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दोहा 7

चौ०

नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई॥ चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते॥१॥

भावार्थ

हे नाथ! श्रीरघुनाथजी तो दीनोंपर दया करनेवाले हैं। सम्मुख ( शरण ) जानेपर तो बाघ भी नहीं खाता। आपको जो कुछ करना चाहिये था, वह सब आप कर चुके। आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभीको जीत लिया॥ १ ॥

चौ०

संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥ तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता॥२॥

भावार्थ

हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन ( बुढ़ापे ) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये। हे स्वामी! वहाँ ( वनमें ) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं॥ २ ॥

चौ०

सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी॥ मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी॥३॥

भावार्थ

हे नाथ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्‌का भजन कीजिये। जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं— ॥ ३ ॥

चौ०

सोइ कोसलाधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया॥ जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन॥४॥

भावार्थ

वही कोसलाधीश श्रीरघुनाथजी आपपर दया करने आये हैं। हे प्रियतम! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यन्त पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकोंमें फैल जायगा॥ ४ ॥

दो०

अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात। नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात॥७॥

भावार्थ

ऐसा कहकर, नेत्रोंमें [ करुणाका ] जल भरकर और पतिके चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीरसे मन्दोदरीने कहा—हे नाथ! श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय॥ ७ ॥

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