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दोहा 38b

अंगद-राम-संवाद · युद्धारम्भ

चौ०

नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥ बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥१॥

भावार्थ

स्त्रीके बाणके समान वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभामें चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमानमें फूलकर सिंहासनपर जा बैठा॥ १ ॥

चौ०

इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥ अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥२॥

भावार्थ

यहाँ ( सुबेल पर्वतपर ) श्रीरामजीने अंगदको बुलाया। उन्होंने आकर चरण-कमलोंमें सिर नवाया। बड़े आदरसे उन्हें पास बैठाकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजी हँसकर बोले—॥ २॥

चौ०

बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही॥ रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका॥३॥

भावार्थ

हे बालिके पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है। हे तात! इसीसे मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना। जो रावण राक्षसोंके कुलका तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबलकी जगत्‌भरमें धाक है, ॥ ३॥

चौ०

तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए॥ सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी॥४॥

भावार्थ

उसके चार मुकुट तुमने फेंके। हे तात! बताओ, तुमने उनको किस प्रकारसे पाया? [ अंगदने कहा ] हे सर्वज्ञ! हे शरणागतको सुख देनेवाले! सुनिये। वे मुकुट नहीं हैं।वे तो राजाके चार गुण हैं॥ ४॥

चौ०

साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥ नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए॥५॥

भावार्थ

हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद—ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं। ये नीति-धर्मके चार सुन्दर चरण हैं। [ किन्तु रावणमें धर्मका अभाव है ] ऐसा जीमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं॥ ५॥

दो०

धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस॥३८ (क)॥

भावार्थ

दशशीश रावण धर्महीन, प्रभुके पदसे विमुख और कालके वशमें है। इसलिये हे कोसलराज! सुनिये, वे गुण रावणको छोड़कर आपके पास आ गये हैं॥ ३८ ( क )॥

दो०

परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार॥३८ (ख)॥

भावार्थ

अंगदकी परम चतुरता [ पूर्ण उक्ति ] कानोंसे सुनकर उदार श्रीरामचन्द्रजी हँसने लगे। फिर बालिपुत्रने किलेके ( लङ्काके ) सब समाचार कहे॥ ३८ ( ख )॥

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