बालकाण्ड, सर्ग 40
देवतानां वचः श्रुत्वा भगवान् वै पितामहः । प्रत्युवाच सुसंत्रस्तान् कृतान्तबलमोहितान् ॥ १ ॥
भावार्थ
देवताओंकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने कितने ही प्राणियोंका अन्त करनेवाले सगर-पुत्रोंके बलसे मोहित एवं भयभीत हुए उन देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः । महिषी माधवस्यैषा स एव भगवान् प्रभुः ॥ २ ॥ कापिलं रूपमास्थाय धारयत्यनिशं धराम् । तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘देवगण ! यह सारी पृथ्वी जिन भगवान् वासुदेवकी वस्तु है तथा जिन भगवान् लक्ष्मीपतिकी यह रानी है, वे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि कपिल मुनिका रूप धारण करके निरन्तर इस पृथ्वीको धारण करते हैं । उनकी कोपाग्निसे ये सारे राजकुमार जलकर भस्म हो जायँगे ॥ २-३ ॥
पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातनः । सगरस्य च पुत्राणां विनाशो दीर्घदर्शिनाम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘पृथ्वीका यह भेदन सनातन है—प्रत्येक कल्पमें अवश्यम्भावी है । ( श्रुतियों और स्मृतियोंमें आये हुए सागर आदि शब्दोंसे यह बात सुस्पष्ट ज्ञात होती है । ) इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषोंने सगरके पुत्रोंका भावी विनाश भी देखा ही है; अतः इस विषयमें शोक करना अनुचित है’ ॥ ४ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा त्रयस्त्रिंशदरिंदमाः । देवाः परमसंहृष्टाः पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले तैंतीस देवता बड़े हर्षमें भरकर जैसे आये थे, उसी तरह पुनः लौट गये ॥ ५ ॥
सगरस्य च पुत्राणां प्रादुरासीन्महास्वनः । पृथिव्यां भिद्यमानायां निर्घातसमनिःस्वनः ॥ ६ ॥ ततो भित्त्वा महीं सर्वां कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । सहिताः सागराः सर्वे पितरं वाक्यमब्रुवन् ॥ ७ ॥
भावार्थ
सगरपुत्रोंके हाथसे जब पृथ्वी खोदी जा रही थी, उस समय उससे वज्रपातके समान बड़ा भयंकर शब्द होता था ॥ इस तरह सारी पृथ्वी खोदकर तथा उसकी परिक्रमा करके वे सभी सगर-पुत्र पिताके पास खाली हाथ लौट आये और बोले—॥ ७ ॥
परिक्रान्ता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिताः । देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगपन्नगाः ॥ ८ ॥ न च पश्यामहेऽश्वं ते अश्वहर्तारमेव च । किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘पिताजी ! हमने सारी पृथ्वी छान डाली । देवता, दानव, राक्षस, पिशाच और नाग आदि बड़े-बड़े बलवान् प्राणियोंको मार डाला । फिर भी हमें न तो कहीं घोड़ा दिखायी दिया और न घोड़ेका चुरानेवाला ही । आपका भला हो । अब हम क्या करें ? इस विषयमें आप ही कोई उपाय सोचिये’ ॥ ८-९ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां राजसत्तमः । समन्युरब्रवीद् वाक्यं सगरो रघुनन्दन ॥ १० ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! पुत्रोंका यह वचन सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ सगरने उनसे कुपित होकर कहा—॥ १० ॥
भूयः खनत भद्रं वो विभेद्य वसुधातलम् । अश्वहर्तारमासाद्य कृतार्थाश्च निवर्तत ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जाओ, फिरसे सारी पृथ्वी खोदो और इसे विदीर्ण करके घोड़ेके चोरका पता लगाओ । चोरतक पहुँचकर काम पूरा होनेपर ही लौटना’ ॥ ११ ॥
पितुर्वचनमासाद्य सगरस्य महात्मनः । षष्टिः पुत्रसहस्राणि रसातलमभिद्रवन् ॥ १२ ॥
भावार्थ
अपने महात्मा पिता सगरकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके वे साठ हजार राजकुमार रसातलकी ओर बढ़े ( और रोषमें भरकर पृथ्वी खोदने लगे ) ॥ १२ ॥
खन्यमाने ततस्तस्मिन् ददृशुः पर्वतोपमम् । दिशागजं विरूपाक्षं धारयन्तं महीतलम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
उस खुदाईके समय ही उन्हें एक पर्वताकार दिग्गज दिखायी दिया, जिसका नाम विरूपाक्ष है । वह इस भूतलको धारण किये हुए था ॥ १३ ॥
सपर्वतवनां कृत्स्नां पृथिवीं रघुनन्दन । धारयामास शिरसा विरूपाक्षो महागजः ॥ १४ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! महान् गजराज विरूपाक्षने पर्वत और वनोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण कर रक्खा था ॥ १४ ॥
यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजः । खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
काकुत्स्थ ! वह महान् दिग्गज जिस समय थककर विश्रामके लिये अपने मस्तकको इधर-उधर हटाता था, उस समय भूकम्प होने लगता था ॥ १५ ॥
ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा दिशापालं महागजम् । मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्त्वा रसातलम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! पूर्व दिशाकी रक्षा करनेवाले विशाल गजराज विरूपाक्षकी परिक्रमा करके उसका सम्मान करते हुए वे सगरपुत्र रसातलका भेदन करके आगे बढ़ गये ॥ १६ ॥
ततः पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदुः पुनः । दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
पूर्व दिशाका भेदन करनेके पश्चात् वे पुनः दक्षिण दिशाकी भूमिको खोदने लगे । दक्षिण दिशामें भी उन्हें एक महान् दिग्गज दिखायी दिया ॥ १७ ॥
महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम् । शिरसा धारयन्तं गां विस्मयं जग्मुरुत्तमम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
उसका नाम था महापद्म । महान् पर्वतके समान ऊँचा वह विशालकाय गजराज अपने मस्तकपर पृथ्वीको धारण करता था । उसे देखकर उन राजकुमारोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ १८ ॥
ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा सगरस्य महात्मनः । षष्टिः पुत्रसहस्राणि पश्चिमां बिभिदुर्दिशम् ॥ १९ ॥ पश्चिमायामपि दिशि महान्तमचलोपमम् । दिशागजं सौमनसं ददृशुस्ते महाबलाः ॥ २० ॥
भावार्थ
महात्मा सगरके वे साठ हजार पुत्र उस दिग्गजकी परिक्रमा करके पश्चिम दिशाकी भूमिका भेदन करने लगे ॥ पश्चिम दिशामें भी उन महाबली सगरपुत्रोंने महान् पर्वताकार दिग्गज सौमनसका दर्शन किया ॥ २० ॥
ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चापि निरामयम् । खनन्तः समुपाक्रान्ता दिशं सोमवतीं तदा ॥ २१ ॥
भावार्थ
उसकी भी परिक्रमा करके उसका कुशल-समाचार पूछकर वे सभी राजकुमार भूमि खोदते हुए उत्तर दिशामें जा पहुँचे ॥ २१ ॥
उत्तरस्यां रघुश्रेष्ठ ददृशुर्हिमपाण्डुरम् । भद्रं भद्रेण वपुषा धारयन्तं महीमिमाम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
रघुश्रेष्ठ ! उत्तर दिशामें उन्हें हिमके समान श्वेतभद्र नामक दिग्गज दिखायी दिया, जो अपने कल्याणमय शरीरसे इस पृथ्वीको धारण किये हुए था ॥ २२ ॥
समालभ्य ततः सर्वे कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम् । षष्टिः पुत्रसहस्राणि बिभिदुर्वसुधातलम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
उसका कुशल-समाचार पूछकर राजा सगरके वे सभी साठ हजार पुत्र उसकी परिक्रमा करनेके पश्चात् भूमि खोदनेके काममें जुट गये ॥ २३ ॥
ततः प्रागुत्तरां गत्वा सागराः प्रथितां दिशम् । रोषादभ्यखनन् सर्वे पृथिवीं सगरात्मजाः ॥ २४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशामें जाकर उन सगर-कुमारोंने एक साथ होकर रोषपूर्वक पृथ्वीको खोदना आरम्भ किया ॥ २४ ॥
ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबलाः । दद्दशुः कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारोंने वहाँ सनातन वासुदेवस्वरूप भगवान् कपिलको देखा ॥ २५ ॥
हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरतः । प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः सर्वे ते रघुनन्दन ॥ २६ ॥
भावार्थ
राजा सगरके यज्ञका वह घोड़ा भी भगवान् कपिलके पास ही चर रहा था । रघुनन्दन ! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ २६ ॥
ते तं यज्ञहनं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणाः । खनित्रलाङ्गलधरा नानावृक्षशिलाधराः ॥ २७ ॥
भावार्थ
भगवान् कपिलको अपने यज्ञमें विघ्न डालनेवाला जानकर उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं । उन्होंने अपने हाथोंमें खंती, हल और नाना प्रकारके वृक्ष एवं पत्थरोंके टुकड़े ले रखे थे ॥ २७ ॥
अभ्यधावन्त संक्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रुवन् । अस्माकं त्वं हि तुरगं यज्ञियं हृतवानसि ॥ २८ ॥ दुर्मेधस्त्वं हि सम्प्राप्तान् विद्धि नः सगरात्मजान् ।
भावार्थ
वे अत्यन्त रोषमें भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले— ‘अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह । तू ही हमारे यज्ञके घोड़ेको यहाँ चुरा लाया है । दुर्बुद्धे ! अब हम आ गये । तू समझ ले, हम महाराज सगरके पुत्र हैं’ ॥ २८½ ॥
श्रुत्वा तद् वचनं तेषां कपिलो रघुनन्दन ॥ २९ ॥ रोषेण महताविष्टो हुङ्कारमकरोत् तदा ।
भावार्थ
रघुनन्दन ! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिलको बड़ा रोष हुआ और उस रोषके आवेशमें ही उनके मुँहसे एक हुंकार निकल पड़ा ॥ २९½ ॥
ततस्तेनाप्रमेयेण कपिलेन महात्मना । भस्मराशीकृताः सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजाः ॥ ३० ॥
भावार्थ
श्रीराम ! उस हुंकारके साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने उन सभी सगरपुत्रोंको जलाकर राखका ढेर कर दिया ॥ ३० ॥
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