दोहा 44
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥ रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई॥१॥
भावार्थ
युद्धमें शत्रुओंके विरुद्ध दोनों वानर क्रुद्ध हो गये। हृदयमें श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके दोनों दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलराज श्रीरामजीकी दुहाई बोलने लगे॥ १॥
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा॥ नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती॥२॥
भावार्थ
उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया। यह देखकर राक्षसराज रावण डर गया। सब स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पीटने लगीं [ और कहने लगीं— ] अबकी बार दो उत्पाती वानर [ एक साथ ] आ गये॥ २॥
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं॥ पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा॥३॥
भावार्थ
वानरलीला करके ( घुड़की देकर ) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनाते हैं। फिर सोनेके खंभोंको हाथोंसे पकड़कर उन्होंने [ परस्पर ] कहा कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय॥ ३॥
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥४॥
भावार्थ
वे गर्जकर शत्रुकी सेनाके बीचमें कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसका मर्दन करने लगे। किसीकी लातसे और किसीकी थप्पड़से खबर लेते हैं [ और कहते हैं कि ] तुम श्रीरामजीको नहीं भजते, उसका यह फल लो॥ ४॥
एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड। रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥४४॥
भावार्थ
एकको दूसरेसे [ रगड़कर ] मसल डालते हैं और सिरोंको तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावणके सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दहीके कूँड़े फूट रहे हों॥ ४४॥
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