Ramayana.com

दोहा 103b

चौ०

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥ त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥ १ ॥

भावार्थ

सत्ययुगमें सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरिका ध्यान करके सब प्राणी भवसागरसे तर जाते हैं। त्रेतामें मनुष्य अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं और सब कर्मोंको प्रभुके समर्पण करके भवसागरसे पार हो जाते हैं॥१॥

चौ०

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥ २ ॥

भावार्थ

द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है। और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं॥२॥

चौ०

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥ सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥ ३ ॥

भावार्थ

कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है,॥३॥

चौ०

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥ कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥ ४ ॥

भावार्थ

वही भवसागरसे तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है। कलियुगका एक पवित्र प्रताप ( महिमा ) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [ मानसिक ] पाप नहीं होते॥४॥

दो०

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास । गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥ १०३ (क) ॥

भावार्थ

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुगके समान दूसरा युग नहीं है। [ क्योंकि ] इस युगमें श्रीरामजीके निर्मल गुणसमूहोंको गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [ रूपी समुद्र ] से तर जाता है॥१०३ ( क )॥

दो०

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान । जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥ १०३ (ख) ॥

भावार्थ

धर्मके चार चरण ( सत्य, दया, तप और दान ) प्रसिद्ध हैं, जिनमेंसे कलिमें एक [ दानरूपी ] चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है॥१०३ ( ख )॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें