दोहा 107b
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥ जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥१॥
भावार्थ
मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरुको क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्तके हैं और उन्हें [ पूर्ण तथा ] यथार्थ ज्ञान है,॥१॥
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥ जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥२॥
भावार्थ
तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा; [ क्योंकि ] नीतिका विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। अरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय॥२॥
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥३॥
भावार्थ
जो मूर्ख गुरुसे ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगोंतक रौरव नरकमें पड़े रहते हैं। फिर ( वहाँसे निकलकर ) वे तिर्यक् ( पशु, पक्षी आदि ) योनियोंमें शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मोंतक दुःख पाते रहते हैं॥३॥
बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥४॥
भावार्थ
अरे पापी! तू गुरुके सामने अजगरकी भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पापसे ढक गयी है, [ अतः ] तू सर्प हो जा। और अरे अधमसे भी अधम! इस अधोगति ( सर्पकी नीची योनि ) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़के खोखलेमें जाकर रह॥४॥
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥१०७ (क)॥
भावार्थ
शिवजीका भयानक शाप सुनकर गुरुजीने हाहाकार किया। मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप उत्पन्न हुआ॥१०७ ( क )॥
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥१०७ (ख)॥
भावार्थ
प्रेमसहित दण्डवत् करके वे ब्राह्मण श्रीशिवजीके सामने हाथ जोड़कर मेरी भयङ्कर गति ( दण्ड ) का विचार कर गद्गद वाणीसे विनती करने लगे— ॥१०७ ( ख )॥
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