दोहा 105b
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥ गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥ १ ॥
भावार्थ
हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये। मैं दीन, मलिन ( उदास ), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतनेपर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीं भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥१॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥ परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥ २ ॥
भावार्थ
एक ब्राह्मण वेदविधिसे सदा शिवजीकी पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थके ज्ञाता थे, वे शम्भुके उपासक थे, पर श्रीहरिकी निन्दा करनेवाले न थे॥२॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥ बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥ ३ ॥
भावार्थ
मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीतिके घर थे। हे स्वामी! बाहरसे नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्रकी भाँति मानकर पढ़ाते थे॥३॥
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा॥ जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई॥४॥
भावार्थ
उन ब्राह्मणश्रेष्ठने मुझको शिवजीका मन्त्र दिया और अनेकों प्रकारके शुभ उपदेश किये। मैं शिवजीके मन्दिरमें जाकर मन्त्र जपता। मेरे हृदयमें दम्भ और अहंकार बढ़ गया॥४॥
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह॥१०५ (क)॥
भावार्थ
मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धिवाला मोहवश श्रीहरिके भक्तों और द्विजोंको देखते ही जल उठता और विष्णुभगवान्से द्रोह करता था॥१०५ ( क )॥
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥१०५ (ख)॥
भावार्थ
गुरुजी मेरे आचरण देखकर दुःखित थे। वे मुझे नित्य ही भलीभाँति समझाते, पर [ मैं कुछ भी नहीं समझता, उलटे ] मुझे अत्यन्त क्रोध उत्पन्न होता। दम्भीको कभी नीति अच्छी लगती है ?॥१०५ ( ख )॥
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