बालकाण्ड, सर्ग 41
पुत्रांश्चिरगताञ्ज्ञात्वा सगरो रघुनन्दन । नप्तारमब्रवीद् राजा दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ १ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! ‘पुत्रोंको गये बहुत दिन हो गये’—ऐसा जानकर राजा सगरने अपने पौत्र अंशुमान्से, जो अपने तेजसे देदीप्यमान हो रहा था, इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
शूरश्च कृतविद्यश्च पूर्वैस्तुल्योऽसि तेजसा । पितृणां गतिमन्विच्छ येन चाश्वोऽपवाहितः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘वत्स ! तुम शूरवीर, विद्वान् तथा अपने पूर्वजोंके तुल्य तेजस्वी हो । तुम भी अपने चाचाओंके पथका अनुसरण करो और उस चोरका पता लगाओ, जिसने मेरे यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका अपहरण कर लिया है ॥ २ ॥
अन्तर्भौमानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च । तेषां तु प्रतिघातार्थं सासिं गृह्णीष्व कार्मुकम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘देखो, पृथ्वीके भीतर बड़े-बड़े बलवान् जीव रहते हैं; अतः उनसे टक्कर लेनेके लिये तुम तलवार और धनुष भी लेते जाओ ॥ ३ ॥
अभिवाद्याभिवाद्यांस्त्वं हत्वा विघ्नकरानपि । सिद्धार्थः संनिवर्तस्व मम यज्ञस्य पारगः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जो वन्दनीय पुरुष हों, उन्हें प्रणाम करना और जो तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेवाले हों, उनको मार डालना । ऐसा करते हुए सफलमनोरथ होकर लौटो और मेरे इस यज्ञको पूर्ण कराओ’ ॥ ४ ॥
एवमुक्तोऽंशुमान् सम्यक् सगरेण महात्मना । धनुरादाय खड्गं च जगाम लघुविक्रमः ॥ ५ ॥
भावार्थ
महात्मा सगरके ऐसा कहनेपर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम कर दिखानेवाला वीरवर अंशुमान् धनुष और तलवार लेकर चल दिया ॥ ५ ॥
स खातं पितृभिर्मार्गमन्तर्भौमं महात्मभिः । प्रापद्यत नरश्रेष्ठ तेन राज्ञाभिचोदितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
नरश्रेष्ठ ! उसके महामनस्वी चाचाओंने पृथ्वीके भीतर जो मार्ग बना दिया था, उसीपर वह राजा सगरसे प्रेरित होकर गया ॥ ६ ॥
देवदानवरक्षोभिः पिशाचपतगोरगैः । पूज्यमानं महातेजा दिशागजमपश्यत ॥ ७ ॥
भावार्थ
वहाँ उस महातेजस्वी वीरने एक दिग्गजको देखा, जिसकी देवता, दानव, राक्षस, पिशाच, पक्षी और नाग—सभी पूजा कर रहे थे ॥ ७ ॥
स तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चैव निरामयम् । पितॄन् स परिपप्रच्छ वाजिहर्तारमेव च ॥ ८ ॥
भावार्थ
उसकी परिक्रमा करके कुशल-मङ्गल पूछकर अंशुमान्ने उस दिग्गजसे अपने चाचाओंका समाचार तथा अश्व चुराने-वालेका पता पूछा ॥ ८ ॥
दिशागजस्तु तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाच महामतिः । आसमञ्ज कृतार्थस्त्वं सहाश्वः शीघ्रमेष्यसि ॥ ९ ॥
भावार्थ
उसका प्रश्न सुनकर परम बुद्धिमान् दिग्गजने इस प्रकार उत्तर दिया—‘असमंज-कुमार ! तुम अपना कार्य सिद्ध करके घोड़ेसहित शीघ्र लौट आओगे’ ॥ ९ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सर्वानेव दिशागजान् । यथाक्रमं यथान्यायं प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १० ॥
भावार्थ
उसकी यह बात सुनकर अंशुमान्ने क्रमशः सभी दिग्गजोंसे न्यायानुसार उक्त प्रश्न पूछना आरम्भ किया॥१०॥
तैश्च सर्वैर्दिशापालैर्वाक्यज्ञैर्वाक्यकोविदैः । पूजितः सहयश्चैवागन्तासीत्यभिचोदितः ॥ ११ ॥
भावार्थ
वाक्यके मर्मको समझने तथा बोलनेमें कुशल उन समस्त दिग्गजोंने अंशुमान्का सत्कार किया और यह शुभ कामना प्रकट की कि तुम घोड़ेसहित लौट आओगे ॥ ११ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा जगाम लघुविक्रमः। भस्मराशीकृता यत्र पितरस्तस्य सागराः ॥ १२ ॥
भावार्थ
उनका यह आशीर्वाद सुनकर अंशुमान् शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ उसके चाचा सगरपुत्र राखके ढेर हुए पड़े थे ॥ १२ ॥
स दुःखवशमापन्नस्त्वसमञ्जसुतस्तदा । चुक्रोश परमार्तस्तु वधात् तेषां सुदुःखितः ॥ १३ ॥
भावार्थ
उनके वधसे असमंजपुत्र अंशुमान्को बड़ा दुःख हुआ। वह शोकके वशीभूत हो अत्यन्त आर्तभावसे फूट-फूटकर रोने लगा ॥ १३ ॥
यज्ञियं च हयं तत्र चरन्तमविदूरतः। ददर्श पुरुषव्याघ्रो दुःखशोकसमन्वितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
दुःख-शोकमें डूबे हुए पुरुषसिंह अंशुमान्ने अपने यज्ञसम्बन्धी अश्वको भी वहाँ पास ही चरते देखा ॥ १४ ॥
स तेषां राजपुत्राणां कर्तुकामो जलक्रियाम् । स जलार्थी महातेजा न चापश्यज्जलाशयम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी अंशुमान्ने उन राजकुमारोंको जलाञ्जलि देनेके लिये जलकी इच्छा की; किंतु वहाँ कहीं भी कोई जलाशय नहीं दिखायी दिया ॥ १५ ॥
विसार्य निपुणां दृष्टिं ततोऽपश्यत् खगाधिपम् । पितृणां मातुलं राम सुपर्णमनिलोपमम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! तब उसने दूरतककी वस्तुओंको देखनेमें समर्थ अपनी दृष्टिको फैलाकर देखा । उस समय उसे वायुके समान वेगशाली पक्षिराज गरुड़ दिखायी दिये, जो उसके चाचाओं ( सगरपुत्रों ) के मामा थे ॥ १६ ॥
स चैनमब्रवीद् वाक्यं वैनतेयो महाबलः । मा शुचः पुरुषव्याघ्र वधोऽयं लोकसम्मतः ॥ १७ ॥
भावार्थ
महाबली विनतानन्दन गरुड़ने अंशुमान्से कहा—— ‘पुरुषसिंह ! शोक न करो । इन राजकुमारोंका वध सम्पूर्ण जगत्के मङ्गलके लिये हुआ है ॥ १७ ॥
कपिलेनाप्रमेयेण दग्धा हीमे महाबलाः । सलिलं नार्हसि प्राज्ञ दातुमेषां हि लौकिकम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘विद्वन् ! अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने इन महाबली राजकुमारोंको दग्ध किया है । इनके लिये तुम्हें लौकिक जलकी अञ्जलि देना उचित नहीं है ॥ १८ ॥
गङ्गा हिमवतो ज्येष्ठा दुहिता पुरुषर्षभ । तस्यां कुरु महाबाहो पितॄणां सलिलक्रियाम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! महाबाहो ! हिमवान्की जो ज्येष्ठ पुत्री गङ्गाजी हैं, उन्हींके जलसे अपने इन चाचाओंका तर्पण करो ॥ १९ ॥
भस्मराशीकृतानेतान् प्लावयेल्लोकपावनी । तया क्लिन्नमिदं भस्म गङ्गया लोककान्तया । षष्टिं पुत्रसहस्राणि स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥ २० ॥
भावार्थ
‘जिस समय लोकपावनी गङ्गा राखके ढेर होकर गिरे हुए उन साठ हजार राजकुमारोंको अपने जलसे आप्लावित करेंगी, उसी समय उन सबको स्वर्गलोकमें पहुँचा देंगी । लोककमनीया गङ्गाके जलसे भीगी हुई यह भस्मराशि इन सबको स्वर्गलोकमें भेज देगी ॥ २० ॥
निर्गच्छाश्वं महाभाग संगृह्य पुरुषर्षभ । यज्ञं पैतामहं वीर निर्वर्तयितुमर्हसि ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘महाभाग ! पुरुषप्रवर ! वीर ! अब तुम घोड़ा लेकर जाओ और अपने पितामहका यज्ञ पूर्ण करो’ ॥ २१ ॥
सुपर्णवचनं श्रुत्वा सोऽंशुमानतिवीर्यवान् । त्वरितं हयमादाय पुनरायान्महातपाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
गरुड़की यह बात सुनकर अत्यन्त पराक्रमी महातपस्वी अंशुमान् घोड़ा लेकर तुरंत लौट आया ॥ २२ ॥
ततो राजानमासाद्य दीक्षितं रघुनन्दन । न्यवेदयद् यथावृत्तं सुपर्णवचनं तथा ॥ २३ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! यज्ञमें दीक्षित हुए राजाके पास आकर उसने सारा समाचार निवेदन किया और गरुड़की बतायी हुई बात भी कह सुनायी ॥ २३ ॥
तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं वाक्यमंशुमतो नृपः । यज्ञं निर्वर्तयामास यथाकल्पं यथाविधि ॥ २४ ॥
भावार्थ
अंशुमान्के मुखसे यह भयंकर समाचार सुनकर राजा सगरने कल्पोक्त नियमके अनुसार अपना यज्ञ विधिवत् पूर्ण किया ॥ २४ ॥
स्वपुरं त्वगमच्छ्रीमानिष्टयज्ञो महीपतिः । गङ्गायाश्चागमे राजा निश्चयं नाध्यगच्छत ॥ २५ ॥
भावार्थ
यज्ञ समाप्त करके पृथ्वीपति महाराज सगर अपनी राजधानीको लौट आये । वहाँ आनेपर उन्होंने गङ्गाजीको ले आनेके विषयमें बहुत विचार किया; किंतु वे किसी निश्चयपर न पहुँच सके ॥ २५ ॥
अगत्वा निश्चयं राजा कालेन महता महान् । त्रिंशद्वर्षसहस्राणि राज्यं कृत्वा दिवं गतः ॥ २६ ॥
भावार्थ
दीर्घकालतक विचार करनेपर भी उन्हें कोई निश्चित उपाय नहीं सूझा और तीस हजार वर्षोंतक राज्य करके वे स्वर्गलोकको चले गये ॥ २६ ॥
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