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दोहा 106b

गुरुजीका अपमान एवं शिवजीके शापकी बात सुनना · रुद्राष्टक

चौ०

एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई॥ सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥१॥

भावार्थ

एक बार गुरुजीने मुझे बुला लिया और बहुत प्रकारसे [ परमार्थ ] नीतिकी शिक्षा दी कि हे पुत्र! शिवजीकी सेवाका फल यही है कि श्रीरामजीके चरणोंमें प्रगाढ़ भक्ति हो॥१॥

चौ०

रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥ जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥२॥

भावार्थ

हे तात! शिवजी और ब्रह्माजी भी श्रीरामजीको भजते हैं [ फिर ] नीच मनुष्यकी तो बात ही कितनी है ? ब्रह्माजी और शिवजी जिनके चरणोंके प्रेमी हैं, अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है ?॥२॥

चौ०

हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥ अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥३॥

भावार्थ

गुरुजीने शिवजीको हरिका सेवक कहा। यह सुनकर हे पक्षिराज! मेरा हृदय जल उठा। नीच जातिका मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलानेसे साँप॥३॥

चौ०

मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती॥ अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा॥४॥

भावार्थ

अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति मैं दिन-रात गुरुजीसे द्रोह करता। गुरुजी अत्यन्त दयालु थे, उनको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं आता। [ मेरे द्रोह करनेपर भी ] वे बार-बार मुझे उत्तम ज्ञानकी ही शिक्षा देते थे॥४॥

चौ०

जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥ धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥५॥

भावार्थ

नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसीको मारकर उसीका नाश करता है। हे भाई! सुनिये, आगसे उत्पन्न हुआ धुआँ मेघकी पदवी पाकर उसी अग्निको बुझा देता है॥५॥

चौ०

रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई॥ मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई॥६॥

भावार्थ

धूल रास्तेमें निरादरसे पड़ी रहती है और सदा सब [ राह चलनेवालों ] के लातोंकी मार सहती है। पर जब पवन उसे उड़ाता ( ऊँचा उठाता ) है, तो सबसे पहले वह उसी ( पवन ) को भर देती है और फिर राजाओंके नेत्रों और किरीटों ( मुकुटों ) पर पड़ती है॥६॥

चौ०

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा॥ कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती॥७॥

भावार्थ

हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, ऐसी बात समझकर बुद्धिमान्‌ लोग अधम ( नीच ) का संग नहीं करते। कवि और पण्डित ऐसी नीति कहते हैं कि दुष्टसे न कलह ही अच्छा है, न प्रेम ही॥७॥

चौ०

उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥ मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई॥८॥

भावार्थ

हे गोसाईं! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये। दुष्टको कुत्तेकी तरह दूरसे ही त्याग देना चाहिये। मैं दुष्ट था, हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी। [ इसीलिये यद्यपि ] गुरुजी हितकी बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी॥८॥

दो०

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥१०६ (क)॥

भावार्थ

एक दिन मैं शिवजीके मन्दिरमें शिवनाम जप रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आये, पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया॥१०६ ( क )॥

दो०

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥१०६ (ख)॥

भावार्थ

गुरुजी दयालु थे, [ मेरा दोष देखकर भी ] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदयमें लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरुका अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके॥१०६ ( ख )॥

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