ययो न स्याद् दूता हि त्वरयन्ति माम्॥ ५ ॥

भावार्थ

‘वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घजीवी मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन—ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलें । मेरा रथ भी तैयार करो । देर नहीं होनी चाहिये । राजा जनकके दूत मुझे जल्दी करनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं’ ॥ ४-५ ॥

वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना च चतुरङ्गिणी । राजानमृषिभिः सार्धं व्रजन्तं पृष्ठतोऽन्वयात् ॥ ६ ॥

भावार्थ

राजाकी इस आज्ञाके अनुसार चतुरङ्गिणी सेना तैयार हो गयी और ऋषियोंके साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथके पीछे-पीछे चली ॥ ६ ॥

गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान् । राजा च जनकः श्रीमाञ्श्रुत्वा पूजामकल्पयत्॥ ७ ॥

भावार्थ

चार दिनका मार्ग तय करके वे सब लोग विदेह-देशमें जा पहुँचे । उनके आगमनका समाचार सुनकर श्रीमान् राजा जनकने स्वागत-सत्कारकी तैयारी की ॥ ७ ॥

ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम् । मुदितो जनको राजा प्रहर्षं परमं ययौ ॥ ८ ॥ उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम् । स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ ९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर आनन्दमग्न हुए राजा जनक बूढ़े महाराज दशरथके पास पहुँचे । उनसे मिलकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ ॥ राजाओंमें श्रेष्ठ मिथिलानरेशने आनन्दमग्न हुए पुरुषप्रवर राजा दशरथसे कहा—‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! आपका स्वागत है। मेरे बड़े भाग्य, जो आप यहाँ पधारे॥ ९ ॥

पुत्रयोरुभयोः प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम् । दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १० ॥ सह सर्वैर्द्विजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतुः ।

भावार्थ

‘आप यहाँ अपने दोनों पुत्रोंकी प्रीति प्राप्त करेंगे, जो उन्होंने अपने पराक्रमसे जीतकर पायी है । महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने भी हमारे सौभाग्यसे ही यहाँ पदार्पण किया है । ये इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे देवताओंके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं ॥ १०½ ॥

दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम् ॥ ११ ॥ राघवैः सह सम्बन्धाद् वीर्यश्रेष्ठैर्महाबलैः ।

भावार्थ

‘सौभाग्यसे मेरी सारी विघ्न-बाधाएँ पराजित हो गयीं । रघुकुलके महापुरुष महान् बलसे सम्पन्न और पराक्रममें सबसे श्रेष्ठ होते हैं । इस कुलके साथ सम्बन्ध होनेके कारण आज मेरे कुलका सम्मान बढ़ गया ॥ ११½ ॥

श्वः प्रभाते नरेन्द्र त्वं संवर्तयितुमर्हसि ॥ १२ ॥ यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमैः ।

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ नरेन्द्र ! कल सवेरे इन सभी महर्षियोंके साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञकी समाप्तिके बाद आप श्रीरामके विवाहका शुभकार्य सम्पन्न करें’ ॥ १२½ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिपः ॥ १३ ॥ वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः प्रत्युवाच महीपतिम् । प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेतन्मया पुरा ॥ १४ ॥ यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत् करिष्यामहे वयम् ।

भावार्थ

ऋषियोंकी मण्डलीमें राजा जनककी यह बात सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथने मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया–॥ ‘धर्मज्ञ ! मैंने पहलेसे यह सुन रक्खा है कि प्रतिग्रह दाताके अधीन होता है । अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे’ ॥ १४½ ॥

तद् धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिनः ॥ १५ ॥ श्रुत्वा विदेहाधिपतिः परं विस्मयमागतः ।

भावार्थ

सत्यवादी राजा दशरथका वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनकको बड़ा विस्मय हुआ ॥१५½॥

ततः सर्वे मुनिगणाः परस्परसमागमे ॥ १६ ॥ हर्षेण महता युक्तास्तां रात्रिमवसन् सुखम् ।

भावार्थ

तदनन्तर सभी महर्षि एक-दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और सबने बड़े सुखसे वह रात बितायी ॥ १६½ ॥

अथ रामो महातेजा लक्ष्मणेन समं ययौ ॥१७॥ विश्वामित्रं पुरस्कृत्य पितुः पादावुपस्पृशन् ।

भावार्थ

इधर महातेजस्वी श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे करके लक्ष्मणके साथ पिताजीके पास गये और उनके चरणोंका स्पर्श किया ॥१७½॥

राजा च राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षितः ॥ १८ ॥ उवास परमप्रीतो जनकेनाभिपूजितः ।

भावार्थ

राजा दशरथने भी जनकके द्वारा आदर-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल-रत्न पुत्रोंको सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। वे रातमें बड़े सुखसे वहाँ रहे ॥ १८½ ॥

जनकोऽपि महातेजाः क्रिया धर्मेण तत्त्ववित् । यज्ञस्य च सुताभ्यां च कृत्वा रात्रिमुवास ह ॥ १९ ॥

भावार्थ

महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनकने भी धर्मके अनुसार यज्ञकार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओंके लिये मङ्गला-चारका सम्पादन करके सुखसे वह रात्रि व्यतीत की ॥ १९ ॥

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