दोहा 43
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे॥ कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता॥ १ ॥
भावार्थ
[ शिवजी कहते हैं— ] वानर भयातुर होकर ( डरके मारे घबड़ाकर ) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर [ वे ही ] जीतेंगे। कोई कहता है—अंगद-हनुमान् कहाँ हैं ? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?॥ १ ॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना॥ मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई॥२॥
भावार्थ
हनुमान्जीने जब अपने दलको विकल ( भयभीत ) हुआ सुना, उस समय वे बलवान् पश्चिम द्वारपर थे। वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी॥ २ ॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥ कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा॥३॥
भावार्थ
तब पवनपुत्र हनुमान्जीके मनमें बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे कालके समान योद्धा बड़े जोरसे गरजे और कूदकर लङ्काके किलेपर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनादकी ओर दौड़े॥ ३॥
भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता॥ दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना॥४॥
भावार्थ
रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात मारी। दूसरा सारथि मेघनादको व्याकुल जानकर, उसे रथमें डालकर, तुरंत घर ले आया॥ ४॥
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल। रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥४३॥
भावार्थ
इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किलेपर अकेले ही गये हैं, तो रणमें बाँके बालिपुत्र वानरके खेलकी तरह उछलकर किलेपर चढ़ गये॥ ४३॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें