दोहा 9
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥ बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥१॥
भावार्थ
ये सभी मूर्ख ( खुशामदी ) मन्त्री ठकुरसुहाती ( मुँहदेखी ) कह रहे हैं। हे नाथ! इस प्रकारकी बातोंसे पूरा नहीं पड़ेगा। एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था। उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं ( स्मरण किया करते हैं )॥१॥
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू॥ सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा॥२॥
भावार्थ
उस समय तुमलोगोंमेंसे किसीको भूख न थी ? [ बंदर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर ] नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया ? इन मन्त्रियोंने स्वामी ( आप ) को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुननेमें अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुःख पाना होगा॥२॥
जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला॥ सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई॥३॥
भावार्थ
जिसने खेल-ही-खेलमें समुद्र बँधा लिया और जो सेनासहित सुबेल पर्वतपर आ उतरा। हे भाई! कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे ? सब गाल फुला-फुलाकर ( पागलोंकी तरह ) वचन कह रहे हैं!॥३॥
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर॥ प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं॥४॥
भावार्थ
हे तात! मेरे वचनोंको बहुत आदरसे ( बड़े गौरसे ) सुनिये। मुझे मनमें कायर न समझ लीजियेगा। जगत्में ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड ( बहुत अधिक ) हैं, जो प्यारी ( मुँहपर मीठी लगनेवाली ) बात ही सुनते और कहते हैं॥४॥
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥ प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥५॥
भावार्थ
हे प्रभो! सुननेमें कठोर परन्तु [ परिणाममें ] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। नीति सुनिये, [ उसके अनुसार ] पहले दूत भेजिये, और [ फिर ] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति [ मेल ] कर लीजिये॥५॥
नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि। नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि॥९॥
भावार्थ
यदि वे स्त्री पाकर लौट जायँ, तब तो [ व्यर्थ ] झगड़ा न बढ़ाइये। नहीं तो ( यदि न फिरें तो ) हे तात! सम्मुख युद्धभूमिमें उनसे हठपूर्वक ( डटकर ) मार-काट कीजिये॥९॥
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