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दोहा 8

चौ०

तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई॥ सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥१॥

भावार्थ

तब रावणने मन्दोदरीको उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा—हे प्रिये! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगत्‌में मेरे समान योद्धा है कौन ?॥ १ ॥

चौ०

बरुन कुबेर पवन जम काला। भुजबल जितेउँ सकल दिगपाला॥ देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें॥२॥

भावार्थ

वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालोंको तथा कालको भी मैंने अपनी भुजाओंके बलसे जीत रखा है। देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वशमें हैं। फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया ?॥ २ ॥

चौ०

नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥ मंदोदरीं हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥३॥

भावार्थ

मन्दोदरीने उसे बहुत तरहसे समझाकर कहा [ किन्तु रावणने उसकी एक भी बात न सुनी ] और वह फिर सभामें जाकर बैठ गया। मन्दोदरीने हृदयमें ऐसा जान लिया कि कालके वश होनेसे पतिको अभिमान हो गया है॥ ३ ॥

चौ०

सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेहिं बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा॥ कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा॥४॥

भावार्थ

सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि शत्रुके साथ किस प्रकारसे युद्ध करना होगा ? मन्त्री कहने लगे—हे राक्षसोंके नाथ! हे प्रभु! सुनिये, आप बार-बार क्या पूछते हैं ?॥४॥

चौ०

कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा॥५॥

भावार्थ

कहिये तो [ ऐसा ] कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाय ? ( भयकी बात ही क्या है ? ) मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन [ की सामग्री ] हैं॥५॥

दो०

सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि। नीति बिरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि॥८॥

भावार्थ

कानोंसे सबके वचन सुनकर [ रावणका पुत्र ] प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा—हे प्रभु! नीतिके विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिये, मन्त्रियोंमें बहुत ही थोड़ी बुद्धि है॥८॥

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