Ramayana.com

दोहा 104b

चौ०

नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥ सुद्ध सत्व समता बिग्याना । कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामजीकी मायासे प्रेरित होकर सबके हृदयोंमें सभी युगोंके धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मनका प्रसन्न होना, इसे सत्ययुगका प्रभाव जाने॥१॥

चौ०

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥ बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥ २ ॥

भावार्थ

सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मोंमें प्रीति हो, सब प्रकारसे सुख हो, यह त्रेताका धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मनमें हर्ष और भय हो, यह द्वापरका धर्म है॥२॥

चौ०

तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥ बुध जुग धर्म जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥ ३ ॥

भावार्थ

तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुगका प्रभाव है। पण्डित लोग युगोंके धर्मको मनमें जान ( पहिचान ) कर, अधर्म छोड़कर धर्ममें प्रीति करते हैं॥३॥

चौ०

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥ नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न ब्यापइ माया ॥ ४ ॥

भावार्थ

जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म ( युगधर्म ) नहीं व्यापते। हे पक्षिराज! नट ( बाजीगर ) का किया हुआ कपट-चरित्र ( इन्द्रजाल ) देखनेवालोंके लिये बड़ा विकट ( दुर्गम ) होता है, पर नटके सेवक ( जंभूरे ) को उसकी माया नहीं व्यापती॥४॥

दो०

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं । भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥ १०४ (क) ॥

भावार्थ

श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं जाते। मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर ( निष्कामभावसे ) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये॥१०४ ( क )॥

दो०

तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस । परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥ १०४ (ख) ॥

भावार्थ

हे पक्षिराज! उस कलिकालमें मैं बहुत वर्षोंतक अयोध्यामें रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्तिका मारा विदेश चला गया॥१०४ ( ख )॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें