दोहा 39
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए॥ लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥१॥
भावार्थ
जब शत्रुके समाचार प्राप्त हो गये, तब श्रीरामचन्द्रजीने सब मन्त्रियोंको पास बुलाया [ और कहा— ] लङ्काके चार बड़े विकट दरवाजे हैं। उनपर किस तरह आक्रमण किया जाय, इसपर विचार करो॥ १ ॥
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन॥ करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा॥२॥
भावार्थ
तब वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवान् और विभीषणने हृदयमें सूर्यकुलके भूषण श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया। वानरोंकी सेनाके चार दल बनाये॥ २॥
जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे॥ प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए॥३॥
भावार्थ
और उनके लिये यथायोग्य ( जैसे चाहिये वैसे ) सेनापति नियुक्त किये। फिर सब यूथपतियोंको बुला लिया और प्रभुका प्रताप कहकर सबको समझाया, जिसे सुनकर वानर सिंहके समान गर्जना करके दौड़े॥ ३॥
हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं॥ गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा॥४॥
भावार्थ
वे हर्षित होकर श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाते हैं और पर्वतोंके शिखर ले-लेकर सब वीर दौड़ते हैं। ‘कोसलराज श्रीरघुवीरजीकी जय हो’ पुकारते हुए भालू और वानर गरजते और ललकारते हैं॥ ४॥
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहिं भेरी॥५॥
भावार्थ
लङ्काको अत्यन्त श्रेष्ठ ( अजेय ) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे निडर होकर चले। चारों ओरसे घिरी हुई बादलोंकी घटाकी तरह लङ्काको चारों दिशाओंसे घेरकर वे मुँहसे ही डंके और भेरी बजाने लगे॥ ५॥
जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव। गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव॥३९॥
भावार्थ
महान् बलकी सीमा वे वानर-भालू सिंहके समान ऊँचे स्वरसे ‘श्रीरामजीकी जय’, ‘लक्ष्मणजीकी जय’, ‘वानरराज सुग्रीवकी जय’— ऐसी गर्जना करने लगे॥ ३९॥
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